सावरकर के  माफ़ी माँग कर अंडमान की जेल से छूटने का सच —श्याम सुन्दर पोद्दार 

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                   ——————————————— वामपंथी व कांग्रेसी  सावरकर पर आरोप लगाते हैं कि वे अंग्रेज़ सरकार से माफ़ी माँग कर अंडमान की जेल से मुक्त हुए थे। यह आरोप शतप्रतिशत मिथ्या है। सच ये है कि वीर सावरकर ने अंडमान जेल में रहते  हुवे, भारत सरकार के गृह मंत्रालय के सदस्य को अंडमान की जेल में उनके साथ होने वाले भेदभाव व अन्याय के प्रति ध्यान आकर्षित करने के लिए एक पत्र लिखा।   मै यहाँ पूर्ण पत्र को नही लिख कर,पत्र का सारांश लिख रहा हूँ। उनके साथ होने वाले भेदभाव व अन्याय को संक्षेप में लिख रहा हूँ। उनके साथ अपराधी घोषित क़ैदियों को सामान्य श्रेणी में रखा गया,वही उन्हें ‘ख़तरनाक’ श्रेणी के क़ैदी के रूप में रखा गया। उनको ६ माह की एकांत में रहने की कठोर सजा दी गयी,वहीं अन्य को नही। उनसे नारियल का छिलका उतरवाया जाता था,उनके हाथ लहू लूहान हो जाते थे,उनको कोल्हू में तेल निकालने की कठोर सजा दी जाती थी,अन्य उनके साथ वाले क़ैदियों को नही। अन्य सब को जेल से रिहा कर दिया जाता था,पर  उनको यह कह कर कि वे  विशेष श्रेणी के क़ैदी हैं ,रिहा नही किया जा सकता । जब विशेष श्रेणी के क़ैदी का भोजन माँगा जाता,तो कहा जाता कि वे सिर्फ़ क़ैदी हैं।  उनकी उन्नति की  माँग करते,तो कहा जाता कि वे “ख़तरनाक”क़ैदी हैं,इसलिए उन्नति नही दी जा सकती। अन्य क़ैदियों को मिलने वाली सुविधा से भी उन्हें वंचित रखा जाता। भारत की जेल में वे रहते, तो ४ महीने में अपने परिवार वालों से एक बार मिल सकते थे,जो यहाँ सम्भव नही है। वे अब तक छूट जाते। अन्त में वे लिखते हैं,सरकार ने सँवैधानिक सुधारों के माध्यम से बहुत परिवर्तन किए हैं। अब १९०५ जैसी कठिन परिस्थिति नही है। मैं यदि छोड़ दिया गया,तो मैं पुराना क्रांति का मार्ग छोड़ कर,सँवैधानिक  मार्ग का अनुसरण करूँगा तथा मेरे साथियों को जो मुझे अनुसरण करते हैं,उनको भी इसी मार्ग पर लाऊँगा। मुझे जेल में रखने से सरकार को वह लाभ नही होगा जो मुझे जेल से बाहर रखने में होगा।
सावरकर ने इस पत्र में एक वाक्य यह भी लिख दिया,मैं सरकार का वफ़ादार रहूँगा। सावरकर के उपर होने वाले अन्याय व अत्याचार पर कुछ शैतानों का ध्यान नही गया। मैं सरकार का वफ़ादार रहूँगा,इसी को वे सावरकर का माफ़ीनामा कहते हैं। तब तो गांधी जो डंके की चोट पर घोषणा करता थे,मै ब्रिटिश सरकार का वफ़ादार  हूँ, उसको आप क्या कहेंगे? उनको  रखते हुए देश की उन्नति होगी। सावरकर ने तो वही कहा,जो गाँधी भी कहते हैं तो ऐसा कहकर क्या गाँधी माफ़ी माँगते थे? जो सावरकर ने ऐसा कहकर माफ़ी माँगी।         
अब मैं आपका ध्यान सावरकर पर ब्रिटिश हुकूमत द्वारा किए गये जघन्य अत्याचारों की ओर लाता हूँ। इतने आवेदन के बाद भी कभी भी ब्रिटिश शासन ने सावरकर के प्रति अपने रुख़ में तिनका भर भी परिवर्तन नही किया। क्योंकि सावरकर  ने कभी  भी माफ़ी माँगते हुए अपने किए कार्यों के लिए खेद व्यक्त नही किया। वायसराय के सलाहकार की  उनके आवेदन पत्र पर प्रतिक्रिया थी कि सावरकर का यह पत्र एक झाँसा है। वह जेल से बाहर आकर यूरोप के अपने आतंकवादी साथियों के साथ मिलकर सरकार को ऊलटने की कोशिस करेगा।
सावरकर जेल में अपने साथियों से कहते थे कि हमें शिवाजी की तरह जेल से निकलने का प्रयत्न करना चाहिए। प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पर,डिसेम्बर २४,१९१९के आदेश के अनुसार क़ैदियों को छोड़ा गया,उनमें अंडमान जेल के क़ैदी भी थे। पर सावरकर को नही छोड़ा गया। तिलक व पटेल ने १९२० व १९२१ में सावरकर को छुड़ाने का प्रयास किया,पर वे असफल रहे। १९२१ में के.वी. अंगास्वामी अय्यंगर ने एक प्रस्ताव राज्य कौंसिल में  रक्खा कि सावरकर को छोड़ा जाय, इस के पास होने से,उनको व उनके बड़े भाई को छोड़ा गया व कलकत्ते के अलिपुर जेल में रखा गया। इसके बाद रत्नागिरी के राजनैतिक सम्मेलन में सावरकर के बिना शर्त छोड़ने की माँग की गयी व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के काकीनाड़ा सम्मेलन में १९२३ में एक प्रस्ताव पास किया गया। इन सभी प्रयासों के चलते  उनको यरवदा जेल से ६ जनवरी १९२४ को सशर्त छोड़ा गया।शर्तें इस प्रकार थीं (१)कि उनको रत्नागिरी ज़िले में ही रहना होगा। अत्यावश्यक स्थिति में  वे कही अन्यंत्र जाना चाहते है,तो सरकार से स्वीकृति लेनी होगी। (२) ५ वर्ष तक वे किसी राजनैतिक कार्य में समिल नही हो सकेंगे। इस सन्दर्भ में ५ वर्ष की समाप्ति पर निर्णय लिया जाएगा। प्रत्येक पाँच वर्ष पर,पुनः इस आदेश को अगले पाँच वर्ष तक बढ़ा दिया जाता था। अन्त में १० मई १९३७ को उनको छोड़ दिया गया,जब जमना दास मेहता ने,अपनी सरकार बनाने की शर्त रख दी कि जब तक सावरकर पर से प्रतिबंध व उनकी रिहायी नही होती वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री नही बनेंगे।          
क्या विडम्बना है कि नेहरू ने अपने राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी सावरकर को गाँधी हत्या के बाद जान से मारने का असफल प्रयास किया। फिर गाँधी हत्या काण्ड में फँसाया, वहाँ से मुक्त होने पर,नेहरू के उत्तराधिकारी,२७ वर्ष तक कालापानी की कठिन यातना व राजनीति नही करने के साथ ज़िला नज़रबंदी का कष्टमय जीवन जीने वाले  वीर सावरकर पर आरोप लगाते है कि उन्होंने ब्रिटिश सरकार से माफ़ी मांग़ी थी।

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