चंबल में पक्षियों की प्यारी-प्यारी चहल पहल

दिनेश शाक्य
नहीं, नहीं, यह दिन में किसी गिरोह के आने की सूचना नहीं है कि आप अपने घरों में दुबक जाएं। न ही दूर बीहड़ों से किसी फायर की आवाज आ रही है। बीहड़ों से गूंजती यह उन प्रवासी पक्षियों का कलरव है जिसे सुनने के लिए घरों से निकलने की जरूरत हैं। लाखों की तादात में बीहड़ की वीरानी को अपने कलरव से आबाद करनेवाले इन प्रवासी पक्षियों की आवक इस साल सर्वाधिक हुई जान पड़ती है। पक्षियों का कलरव गान सुनाते दिनेश शाक्य की रिपोर्ट:
दुनिया में दो घाटियाँ है, एक कश्मीर घाटी तो दूसरी है चम्बल घाटी। दुर्योग देखिए कि दोनों ही घाटियां आतंकवाद और अतिवाद से पीडि़त रही हैं। आतंकबाद से जूझ रही कश्मीर घाटी की तरह है चम्बल घाटी, जिसमे डाकू पनपते है लेकिन आज इस घाटी मे पनाह पा रहे है प्रवासी पक्षी। चंबल सेचुंरी मे खासी तादात मे आ चुके प्रवासी पक्षियो को देखने की गरज से विश्वप्रसिद्ध आगरा से भी बडी संख्या मे पर्यटको आना जाना शुरू है साथ ही इटावा मे भी अपने अपने रिश्तेदारो के यहा पर आ रहे लोग चंबल जाना नही भूल रहे है। कुख्यात डाकुओ की शरणस्थली के रूप मे विख्यात चंबल घाटी सर्दी का मौसम शुरू होते ही प्रवासी पक्षियो से गुलजार होना शुरू हो गया है। चंबल की कई खासियते है चंबल को डाकूओ की शरणस्थली के तौर पर जाना और पहचाना जाता है लेकिन चंबल मे दूरस्त से आने वाले हजारो ने प्रवासी पक्षियो ने चंबल की छवि को बदल दिया है। चंबल सेचंरी का महत्व सर्दी के मौसम मे अपने आप ही बढ जाता क्यो कि चंबल सेचुंरी मे कई लाख प्रवासी पक्षी सर्दी के मौसम मे सालो दर साल से आ रहे है।
दुर्लभ जलचरो के सबसे बडे संरक्षण स्थल के रूप मे अपनी अलग पहचान बनाये चंबल सेंचुरी को इटावा आने वाले पर्यटक देख पाने मे कामयाब होगे। चंबल सेचुंरी से जुडे बडे अफसर ऐसा मान करके चल रहे है 3 राज्यो मे फैली चंबल सेचुंरी का महत्व इतना है कि चंबल सेंचुरी मे डाल्फिन,घडियाल,मगर और कई प्रजाति के कछुये तो हमेशा रहते ही साथ ही कई माईग्रेटी बल्र्ड भी साल भर रह करके चंबल की खूबसूरती को चार चांद लगाती रहती है। चंबल सेंचुरी मे करीब 300 से अधिक प्रजाति के दुर्लभ प्रवासी पक्षी आते है जो चंबल नदी को बेहद खूबसूरत बनाने मे सहायक होते है।
चंबल सेंचुरी मे मुख्य आर्कषण विदेशो से आने वाले कोमन्टिल, कोटनटिल, स्पोटविल्डक, पिन्टैल, गैलियार्ड, कांट जैसे प्रवासी पक्षी है। ऐसा माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश मे दुधवा सेंचुरी को छोड करके कोई दूसरी सेंचुरी चंबल के बराबर वजूद वाली नही लग रही है। तीन राज्यो मे पसरी चंबल सेंचुरी का महत्व लगातार इसलिये बढता चला जा रहा है क्यो कि चंबल सेंचुरी ना केवल संरक्षण की दिशा मे आगे बढ रही है बल्कि सरकारे इस बात पर चिंतन करने मे जुट गई है कि चंबल सेचुंरी के दायरे को और सरंक्षित किया जाये।
इस बार इन पक्षियों की तादाद 15 लाख के पार जाने की उम्मीद जताई जा रही है। यह पक्षी हर साल सर्दियों में भोजन की तलाश में अपनी जगह से पलायन करते हैं। कश्मीर में ये पक्षी ज्यादातर चीन, यूरोप और सेंट्रल एशिया से आते हैं। पक्षियों का कलरव रोमांचित करने के साथ उर्जा देने वाला होता है और यदि यह कलरव चंबल सेंचुरी के अलावा आसपास के इलाको मे भी प्रवासी पक्षियों की अठखेलियां मन को खूब भा रही हैं। यहां प्रवासी पक्षी बरबस पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींच लेते हैं। इन स्थलों पर प्रवासी पक्षियों का डेरा सुंदरता व दृश्य को और भी मनोरम बना देता है। दूर देशों में बढ़ रही ठंड व हो रही बर्फबारी के कारण चंबल सेंचुरी में प्रवासी पक्षियों की आमद में वृद्धि बरकरार है। चंबल की सुंदर वादियों में पहुंच रहे प्रवासी पक्षियों की अठखेलियां व लगातार उड़ान भरते रहने के मनोहारी दृश्यों से वादियों की सुंदरता और बढ़ गई है। इस वजह से चंबल सेंचुरी का आकर्षण भी बढ़ गया है। चंबल सेचुंरी में भारत के अलावा विश्व के ठण्डे देशों स्विटजरलैंड, साईबेरिया, जापान, रूस, श्री लंका, वर्मा, थाईलैंड आदि दर्जनों देशों में बर्फबारी के कारण हजारों मील की दूरी तय कर यहां भारी संख्या में प्रवासी पक्षी करीब चार माह तक प्रवास करते हैं तथा मौसम अनुकूल होने पर वापस लौट जाते हैं। पर्यावरण व पक्षियों की सुरक्षा के लिए कार्य कर रही संस्थाओं के प्रतिनिधियों के अनुसार इन प्रवासी पक्षी रूडीशेल्डक, कूटस, वीजन, गैडवाल, क्रेसटिड ग्रेव काफी संख्या में पहुंच चुके हैं। सोसायटी फार कंजरवेशन आफ नेचर के सचिव पर्यावरण प्रेमी डा. राजीव चौहान ने आशा जताई कि इस बार चंबल में प्रवासी पक्षियों की संख्या में काफी वृद्धि होने की संभावना है। उन्होंने बताया कि इस बार अब तक प्रवासी पक्षियों में कॉमनटील, नार्दन शिवेलर, ग्रेट कारमोरेंट, टफटिड डक, पोचहर्ड आदि दर्जनों प्रजातियों के सुंदर संवेदनशील पक्षी यहां पहुंच चुके हैं। इसके अलावा इटावा के छोटे छोटे वेटलैंडो के अलावा खेत खलिहानों व यमुना क्वारी ,सिंधु जैसी नदियो में भी प्रवासी पक्षियों के झुंड आकर्षण बने हुए हैं।
पंछी, नदिया, पवन के झोंके, कोई सरहद न इन्हें रोके। हिंदी फिल्म रिफ्यूजी का यह गीत इन दिनों चंबल नदी पर रंग-बिरंगे प्रवासी पक्षियों को देखकर अनायास होठों पर आ जाता है। चंबल सहसों सेतु, डिभौली सेतु, पचनदा, बाबा सिद्धनाथ मंदिर आदि घाटों पर इन प्रवासी मेहमानों ने डेरा जमा रखा है। सर्दी के मौसम में जिन देशों में बर्फ से सबकुछ ढक जाता है। वहां के पक्षी दाना पानी की तलाश में दूर देशों को प्रस्थान कर जाते हैं। प्रतिवर्ष अक्टूबर के माह में इन पक्षियों का आना प्रारंभ हो जाता है और मार्च आते-आते यह पक्षी अपने देशों को वापस लौट जाते हैं। प्रवासी पक्षी हजारों की संख्या में काफिले के रूप में उड़ते हैं। शिकारियों से इनकी दूरी बनी रहती है। ये इतने चालाक होते हैं कि जरा खतरा भांप कर आकाश या सुरक्षित तट पर बसेरा कर लेते हैं। सेंचुरी कर्मियों का कहना है कि प्रवासी पक्षियों की पूर्ण देखरेख की जाती है। यह जंगलों में ऐसी जगह पहुंचते हैं जहां इनकी आवश्यकताओं की पूर्ति सहजता से होती रहे। प्राय यह पानी में रहते हैं। तीन दर्जन से अधिक देश ऐसे हैं जहां बर्फबारी बहुत अधिक होती है। इनमें रूस, साइबीरिया आदि देशों के पक्षी शामिल हैं। इन पक्षियों की प्रजातियों में टर्न, बार हैडिड गोड, पिनटेल, पावलर, मलार्ड, गागरे, गोनी आदि प्रमुख हैं।
चंबल में सर्दियों के मौसम में 280 प्रजातियों के प्रवासी पक्षी भ्रमण करने आते हैं। चंबल सेंचुरी के डीएफओ सुजाय बनर्जी का कहना है कि चंबल सेंचुरी मे सर्दी के मौसम मे करीब 300 से अधिक प्रजाति के प्रवासी पक्षियो का बसेरा होता है जो चंबल की खूबसूरत को और बढाने के लिये काफी बेहतर माना जा सकता है। इसके अलावा पीले फूलों के लिए विख्यात रही यह वादी उत्तराखंड की पर्वतीय वादियों से कहीं कमतर नहीं है। अंतर सिर्फ इतना है कि वहां पत्थरों के पहाड़ हैं, तो यहां मिट्टी के पहाड़ हैं। बीहड़ की ऐसी बलखाती वादियां समूची पृथ्वी पर अन्यत्र कहीं नहीं देखी जा सकती हैं।

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