विश्व शिक्षक दिवस 5 अक्टूबर, 2021 पर विशेष शिक्षक ऐसे हों जो सारे विश्व तोड़े नहीं, बल्कि जोड़े

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– ललित गर्ग-

विश्व शिक्षक दिवस प्रतिवर्ष दुनिया के लगभग एक सौ देशों में 5 अक्टूबर को मनाया जाता है। इस दिवस को आयोजित करने का उद्देश्य विश्वभर के शिक्षकों द्वारा विश्व के लगभग दो अरब पचास करोड़ बच्चों के जीवन निर्माण मंे दिये जा रहे महत्वपूर्ण योगदान पर विचार-विमर्श करना है। इस दिवस को मनाते हुए यूनेस्को अपने कार्यक्रमों एवं प्रेरणाओं के द्वारा विश्व को शिक्षा, विज्ञान, शांति एवं प्रगति का सन्देश देने के लिए कृत संकल्पित है। प्राचीन भारत ने गुरुकुल शिक्षा के माध्यम से संसार में जगत गुरू की भूमिका निभाई है। दुनिया के सबसे सशक्त एवं प्रभावी संगठन के रूप में विद्या भारती अपने करीब 25 हजार स्कूलों एवं डेढ़ लाख शिक्षकों के माध्यम से देश एवं दुनिया को परिष्कृत करनेे और जिम्मेदार व्यक्तियों का निर्माण करने के अनूठे एवं अनुकरणीय प्रयास कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 घोषित की है जिसमें शिक्षकों को अधिक सशक्त, जिम्मेदार एवं राष्ट्र- व्यक्ति निर्माण में उनकी भूमिका पर विशेष बल दिया गया है। लार्ड मैकाले की शिक्षा में अब तक भारत में गुरु एवं शिक्षक श्रद्धा का पात्र न होकर वेतन-भोगी नौकर बन गया था, शिक्षक की भूमिका गौण हो गयी थी। इस बड़ी विसंगति को दूर करने की दृष्टि से वर्ततान शिक्षा नीति में व्यापक चिन्तन-मंथन किया गया है।
विश्व स्तर पर नयी शिक्षा एवं शिक्षकों के निर्माण की नीति बनायी जानी चाहिए, जिसके अन्तर्गत भारतीय संस्कृति के आदर्श वसुधैव कुटुम्बकम् को विश्व संस्कृति के रूप में विकसित करना चाहिए, जिससे विश्वव्यापी समस्याओं हिंसा, युद्ध एवं आतंकवाद के समाधान निकाले जा सकते हैं। आदर्श शिक्षकों का निर्माण दुनिया की सबसे बड़ी जरूरत है, क्योंकि एक शिक्षक द्वारा दी गई शिक्षा के बल से ही छात्र आगे चलकर देश सहित विश्व के कर्णधार बनते हैं। भारत में राष्ट्रीय स्तर पर यूं तो शिक्षक दिवस पांच सितंबर को प्रतिवर्ष मनाया जाता है लेकिन यूनेस्को के आह्वान पर पांच अक्टूबर को विश्व शिक्षक दिवस भी मनाया जाता है। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य एक छात्र की जिंदगी में शिक्षकों के महत्व को रेखांकित करना है। उनका महत्व एवं व्यक्तित्व-निर्माण की जिम्मेदारी अधिक प्रासंगिक हुई है। क्योंकि सर्वतोमुखी योग्यता की अभिवृद्धि के बिना युग के साथ चलना और अपने आपको टिकाए रखना अत्यंत कठिन होता है। फौलाद-सा संकल्प और सब कुछ करने का सामथ्र्य ही व्यक्तित्व में निखार ला सकता है। शिक्षक ही ऐसे व्यक्तित्वों का निर्माण करते हैं।
किसी भी समाज और राष्ट्र के विकास में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान है। शिक्षा ही वह सेतु है, जो व्यक्ति-चेतना और समूह चेतना को वैश्विक, राष्ट्रीय, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों से अनुप्राणित करती है। भारत के सामने जो समस्याएं सिर उठाए खड़ी हैं, उनमें मूल्यहीन शिक्षानीति एक बड़ा कारण रही है। शिक्षा ही जब मूल्यहीन हो जाए, तो देश एवं दुनिया में मूल्यों की संस्कृति कैसे फलेगी? वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य जीवन को उन्नत बनाना नहीं, अपितु आर्थिक स्तर को ऊंचा उठाना हो गया है। विद्या भारती का मंतव्य है- ‘‘यदि भारत के भविष्य को बदलना है तो भावी पीढ़ी पर ध्यान देना ही होगा, उन्हें अपनी संस्कृति एवं मूल्यों से जोड़ना होगा।’’ महात्मा गांधी के अनुसार सर्वांगीण विकास का तात्पर्य है- आत्मा, मस्तिष्क, वाणी और कर्म-इन सबके विकास में संतुलन बना रहे। स्वामी विवेकानंद के अनुसार सर्वांगीण विकास का अर्थ है- हृदय से विशाल, मन से उच्च और कर्म से महान। भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था में सर्वांगीण व्यक्तित्व के विकास हेतु शिक्षक एवं गुरु आचार, संस्कार, व्यवहार और विचार- इन सबका परिमार्जन एवं विकास करने का प्रयत्न करते रहते थे।
बाल एवं युवा छात्रों में ढेरांे क्षमताएँ तथा ऊर्जा होती हैं। इसे सही दिशा की ओर मोड़ने की आवश्यकता है ताकि उनकी क्षमताओं का दुरूपयोग न हो। अतः आज बालक केे सामाजिक, राष्ट्रीय एवं आध्यात्मिक गुणों को बाल्यावस्था से ही विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है जितना उसको पुस्तकीय ज्ञान देना। इस प्रकार शिक्षा का उद्देश्य प्र्रत्येक बालक को भौतिक, सामाजिक, राष्ट्रीय तथा आध्यात्मिक चारों प्रकार की उद्देश्यपूर्ण शिक्षा देकर उसे संतुलित, चरित्रसम्पन्न और पूर्णतया गुणात्मक व्यक्ति बनाना होना चाहिए। भारत के मिसाइल मैन, पूर्व राष्ट्रपति डाॅ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा है कि अगर कोई देश भ्रष्टाचार मुक्त है और सुंदर दिमाग का राष्ट्र बन गया है, तो मुझे दृढ़ता से लगता है कि उसके लिये तीन प्रमुख सामाजिक सदस्य हैं वे पिता, माता और शिक्षक हैं।” डाॅ. कलाम की यह शानदार उक्ति प्रत्येक व्यक्ति के दिमाग में आज भी गूंज रही हैं। शिक्षण इस दुनिया में सबसे प्रेरक काम और एक बड़ी जिम्मेदारी है। शिक्षक ज्ञान का भंडार हैं जो अपने शिष्यों को अपना ज्ञान देने में विश्वास करते हैं जिससे उनके शिष्य भविष्य में दुनिया को बेहतर बनाने में सहायता कर सकेंगे। इससे ऐसी पीढ़ी निर्मित होगी जो उज्ज्वल और बुद्धिमान हो तथा वह जो दुनिया को उसी तरीके से समझे जैसी यह है और जो भावनाओं से नहीं बल्कि तर्क और तथ्यों से प्रेरित हो। डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार, शिक्षक देश के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इसी वजह से वे अधिक सम्मान के योग्य होते हैं।’ विद्या भारती की शिक्षा एवं नयी शिक्षा नीति में ऐसी संभावनाएं है कि देश एवं दुनिया के निर्माण में शिक्षकों की भूमिका अधिक प्रभावी बनकर प्रस्तुत होगी। अब शिक्षा से मानव को योग्य, राष्ट्र-निर्माता एवं चरित्रवान बनाने का वास्तविक लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा। अब शिक्षक एवं शिक्षा-नीति एक क्रांतिकारी बदलाव की ओर अग्रसर हुई है।
हिंसा और अपराधों की वृद्धि में शिक्षा प्रणाली एवं शिक्षक भी अपूर्णता एक सीमा तक जिम्मेदार है। अशिक्षित और मूर्ख की अपेक्षा शिक्षित और बुद्धिमान अधिक अपराध करते रहे हैं। मानव ने ज्ञान-विज्ञान में आश्चर्यजनक प्रगति की है। परन्तु अपने और औरों के जीवन के प्रति सम्मान में कमी आई है। विचार-क्रान्तियां बहुत हुईं, किन्तु आचार-स्तर पर क्रान्तिकारी परिवर्तन कम हुए। शान्ति, अहिंसा और मानवाधिकारों की बातें संसार में बहुत हो रही हैं, किन्तु सम्यक्-आचरण का अभाव अखरता है। अब नयी शिक्षा नीति से सम्यक् चरित्र, सम्यक् सोच एवं सम्यक् आचरण का प्रादुर्भाव होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ के पूर्व महासचिव डा0 कोफी अन्नान ने कहा था कि ‘‘मानव इतिहास में बीसवीं सदी सबसे खूनी तथा हिंसक सदी रही है।’’ बीसवीं सदी में विश्व में दो विश्व महायुद्धों, हिरोशिमा तथा नागाशाकी पर दो परमाणु बमांे का हमला तथा अनेक युद्धों की विनाश लीला के ताण्डवों को देखा है, जिसके लिए सबसे अधिक दोषी हमारी शिक्षा है। विश्व के सभी देशों के स्कूल अपने-अपने देश के बच्चों को अपने देश से प्रेम करने की शिक्षा तो देते हैं लेकिन शिक्षा के द्वारा सारे विश्व से प्रेम करना नहीं सिखाते हैं। भारत ही ऐसा देश है जो वसुधैव कुटुम्बकम की शिक्षा देता, यदि विश्व सुरक्षित रहेगा तभी देश सुरक्षित रहेंगे।
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नेल्सन मंडेला ने कहा था कि ‘‘संसार में शिक्षा ही सबसे शक्तिशाली हथियार है जो दुनिया को बदल सकती है।’’ युद्ध के विचार मानव मस्तिष्क में उत्पन्न होते हैं। मनुष्य के विचार ग्रहण करने की सबसे श्रेष्ठ अवस्था बचपन है। मानव मस्तिष्क में शान्ति, अहिंसा, सह-अस्तित्व के विचार बचपन से ही डालना होगा। इक्कीसवीं सदी की शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बालक को सारे विश्व से प्रेम करने के विश्वव्यापी दृष्टिकोण को विकसित करें। ग्लोबल विलेज के युग में सारे विश्व की एक जैसी शिक्षा प्रणाली होनी चाहिए। विश्व एकता की शिक्षा इस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। ‘सा विद्या या विमुक्तये’, यह भारतीय शिक्षा जगत का प्रमुख सुभाषित है, जो दुनिया के लिये भी आदर्श है। इस सुभाषित के अनुसार सच्ची शिक्षा वह है जो विद्यार्थी को नकारात्मक भावों और प्रवृत्तियों के बंधनों से मुक्ति प्रदान करें। पर ंिचंता का विषय बना रहा कि भारत के शिक्षक ही आज इसकी उपेक्षा करते रहे हैं। अब नयी शिक्षा नीति में शिक्षक के लिये शिक्षा एक मिशन होगा, स्वदेशी, सार्थक, मानवतावादी और मूल्य आधारित शिक्षा के माध्यम से उन्नत पीढ़ी का निर्माण होगा। अब भारत की नयी शिक्षा नीति में शिक्षक का चरित्र एवं साख दुनिया के लिये प्रेरक एवं अनुकरणीय बनकर प्रस्तुत होगा, जिसमें भारतीय संस्कारों एवं संस्कृति का समावेश दिखाई देगा। अतः विश्व शिक्षक दिवस के अवसर पर विश्व के सभी शिक्षकों को यह संकल्प लेना चाहिए कि वे संसार के प्रत्येक बच्चे को संतुलित एवं उद्देश्यपूर्ण शिक्षा प्रदान करके सारे विश्व में आध्यात्मिक, अहिंसक एवं शांतिपूर्ण सभ्यता की स्थापना करेंगे।

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