इतिहास के झूठों का भंडाफोड़ अब होना ही चाहिए

भारत में छद्म धर्मनिरपेक्षियों का एकमात्र उद्देश्य इस देश में साम्राज्यवाद को बढ़ावा देना है। यह बढ़ावा देने की प्रवृत्ति उनके हिन्दू विरोध को देखने से स्पष्ट हो जाती है। इस हिन्दू विरोध की प्रवृत्ति के कारण इतिहास के कई झूठ ऐसे हैं जो इस देश में पहले तो विदेशियों के द्वारा गढ़े गये और आज वह यहां एक सत्य के रूप में आसीन हं।
परतंत्रता का काल
अपने देश की परतंत्रता की कहानी बड़ी लंबी बताई जाती है। कुछ फ्रेंच कट दाढ़ी वाले आलिम अर्थात विद्वान इसे 1200 वर्ष की बताते हैं, कुछ 1000 वर्ष की बताते हैं तो कुछ 900 वर्ष की बताते हैं।
स्वाध्याय से मुंह फेर चुकी हमारी ये भारतीय (अधिकांश) जनता इसे इसी रूप में स्वीकार कर लेती है, पढ़ लेती है, कोई कौतूहल नहीं, कोई जिज्ञासा नहीं, कोई किंतु परंतु नहीं, कोई हलचल नहीं, कोई प्रश्न नहीं और कोई मीन-मेख नहीं। जिस देश के वेद जैसे पावन धर्म ग्रंथ यह उद्घोष कर रहे हों कि जब तक तर्क शांत न हो जाए, तब तक अनुसंधान चलता रहना चाहिए, उस देश की प्रजा किसी की बुद्घि की अनुचर हो जाए तो यह लज्जास्पद स्थिति है।
हमें हमारे शत्रुओं ने बताया और समझाया है कि हमारी परतंत्रता की कहानी कितनी लंबी है? ऐसा बताने का उनका कारण स्पष्ट था, किंतु हम क्यों बौद्घिक रूप से इतना पंगु हो गये कि हम उनके कहे पर आंख मीच कर विश्वास करने लगे हमने तर्क और बुद्घि एवं इतिहास के आधार पर नही सोचा। हमारी इस दयापूर्ण स्थिति से अधिक दयापूर्ण और लज्जास्पद स्थिति हमारे राजनीतिज्ञों की रही, जिन्होंने इस झूठ को न केवल इस देश में प्रतिष्ठित कर गौरवान्वित किया अपितु उसके सम्मान में ऐसा कहने वालों की आरती उतारी और हम भूल गये कि-
लीक लीक गाड़ी चले लीक ही चले कपूत।
तीन चलें बिना लीक के शायर, शूर, सपूत।।
अंग्रेज लीक बनाते गये और हम उस पर चलते गये। यहां तक कि स्वतंत्रता के पश्चात भी इसी लीक पर चल रहे हैं। कवि की बात पर विश्वास करें तो यह हमारा एक तरह से कपूतपन ही है। कवि का अभिप्राय स्पष्ट है कि हम अपने विवेक और बुद्घि का तर्क और अनुसंधान का सदा सदुपयोग करें। देखिये तथ्य क्या बता रहे हैं? यही कि यह देश मौहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के साथ ही पराधीन नहीं हो गया था बल्कि वह एक भूचाल था जिसे इस सनातन वैदिक राष्ट्र ने अपनी प्रतिरोधक क्षमता से केवल दो वर्ष के अंदर ही ध्वस्त कर दिया था। इस आक्रमण के लगभग 500 वर्ष पश्चात सन 1206 ई. में इस देश में मुस्लिम सुल्तानों के राज्य की नींव ‘कुतुबुद्दीन ऐबक’ नाम के एक गुलाम शासक द्वारा रखी गयी। इसके पश्चात कई शासक आये, कई राजवंश आये और कई विदेशी आक्रांता यहां आकर बादशाह बने या यहां का माल लूटकर स्वदेश लौट गये। इस प्रकार यह क्रम सन 1707 ई तक उस समय तक अनवरत चला जब तक कि मुगल बादशाह औरंगजेब का निधन न हो गया।
इसके पश्चात भी यद्यपि विदेशी शासक और आक्रांता यहां आते रहे कितु सन 1206 ई. से जिस विदेशी मुस्लिम शासन की नींव भारत में रखी गयी थी वह सही पांच सौ वर्ष के पश्चात यहां इतनी ढीली पड़ गयी कि सत्ता उनके हाथ से निकल गयी। इस काल के पश्चात यद्यपि मुगलकाल सन 1857 ई. तक माना जाता है किंतु इस काल में जो शासक हुए वे नगण्य ही रहे।
सन 1707 ई. तक का काल ही एक ऐसा काल है जिसमें मुस्लिम सत्ता का आदेश यहां चला। यद्यपि इस काल में भी इस आदेश को चुनौती मिलती रही। इसलिए निष्कंटक आदेशों के प्रचलन का काल यह भी नहीं कहा जा सकता। सन 1707 ई. से लगभग एक शताब्दी पूर्व ब्रिटिश ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ यहां आ गया थी जो धीरे-धीरे यहां की सत्ता पर अपना नियंत्रण स्थापित करने हेतु प्रयासरत थी।
मुगल बादशाह औरंगजेब के निधन के पश्चात जब मुगल खानदान की नींव हिल गयी और उनका साम्राज्य गया तो इस कंपनी ने भारत पर शासन करने का षडय़ंत्र रचाया। सन 1707 ई. से सन 1757 ई. तक का पूरे पचास वर्ष का एक कालखण्ड गुजर गया। अब सन 1757 ई. से सन 1947 ई. तक 190 वर्ष तक यहां पहले सौ वर्ष तक भारत के कुछ भागों पर ईस्ट इंडिया कंपनी का और शेष 90 वर्ष के लिए ब्रिटिश सम्राट का शासन रहा। इस प्रकार 500+190=690 वर्ष तक हमारे यहां विदेशियों का आंशिक शासन रहा। इसमें बीच के पचास वर्ष को और जोड़ दें तो 740 वर्ष होते हैं। इस काल को कुछ लोग 900 तो कुछ 1000 और कुछ 1200 वर्ष के दीर्घ कालखण्ड तक ले जाते हैं तो यह एक झूठ नही तो और क्या है?

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)
पुस्तक प्राप्ति का स्थान-अमर स्वामी प्रकाशन 1058 विवेकानंद नगर गाजियाबाद मो. 9910336715

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