दो प्रकार की विद्याएं हैं,एक परा दूसरी अपरा…

वैदिक संपत्ति

गतांक से आगे…

दो प्रकार की विद्याएं हैं,एक परा दूसरी अपरा। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष आदि अपरा विद्याए हैं और जिससे वह अक्षर प्राप्त होता है, वह परा विद्या है। इस वर्णन से ज्ञात होता है कि, वेदों में परा विद्या का वर्णन नहीं है, अर्थात वेद परम तत्व का स्वरूप और उसके प्राप्ति की विधि नहीं बतला सकते।परन्तु ‘अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते’ इस वाक्य से वह परा विद्या का ज्ञान परिचित कराया जा रहा है, जो परम तत्व की शिक्षा देता है। परन्तु परा विद्या का ज्ञान है ? वह ज्ञान सिवा असुर उपनिषद के और कुछ नहीं है।दश, ईशोपनिषदों वेदभाग ही है।इसके सिवा वेदों में पुरुषसूक्त नासदीय सूक्त आदि सैकड़ों ऐसे स्पोत्र और स्थल हैं, जो बड़ी खूबी से जीव, ब्रह्म और प्रकृति के भेद, सृष्टि की पूर्व अवस्था, उसकी रचना, पुनर्जन्म, मोक्ष का साधन और मोक्ष आदि जितने प्रकरण ब्रह्मविद्या से संबंध रखते हैं, सब का उत्तम वर्णन करते हैं। पर यहां तो आसुरी धर्म, आसुरी आचार और आसुरी सिद्धांतों का प्रचार करना है। इसलिए कहा गया है कि, वेदों में परा विद्या नहीं है। इस तरह की बातों से आसुर उपनिषद का परिचय कराया गया है। इसके अतिरिक्त छान्दोग्य 1/4/3 में भी वेदों पर खासी चोट की गई है। वहां लिखा है कि-
‘तानु यत्र मृत्युर्यथा मत्स्यमुदके परिपश्येदेवं पर्यपश्यद्दचि
साम्नि यजुषि ते नु वित्त्वोंध्र्वा ऋच: साम्नो यजुषः स्वरभेव प्राविशन।
अर्थात जैसे मछली को जल में मत्स्यधाती देखता है, उसी तरह मृत्यु ने देवों को ऋग्वेद,सामवेद, और यजुर्वेद में स्थित देखा। वे देव मृत्यु के इस आशय को जानकर ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद से ऊपर स्वर को प्राप्त हुए।इस आख्यायिका का रचने वाला इस अलंकृत भाषा के द्वारा कहता है कि, वेदों के आश्रित रहने से मृत्यु कभी नहीं छोड़ता। अर्थात आवागमन बना रहता है। परन्तु वेदों के आगे स्वर का आश्रय लेने वाला मृत्यु से छूटकर मुक्त हो जाता है। यहां भी वही परा और अपरा विद्यावाली बात बहुत बारीकी से, कही गई है। यदि यह स्वर ओंकार है, तो क्या वेदों में ओंकार की महिमा का वर्णन नहीं है? क्या यजुर्वेद में ‘ओ३म कतो स्मर’ नहीं कहा गया और क्या यजुर्वेद के अन्त में ‘ओ३म खं ब्रह्म’ उपस्थित नहीं है? जब हम मूलसंहिताओं में ही ओंकार की इतनी महिमा देखते हैं, तब स्वर के लिए वेदों को छोड़कर किसी अन्य साहित्य की ओर इशारा क्यों है? कहा नहीं जा सकता कि, वह ‘स्वर’ क्या है ? कहीं कबीर साहब का सा ‘अनहत शब्द’ तो नहीं है ? हमारी समझ में तो मिश्रण करने वालों को जिस बात की आवश्यकता है, वह वेदों से पूरी नहीं होती इसलिए कहीं स्वर के नाम से, कहीं परा के नाम से ,आसुर सिद्धांतों की ओर इशारा किया गया है और वेदों की निन्दा की गई है। जिस प्रकार यह वेदों की निन्दा उपनिषदों में है, उसी तरह वेदों की निंदा गीता में भी मौजूद है। गीता के उस प्रकरण के पढ़ने से प्रार्थनत्रयी की भीतरी जालसाजी और आसुरी प्रचार की तरकीब पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। गीता में वेदों को किस प्रकार गालियां दी गई है, यहां हम उसका संक्षेप से दिग्दर्शन कराते हैं।गीता के दूसरे अध्याय में लिखा है कि-

व्यवसायात्मिका बुद्विरेकेह कुरुनंदन। बहुशाखा ह्मनंताश्रच बुद्वयोऽव्यवसायिनाम॥41॥

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदंत्यविपश्रिच्तः। वेदवादरता: पार्थ नान्यदस्तीति वादिन:॥42॥

कामात्मान: स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम। क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्य गतिं प्रति॥43॥

भोगैश्वर्य प्रसक्तानां तयाऽपह्रतचेतसाम। व्यवसायात्मिका बुद्धि. समाधौ न विधीयते॥44॥

त्रैगुण्यविषयावेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। निर्द्धन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान॥45॥

यावानर्थ उदशाने सर्वतःसंप्लुतोदके। तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानत:॥46॥

श्रुतिविप्रतित्रा ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥53॥
(भगवत गीता अध्याय 2)

 अर्थात बहुत शाखावाले अनन्त वेदों से बुद्धि चंचल हो जाती है। वेदवादरत जो इस प्रफुल्लित वेदवाणी के द्वारा कहते हैं कि,वेदों के सिवा और कुछ नहीं है, वे अज्ञानी है। वे काम भोग और स्वर्ग के मानने वाले हैं और कर्म में अनेक प्रकार की विधि करने वाले तथा भोग और ऐश्वर्या में ही प्रीति रखते हैं। ऐसे लोग समाधि को प्राप्त नहीं हो सकते।

हे अर्जुन! वेद त्रिगुणात्मक है, इसलिए तो निर्द्धन्द्व शुद्धचित्त योग क्षेम का त्यागी, आत्मनिष्ठ अर्थात निस्त्रैगुण्य हो जा। वेद बहुत उपयोगी नहीं है। वे तो बड़े तड़ाग की अपेक्षा एक छोटे से कुएं के ही बराबर हैं। वेद से तेरी मतिमन्द हो गई है, अतः अब निश्चल बुद्धि होगी, तभी योग प्राप्त होगा।
यह है गीता में वर्णित वेदों की कीर्ति! इस वर्णन में जितने विलासियों के लक्षण हैं, वे सब वैदिको में घटा दिए गए हैं और वेदों को मोक्षमार्ग के लिए महान हानिकारक बतलाया गया है।वेदों की इस निन्दा का कारण स्पष्ट है। आसुर सिद्धान्तप्रवर्तक वेदों की विधि और निषेध में बड़ी अड़चन देखते थे, इसलिए उन्होंने वेदों के विरुद्ध इस प्रकार की रचना की है। क्योंकि ‘त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन’ वाक्य पर कहा गया है कि, निस्त्रैगुण्ये पथि विचरातं को विधि: को निषेध:?’ जिसका यही मतलब है कि, त्रिगुणातीत अर्थात अवैदिक हो जाने पर फिर कोई विधि निषेध नहीं रहता।
क्रमशः

  • देवेंद्र सिंह आर्य
    चेयरमैन : उगता भारत

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