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सुनील शास्त्री

बाबूजी सारे संसार में शास्त्री जी के नाम से प्रसिद्ध थे। लेकिन घर परिवार में हम सब उन्हें ‘बाबूजी’ कहते थे। यह सम्बोधन धीरे-धीरे घर के नौकर-चाकर और अन्य कर्मचारियों तक की जुबान पर चढ़ गया और इस प्रकार अति निकट सम्पर्कियों में वे बाबूजी ही कहे जाने लगे। वैसे बाबूजी स्वयं व्यक्तिगत रूप से तो गीता के ‘यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति। शुभाशुभपरित्यागी…’ आदर्श को चरितार्थ कर चुके थे। अत: सम्बोधन उनके लिये कोई खास मायने नहीं रखता था। गीता की उक्त सूक्ति के अनुसार वे निष्काम कर्मयोगी थे। लेकिन ऐसे कर्मयोगी जो योजनाबद्ध सुचिन्तित कर्म के अनुयायी थे। किन्तु कर्म का ढोल पीटने के बजाय उस पर अमल उन्हें अच्छा लगता था।

बाबूजी सामाजिक कुरीतियों के घोर विरोधी थे। उनका सारा जीवन गलत परम्पराओं के विरुद्ध संघर्ष को समर्पित था। उन परम्पराओं का विरोध जीवन में ढाल लेना बहुत कठिन होता है। बाबूजी का विवाह जिस समय हुआ, उस समय दहेज प्रथा पूरे जोर-शोर से प्रचलित थी। इस प्रथा का विरोध विशेषकर उस समय कितना कठिन था। बाबूजी ने अपने विवाह के पहले जो शर्त रखी थी, वह उनके आदर्श का ज्वलंत प्रतीक है। बाबूजी ने कहा, ‘मैं शादी केवल इसी शर्त पर कर सकता हूं कि उपहार में मुझे केवल एक चरखा दिया जाये।’ अब दहेज में चरखा लेने की बात तो ठीक थी लेकिन केवल एक चरखा रखने से कुछ आवश्यक ‘शगुन’ (जो नवदम्पति के मंगल से सम्बंधित थे) न मनाये जाने की हठ किसी की समझ में नहीं आ रही थी। बहुत प्रयत्न किया गया लेकिन बाबूजी जिस बात को गलत समझते थे, उसे वे कभी नहीं मानते थे। फिर सवाल दहेज जैसी घृणित प्रथा के विरोध का हो तो बाबूजी अपने ही विवाह में किसी शगुन के नाम पर दहेज के दो-चार सौ रुपये भी कैसे चलने देते। अन्त में विजय ‘दुल्हा जी’ की ही हुई और हमारी अम्मा दहेज में केवल एक चरखा लेकर हमारे घर आई।

आज दहेज प्रथा के विरुद्ध देश में अभियान चल रहा है। हजारों उत्साही युवक-युवतियां दहेज-विरोधी शपथ ले रहे हैं लेकिन आज से दशकों पहले बाबूजी ने यह सिद्ध कर दिया था कि कहने से पहले करके दिखाना कहीं जरूरी है। आदर्श को कर्म में परिणत करना ही कर्मयोग है।

बाबूजी के प्रधानमंत्रित्वकाल में ही कुछ प्राकृतिक कारणों से केरल में चावल की कमी हो गई। चावल की पूर्ति के लिए सरकारी प्रयत्न तो चल ही रहे थे। बाबूजी के सम्मानित सहयोगी भी प्रयत्न कर रहे थे, बाबूजी स्वयं भी इसी सोच में डूबे रहते थे। चावल केरलवासियों का मुख्य भोजन है। इसी की कमी उन्हें कष्ट दे रही थी। उधर बाबूजी का कहना था कि चावल की कमी के कारण केरल के एक भी भाई-बहन को भूखा नहीं रहने दूंगा। कोई अपील दूसरों के लिए निकालने से पहले उन्होंने घर में आदेश कर दिया, ‘हम सब लोग तब तक चावल नहीं खायेंगे जब तक पहले केरल में चावल की पूर्ति आवश्यकतानुसार नहीं हो जाती। चावल पूजा में अक्षत के नाम से इस्तेमाल होता है, इसे अक्षत ही रहने दो।’ इस आदेश का सबसे अधिक असर आदरणीय हरि भैया व मेरे ऊपर पड़ा क्योंकि हम दोनों ही परिवार में ‘भतहा’ अर्थात पूरी तरह भोजन में चावल ही खाने के लिए विख्यात थे। हमें कठिनाई तो हुई लेकिन बाबूजी के समझाने का वह विश्व प्रसिद्ध तरीका हमें संतुष्ट कर गया। जिसे पश्चिम के पत्रकारों ने उनकी ‘करेक्टरिष्टिक डिस्आर्म्ड सिम्पलिसिटी’ (निराली सादगी) कहा। हम सब महीनों बिना चावल के काम चलाते रहे। इस अनुभव ने हमें राष्ट्रीय कठिनाइयों को महसूस करना, उसके हल के लिए कुछ करना सिखाया। हम लोग जान गये कि केरलवासी भाई-बहनों का दु:ख कैसा होगा लेकिन साथ ही शास्त्री परिवार के हर व्यक्ति ने जो बात ऐसे ही अनेक अनुभवों से सीखी, वह है आदर्श को आदत बना डालना।

बाबूजी का प्रारम्भिक जीवन अभावों के बीच गुजरा था। होश सम्भालते ही उन्होंने अपने आप को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम से सम्बद्ध कर लिया था। उनकी जीवनचर्या का हर दिन और हर क्षण राष्ट्र के लिए था। स्वतंत्रता पूर्व के भारत का इतिहास जहां जिस रूप में बन रहा था, वहीं पर बाबूजी का जीवन इतिहास उसी के साथ परस्पर एक-दूसरे से संयुक्त होकर चल रहा था। हमारे परिवार की कितनी ही घटनाएं ऐसी हैं, जिन्हें हम व्यापक इतिहास धारा से अलग नहीं कर पाते। इसी तथ्य की अनुगूंज तब हुई जब बाबूजी प्रधानमंत्री होते हुए भी किसान बने। सारा विश्व जानता है कि बाबूजी देश में प्राकृतिक प्रकोप के कारण हुई अन्न की कमी के समय बाहर से अन्न आयात तो करना चाहते थे, लेकिन राष्ट्रीय नीतियों में परिवर्तन करके नहीं। उन्होंने राष्ट्र को आह्वान किया कि चप्पा-चप्पा भूमि पर अनाज का उत्पादन हो ताकि हम अनाज के लिए अपनी पूर्ति में कोई कमी न कर सकें। दूसरे लोगों से आह्वान पर अमल करवाने से पहले प्रधानमंत्री निवास में ही रातों-रात मखमली दूब के खूबसूरत लॉन व सुगंधित पुष्प समाप्त हो गये। उनकी जगह बने खेत, जिनमें समय मिलने पर बाबूजी स्वयं शारीरिक परिश्रम तक करते थे। इतिहास की अंधेरी राहों में यह तथ्य रोशनी की एक उजली लकीर रहेगा कि भारत का राष्ट्रपति एक दार्शनिक था तब भारत का प्रधानमंत्री किसान बना।

बाबूजी का पालन पोषण विशुद्ध हिन्दू संस्कारों में हुआ लेकिन मन उनका ऐसा खुला आकाश था जहां सभी धर्मों की अच्छी बातों का प्रकाश हमेशा उजाला किए रहता था। भगवान बुद्ध के अनेक उपदेश उन्हें बहुत प्रिय थे। दर्शन तो उनका प्रिय विषय था ही। एक बार मेरे जूतों पर समय से पालिश न हो सकने के कारण मुझे देर हो रही थी। मैं नौकर को डांट रहा था। बाबूजी पास के ही कमरे में थे और इस बात का मुझे जरा-सा भी भान नहीं था। मैं स्कूल चला गया और जब वहां से लौटा तो मेरी पूज्या अम्मा ने बताया कि आज हम लोग शाम को बाबूजी के साथ खाना खा रहे हैं। आमतौर से बाबूजी दफ्तर से देर से लौटते थे और इसीलिए हम लोग उनके साथ भोजन नहीं कर पाते थे। उस दिन बाबूजी 10:30 बजे ही घर लौटे और हम लोग खाने की मेज पर जा बैठे। बाबूजी ने मेरी ओर देखा और मुझे इशारा करके अनिल भैया को हटाकर मुझे बिठा लिया। मैं गर्व से फूला नहीं समा रहा था। खाना खाते-खाते बाबूजी ने धीरे से मेरे कान मेंे कहा कि ‘आज आपने सुबह जो किया वह ठीक नहीं था।’ मैं थोड़ा अचम्भे में पड़ गया लेकिन फिर समझ में आया कि बाबूजी मेरे नौकर को फटकारने के बारे में कह रहे थे…। फिर उन्होंने कहा, ‘बेटा हरेक इनसान का यह फर्ज है कि वह हरेक इनसान, चाहे वह छोटा हो, चाहे बड़ा, उसकी इज्जत करे और मैं तुमसे चाहूंगा कि नौकर को बुलाकर उससे माफी मांगो और आगे से अपना काम स्वयं करने की कोशिश करो।’ मैंने नौकर से माफी मांगी। दूसरे दिन सुबह बाबूजी ने मुझे बुलाया और समझाया कि भगवान बुद्ध ने हजारों वर्ष पहले ‘सेल्फ हेल्प’ का पाठ पढ़ाया था। अपना काम खुद कर लेना कोई छोटी बात नहीं है। भगवान बुद्ध के अनुसार जब अपने जीवन की राह अंधेरी हो तो अपने पथ पर प्रकाश करने के लिए अपना दीपक स्वयं बनो, ‘अप्प दीपो भव।’ यह उक्ति आज भी जब बाबूजी मेरे साथ नहीं हैं, मुझे अपनी राह में रोशनी के अभाव में विचलित नहीं होने देती।

आज देश में हर कोने से अंधेरा दूर करने का प्रयास हो रहा है। इस समय कर्मयोगी तथा भगवान बुद्ध की ‘अप्प दीपो भव’ वाणी को चरितार्थ करने वाले बाबूजी की शिक्षाएं भी कितनी सटीक बैठती हैं। यह मेरा सौभाग्य है कि मैंने बाबूजी के चरणों में बैठकर जिस दीप की पवित्र लौ अपने जीवन में जलाई, आज उसी दीपक के महाप्रकाश से करोड़ों देशवासियों के साथ मुझे भी अपने पथ पर प्रकाश दिख रहा है।

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