बलिदान दिवस पर : धर्म रक्षक एवं आर्य साहित्य के यशस्वी प्रकाशक रक्तसाक्षी महाशय राजपाल

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महाशय राजपाल प्रथम पीढ़ी के प्रमुख ऋषिभक्तों में से एक थे। वह आर्य साहित्य के प्रमुख प्रकाशक थे। उनका प्रकाशन मैसर्स सरस्वती संस्थान आर्य पुस्तकालय के नाम होता था जिसका मुख्यालय लाहौर था। उन्होंने अपने जीवन में उन्नत स्तर का आर्य साहित्य प्रकाशित कर वैदिक धर्म का प्रचार प्रसार किया। उनका जन्म अमृतसर में आषाढ़ महीने के पांचवे दिवस को हुआ था। वर्ष 1942 विक्रमी था। उनका परिवार निर्धन था। महाशय जी का बचपन का नाम घसीटाराम था। पिता किसी अज्ञात कारण से घर छोड़कर चले गये थे। इस कारण अपनी माता तथा छोटे भाई के पालन पोषण का भार आपके ऊपर आ पड़ा था। आपने किसी प्रकार मिडिल तक की शिक्षा प्राप्त की और अमृतसर के एक हकीम फतहचन्द के यहां बारह रुपये महीने की नौकरी कर ली। आपकी पढ़ने व लिखने में रुचि थी। ऋषि दयानन्द के प्रमुख भक्त महात्मा मुंशीराम जी “सद्धर्म प्रचारक” पत्र का प्रकाशन करते थे। सन् 1906 में घसीटाराम जी ने उनके पत्र में एक क्लर्क के रूप में काम करना आरम्भ किया। महात्मा जी से उन्हें पच्चीस रुपये मासिक वेतन प्राप्त होता था। इसके कुछ समय बाद महाशय कृष्ण ने ‘प्रकाश’ नाम का एक साप्ताहिक पत्र निकाला था। आप उनके यहां मैनेजर पद पर नियुक्त किये गये थे। आपके समय में प्रकाश पत्र में खूब प्रगति की।

ऋषिभक्त घसीटाराम जी का विवाह सन् 1911 में हुआ। विवाह के कारण आपका व्यय बढ़ गया था। अतः आपने ‘सरस्वती आश्रम एवं आर्य पुस्तकालय’ नाम से एक प्रकाशन संस्था आरम्भ की। ऋषि दयानन्द के एक प्रमुख जीवनी लेखक स्वामी सत्यानन्द जी की एक प्रसिद्ध पुस्तक है ‘सत्योपदेश माला’। यह पुस्तक आज भी भव्य रूप में मिलती है। इससे पूर्व इसके अनेक संस्कंरण प्रकाशित हुए हैं। आपके प्रकाशन संस्थान से प्रथम प्रकाशन के रूप में इसी पुस्तक का चयन एवं प्रकाशन किया गया था। इन्हीं दिनों आपने अपना नाम घसीटाराम से बदलकर राजपाल रख लिया था। लोग आर्यसमाजियों को महाशय जी कहकर सम्बोधित करते थे। आपके नाम से पहले भी यह शब्द जुड़ गया और आप महाशय राजपाल के नाम से प्रख्यात हुए। आपने उन दिनों जब प्रकाशन का कार्य अधिक उन्नति को प्राप्त नहीं हुआ था, आर्य साहित्य के भण्डार में प्रशंसनीय वृद्धि की। आपने हिन्दी, अंग्रेजी एवं उर्दू भाषा की सैकड़ों पुस्तकों का प्रकाशन किया। आपके प्रकाशन संस्थान से ऋषि दयानन्द के प्रमुख ग्रन्थ जिन्हें दयानन्द त्रयी के नाम से भी जाना जाता है, उन सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका तथा संस्कार विधि ग्रन्थों का उर्दू में अनुवाद कराकर हजारों की संख्या में प्रकाशित किया। यह भी बता दें की आपकी पत्नी का नाम श्रीमती सरस्वती देवी था। आप भारत के पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने अपनी धर्म पत्नी के नाम से अपने प्रकाशन संस्थान का नाम सरस्वती संस्थान रखा था। इससे पहले किसी व्यक्ति ने अपनी पत्नी के नाम से कोई संस्था बनाई हो, विदित नहीं है।

सन् 1924 में कादियानी मुसलमानों की ओर से ‘उन्नीसवीं सदी का महर्षि’ नाम की पुस्तक का प्रकाशन किया गया। इस पुस्तक में ऋषि दयानन्द पर घृणित व मिथ्या आरोप लगाये गये थे। इसके उत्तर में महाशय राजपाल जी ने ‘रंगीला रसूल’ नाम की पुस्तक का प्रकाशन किया। पुस्तक प्रकाशन के काफी समय बाद गांधी जी ने इस पुस्तक के विरोध में अपने पत्र यंग इण्डिया में लेख लिखा। गांधी जी के विरोध के कारण मुसलमानों ने भी इस पुस्तक का विरोध करना आरम्भ किया। इस आन्दोलन के कारण तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने महाशय जी पर अभियोग चलाया। महाशय जी ने मुकदमा लड़ा और अदालत ने उन्हें इस केस में सभी आरोपों से बरी कर दिया। इस पर भी मुसलमानों की उनके प्रति शत्रुता कायम रही। उनको मार डालने की धमकियां दी जाने लगीं। अन्ततः 6 अप्रैल सन् 1929 को इल्मदीन नाम के एक जनूनी मुसलमान ने अपने मत के लोगों के उकसाने के कारण महाशय राजपाल जी का उनकी ही दुकान पर छूरों के प्रहार से वध कर दिया। महाशय जी आर्य वैदिक धर्म तथा सत्य वैदिक साहित्य के प्रकाशन के लिये शहीद हो गये। इल्मदीन को दुकान पर उपस्थित अन्य आर्य बन्धुओं ने पकड़ लिया था। उसे अदालत से फांसी का दण्ड मिला।

महाशय राजपाल जी वैदिक धर्म के एक विद्वान थे एवं ग्रन्थकार भी थे। उनकी अपनी लिखी एक पुस्तक है जिसका नाम है ‘भक्तिदर्पण’। अब तक यह पुस्तक लाखों की संख्या में छप चुकी है। हमारा अनुमान है कि अब तक इसके 70 से अधिक संस्करण निकल चुके हैं। सन् 1971 में प्रकाशित 66वे संस्करण की एक प्रति हमारे पास भी है। वर्तमान समय में भी यह पुस्तक प्रकाशक मै. राजपाल एण्ड संस से उपलब्ध हो जाती है। पुस्तक अत्यन्त उपयोगी है इसी कारण इसका देश में इतना प्रचार हुआ है। कुछ इसी प्रकार की एक पुस्तक महात्मा नारायण स्वामी जी की ‘कर्तव्य दर्पण’ है। देश की आजादी के बाद उनके बड़े पुत्र श्री विश्वनाथ प्रकाशन संस्थान को दिल्ली में कश्मीरी गेट के निकट ले आये। दिल्ली आकर आपने अपने प्रकाशन को आर्य साहित्य तक ही सीमित नहीं रखा अपितु साहित्य की सभी विधाओं पर उत्तम कोटि के ग्रन्थों का प्रकाशन किया। डा. भवानीलाल भारतीय जी आर्य साहित्य के प्रकाशन के इतिहास सहित ऋषि जीवन एवं आर्यसमाज के इतिहास के भी मर्मज्ञ विद्वान थे। आपने महाशय राजपाल जी के विषय में लिखा है ‘आर्य समाज के साहित्य प्रकाशन में महाशय राजपाल का योगदान चिरस्मरणीय रहेगा।’

महाशय राजपाल महर्षि दयानन्द और पं. लेखराम जी की श्रृंखला में आर्यसमाज के तीसरे प्रमुख शहीद हुए। वह निर्भीक पत्रकार, लेखक, प्रकाशक सहित वैदिक धर्म एवं संस्कृति के अनन्य प्रेमी, देशभक्त, समाज सुधारक, ऋषि दयानन्द भक्त, वेदभक्त, त्यागी, तपस्वी तथा आर्य धर्म के रक्षक एवं पोषक थे। आज महाशय राजपाल जी के 92 वें बलिदान दिवस पर हम उनको अपनी हृदय के कृतज्ञता के भावों से पूरित श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। आर्य साहित्य तथा आर्य धर्म की रक्षा के इतिहास में वह सदा अमर रहेंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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