ओ3म्:मेरे श्वास प्रश्वास में प्रेम व उन्नति का कारण हो

Aum-_The_Symbol_of_Arya_Samajडा. अशोक आर्य
मैं प्रयत्न पूर्वक अपने आप को इस योग्य बना लूं की परमात्मा मुझ को धारण करे । एसे कार्य करू की प्रभु का दायाँ हाथ बन जाऊ । श्वास – प्रश्वास या प्रेम तथा अद्वेष भावना मेरे उन्नति का कारण हो । यह भाव यजुर्वेद के अध्याय दो के मंत्र संख्या तीन में इस प्रकार स्पष्ट किए गये हैं
गन्धर्ववसत्व विश्वावसु परिदधातु विश्वास्यारिष्ट्ये यजमानस्यपरिधिरस्याग्निरिड ईडित । इन्द्रस्य बाहुर्सि दक्षिणो विश्वस्यारिश्टये यजमानस्य परिधिरस्यग्निरिड ईडिट । मित्रावरुणो त्वोत्तरत परिधत्त धरुवेण धर्माणा विश्वस्यारीष्टये यजमानस्य परिधिस्यग्निरिड ईडिट ।। यजुर्वेद 2.3 ।।
यजुर्वेद के दूसरे अध्याय का दूसरा मंत्र भूतानां शब्द के साथ समाप्त होता है । इसके उपदेश के अनुसार मानव जीवन का लक्ष्य सब प्राणियों कॅया ना केवल रक्षक बल्कि पालक बनाना भी होता है।
1. वेदवाणी का धारक बन –
मंत्र कहता है की जो व्यक्ति अपने जीवन का ध्येय लोक कल्याण के कार्यों को बनाता है , दूसरों की सहायता ,उनका मार्गदर्शन को अपना उद्देश्य बनाता है , परमपिता परमात्मा एसे व्यक्ति की सदा रक्षा करता है । दूसरे के सहायक की सहायता करने वाले की सहायता पिता अवश्य ही करता है ।
अत: मंत्र कह रहा है कि वेदवाणी को धारण करने वाला , सब लोगों के निवास की व्यवस्था करने वाला अर्थात सब को सुखी व सम्पन्न करने वाला वह प्रभु सब को सहायता का पालन का उद्देश्य लेकर चलने वाले तुझ को धारण करे ।
2. प्रभु तुझे धारण करे –
वह पिता वेद के ग्यान का वेद की वाणी का धारक है । वेदवाणी को उस पिता ने ही धारण किया है । इतना ही नहीं वह प्रभु सबको निवास देने वाला , रहने का स्थान देने वाला भी है । वह प्रभु ही तुझे धारण करे । जो लोग अन्य लोगों को धारण करने वाले होते हैं , अन्य लोगों के सहायक होते हैं , अन्य लोगों के सदा सहयोगी होते हैं , परम पिता होने के नाते वह प्रभु उन लोगों को धारण करते हैं , उनके सहाय होते हैं । एसा मनुष्य सब की अहिंसा के लिए , सब के कल्याण के लिए, सब के उतम के लिए लगा होने के कारण प्रभु उसे धारण करते हैं । प्रभु का कार्य तो लोक कल्याण, लोकहित ही तो है । इस कारण वह पिता उनका ही हित करते हैं, जो जनहित के कार्यों में लगे होते हैं, लोक हित के कार्यों में लगे होते हैं, सब के कल्याण की इच्छा से कार्य करते हैं । इस प्रकार का कार्य ही यज़्यमय कहलाता है । इस प्रकार के कार्य करने वाले व्यक्ति का ही जीवन यज्यमय होता है । यह सृष्टि भी तो एक यज्य ही तो है । अत: यह यज्यमय जीवन वाला व्यक्ति ही इस सृष्टि यज्य के प्रवर्तक प्रभु की, पिता की परिधि, घेरा होता है । इसका भाव यह है की एसे व्यक्तिओ के जीवन का केंद्र परमपिता परमात्मा स्वयन होते हैं । प्रभु के घेरे में होने के कारण इस मानव की सारी की सारी क्रियाएँ, सारी की सारी गतिविधियाँ उस पिता के कार्यों की और ही घूमती हैं । यह ही कारण है की चाहे वह कुछ खा रहा हो या पी रहा हो, सौ रहा हो या उठ रहा हो, जाग रहा हो या बैठ रहा हो, अपने जीवन के प्रत्येक कष्ण में वह मनुष्य उस पिता कॅया स्मरण रखता है, उसे याद रखता है, कभी भूलता नहीं ।
3. अग्रगति वाला अग्नि बन –
मनुष्य प्रभु को केंद्र बना कर ही आगे बढ़ सकता है। इस कारण वह अपने जीवन को आगे बढ़ाने की इच्छा से प्रभु को ही अपने जीवन का केंद्र बनाता है । वह जानता है की पिता के सहाय के बिना वह कुछ भी तो नहीं कर सकता , उसकी सहायता से ही वह कुछ करने की संपन्नता पाता है , इस लिए वह सदा प्रभु की सहायता पाने का स्वय को अधिकारी बनाने का यत्न है , प्रयत्न करता है । यह ही उसकी अग्रगति कहलाती है । यह अग्रगति का प्रयास ही उसे अग्नि बना देता है , अग्नि के समान आगे बढऩे वाला तथा तेजस्वी बना देता है ।
4. जीवन को नियमित बना –
जो व्यक्ति सदा आगे बढ़ाने का यत्न करते हुए अग्नि बनने वाला होता है, वह ही वेद ग्यान से युक्त हो पाता है , प्रभु के दिए ग्यान को वह ही चख पाता है । इस कारण वह विद्वान कहलाता है । इस प्रकार के वेद के ग्यान से युक्त होने के कारण उसे लोग वेद ग्यानी मानते हैं । वेढ्ग्यानी सदा कुछ निर्धारित नियमों में बंधा होता है । इससे स्पष्ट है कि वह नियमित वा निर्धारित नियम के अनुसार अपने जीवन को चलाने वाला होता है । निर्धारित जीवन वाला होने के कारण ही उसका जीवन नियमित बन जाता है ।
5. प्रभु का दायाँ हाथ बन –
जब मानव अपने जीवन को वेद ग्यान की प्राप्ति के कारण नियमित बना लेता है तो उस का जीवन अग्नि के ही समान हो जाता है, निरंतर उपर उठने लगता है, उन्नत होने लगता है । इस प्रकार के उन्नत जीवन वालों को लोग सदा याद करते हैं, उसका सदा यशोगान करते हैं । इस प्रकार लोगों द्वारा स्तुति का वह केंद्र बनता है । यह सब प्रभु स्तवन वाला बनने से ही संभव हो पाता है । अत: वह प्रभु स्तवन वाला बनता है ।
6. इस लोक में हिंसा विनाश का कारण होती है । इस विनाश से बचने के लिए अहिंसक होना आवश्यक होता है । लोक को अहिंसक बनाने के लिए प्रभु जो कार्य करता है , यह उतम मानव इस अहिंसक कार्यों को करने का माध्यम बनता है । हम जानते हैं कि प्रभु निराकार है । निराकार होने के कारण वह जो भी कार्य करता है , उसके लिए किसी देहधारी का माध्यम होना आवश्यक होता है । इसलिए उतम मानव ही प्रभु के कार्य को संपन्न करने का कारण होते हैं , वह ही उस पिता के प्रतिनिधि स्वरूप माध्यम बनते है । इस लिए ही यह मंत्र कह रहा है कि यह उतम मानव प्रभु के अहिंसक कार्यों का माध्यम होता है, माध्यम बनता है ।
इस सब से स्पष्ट होता है कि सब प्रकार की मानवीय प्रवृतियों के केंद्र में प्रभु ही होते हैं । उन को केंद्र में रख कर ही सब कार्य संपन्न होते हैं, उनके आशीर्वाद के बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते ।
इस के साथ ही यह भी निश्चित है कि वह प्रभु अग्नि के समान सब को आगे ले जाने वाले हैं , सब को आगे बढ़ाने वाले हैं। उन की दया के बिना , उन के आशीर्वाद के बिना हम किसी प्रकार की उन्नति नहीं कार सकते। किसी भी प्रकार की सफलता के लिए, उन्नति के लिए प्रभु का आशीर्वाद आवश्यक होता है । प्रभु के समीप रहने के कारण तूं वेदवाणी वाला भी बन गया है । वेद का ग्यान, जो परमपिता परमात्मा ने तेरे उपकार के लिए , तेरे उद्धार के लिए , तेरी उन्नति के लिए तुझे दिया है , उस ग्यान को अपना कर तूं उत्तम बुद्धि वाला ग्यानी बन गया है , ग्यान का भंडारी होने से वेद के ग्यान वाला, वेदवाणी वाला बन गया है । भाव यह है कि तू वेदवाणी का , बुद्धि के प्रकाश वाला होने से एक नियम के अनुसार कार्य करने वाला बन गया है । तेरा जीवन एक नियम के अनुसार चलने वाला बन गया है , नियम बद्ध हो कर ही अपने सब कार्य करता है । इस कारण ही अन्यों के लिए तूं स्तुति का कारण हो गया है । अन्य लोग तेरा अनुकरण करना पसंद करते हैं। इस प्रकार तूं निरंतर प्रभु का स्तवन, प्रभु का गुणगान करने वाला बना है।
7. लोकहित के कार्य कर –
हम जानते हैं कि हम प्रतिक्षण प्राण तथा अपान अथवा श्वास तथा प्रश्वास लेते व छोड़ते रहते हैं। यह स्नेह का भी साधन होते हैं । हमारे इन श्वास प्रश्वास तथा स्नेह का कारण कोई न कोई मित्र ही हो सकता है क्योंकि मित्र ही हमारे सुखों को , हमारी आयु को , हमारी उन्नति को बढ़ाने का कारण होता है । इस लिए इन के देवता को भी यह मंत्र मित्र ही बता रहा है । इसके साथ ही साथ हमारे साथ द्वेष करने वाले भी होते हैं तथा हमारे अंदर भी अनेक प्रकार के द्वेश भाव भरे होते हैं । इन के देवता के रूप में हम वरुण को जानते हैं । मंत्र के माध्यम से यह प्रार्थना की गयी है कि यह दोनों देवता तेरे को उत्कृष्ट स्थित में स्थापित करें, तुझे उन्नत करे, तुझे आगे ले जावें। ये देवता तेरी उन्नति का कारण बनें।
जो तूं प्रतिदिन परम पिता परमात्मा की स्तुति में अपना समय लगाता है तथा जो तूं दूसरों की निंदा में अपना समय नष्ट करता है, जो तूं जिवनिय कार्य करता है तथा जो तू मरण के से कार्य करता है, यह सब कार्य भी धर्म के लिए हों। इन सब गतिविधियों से तू कभी विचलित न हो, परेशान न हो । इस प्रकार के धर्म से तूं इस लोक की अहिंसा के लिए, रक्षा के लिए बन । भाव यह है कि यह सब तेरे को स्थिर रखने वाले कार्य अहिंसक विधि से हों तथा जन कल्याण के लिए, लोक कल्याण के लिए , लोक हित के लिए हों ।
8. प्रभु स्तुति वाला बन –
हे मानव ! तूं परमपिता परमात्मा की परिधि बन कर अपने सब कार्य कर अर्थात तू प्रभु को अपने केंद्र में रखते हुए अपनी गति विधियों का संचालन कर। प्रभु सदा तेरे कार्यों के केंद्र हों। प्रभु को केंद्र बना कर तूं सदा व निरंतर प्रगति पथ पर निरंतर आगे बढ़। अपने जीवन को नियम बद्ध बना। वेद के ग्यान को अपनाने वाला बन। इस प्रकार तूं प्रभु की स्तुति वाला बन।
9. सब क्रियाएँ जाना क्ल्याण के लिए हों –
इस मंत्र मे एक शब्द तीन बार दिया गया है। यह शब्द है विश्वस्यारिष्ट्ये। क्या कारण है कि इस मंत्र को तीन बार प्रयोग किया गया । वेद में सब शब्दों का अपना विशेष प्रायोजन होता है । अत: यहाँ इस शब्द के तीन बार आने का भी कुछ विशेष ही प्रायोजन है । इस मंत्र में इस शब्द को तीन बार लाने का भाव यह है कि हमारे शरीर, मन वा बुद्धि तीनों की जितनी भी क्रियाएँ हैं, वह सब लोक हित के लिए हों, जन कल्याण के लिए हों, सर्व उपकार के लिए हों । हम अपनी इन सब क्रियाओं के केंद्र में उस पिता को ही मान कर चलें, उस पिता को ही केंद्र में रखकर अपनी क्रियाएँ, अपनी गतिविधियाँ चलावें।
हमारे शरीर की तीन अवस्थाएं होती हैं यथा जाग्रत, सुषुप्त व स्वपन । इन तीनों अवस्थाओं में स्थूल, सूक्षम व कारण-शरीरों से चलने वाली सब क्रियाएँ, सब गतिविधियाँ, सब कार्य लोकहित के लिए ही हों, जन कल्याण की भावना से ही हों। सब के क्ल्याण की साधक हों। इस प्रकार हम ने जिस ग्यान का सग्रह किया है, हम जो क्रिया अथवा कार्य करते हैं, हमारे अंदर जो भी श्रद्धाभाव है, वह सब लोकहित का, जन क्ल्याण का कारण बने।
(साभार सोशल मीडिया)

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