ऋषि दयानंद का उद्देश्य वेद तथा देशभक्ति का प्रचार था

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ओ३म्
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ऋषि दयानन्द वेदों के अपूर्व ऋषि थे। उनके जैसे ऋषि का इतिहास में वर्णन नहीं मिलता। सृष्टि के आरम्भ से देश में ऋषि परम्परा चली जो महाभारत के कुछ समय बाद तक चलकर समाप्त हो गई थी। इस दीर्घ अवधि में देश में बड़ी संख्या में ऋषि व महर्षि उत्पन्न हुए परन्तु वर्तमान में उनका जो उल्लेख मिलता है वह योग व ध्यान साधना सहित वेदों मन्त्रों के प्रचार एवं शास्त्र लेखन तक ही सीमित थे। उन ऋषियों के काल में देश में वैदिक धर्म का सर्वत्र प्रचार-प्रसार था। उन दिनों वैदिक धर्म को किसी मत-मतान्तर से कोई समस्या व चुनौती नहीं थी। सभी राजा वैदिक धर्म को मानने वाले हुआ करते थे। ऋषि दयानन्द जी का जब आविर्भाव हुआ तो उनके समय में वेद विलुप्त हो चुके थे। वेद के स्थान पर अविद्यायुक्त मत-मतान्तर देश व विश्व में प्रचलित हो गये थे। विज्ञान उन्नति कर रहा था। वेदों को मानने वाली ऋषि सन्तानें वेदों को छोड़ कर वेदविरुद्ध पुराणों आदि अविद्यायुक्त ग्रन्थों को अपना इष्ट व धर्म ग्रन्थ मानकर उसकी कथा, उसका अध्ययन व प्रचार करते थे तथा आज भी करते व कर रहे हैं। ऋषि दयानन्द के समय में वेदों के सत्यार्थ उपलब्ध नहीं थे अतः उनके प्रचार प्रसार की तो किसी से कोई आशा ही नहीं की जा सकती थी। देश विधर्मियों से आक्रान्त व उनका दास बना हुआ था। देश छोटे छोटे राज्यों व रियासतों में बंट गया था जिसे एकत्र कर अंग्रेजों ने विस्तृत देश बनाया था। देशवासियों पर अंग्रेज व अन्य विधर्मी अन्याय, अत्याचार व हिन्दुओं का धर्मान्तरण करते थे तथा उनका अनेक प्रकार से उत्पीड़न व शोषण होता था। हिन्दू मत में स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन करने का अधिकार नहीं था। ब्राह्मण भी वेद नहीं पढ़ते थे। वेद विरुद्ध मूर्तिपूजा, अवतारवाद की कल्पित व अतार्किक मान्यतायें का प्रचलन, फलित ज्योतिष का व्यवहार, अस्पर्शयता जैसी कुप्रथायें, जन्मना जातिवाद एवं जातिगत आधार पर भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता था। वैदिक गुरुकुल व धर्म शिक्षा भी समाप्त हो चुकी थी। स्त्रियां प्रायः अपढ़ रहती थी। हिन्दू पुरुष उर्दू व अंग्रेजी आदि भाषायें पढ़कर अपना जीवन व्यवहार करते थे। देश में बालक व बालिकाओं की शिक्षण संस्थायें भी नहीं थी। हमें अनुमान होता है कि उन दिनों की देश की नब्बे प्रतिशत से अधिक जनता अशिक्षित होती थी।

ऐसे विपरीत समय में ऋषि ने आकर वेद ईश्वरीय ज्ञान है, वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है, वेद ही मानव मात्र का धर्म ग्रन्थ है, वेद ही हमें ईश्वर का साक्षात्कार करा सकते हैं, वेदाचरण व सत्याचरण ही धर्म है और इससे ही मनुष्यों के सभी दुःख दूर होते हैं। वेद पथ चल कर ही मनुष्य का जीवन सफल होता है। वेद मनुष्यों को ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति, सृष्टि सहित मनुष्यों को उनके सभी कर्तव्यों एवं अकर्तव्यों का बोध कराते हैं। इन सब विषयों का सद्ज्ञान ऋषि दयानन्द ने कराया और इसके साथ ही वेदों को प्राप्त कर उनके आधार पर उनके पोषक सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय ग्रन्थों सहित वेदभाष्य की रचना की तथा इनका देश देशान्तर में प्रचार किया। वेद मनुष्य को उनका जीवन जीने का सम्पूर्ण दर्शन उपलब्ध कराते हैं। वेद ही सर्वश्रेष्ठ जीवन शैली है। ऋषि दयानन्द ने देश भर में घूमकर सर्वत्र वैदिक मान्यताओं सहित वेद के आधार पर ईश्वर व आत्मा के सत्यस्वरूप सहित ईश्वरोपासना, अग्निहोत्र यज्ञ तथा मनुष्यों के सभी निजी एवं सामाजिक कर्तव्यों पर प्रकाश डाला जिससे समाज में जागृति उत्पन्न हुई और वैदिक धर्म व संस्कृति का पुनरुद्धार हुआ। उनकी कृपा से आज वैदिक धर्म संसार के सभी मत-मतान्तरों में श्रेष्ठ धर्म के रूप में प्रतिष्ठित है जिसके सभी विचार ज्ञान व विज्ञान की कसौटी पर खरे हैं। सारा विश्व वेद की प्राचीनता तथा उसमें मानवतावाद के विचारों एवं जीवन शैली से परिचित हो चुका है। ऋषि दयानन्द की कृपा से देश में ज्ञान व विज्ञान की क्रान्ति भी हुई है जिससे आज हमारा देश आर्यावर्त-भारत विश्व का एक प्रमुख राष्ट्र है और धर्म व संस्कृति की दृष्टि से भी एक आदर्श एवं प्रसिद्ध देश है। देश की पहचान वेद, ब्राह्मण, उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, बाल्मीकि रामायण व महाभारत आदि आध्यात्मिक, ऐतिहासिक एवं सांसारिक ज्ञान के रुप में प्रसिद्धि है।

ऋषि दयानन्द ने ईश्वरीय ज्ञान वेद के प्रचार के लिये सन् 1875 में मुम्बई नगर में आर्यसमाज की स्थापना की थी। आर्यसमाज का उन्होंने मुख्य उद्देश्य वेदों का प्रचार अथवा वेदों का पढ़ना-पढ़ाना तथा सुनना व सुनाना बनाया था। ऋषि दयानन्द, उनके प्रमुख अनुयायियों सहित आर्यसमाज के उत्तरवर्ती वैदिक विद्वानों ने विगत डेढ़ शताब्दी में देश विदेश में वेदों का प्रचार प्रसार कर वेदों की महत्ता को स्थापित किया है। आज संसार में ऐसा कोई मत-मतान्तर नहीं है जो वेद की महत्ता को स्वीकार न करता हो। यह बात अलग है कि संसार मत-मतान्तरों में बंटे हुए हैं और मत-मतान्तरों के आचार्यों एवं अनुयायियों को अपने अपने ग्रन्थ ही प्रिय हैं। वह अपने मत की अविद्या पर ध्यान नहीं देते और न ही वेदों से लाभ उठाते हैं वरन् उनकी उपेक्षा करते हैं। इसी कारण से विश्व में धार्मिक एकता व समानता स्थापित नहीं हो पा रही है। सत्य के निर्णयार्थ एवं सत्यासत्य की परीक्षा के लिये ही ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ की रचना की थी। यह ग्रन्थ अपने उद्देश्य में पूर्णतया सफल है। सत्यार्थप्रकाश के पाठक पर अध्ययन करते हुए ही वेदों का महत्व विदित हो जाता है। स्वामी श्रद्धानन्द, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, पं. लेखराम, महात्मा हंसराज, लाला लाजपतराय, स्वामी दर्शनानन्द जी, पं. चमूपति, पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु, पं. विश्वनाथ वेदालंकार, डा. रामनाथ वेदालंकार, पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी आदि सत्यार्थप्रकाश को पढ़कर ही वैदिक धर्मी बने और इन्होंने वेद प्रचार के क्षेत्र में प्रशंनीय कार्य किया। इन विद्वानों के कार्यों के कारण ही वेद देश विदेश में प्रतिष्ठित हैं। वेद संसार के सभी ग्रन्थों में सबसे महान, प्रशंसनीय, उपादेय एवं मनुष्य के जीवन का कल्याण करने सहित उसे मोक्ष के द्वार तक पहुंचाने वाले ग्रन्थ हैं।

वेद हमें राष्ट्रवादी बनने की प्रेरणा देते हैं। अथर्ववेद में कहा गया है कि भूमि मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूं। वेद के इन वचनों से हमें देशभक्त बनने की प्रेरणा मिलती है। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में लिखा है कि हम जिस देश में उत्पन्न हुए हैं, जिस देश का अन्न खाते, जल पीते तथा जिस देश में हमें सुख व उन्नति के साधन प्राप्त होते हैं, जिस देश में हमारे पूर्वज व धर्म संस्कृति के पोषक आदि रहे हैं, उस देश की उन्नति हम सब को मिलकर तन, मन व धन से करनी चाहिये। इसके अतिरिक्त सत्यार्थप्रकाश में ऋषि दयानन्द ने विदेशी राज्य की उपेक्षा करने की दृष्टि से कहा था कि ‘कोई कितना ही करे परन्तु जो स्वदेशीय राज्य होता है वह सर्वोपरि उत्तम होता है। अथवा मत-मतान्तर के आग्रहरहित, अपने और पराये का पक्षपातशून्य, प्रजा पर पिता माता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है।’ बाल्मीकि रामायण में भी हमें श्री राम के मुख से मातृभूमि की भक्ति के विचार पढ़ने को मिलते हैं। श्री कृष्ण ने भी महाभारत में वेद व वैदिक मूल्यों की रक्षा के लिये युद्ध में कौरवों का नेतृत्व किया था। रामायण में कहा गया है कि अपनी माता व मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़ कर होती है। आर्याभिविनय पुस्तक में भी स्वामी दयानन्द जी ने लिखा है कि हमारे देश में विदेशी राजा न हों वा विदेशी हम पर शासन न करें। ऐसे अनेक विचारों से हमें देश प्रेम एवं देश भक्ति की प्रेरणा मिलती है। यही कारण था कि आजादी के आन्दोलन में आर्यसमाज के सभी लोग जो सत्यार्थप्रकाश पढ़ते थे, वह सब देश की आजादी के लिये किसी न किसी रूप में सहयोगी रहे। आजादी के आन्दोलन के प्रमुख दो व्यक्ति पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा तथा महादेव गोविन्द रानाडे महर्षि दयानन्द जी के ही शिष्य थे। इन्हीं के द्वारा देश की आजादी के लिये क्रान्ति व शान्ति पूर्वक आजादी की प्राप्ति के लिए प्रयत्न किये गये और अनन्तः अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ा। देश की आजादी के बाद भी ऋषि दयानन्द के अनुयायियो ंव वेद के मानने वालों ने देश की आजादी की रक्षा तथा देश की उन्नति में समर्पण भाव से योगदान किया है। आर्यसमाज के लोगों ने त्यागपूर्वक देश की सेवा की है, सेवा के बदले में पदों की मांग नहीं की। इस कारण भी देश की राजनीति वेद के विपरीत दिशा में गई जिससे देश को हानि हुई है। देश की आजादी के प्रमुख नेता स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द, पं. राम प्रसाद बिस्मिल, शहीद भगत सिंह आदि लोग ऋषि दयानन्द के प्रमुख शिष्य व उनसे प्रेरणा ग्रहण किये परिवारों के सदस्य थे।

ऋषि दयानन्द ने देश की उन्नति के लिये अज्ञान, अन्धविश्वास, अविद्या, पाखण्ड, सामाजिक विषमताओं आदि को दूर करने के लिये वेद प्रचार कर सभी बुराईयों को दूर किया। उनके अनुयायियों ने देश में वेदों का प्रचार कर इस मान्यता को स्थापित करने का प्रयत्न किया है कि वेद ही वह महौषधि है जिससे अज्ञान व अविद्या दूर होकर देश, समाज व व्यक्ति विद्या से युक्त तथा अन्धविश्वासों से मुक्त होता है। वेदाध्ययन मनुष्य को देशभक्त भी बनाते हैं। वेदों से मातृभूमि की वन्दना करने के विचार विरासत में मिलते हैं। वेद हिंसा व लोभ की प्रवृत्ति को दूर करते हैं। अतः वेद संसार के सभी मनुष्यों का कल्याण करने वाले ग्रन्थ है। सभी को वेदाध्ययन कर सत्यासत्य का निर्णय करना चाहिये और सत्य का ग्रहण तथा असत्य का त्याग करना चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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