मुट्ठी भर अमीर से बेहद गरीब किसान व टुकड़े टुकड़े गैंग नहीं चाहते किसान आंदोलन का हल

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प्रो. सुधांशु त्रिपाठी

वास्तव में देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कुशल नेतृत्व में भारत शांतिपूर्ण तरीके से जिस तरह तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है उससे संपूर्ण विश्व अचंभित है परंतु देश के भीतर तथा विदेश में बैठे इन कट्टर राष्ट्रविरोधी ताकतों को अच्छा नहीं लग रहा है।

केंद्र सरकार तथा आंदोलनकारी किसान नेताओं के बीच कई दौर की वार्ता के बाद भी दोनों पक्षों को स्वीकार्य कोई हल अब तक निकल नहीं सका है। वस्तुतः संपूर्ण घटनाक्रम शाहीन बाग की याद दिला रहा है। जिस तरह से किसान आंदोलन के नाम पर चंद मुट्ठी भर अमीर से बेहद अमीर किसानों के नेतृत्व में पंजाब तथा हरियाणा के बहुसंख्य किसानों ने न केवल दिल्ली बल्कि आसपास के चतुर्दिक सामान्य जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है, वह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। ये प्रदर्शनकारी या तथाकथित अन्नदाता किसान दिल्ली के समीप सिंघु बॉर्डर पर पिछले पचास दिनों से डेरा डाले बैठे हुए हैं जिससे सामान्य किसानों की रोजी-रोटी पर तो कुठाराघात हो ही रहा है, साथ ही दैनिक मजदूरों और अन्य दिहाड़ी कामगारों को भी अपने जीवकोपार्जन में अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। वस्तुतः उनके इस अनवरत प्रदर्शन से दिल्ली तथा संबंधित सभी राज्यों की कानून व्यवस्था संभालने वाली पुलिस तथा प्रशासनिक मशीनरी को इन अन्नदाताओं के धरना स्थलों की सुरक्षा तथा दिल्ली के चारों ओर सभी राज्यों से यहाँ प्रतिदिन आकर काम करने वालों के लिये दैनिक आवागमन सुलभ बनाने तथा सामान्य कानून एवं व्यवस्था की स्थापना करने में भी एड़ी-चोटी एक करनी पड़ रही है। इसमें न केवल देश के करदाताओं का अमूल्य धन नष्ट हो रहा है जिसका अन्यथा सामाजिक कल्याण एवं विकास के कार्यों में उपयोग किया जा सकता था बल्कि पूरे प्रशासनिक अमले का परिश्रम नष्ट हो रहा है जिससे निश्चय ही सामान्य जनजीवन की सुरक्षा बढ़ाई जा सकती थी तथा उनका राष्ट्रहित में उपयोग किया जा सकता था।

यद्यपि ये अन्नदाता कृषि कानून को वापस लिये जाने पर अड़े हैं तथा इसके लिए केंद्र सरकार पर अनेकों प्रकार से दबाव बना रहे हैं जिसमें देश के कुछ प्रमुख तथाकथित बुद्धिजावियों के साथ लगभग सभी प्रमुख विपक्षी राजनीतिक दल और चीन समर्थित माओवादी कम्युनिस्ट पार्टियां तथा लंदन से खालिस्तान समर्थक उग्रवादी संगठन भी भरपूर समर्थन दे रहे हैं जो अखंड भारत के भीतर एक स्वतंत्र पंजाब/खालिस्तान देश का सपना संजोए बैठे हैं। निश्चय ही इन अन्नदाताओं ने अपने निहित स्वार्थों के लिए संपूर्ण देश के बहुसंख्यक सामान्य किसानों को बुरी तरह से भ्रमित करके डरा दिया है क्योंकि इनके लिए राष्ट्रहित का कोई महत्व नहीं है, अन्यथा किसानों के आंदोलन में इन सभी विघटनकारी तत्वों का क्या काम है। यद्यपि कृषि कानून में उल्लिखित विभिन्न सकारात्मक प्रावधानों के महत्व को ये अन्नदाता मौन रूप से स्वीकार कर रहे हैं तथापि अपने संकीर्ण स्वार्थों की निर्बाध पूर्ति के लिए ये इन सभी महत्वपूर्ण किसान-हितकारी उपबंधों की उपेक्षा कर रहे हैं जिसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम0एस0पी0) की गारंटी के साथ ही किसानों को अपनी फसल को देश के किसी भी स्थान पर बेचे जाने की छूट दी गयी है तथा मंडियों में फैले भ्रष्टाचार से उन्हें बचाने का प्रयास भी किया गया है। संभवतः अपने इन तुच्छ स्वार्थों एवं संकीर्ण उद्देश्यों के चलते तथा इस आंदोलन के देश विरोधी और विघटनकारी-आतंकवादी तत्वों के हाथों में पड़ जाने के कारण इन आंदोलनकारी किसान नेताओं में उत्पन्न निराशा साफ दिखायी दे रही है।

वास्तव में देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कुशल नेतृत्व में भारत शांतिपूर्ण तरीके से जिस तरह तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है उससे संपूर्ण विश्व अचंभित है परंतु देश के भीतर तथा विदेश में बैठे इन कट्टर राष्ट्रविरोधी ताकतों को अच्छा नहीं लग रहा है। विश्व के सभी प्रमुख राष्ट्राध्यक्ष या शासनाध्यक्ष यथा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एवं फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रोन तथा आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन, इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू एवं ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन आदि सभी प्रमुख नेतागण प्रधानमंत्री मोदी की कार्यशैली से अत्यंत प्रभावित हैं। यह प्रधानमंत्री मोदी की विश्व में बढ़ती हुई लोकप्रियता की स्वीकारोक्ति ही है कि अनेक प्रमुख देश उन्हें अपने-अपने सर्वोच्च राजकीय सम्मान से सम्मानित कर चुके हैं।

वर्तमान कोरोना की विश्वव्यापी महामारी के दौर में देश के प्रधानमंत्री ने जिस सूझ-बूझ का परिचय देते हुए सभी देशवासियों की सुरक्षा एवं उनके जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सारे व्यापक उपाय किए उसकी न केवल देश में बल्कि विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी वैश्विक संस्था तथा विभिन्न देशों द्वारा कई प्रमुख मंचों पर भूरि-भूरि प्रशंसा की गई। कोविड-19 के कठिन दौर में भी जब पड़ोसी देश चीन ने अत्यंत शर्मनाक विश्वासघात करते हुए भारत-चीन सीमा, (एल0ए0सी0) पर देश में अनेक स्थानों पर घुसपैठ करने की कोशिश की, उसका अत्यंत साहसपूर्वक ढंग से सामना करते हुए भारतीय सेना प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में बीजिंग को जिस तरह से मुँहतोड़ जवाब दे रही है उससे चीन बेहद परेशान हो चुका है तथा उसके कारण चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को न केवल विश्व में बल्कि अपने देश में भी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। समग्रतः विश्व में भारत की तेजी से उभरती सशक्त छवि देशविरोधी शक्तियों के लिए एक बहुत बड़ी परेशानी का कारण बन चुकी है। अतः ये सब, जिनमें देश के भीतर सक्रिय टुकडे-टुकड़े गैंग की प्रभावी भूमिका रहती है, केवल मौके की तलाश में रहते हैं कि कैसे भारत को एक बार पुनः अस्थिर तथा विखंडित किया जाए। किसानों के इस आंदोलन ने इन्हें पुनः एक मौका दे दिया है।

ऐसे चिंताजनक परिदृश्य में यद्यपि देश की सर्वोच्च अदालत ने इस कानून पर रोक लगा कर केंद्र सरकार और आंदोलनकारी किसानों के बीच चले आ रहे लंबे टकराव पर विराम लगाने का प्रयास तो किया है और समाधान निकालने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है परंतु एक सदस्य द्वारा समिति में शामिल न होने के फैसले से आगे की कार्यवाही प्रभावित हो सकती है और विलंब हो सकता है। इसी असमंजस के बीच इन आंदोलनकारी किसानों द्वारा देश के आगामी गणतंत्र दिवस 26 जनवरी पर विशाल ट्रैक्टर जुलूस निकालने की चेतावनी दोनों पक्षों के बीच तनाव को बढ़ाने का काम करेगी। अंततोगत्वा सरकार तथा आंदोलनकारी किसानों को ही इस समस्या का हल खोजना होगा जो दोनों के बीच बातचीत से ही निकल सकता है। लेकिन इसके लिए इन किसान आंदोलनकारियों को अपने बीच से स्वार्थी किस्म के छद्म नेताओं तथा विघटनकारी तत्वों को हटाना होगा क्योंकि तभी दोनों के बीच सार्थक वार्तालाप हो सकेगा और दोनों पक्षों को स्वीकार्य हल निकल सकेगा, जो अब तक की कई दौर की वार्ता के सम्पन्न होने पर भी नहीं निकल सका। साथ ही देश के संपूर्ण जनता-जर्नादन अर्थात् हम भारत के लोग को भी जाति, धर्म, भाषा, समुदाय, क्षेत्र आदि जैसे संकीर्ण विचारों से ऊपर उठना चाहिए तथा किसान आंदोलन के नाम पर अपने तुच्छ हितों की रक्षा करने वाले इन स्वार्थी और देश विरोधी किसान नेताओं एवं असामाजिक तत्वों तथा कट्टर राष्ट्रविरोधी-विघटनकारी एवं खालिस्तान समर्थक उग्रवादी संगठनों को अलग-थलग कर देना चाहिए जिससे देश की अखंडता तथा राष्ट्रहित और मानव संस्कृति की रक्षा हो सके तथा समाज में शांति एवं सुरक्षा की स्थापना के साथ ही सामाजिक समरसता भी कायम की जा सके। ऐसा हो सकता है क्योंकि मानव उद्यम से परे कुछ नहीं होता है।

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