ग्लोबल वार्मिंग के चलते मानसूनी बारिश की तीव्रता बढ़ती जा रही है

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योगेश कुमार गोयल

भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान द्वारा सन् 1900 के बाद साल दर साल हुई वर्षा के आंकड़ों के आधार पर 2014 में किए गए अध्ययन में बताया गया था कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते मानसूनी बारिश की तीव्रता बढ़ती जा रही है।

बिहार और असम के बाद इस समय उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल इत्यादि देश के कई हिस्से बाढ़ के कहर से जूझ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के करीब डेढ़ दर्जन जिलों के 650 से अधिक गांव बाढ़ से प्रभावित हैं, जहां नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। मुम्बई में हर तरफ सड़कों पर सैलाब दिखाई दिया है तो केरल भी बारिश और बाढ़ से बेहाल है। कुछ दिनों पहले भी मुम्बई के कई हिस्सों में तो तेज बारिश के बाद सड़कें नदियों में तब्दील हो गई थी। असम के लगभग सभी जिलों में बाढ़ का कहर देखा गया है, जिससे अभी तक सैंकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है। बिहार के कई जिलों में भी बाढ़ के कारण व्यापक नुकसान हुआ है। गुजरात के द्वारका, जूनागढ़, पोरबंदर इत्यादि कई इलाकों में भी भारी बारिश से हालात ऐसे नजर आए थे, जैसे सड़कों पर ही नदियां बह रही हों। फिलहाल लगातार हो रही तेज बारिश से देश के कई राज्यों में बाढ़ के हालात बन गए हैं। कर्नाटक के कोडागु जिले के भागगमंडल में भी बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो गई है। भारी बारिश के कारण ही पिछले दिनों कर्नाटक के चिकमगलूर में भूस्खलन भी हुआ। आने वाले दिनों में देश के कई हिस्सों में बाढ़ से स्थितियां बदतर होने की आशंकाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

मौसम विज्ञानियों के तमाम पूर्वानुमानों और कयासों को धत्ता बताते हुए प्रकृति अब साल दर साल अपना प्रचण्ड प्रकोप दिखा रही है, जिसके चलते प्रतिवर्ष कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ के हालात पैदा हो रहे हैं और कभी सूखा तो कभी बाढ़ के नाम पर हाय-तौबा मचाना ही हमारी नियति बन चुकी है। दुनिया भर में बाढ़ के कारण होने वाली मौतों का पांचवां हिस्सा भारत में होता है और हर साल इससे देश को कम से कम एक हजार करोड़ रुपये का नुकसान होता है। बाढ़ से जान-माल की क्षति तो होती ही है, संबंधित राज्य विकास की दौड़ में भी वर्षों पीछे चला जाता है। करीब दस वर्ष पूर्व चिंता जताई गई थी कि भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर वर्षा के बादलों को मोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला पश्चिमी घाट मानवीय हस्तक्षेप के चलते सिकुड़ रहा है। उसके बाद मामले के सभी पहलुओं का अध्ययन करके रिपोर्ट देने के लिए केन्द्र द्वारा ‘गाडगिल पैनल’ का गठन किया गया था। पैनल ने समय से अपनी रिपोर्ट भी दे दी, जो ठंडे बस्ते में पड़ी है।

भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान द्वारा सन् 1900 के बाद साल दर साल हुई वर्षा के आंकड़ों के आधार पर 2014 में किए गए अध्ययन में बताया गया था कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते मानसूनी बारिश की तीव्रता बढ़ती जा रही है और विनाशकारी बाढ़ की घटनाएं आगे और बढ़ेंगी। आजादी के कुछ वर्षों बाद ‘राष्ट्रीय बाढ़ आयोग’ की स्थापना हुई थी, जिसके जरिये राष्ट्रीय बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत देश में 150 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को बाढ़ से सुरक्षा प्रदान करने के लिए कई हजार किलोमीटर लंबे तटबंध और बड़े पैमाने पर नालियां व नाले बनाए गए। साथ ही निचले क्षेत्रों में बसे कई गांवों को ऊंची जगहों पर बसाया गया। पिछले पचास वर्षों में बाढ़ पर सरकारों द्वारा 1 लाख 70 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा राशि खर्च की जा चुकी है। इसके बावजूद यदि हालात साल-दर-साल बदतर हो रहे हैं तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि कमी आखिर कहां है?

दशकों पहले उफनती नदियों के कहर से बचाने के लिए उत्तरी बिहार में कई मजबूत तटबंध बनाए गए थे, जो दशकों तक काम आते रहे लेकिन अब इनमें से कई तटबंध भी इतने कमजोर हो चुके हैं कि थोड़ी-सी बारिश में ही उनमें जगह-जगह दरारें आ जाती हैं। ऐसी ही बड़ी-बड़ी दरारों के कारण पिछले साल बिहार के कई इलाकों में बाढ़ से भारी तबाही हुई थी। वैसे भी देश के विभिन्न हिस्सों में बांधों के टूटने या उनमें आने वाली दरारों के चलते प्रतिवर्ष बाढ़ का विकराल रूप सामने आता है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि हर साल बाढ़ को प्राकृतिक आपदा का नाम देकर पल्ला झाड़ने के बजाय समय रहते बांधों की मजबूती और मरम्मत के लिए समुचित कदम क्यों नहीं उठाये जाते? भारी वर्षा से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए प्रशासन क्यों नहीं मानसून से पहले ही मुस्तैद होता?

यदि बाढ़ के कारणों पर गौर करें तो अनियोजित और अनियंत्रित विकास के चलते हमने पानी की निकासी के अधिकांश रास्ते बंद कर दिए हैं। ऐसे में बारिश कम हो या ज्यादा, पानी आखिर जाएगा कहां? दूसरी समस्या यह है कि प्रकृति में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप के चलते समुद्रों का तल लगातार ऊंचा उठ रहा है, जिससे समुद्रों में नदियों का पानी समाने की गति कम हो गई है। यह भी अक्सर बाढ़ का बड़ा कारण बनता है। बाढ़ से नुकसान कम हो, इसके लिए हमें नदियों में गाद का भराव कम करना होगा, साथ ही निचले स्थानों को और गहरा कर उनमें बारिश तथा बाढ़ के पानी को एकत्र करने की ओर भी ध्यान देना होगा, जिससे बाढ़ के खतरे से निपटने के साथ-साथ गर्मियों में जल संकट से निपटने में भी मदद मिले। मानसून के दौरान बाढ़ की विनाशलीला देखने और बाकी साल जल संकट से जूझते रहने के बाद भी यह बात हमारी समझ से परे रह जाती है कि बाढ़ के रूप में जितनी बड़ी मात्रा में वर्षा जल व्यर्थ बह जाता है, अगर उसके आधे जल का भी संरक्षण कर लिया जाए तो अगले दो दशकों तक देश में जल संकट की कमी नहीं रहेगी और खेतों में सिंचाई के लिए भी पर्याप्त जल होगा। उत्तर प्रदेश और बिहार में इस दिशा में कुछ कार्य शुरू किया गया है। वहां मनरेगा के तहत हजारों तालाबों की गहराई बढ़ाने से लेकर उनके किनारों का पक्कीकरण करने का कार्य किया जा रहा है, जिससे बारिश के पानी की कुछ मात्रा तालाबों में जरूर सहेजी जा सकेगी। ऐसी पहल देश के हर राज्य में की जानी चाहिए मगर इस तथ्य को भी रेखांकित करने की जरूरत है कि तकरीबन सभी राज्यों में तालाब जिस तेजी से विलुप्त होते गए हैं, उसके पीछे केवल प्राइवेट बिल्डरों और अन्य माफिया की गैरकानूनी अतिक्रमणकारी गतिविधियों की ही भूमिका नहीं है बल्कि सरकारी योजनाओं के तहत पूर्ण कानूनी स्वरूप में चलाए गए कई प्रोजेक्ट भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। सरकार की प्राथमिकताओं और विकास के मॉडल का सवाल यहीं पहुंचकर प्रासंगिक हो जाता है।

बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्या कारण है कि पश्चिमी घाट के सिकुड़ने के कारणों, उसके परिणामों और उसे बचाने के उपायों की पूरी जानकारी होते हुए भी जमीन पर कुछ नहीं हो पाता? गाडगिल पैनल की रिपोर्ट पड़ी-पड़ी धूल खाती रह जाती है? इन सवालों से तो टकराना ही होगा, यह भी समझना होगा कि बाढ़ और सूखा अलग-अलग आपदाएं नहीं हैं। ये एक-दूसरे से जुड़ी हैं। जल प्रबंधन की कारगर योजनाएं, तटबंधों की समय से मरम्मत जैसे कदम इनके लिए जरूरी तो हैं पर काफी नहीं हैं। इन सबके साथ ही जंगल, पहाड़, नदी, झील सहित पूरी पारिस्थितिकी के प्रति केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं बल्कि सरकारी नीतियों के स्तर पर भी थोड़ी संवेदनशीलता की जरूरत है।

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