विकास की चाह रखने वालों को बलिदान करना ही पड़ता है

vikas-ke-path-par-bharat-original-imafq2hzpvrgwueb (1)

विमल भाई

नदियां हमारी संस्कृति और सभ्यता की प्रतीक हैं। पूरी दुनिया में सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुईं हैं। मानव सभ्यता के विकास में इनका महत्वपूर्ण योगदान है। हमारे देश में तो नदियों को पूजने की परंपरा रही है। हमारे यहां कहा गया है कि गंगा के जल से यदि आचमन भर कर लिया जाए तो व्यक्ति को मोक्ष मिल जाता है और नर्मदा की ओर मुख करके प्रणाम भर कर लें तो आप तर जाएंगे। तात्पर्य है कि हमने नदियों को पूजने की हद तक सम्मान दिया। ऐसी परंपरा दुनिया की किसी और सभ्यता में नहीं मिलती।
अपने देश में नदियां हमारे जीवन से जुड़ी रही हैं। विशाल कुंभ मेले के अलावा पूरे देश भर में प्राय: सभी नदियों के किनारे पर छोटे-बड़े मेले लगते हैं। इन मेलों का कोई आयोजन नहीं करता, कोई उसमें किसी को बुलाता नहीं, फिर भी सभी उसमें जाते हैं। नदियों को हम इतना पवित्र मानते थे कि पहले कोई भी इसमें चप्पल पहन कर नहीं जाता था। नदी के किनारे से भी गुजरेंगे तो प्रणाम करेंगे। नदी दिखते ही हमारे हाथ जुड़ते हैं। परंतु यह सब केवल आस्था का विषय नहीं है। पुराने समय में हम प्रकृति के साथ और नदियों के साथ साहचर्य का जीवन व्यतीत करते थे, यह सब उसका ही प्रतीक है। ये सारे नियम केवल और केवल नदियों की सुरक्षा और विकास के लिए थे। नदियों में दूध चढ़ाने की परंपरा भी इसका ही एक हिस्सा थी।
नदियों से हम कितना जुड़े हुए थे इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। एक नदी को क्ंवारी नदी माना जाता था और उसमें यदि कभी बाढ़ आती तो महिलाएं उसमें सिंदूर डाल देती थीं कि इससे नदी शरमा कर वापस लौट जाएगी और वह वापस हो भी जाती थी। भागीरथी को सास और अलकनंदा को बहू कहा गया। नदियों के साथ इस प्रकार हमने संबंध जोड़े थे। नदियां हमारे स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी हुई थीं। क्रांतिकारियों ने सपने देखे थे कि आजादी मिलेगी तो हमारी गंगा स्वतंत्र बहेगी। परंतु आज हमने गंगा और अन्य नदियों की क्या दुर्दशा कर दी है?
आज कोई जगह नहीं है जहां नदियां स्वतंत्र बहती हो। हर जगह हमने उसे बांध रखा है। मैं यह समझ नहीं पाता कि हम जिसे मां कहते हैं, जिस नदी को हम पूजते हैं, उसके साथ ऐसा व्यवहार कैसे कर सकते हैं? केवल एक नर्मदा और उसकी सहायक नदियों पर छोटी बड़ी तीन हजार से अधिक परियोजनाएं बनाई गई हैं। भागीरथी को सुरंगों में डाल दिया गया है। वहां तो नदी दिखती ही नहीं है। आज गंगा के किनारे रहने वाले लोगों में काफी बीमारियां हैं। बांधों के किनारे बसे गांवों व शहरों में रहने वाले लोगों में दमा जैसी श्वांस के रोग काफी बढ़ रहे हैं। उदाहरण के लिए भाखड़ा बांध के किनारे के गांवों व शहरों में मैंने जाकर देखा है। वहां इन बीमारियों से निपटने के लिए 107 करोड़ का बजट बनाया गया था। इसी प्रकार टिहरी परियोजना के आसपास के गांवों में चार हजार लोग मलेरिया से पीडि़त थे। जो नदियां जीवनदायिनी थीं, वे रोगदायिनी कैसे होती जा रही हैं?
उत्तराखंड के एक कार्यकर्ता ने एक बार मुझे कहा कि वह बड़ा खुशनसीब है कि उसका घर नदी के किनारे नहीं है। मैं यह सुन कर स्तब्ध हो गया। हमारे देश में तो नदियों के किनारे रहना हमारा सपना होता था। परंतु उसका तर्क था कि यदि उसका घर नदी किनारे होता तो बांध के कारण उसका घर भी डूबता। इसलिए वह खुश था कि उसका घर ऊपर होने के कारण उसे कोई खतरा नहीं है। परंतु वास्तव में खतरा बांधों से ऊपर बसे गांवों पर भी मंडरा रहा है।
नदी के बारे में दो बात याद रखने की आवश्यकता है। पहली बात है नदी की अविरलता और दूसरी बात है नदी की निर्मलता। यह नारा दिया था सुंदरलाल बहुगुणा ने। नदी के संरक्षण में ये दो बातें महत्वपूर्ण हैं। पहला तो यह कि उसे अविरल बहने दीजिए और दूसरे उसमें कचड़ा, गंदगी मत डालिए। अब गंदगी न डालने के नाम पर नदी के किनारे रहने वाले दलितों व गरीब लोगों को नदी किनारे शौचादि से रोकने की बात की जाती है। मैं उस बात से सहमत नहीं हूँ। नदी के किनारे रहने वाले लोगों के लिए तो नदी ही उनका जीवन है। उनके उसमें नहाने, शौच जाने से नदी गंदी नहीं होती। परंतु उसमें पूरे शहर की गंदगी उड़ेल देना गलत है। नदी संरक्षण और नदी की सफाई का मामला आज हमारे योजनाकारों, राजनीतिज्ञों और कुछेक एनजीओ के लिए दुधारू गाय है, पैसे कमाने का स्रोत है। नदी को साफ करने के नाम पर पैसा खूब आया, चाहे वह गंगा एक्शन प्लान हो या यमुना एक्शन प्लान। दूसरा, नदियों से ऊर्जा बनाने के लिए खूब पैसा आया। कहा गया कि यह तो हरित ऊर्जा है और इसके नाम पर बांध बनाने वाली निजी कंपनियों को टैक्स की छूट दे दी गई क्योंकि वे तो विकास कर रहे हैं। तो बांध बनाने और नदी को साफ करने दोनों ही कामों के लिए विश्व बैंक पैसा दे रहा है और भारत सरकार ले रही है। उसके तो दोनों ही हाथों में लड्डू हो गए जबकि यह सारा पैसा कर्ज के रूप में आता है जो हमें वापस चुकाना होता है। परंतु इसमें वास्तविक काम कम हो रहा है। एक तरफ तो नदी की हत्या की जा रही है और दूसरी तरफ उसको साफ करने के नाम पर भी लूटा जा रहा है।
आज हम नदी से दूर बसते हैं और फिर नदी को वहां लेकर जाते हैं। इससे नदी का विस्थापन होता है। नदी को आज हम एक वस्तु माने बैठे हैं। आज हम यह मानते हैं कि नदी का उपयोग करने का अधिकार केवल मनुष्य का है। यह पाश्चात्य सोच का प्रभाव है। नदियों में रहने वाले जलजीवों का हक हमने छीन लिया है, साथ ही नदी के किनारे रहने वालों का भी हक हमने छीन लिया। नदी के किनारे रहने वाले साहचर्य का जीवन जीते थे। परंतु आज उनको ही नदी उपलब्ध नहीं है। दिल्लीवासियों को तो गंगा का पानी मिलता है परंतु गंगा के किनारे रहने वालों को वह पानी नहीं दिया जाता। टिहरी बांध से दिल्ली को जिस गंगनहर से पानी मिलता है, उस गंगनहर के पास हौदर से केवल आधा किलोमीटर की दूरी पर टिहरी-विस्थापितों के घर और खेत हैं परंतु उन्हें गंगनहर का पानी लेने की अनुमति नहीं है। और जो पानी दिल्ली को पीने के लिए दिया जा रहा है, उससे लोग अपनी गाडिय़ां धो रहे हैं। तो लोग और लोगों में भी अंतर है। यह भी एक बड़ा मुद्दा है कि नदी पर किसका अधिकार हो और नदी का संरक्षण कैसे किया जाए।
नदी को प्रदूषित तो बड़े शहरों ने किया। आज हमारी पूरी विकास योजना केंद्रीकृत है और अब वह शहरीकृत हो गई है। परंतु शहरों के विकास की लागत कौन भुगत रहा है? इसकी लागत हमारी नदियां भुगत रही हैं। दिल्ली का विकास करने के लिए यमुना को नदी से नाला बना दिया गया। यदि हमने यमुना को स्वच्छ रखा होता तो उसे बाहर से पानी मंगाने की जरूरत ही नहीं होती। परंतु आज विकास के नाम पर दो काम हो रहे हैं। नदियों से साफ पानी ऊपर ही निकाल लिया जा रहा है और उसे बड़े शहरों को पीने के लिये दिया जा रहा है और नीचे नदियों में कचड़ा डाल कर नाला बनाया जा रहा है। शहरों के कारण नदी का जलग्रहण क्षेत्र भी समाप्त हो रहा है। आज दिल्ली में यमुना में जिन 17 नालों का पानी गिरता है, वे नाले नहीं थे, वे छोटी-छोटी नदियां थीं, जिनसे यमुना और फैलती थी। आज एक वर्ग है जो नदी को, पूरे प्राकृतिक संसाधनों को खा रहा है और अपने शोषण को सही ठहराने के लिए विकास की बातें कर रहा है। अर्जुन सेनगुप्ता की रिपोर्ट के अनुसार आज देश में 77 रोटियों को 23 लोग खा रहे हैं और 23 रोटियों को 77 लोग खा रहे हैं। इन 23 लोग में भी देश के कुछ चुनींदा लोगों के परिवार के ही लोग हैं। इसलिए इसे विकास कहना गलत है। आज कौन लोग बांध बना रहे हैं, उनकी सूची देख लीजिये तो सब समझ आ जाएगा।
देश में आज साढ़े पांच हजार से अधिक बांध बन चुके हैं। एक भी बांध में यदि सरकार द्वारा निर्धारित पर्यावरण की शर्तें अगर पूरी की गईं हों तो बता दें। देशभर के आंदोलन वापस हो जाएंगे। टिहरी बांध का आज तक कोई मास्टर प्लान नहीं है। वे कहते हैं कि समस्या आती है तो हम उपाय करते रहते हैं। इनके पास पर्यटन के लिए तो योजना है, पुनर्वास के लिए नहीं है। देश में कहीं भी विस्थापितों का कोई रजिस्टर नहीं है कि कितने लोग विस्थापित हुए हैं। जो लोग बांधों के कारण आई आपदा के कारण मरते हैं, उन्हें विस्थापितों में गिना ही नहीं जाता, उन्हें प्राकृतिक आपदा का शिकार बताया जाता है। इसी कारण बांधों की बिजली सस्ती होती है।
इसके अलावा एक भी बांध ने लगातार उतनी बिजली पैदा नहीं की जितने का दावा किया गया था। बांधों के कारण सिंचाई की बात कही गई थी। इनके पास अभी भी कमांड एरिया प्लान यानी कि जहां पानी जाएगा, उसकी कोई योजना नहीं है। टीएचडीसी ने कहा कि लगभग सोलह लाख हेक्टेयर जमीन को सींचने का पानी वे उपलब्ध कराएंगे। आज जब बांध बन कर तैयार हो गया है तो वे कह रहे हैं कि वे किसी नए स्थान को पानी नहीं दे रहे हैं, पहले जहां पानी जाता था, वहीं दे रहे हैं। टिहरी बांध के कारण एक इंच भी असिंचित भूमि को पानी नहीं मिला है। महाराष्ट्र में गायकवाड़ी बांध से कभी सिंचाई नहीं हो पाई। उत्तराखंड में जो बांध बने हैं उसकी बिजली वहां के गांवों में कहां काम आ पा रही है? उत्तराखंड के एक गांव में डेढ़ सौ घराट हैं, जिनसे बिजली बनाई जा सकती थी। बिजली के लिए सौर और पवन ऊर्जा आदि विकेंद्रीकृत और मिश्रित व्यवस्था बनानी होगी।
हम तो निरंतर सरकार से पूछ रहे हैं कि बांधों से हमें मिला क्या? क्या विस्थापित लोग देश का हिस्सा नहीं हैं? क्या उनका विकास आवश्यक नहीं है? नर्मदा आंदोलन के एक स्कूल में एक जनजातीय शिक्षक है केवल गुरूजी। उसने मराठी में एक गीत लिखा है – देशभक्त लोग तुमच्या, त्याग हमसे काय मांगता? देशभक्त तो आप हैं, बांध बनाने वाले हैं, तो आप अपनी जमीन दीजिये, हमसे क्यों त्याग करवा रहे हैं? हमें तो विस्थापित और मंगता कह रहे हो और खुद मजे कर रहे हैं।
अब हमने एक बात कहनी शुरू की है। जो लोग भी बांधों और उसके विकास के समर्थक हैं, वे बांध वाले जगह के लोगों से अपनी जमीन बदल लें, फिर करें विकास। गांव के लोगों को मुंबई, दिल्ली में जमीन दे दो और उनकी जमीन ले लो, उसके बदले मिलने वाला मुआवजा ले लो। दूसरी बात हम ये कह रहे हैं कि यदि बांधों के कारण कोई नुकसान नहीं होता तो बांध कंपनियां अपने कार्यालय सुरंगों के पास के गांव में बना लें। सांसद-विधायकों के बच्चे भी गांव में पढ़ें। ये दो काम कर लें, फिर विकास की बात करें। ऐसा नहीं चलेगा कि विकास किसी और का हो और उसके लिए विनाश कोई और झेले। जो विकास का लाभ उठा रहे हैं, उसकी कीमत भी उन्हें ही चुकानी चाहिए।
आज जरूरत है कि सरकार के हाथों से नदी को निकाला जाए। यदि सरकारी योजनाओं से नदी को निकाल दिया जाए तो लोग अपने आप संभाल लेंगे। नदी के किनारे रहने वाले लोग नदी को नहीं मार रहे, वह तो उनका जीवन है, उसे वे कैसे मार सकते हैं। नदी को मार रहे हैं, उससे दूर रह कर उसकी योजना बनाने वाले, जो लोग नदी को एक वस्तु मात्र मानते हैं।

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betpark giriş
klasbahis giriş
klasbahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betsat giriş
betsat giriş
betgaranti giriş
betgaranti yeni giriş
betsat giriş
betsat giriş
superbetin giriş
betgaranti giriş
superbetin giriş
vdcasino giriş