राम प्रसाद बिस्मिल के परिजनों की हो गई थी ऐसी दुर्दशा

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उफ! यह कृतघ्नता!!

लेखक: राजेशार्य आट्टा, (पानीपत)
–चंद्रशेखर आजाद से पहले भगतसिंह आदि के दल का नेतृत्व करते थे- अमर बलिदानी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल। चंद्रशेखर आजाद बिस्मिल के आस्तिक देशभक्ति पूर्ण व आर्यसमाजी विचारों से बहुत प्रभावित थे। काकोरी कांड में गिरफ्तार होने पर जेल में बंद बिस्मिल को स्वार्थी संसार की असलियत का कटु अनुभव हुआ जो उन्होंने फांसी आने (19 दिसंबर 1927) से कुछ दिन पहले लिखी आत्मकथा में वर्णन किया है। सहानुभूति रखने वाले किसी वार्डन के हाथों यह पुस्तक गुप्त रूप से बाहर (संभवतः गणेश शंकर विद्यार्थी के पास) भेजी गई। पंडित गणेश शंकर विद्यार्थी के प्रताप प्रेस से प्रकाशित हुई। ऐसा भी सुनने में आया है कि इसे सबसे पहले भजनलाल बुक सेलर द्वारा आर्ट प्रैस सिंध ने ‘काकोरी षड्यंत्र’ शीर्षक से छापा था। फिर वर्षों बाद पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी के प्रयास से इस आत्मकथा का पुनर्जन्म हुआ। बिस्मिल जी की गिरफ्तारी और फांसी के बाद उनके परिवार की जो दयनीय दशा हुई उसका वर्णन उनकी क्रांतिकारी बहन शास्त्री देवी ने बड़े मार्मिक शब्दों में किया है।


बिस्मिल जी के परिवार ने बड़ी गरीबी में जीवन बिताया था। पर पुनः क्रांति में कूदने से पहले बिस्मिल जी ने सांझे में कपड़े का कारखाना लगाकर स्थिति सुधार ली थी। जेल में जाने के बाद बिस्मिल जी ने अपने साझीदार मुरालीलाल को लिखा कि जो कुछ पैसा मेरे हिस्से का हो मेरे पिताजी को दे देना। बार-बार लिखने पर भी उसने एक पैसा भी नहीं दिया। उल्टे अकड़ दिखाने लगा और पिताजी से लड़ पड़ा।
शाहजहांपुर में रघुनाथ प्रसाद नामक एक व्यक्ति पर बिस्मिल जी माता पिता की तरह विश्वास करते थे। इनके पास बिस्मिल जी के अपने सब अस्त्र-शस्त्र (पांच) और धन (5000/-) रखे हुए थे। बिस्मिल जी ने वकील को लिखा कि मेरे रुपए मेरे पिताजी को और हथियार बहन शास्त्री देवी को दे देना। वह भी टालता रहा और कुछ नहीं दिया। घर पर पुलिस का इतना आतंक छाया हुआ था कि उनके परिवार से कोई बात तक नहीं करता था। उनके अपने मित्र उनके पास आते हुए डरते थे। ऐसे बुरे समय में महान क्रांतिकारी पंडित गणेश शंकर विद्यार्थी ने लगभग 2000/- चंदा करके बिस्मिल आदि साथियों का अभियोग लड़ने में सहयोग किया। बिस्मिल के पिताजी के लिए पंडित जवाहरलाल ने 500/- भिजवाए। विद्यार्थी जी इन्हें परिवार के लिए 15/- मासिक देते रहे। जब बहन शास्त्री देवी को पुत्र उत्पन्न हुआ तब विद्यार्थी जी ने एक सौ रुपए सहायतार्थ भेजे और साथ ही यह भी कहा भेजा कि आप यह न समझें कि मेरा भाई नहीं है, हम सब आपके भाई हैं। बिस्मिल जी की बहन ब्रह्मा देवी इनकी फांसी (मृत्यु) से इतनी दुःखी हो गई कि तीन-चार माह बाद ही इस असह्य शोक से पिंड छुड़ाने के लिए विष खाकर मर गई। थोड़े दिन बाद ही इनका छोटा भाई रमेश बीमार पड़ गया। (संभवतः सुशील चंद्र फांसी से पहले ही चल बसा था) रमेश की चिकित्सा धन के अभाव में (डाॅक्टर ने 200/- मांगे थे) ठीक से नहीं हो पाई और वह भी चल बसा। अब घर में खाने को दाने और पहनने को कपड़े न थे। ऐसी अवस्था में उपवास के अतिरिक्त और कोई चारा न था। अंत में उपवास करते-करते पिता श्री मुरलीधर जी भी दुःखों की गठड़ी माता (मूल मंत्री देवी) जी के सिर पर रखकर इस असार संसार को छोड़ चले। माताजी पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा। इसके 1 महीने बाद बहन शास्त्री देवी भी विधवा हो गई। इनके पास एक पुत्र 3 साल का था।
अपने तीन तोले के सोने के बटन बेचकर माताजी ने दो कोठड़ियां बनवाई। उनमें से एक कोठडी आठ रुपये मासिक किराए पर दे दी। शास्त्री देवी ने एक डाॅक्टर के यहां मासिक छः रुपये में खाना बनाने का काम किया। फिर भी एक समय कभी कभी खाना मिलता था। बच्चा स्याना हुआ तो माताजी ने सबसे फरियाद की कि कोई इस बच्चे को पढ़ा दो। कुछ बन जाएगा। पर शाहजहांपुर में किसी ने पुकार नहीं सुनी। तब तक शास्त्री देवी का देवपुरुष भाई पंडित गणेश शंकर विद्यार्थी भी शहीद हो चुका था। 25 मार्च 1931 को कानपुर में मजहबी अंधे मुस्लिमों की भीड़ ने छुरे कुल्हाड़ी मारकर उन्हें बेरहमी से मारा था। शास्त्री देवी ने जैसे तैसे करके बेटे को पांचवी तक पढ़ाया। फिर वह मजदूरी करने लगा। पर इस शहीद परिवार को देश का समाज अपराधी की तरह देख रहा था।
माताजी अन्न-वस्त्र के अभाव में जैसे तैसे दिन गुजार रही थीं। एक दिन शीत काल का समय था। माताजी अपने कोठरी में फटा सा कोट लपेटे हुए बैठी थीं। इतने में विष्णु शर्मा जेल से रिहा होकर माताजी के दर्शनों के लिए आ पहुँचे। वीर माता जी की यह दुर्दशा देखकर बहुत हैरान, दुःखी व देशवासियों पर क्रोधित हुए। उन्हें लाखों श्राप दिए और अपना कंबल उतारकर माता को ओढा दिया। फिर बहुत कोशिश करके विष्णु शर्मा ने यूपी सरकार द्वारा स्थापित शहीद परिवार सहायक फंड में से माताजी की पेंशन (60रुपये) बंधवाई। इससे माता जी के साथ शास्त्री देवी के परिवार (लड़का व बहू) का भी गुजारा होने लगा। पर 13 मार्च 1956 को माताजी महाप्रयाण कर गईं। पेंशन बंद होने से शास्त्री देवी के परिवार की फिर दुर्दशा हो गई। अन्न वस्त्र के अभाव में जीवन दूभर हो गया। इनका लड़का कुसंग में फंसकर घर से भाग गया। महीनों तक उसका कुछ पता न चला। एक दिन दोनों सास बहू सलाह कर रही थीं कि चलो गंगा जी में डूब जाएं, तभी पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा भेजे गए चतुर्वेदी ओंकार नाथ पांडे ने कोसमा गांव जाकर देखा कि ये फटे कपड़े पहने हुई थीं और घर में लगभग 5 किलो अन्न था। पांडे जी ने बहन जी को 5 रुपये दिए और बनारसी दास जी को सारा हाल लिखा। उन्होंने इनकी सहायता के लिए अपील निकाली। छोटे बड़े सबसे सहयोग लेकर बनारसीदास जी ने बहनजी की सहायता की और लिखा कि ‘आप संकोच न करें, यह पैसा आपका ही है। आप कपड़ा बनवा लीजिए। अन्न भी लेकर रख लीजिए। अब आप मुसीबत न उठाइए। बहुत दुःख आपने सहे। मैं आपको दुःख नहीं होने दूंगा।’
संभवतः बनारसी दास जी की अपील पढ़कर ही गुरुकुल झज्जर के आचार्य भगवान देव (स्वामी ओमानंद जी) अप्रैल 1959 में कोसमा (मैनपुरी) गए। बिस्मिल जी के हवन कुंड आदि ऐतिहासिक धरोहर के रूप में गुरुकुल में ले आए। एक वर्ष के लिए बहन जी की पचास रुपये मासिक वृत्ति बांध दी। गुरुकुल के उत्सव पर भी बहन जी को बुलवाकर सम्मानित करते रहे। पंडित बनारसीदास जी ने बहुत कोशिश करके बहन जी की पेंशन 40 रुपये करवाई। (1960)
पंडित रामप्रसाद बिस्मिल जैसे चरित्रवान् राष्ट्रभक्त के त्याग व बलिदान को पहचानने में भारतवासियों ने इतनी देर लगा दी, जबकि श्री सुधीर विद्यार्थी के अनुसार तुर्की के राष्ट्रपति मुस्तफा कमाल पाशा ने तो 1936 में बसे नए जिले (केन्या से आइए विस्थापितों के लिए) का नाम ही भारत के इस महान शहीद के नाम पर ‘बिस्मिल जिला’ रख दिया था और इस जिले के अंतर्गत इसका मुख्यालय ‘बिस्मिल शहर’ के नाम से जाना जाता है। तभी तो कवि को कहना पड़ा-
अच्छाइयों की चर्चा जिनकी जहान में है।
उनका निवास अब भी कच्चे मकान में है।।
(शांतिधर्मी मासिक के अप्रैल 2020 अंक में प्रकाशित लेख का एक अंश)

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