लव जिहाद और राणा जैसे बयान दो समुदायों के बीच नफरत पैदा करते हैं

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रात हलाला नेक है, उठते नहीं सवाल ! राम नाम की दक्षिणा,पर क्यों कटे बवाल !!
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(लव जिहाद और राणा जैसे बयान दो समुदायों के बीच नफरत पैदा करते है। यह किसी एक राज्य, देश या समुदायों तक सीमित नही बल्कि विश्व्यापी समस्या बनता जा रहा है और इस कुचक्र का शिकार मासूम लड़कियां ही नहीं अब हम सब होते जा रहें है। धर्म के ठेकेदार हमेशा ऐसे मौकों को अपना हथियार बनाते है। गंगा जमुनी तहजीब का हवाला देकर ऐसी घटनाएं करवाना इनके नापाक कारनामों का आधार होती है.)
— डॉo सत्यवान सौरभ,
रिसर्च स्कॉलर,कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,
आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,
वर्तमान दौर में ये बात अक्षरश: सही साबित हो रही है कि कुछ दक्षिणा लेकर भी बदनाम हो गए, कुछ पूरी रात हलाला कर भी नेक निकले. बहुत से कवियों ने, शायरों, साहित्यकारों ने इस देश से पैसे और पहचान कमाई. मगर कुछ लोग साम्प्रदायिकता का जहर घोलकर अपने कद को बड़ा करने की कोशिश में लगे रहते है और जात-पात एवं धर्म के झगड़ों को बढ़ावा देकर कवि धर्म को दांव पर लगा देते है. मुनव्वर राणा कई बार अपनी हरकतों और ट्वीट को लेकर सुर्खियों में आ चुके हैं। मोदी सरकार आने के बाद तो ये हर जगह मजहब के पहलुओं को ढूंढ़ने में लगे रहते है।
इन जैसे तथाकथित बुद्धिजीवियों का दम अब धर्मनिरपेक्षता के मुखौटे में घुटने लगा है। यही वजह है कि वे मोदी राज में अपना मुखौटा उतार कर अपना असली चेहरा दिखा रहे हैं। उनमें हिन्दुओं और प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ कितना जहर भरा हुआ है, इसका अंदाजा उनके बयान और उनके लिखे शब्दों से लगाया जा सकता है। ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवियों में ये विवादित शायर मुनव्वर राणा भी शामिल है। आतंकवाद और बलात्कार जैसी घटनाओं को हिन्दू-मुस्लिम का चौला पहनाकर देश विरोधी चालें चलना गद्दारी का पुख्ता सबूत है-
खा इसको गाये उसे, ये कैसे इंसान !
रहते भारत में मगर, अंदर पाकिस्तान !!
मिट्टी-पानी भोगते, लूटे चैन बहार !
सौरभ ऐसे लोग ही, होते सदा गद्दार !!
मुनव्वर राणा के फ्रांस हमले को सही बताए जाने के बाद मुल्कभर में उनकी आलोचना हो रही है. मुनव्वर राना ने कहा कि आप विवाद को जन्म देकर लोगों को उकसा रहे हैं. मोहम्मद साहब का कार्टून बना कर उसे कत्ल के लिए मजबूर किया गया, अगर उस स्टूडेंट की जगह मैं भी होता तो वही करता जो उस स्टूडेंट ने किया. उन्होंने आगे कहा कि मजहब मां-बाप की तरह होता है, अगर कोई आपके मां-बाप का बुरा कार्टून बनाता है या गाली देता है तो उसका कत्ल करना गुनाह नहीं. इतना ही नहीं उन्होंने भगवान राम और माता सीता को लेकर कहा भी कहा कि कोई अगर भगवान राम या माता सीता का विवादित कार्टून बनाएगा तो मैं उसका भी कत्ल कर दूंगा.
मुनव्वर राणा के इस बयान के बाद उन्हें तमाम आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा. क्या इन सब बातों के लिए पूरी दुनिया को धर्म और मजहब का चौला पहनाकर कत्ले आम के लिए उकसाना सही है. आतंकवाद तो आतंकवाद होता है. इंसान के बिना धर्म का कोई मतलब नहीं हो सकता. ये बात मुनावर राणा को अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए. अपने मतलब और स्वार्थ सीधी के लिए पूरी कायनात को फूंकना इन्होने कहाँ से सीखा, समझ नहीं आता? क्या हिंदुस्तान को भी इनकी गलत बयानबाजी के लिए ऐसी ही सजा देनी चाहिए जिनकी बात ये करते हैं. अगर भारत एक धर्म- निरपेक्ष राज्य न होकर पूर्णत: एक तरफा होता तो इनको ये बात कब की समझ आ जाती. ऐसे लोग घर-घर में आग लगाने का काम करते है. यहाँ की मिटटी में पल बढ़कर ऐसा करना हमारे संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध जरूर है-
घर-घर में कैसी लगी, ये मतलब की आग !
अपनों को ही डस रहे, बने विभीषण नाग !!
जातिवाद और धर्म का, ये कैसा है दौर !
जय भारत, जय हिन्द में, गूँज रहा कुछ और !!
मजहब मां-बाप की तरह होता है, अगर कोई आपके मां-बाप का बुरा कार्टून बनाता है या गाली देता है तो उसका कत्ल करना गुनाह नहीं, जैसी बातें भारत में लव जिहाद के बढ़ते मामलों के लिए सीधा जिम्मेवार है तभी ये एक सम्प्रदाय दूसरे धर्म की लड़कियों को अपना शिकार बनाते है। वह भी अपनी विस्तारवादी सोच की वजह से। सब जानते है कि लव जिहाद आज आतंकवाद की तरह हमारी वसुधैव कुटुम्बकम की परंपरा में विष घोल रहा है लेकिन अफसोस की ऐसे गम्भीर विषय पर बुलंद आवाज़ नहीं उठती।
इसमें गलती हम सबकी भी है, सेक्युलर बनने की चाह में हम अपने ही धर्म पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध आवाज तक नही उठाते है। अब इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा? चलिए एक दफ़ा मान लिया हिन्दू-मुस्लिम भगवान ने किसी को नहीं बनाया बल्कि इंसान बनाया। इसके बाद भी सिर्फ़ एक समुदाय सहन करता जाएं और दूसरा विस्तार करे यह सोच तो कतई सही नहीं। एक अपने धर्म की रक्षा के लिए क़दम उठाएं तो कट्टरवादी और दूसरा कुछ भी कर लें, फिर भी वह गंगा-जमुनी तहज़ीब का खेवनहार। क्या अजीबोगरीब परिभाषाएं लिखी और गढ़ी जाती है हमारे देश में।
क्यों आज देश के नामचीन कवि/साहित्यकार चुप है? मैं ये नहीं कहता कि मुन्नवर राणा जैसे बड़काऊ लोगों का सरेआम क़त्ल कर दिया जाये. इस मुद्दे पर बहस तो होनी चाहिए. सही को सही और गलत को गलत तो बताया जाये. ये बिलकुल भी सही नहीं कि एक कुछ भी करे और दूसरा चुप रहें. साफ़ और स्पष्ट बहस हो. किसी को बेवजह ग़ुमराह करना कहीं से न्यायोचित नहीं। लव जेहाद और ऐसी कट्टरता एक ऐसा ही कुचक्र है। अगर धर्म परिवर्तन नहीं रुका तो समाज में ऐसी घटनाएं घटित होगी। फ़िर मुगल काल और आधुनिक युग में अंतर क्या रह जाएगा? ये सवाल उन ढोंगी सेकुलरिज्म के ठेकेदारों से भी आख़िर उन्हें अपने ही धर्म को कमज़ोर करके हासिल क्या होगा? पैसे के लिए अपने धर्म को ही कमज़ोर करना तो ग़द्दारी होती है। ऐसे में जो अपने धर्म का नहीं हो सकता, फ़िर तो शायद वह किसी का नही हो सकता-
कब गीता ने ये कहा, बोली कहाँ कुरान !
करो धर्म के नाम पर,धरती लहूलुहान !!
मंदिर-मस्जिद से भली,एक किताब दुकान।
एक साथ है जो रखें, गीता और कुरान !!
लव जिहाद और राणा जैसे बयान दो समुदाय के बीच नफरत पैदा करते है। यह किसी एक राज्य, देश या समुदाय तक सीमित नही बल्कि विश्व्यापी समस्या बनता जा रहा है और इस कुचक्र का शिकार मासूम लड़कियां ही नहीं अब हम सब होते जा रहें है। धर्म के ठेकेदार हमेशा ऐसे मौकों को अपना हथियार बनाते है। गंगा जमुनी तहजीब का हवाला देकर ऐसी घटनाएं करवाना इनके नापाक कारनामों का आधार होती है. प्रेम और आतंकवाद को धर्म की दीवारों में फंसाकर देश धर्म को कमजोर करना कतई उचित नहीं है. एक अच्छे और सच्चे कवि-साहित्यकार का पहला धर्म वहां मिट्टी के प्रति वफ़ादारी और राज्य में अमन-चैन लाना होता है. खैर इन सबके बावजूद मेरी तो अंतिम इच्छा यही है कि-
लाज तिरंगें की रहे, बस इतना अरमान !
मरते दम तक मैं रखूँ, दिल में हिन्दुस्तान !!
तभी इस मिट्टी का कुछ ऋण अदा होगा और जीना सार्थक होगा.
— डॉo सत्यवान सौरभ,
रिसर्च स्कॉलर,कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,
आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट

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