अविद्या से सर्वथा रहित और सद्ज्ञान से युक्त ग्रंथ है सत्यार्थ प्रकाश

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ओ३म्

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मनुष्य चेतन एवं अल्पज्ञ सत्ता है। इसका शरीर जड़ पंच-भौतिक पदार्थों से परमात्मा द्वारा बनाया व प्रदान किया हुआ है। परमात्मा को ही मनुष्य शरीर व उसके सभी अवयव बनाने का ज्ञान है। उसी के विधान व नियमों के अन्तर्गत मनुष्य का जन्म होता तथा मनुष्य के शरीर में वृद्धि व ह्रास का नियम देखा जाता है। इसी के अनुसार मनुष्य शिशु से बालक, किशोर, युवा व वृद्ध होकर मृत्यु को प्राप्त होता है। परमात्मा ने मनुष्य को उसकी चेतन व गुण ग्रहण करने में समर्थ आत्मा को सार्थकता प्रदान करने के लिए मनुष्य शरीर में बुद्धि दी है और बुद्धि से प्राप्त ज्ञान को क्रियान्वित करने के लिये हाथ, पैर व शरीर में भिन्न भिन्न ज्ञान व कर्म इन्द्रियां दी हैं। मनुष्य शरीर सहित अपने मन, बुद्धि व आत्मा के द्वारा सत्य ज्ञान व विद्या को प्राप्त करता है और विद्या के अनुसार आचरण करते हुए अनेक क्रियायें को करके अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। विज्ञान के सभी आविष्कार मनुष्य की ज्ञान प्राप्ति व बुद्धि के सहयोग से ही सम्भव हुए हैं।

ज्ञान पर विचार करते हैं तो यह दो प्रकार का प्रतीत होता है। एक सत्य ज्ञान व दूसरा सत्यासत्य मिश्रित व असत्य ज्ञान। कई बार रात्रि के अन्धकार में मनुष्य सड़क पर रस्सी को सांप समझ लेता है। यह उसका असत्य व मिथ्या ज्ञान होता है। प्रकाश होने पर उसे रस्सी की वास्तविकता का ज्ञान हो जाता है और वह निर्भ्रम होकर शुद्ध व सत्य ज्ञान को प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार से सृष्टि में सभी विषयों का ज्ञान है। उसके सत्य व असत्य दो पक्ष होते हैं। कई मनुष्य अपने प्रयोजनों को सिद्ध करने के लिये सत्य के विपरीत असत्य का व्यवहार करते हैं। कुछ ज्ञानी सत्य का महत्व जानते हैं और वह अपने ज्ञान के अनुसार सत्य का ही आचरण करते हैं। सत्य का आचरण करना तथा अपने सत्य ज्ञान को बढ़ाना व उसे पूर्णता तक ले जाना ही धर्म व धर्माचार कहलाता है। धर्म सत्य कर्मों के आचरण को कहते हैं। धर्म की परिभाषा व पर्याय सत्याचार व सत्य कर्मों का आचरण करना ही होता है। अतः मनुष्य के लिये सभी विषयों में सत्य का ज्ञान होना लाभदायक व आवश्यक होता है।

मनुष्य को यदि सही मार्ग पता हो तभी वह अपने गन्तव्य पर पहुंच सकता है। असत्य मार्ग पर चल कर हम लक्ष्य पर न पहुंच कर भिन्न स्थान पर पहुंचते हैं जिससे हमारा प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। अतः मनुष्य को सत्य ज्ञान की आवश्यकता अपने जीवन को सफल करने व अपने इष्ट कार्यों व उद्देश्यों की पूर्ति के लिए करनी पड़ती है। सत्य ज्ञान जिससे यह सारा संसार व मनुष्य जीवन के उद्देश्य को जानकर उसकी पूर्ति व लक्ष्य की प्राप्ति की जाती है, वह विद्या से युक्त तथा अविद्या से रहित कर्म ही हुआ करते हैं। संसार में विद्या व सभी पदार्थों का यथार्थ ज्ञान हमें सृष्टि की आदि में ईश्वर प्रदत्त ज्ञान चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद से प्राप्त होती है। वेद ईश्वरीय भाषा संस्कृत में है। इसको जानने के लिये वेद व्याकरण के ग्रन्थों व शब्द कोषों का अध्ययन करना पड़ता है। ऋषियों के वेदों पर व्याख्यान व वेदांग, ब्राह्मण, उपवेद तथा वेदोपांग सहित उपनिषद तथा विशुद्ध मनुस्मृति आदि ग्रन्थों का अध्ययन करना होता है। वर्तमान में विद्या की प्राप्ति सरलता से की जा सकती है। इसके लिये वेद व इतर वैदिक साहित्य का सारग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश, जो कि आर्यभाषा हिन्दी में है, उसे पढ़कर वेदों की सभी मान्यताओं व सिद्धान्तों को जाना जा सकता है।

सत्यार्थप्रकाश सहित यदि हम ऋषि दयानन्द कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ग्रन्थ, उनके और आर्य विद्वानों के वेदों के भाष्यों का अध्ययन भी करते हैं तो इससे वेदों के आशय, सत्य सिद्धान्तों वा मान्यताओं का ज्ञान हो जाता है। वेद, वैदिक साहित्य तथा ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों से इतर ग्रन्थों में ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति सहित अन्य अनेकानेक विषयों का वैसा सुस्पष्ट व निभ्र्रान्त ज्ञान प्राप्त नहीं होता जैसा हमें मुख्यतः सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ से प्राप्त होता है। सत्यार्थप्रकाश के अतिरिक्त धर्माधर्म विषयक जो ग्रन्थ प्राप्त होते हैं वह विष सम्पृक्त अन्न के समान होते हैं जिसमें अविद्या भी मिश्रित होती है। इसका दिग्दर्शन ऋषि दयानन्द जी द्वारा अपने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के उत्तरार्ध के चार समुल्लासों में कराया गया है। अतः सृष्टि के अनेक रहस्यों सहित सत्य वैदिक सिद्धान्तों एवं ईश्वर, जीव व प्रकृति विषयक सत्य एवं यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति हेतु जिज्ञासु व सत्यान्वेषी मनुष्यों को वेदों सहित सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अध्ययन अवश्य करना चाहिये। सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन कर मनुष्य अपनी अविद्या को दूर कर सकते हैं। यह हमारा व अनेक विद्वानों का अनुभव है। अविद्या की निवृत्ति तथा विद्या की वृद्धि सहित संसारस्थ सभी पदार्थों के सत्य सत्य अर्थों का प्रकाश करने के लिए ही ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ की रचना सन्1874 में की थी और इसके बाद सन् 1883 में इसका संशोधित व परिवर्धित संस्करण भी प्रस्तुत व प्रकाशित किया था।

हमारा सौभाग्य है कि हमने इस सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का कई बार अध्ययन किया है और हम इसे कुछ कुछ जानने में सफल हुए हैं। सभी मनुष्यों को सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन कर इससे लाभ उठाना चाहिये। जो इसका अध्ययन करेंगे उनको इसके अध्ययन से लाभ प्राप्त होगा और जो अध्ययन नहीं करेंगे वह इससे होने वाले लाभों से वंचित रहेंगे। कहा जाता है कि परमात्मा ने मनुष्य जन्म सत्य को जानने व सत्य का ग्रहण करने के लिये ही दिया है। यदि हमने मनुष्य जीवन में सत्य विद्याओं को न जाना और उनको जीवन में धारण कर आचरण नहीं किया तो हमारा यह मनुष्य जन्म सफल नहीं होता। अतः सभी मनुष्यों को अविद्या के निवारक तथा सत्य के प्रकाशक व प्रचारक सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन अवश्य ही करना चाहिये। ऐसा करने से पाठक महानुभाव का आत्मा सत्य ज्ञान से युक्त होकर अपने जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य को जानकर उन्हें प्राप्त करने में प्रवृत्त हो सकता है और उसे प्राप्त कर ही सभी दुःखों की निवृत्ति व पूर्ण सुख व आनन्द की प्राप्ति हो सकती है। ऐसा करने ही हम अपने साथ न्याय कर सकते हैं और ऋषि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का लिखना भी तभी सार्थक हो सकता है।

सत्यार्थ प्रकाश में जिन मुख्य विषयों का वर्णन हुआ है उनको भी जान लेते हैं। सत्यार्थप्रकाश में वर्णित विषयों में प्रमुख विषय हैं- ईश्वर के सौ से अधिक नामों की व्याख्या, बालशिक्षा, भूतप्रेत निषेध, जन्मपत्र सूर्यादि ग्रह समीक्षा, अध्ययनाध्यापन विषय, गायत्री व गुरु मन्त्र व्याख्या, प्राणायाम शिक्षा, सन्ध्या अग्निहोत्र उपदेश, उपनयन समीक्षा, ब्रह्मचर्य उपदेश, पठन-पाठन की विशेष विधि, ग्रन्थ प्रमाण अप्रमाण विषय, स्त्री शूद्र अध्ययन विधि, समावर्तन विषय, दूर देश में कन्या का विवाह, विवाहार्थ स्त्री व पुरुष की परीक्षा, अल्पवय में विवाह का निषेध, गुण कर्म स्वभाव के अनुसार वर्णव्यवस्था, स्त्री पुरुष व्यवहार, पंचमहायज्ञ, पाखण्ड तिरस्कार, पाखण्डियों के लक्षण, गृहस्थ धर्म, पण्डितों के लक्षण, मूर्ख के लक्षण, पुनर्विवाह विचार, नियोग विषय, गृहस्थाश्रम की श्रेष्ठता, वानप्रस्थ और सन्याश्रम तथा इनकी विधि, राजधर्म विषय, राजा के लक्षण व गुण, दण्ड की व्याख्या, राजा के कर्तव्य, मन्त्रियों के कार्य, दुर्ग निर्माण, युद्ध के प्रकार, राज्य के रक्षण की विधि, कर ग्रहण की विधि, व्यापार विषय, न्याय की विधि, साक्षी के कर्तव्योपदेश, चोर आदि कर्मों के दण्ड की व्यवस्था, ईश्वर विषय, ईश्वर का ज्ञान विषय, ईश्वर का अस्तित्व, ईश्वर के अवतार का निषेध, जीव की स्वतन्त्रता, वेद विषय विचार, सृष्टि उत्पत्ति विषय, ईश्वर का जीव व प्रकृति से भिन्न होना विषय, सृष्टि उत्पत्ति के नास्तिक मत का निराकरण, सृष्टि में प्रथम मनुष्य उत्पत्ति के स्थान का निर्णय, आर्य व मलेच्छ की व्याख्या, ईश्वर का जगत को धारण करना, विद्या अविद्या विषय, बन्धन तथा मोक्ष विषय, आचार अनाचार विषय तथा भक्ष्य अभक्ष्य विषय आदि। यह सब विषय सत्यार्थप्रकाश के पूर्वार्ध के दस समुल्लासों वर्णित हैं। इसके बाद उत्तरार्ध में चार समुल्लास हैं जिसमें भारत के सभी मत-मतान्तरों की समीक्षा, नास्तिक-चारवाक-बौद्ध-जैन मत समीक्षा, कृश्चीनमत समीक्षा तथा यवनमत समीक्षा प्रस्तुत की गई है। उत्तरार्ध के चार समुल्लासों में मत-मतान्तरों की अविद्या का दिग्दर्शन कराया गया है जिससे पाठक सत्य मत का निर्णय कर सत्य सिद्धान्तों, मान्यताओं व सत्य मत का धारण कर सकें। अन्त में ऋषि दयानन्द ने अपने मन्तव्य व अमन्तव्यों पर प्रकाश डाला है। इसमें उन्होंने अनेक विषयों को परिभाषित किया है जिनकी संख्या51 व अधिक है।

सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ को पढ़कर मनुष्य की अविद्या सर्वथा दूर हो जाती है। वह सत्य ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हो जाता है। उसकी सभी शंकायें दूर होने के साथ वह निर्भरान्त ज्ञान को प्राप्त होता है। ईश्वर व आत्मा के सत्य स्वरूप व इनके गुण, कर्म व स्वभाव के ज्ञान सहित पाठक आत्मा की उन्नति के साधनों से भी परिचित होता है। ईश्वर के सृष्टि बनाने के प्रयोजन सहित सृष्टि मनुष्य की आत्मिक उन्नति, दुःख निवृत्ति तथा मोक्षानन्द की प्राप्ति में साधन है, इसका स्पष्ट ज्ञान भी सत्यार्थप्रकाश के अध्ययन से होता है। सत्यार्थप्रकाश संसार का सबसे उत्तम एवं लाभकारी ग्रन्थ है। यह ज्ञान का खजाना वा कोष है। इसका मूल्याकंन धन की दृष्टि से नहीं किया जा सकता। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ व इससे प्राप्त होने वाला ज्ञान अनमोल, दुर्लभ व अत्युत्तम है। जो भी मनुष्य इसको पढ़ेगा वह ईश्वर व आत्मा सहित सृष्टि के प्रयोजन व इसके उपयोग को जानकर अविद्या से मुक्त तथा विद्या से युक्त होकर मोक्ष पथ का अनुगामी बनता है। यही मनुष्य जीवन का उद्देश्य व लक्ष्य भी है। हम सबको लोक व परलोक में अपने हित के लिए सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन कर इसको आचरण में लाना चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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