आज का बिहार नीतीश का बिहार है। यह सच है कि नीतीश के शासन काल में बिहार ने बहुत कुछ पाया है। लालू-राबड़ी के राज में बिहार ने जिस प्रकार अपने वैभव को गंवाया उसे नीतिश ने पुन: लौटाया है। इस बात को आम बिहारी ही नही पूरे देशवासियों के साथ नीतीश कुमार के विरोधी भी स्वीकार करते हैं। यही कारण है कि देश के भावी प्रधानमंत्रियों में देश के जिन मुख्यमंत्रियों का नाम लिया जाता है उनमें नरेन्द्र मोदी के बाद नीतीश का ही नाम है।
दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित 17 मार्च की अधिकार रैली में नीतीश कुमार ने इसीलिए अपने विकास कार्यक्रमों को विकास का असली मॉडल बताया और संकेत दिया कि नरेन्द्र मोदी से बेहतर हम हैं। उन्होंने अपने राजनैतिक कौशल का परिचय देते हुए नरेन्द्र मोदी पर सीधा निशाना नही साधा, बल्कि देश की जनता की नब्ज को टटोलने का प्रयास करते हुए मात्र अपने विकास कार्यक्रमों को ही विकास का असली मॉडल कहा। यह सच है कि बिहार को इस समय एक अच्छा नेता मिला है। बिहार का एक शानदार अतीत रहा है।images (2) मगध साम्राज्य का वैभव, महात्मा बुद्घ का अध्यात्मवाद और अशोक कालीन गरिमा ही बिहार की थाती नही है अपितु स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद भी बिहार से निकलकर देश के शीर्ष स्थान पर पहुंचकर भारतीयता की शान बने। नीतीश बाबू बिहार के अतीत और वैभव को भली प्रकार जानते हैं इसलिए उनकी नीतियों में लालू राबड़ी राज की सी जातीय गंध कहीं नही आती। उन्होंने बिहार को उसकी आत्मा से परिचय कराने का प्रयास किया है और हम देख रहे हैं कि उनके राज में बिहार फिर से खड़ा हो रहा है।
बिहार के पास अपना सब कुछ है। लेकिन बिहार में फिर भी गरीबी है। इसके लिए बिहार का भूगोल भी जिम्मेदार है। बिहार के लोगों का परिश्रमी स्वभाव तो जगजाहिर है, लेकिन परिश्रम पर अधिकांशत: नदियों का पानी हर बार फिर जाता है और हम देखते हैं कि जो काम बिहार के लिए किये जाते हैं उन्हें बरसात के दिनों में आने वाली बाढ़ अपने साथ बहा ले जाती है। इसलिए बिहार को फिर खड़ा होने में मशक्कत करनी पड़ती है। ऐसी परिस्थितियों में बिहार के लिए विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की संकल्प रैली का आयोजन करना नीतीश के लिए आवश्यक था। नीतीश ने इस रैली के आयोजन के लिए समय भी सही चुना है। उनका भाव राजनीति में है परंतु नरेन्द्र मोदी के कारण यह भाव गिर रहा था। एक झटके में ही नीतीश ने नरेन्द्र मोदी को बता दिया है कि भाजपा के लिए जद (यू) आवश्यक है, और आवश्यक है तो इसलिए जद (यू) की बात को मानकर ही अगली लोकसभा के लिए चुनावों की रणनीति तय की जाएगी, साथ ही यदि ऐसा नही होता है तो उन्हें और उनकी पार्टी को ‘रामराम जी’ करने में भी देर नही लगेगी। नीतीश ने सधी सधाई भाषा का प्रयोग कर गठबंधन धर्म तो निभाया है, लेकिन गठबंधन के मुखिया को सचेत अवश्य कर दिया है। राजनीति का यह तकाजा भी है कि अपने शत्रु या विरोधी को सावधानी से गिराओ और उसे उसकी सीमाओं में रोक दो।
बिहार के लिए अधिकार रैली का आयोजन कर बिहार के जनमानस से सीधे जुड़े नीतीश ने बिहार को अपने साथ दिल्ली के रामलीला मैदान में लाकर भाजपा को और कांग्रेस को रामलीला दिखा दी है। अब चर्चा है कि नीतीश अगले चुनावों में कांग्रेस के साथ हो सकते हैं, कांग्रेस इस दांव के लिए तैयार बैठी है कि वे कब उसकी गोद में आयें और वह उन्हें भाजपा के खिलाफ प्रयोग करें। जबकि भाजपा के प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने बिहार के लिए नीतीश के प्रयासों की प्रशंसा की है और कहा है कि भाजपा अपने शासन काल में बिहार के विकास के लिए पूरा प्रयास करेगी और अपने हाथों से हम बिहार को संवारेंगे। इस प्रकार नीतीश ने एक कुशल खिलाड़ी की तरह भाजपा और कांग्रेस दोनों को ‘बिना नीतीश सब सून’ लगने वाली स्थिति में ला दिया है। फिलहाल नीतीश की यह बड़ी उपलब्धि है। नीतीश कुमार ने अपने साथ अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता शरद यादव को भी मंच पर अपने साथ रखा। इसमें दो राय नहीं, कि शरद यादव भारतीय राजनीति के इस समय एक मजबूत स्तंभ हैं और संसद में उनके भाषण सुनने लायक होते हैं। श्री यादव तथ्यों के आधार पर बोलने वाले एक मंझे हुए राजनीतिज्ञ हैं, लेकिन इसके बावजूद लोगों ने और मीडिया ने जितना नीतीश के भाषण पर ध्यान दिया है उतना शरद यादव पर या उनके भाषण पर ध्यान नही दिया गया। कारण स्पष्टï है कि बिखरे हुए विपक्ष में बिखरे हुए एनडीए के पास नरेन्द्र और नीतीश नाम की दो तोपें हैं। ये साफ है कि नरेन्द्र मोदी नीतीश से बहुत आगे हैं, बस इसी दूरी को काटने के लिए नीतीश ने और उनके मीडिया प्रबंधकों ने अपने आपको नरेन्द्र मोदी का विकल्प और विकल्प से भी बढ़कर दिखाने का प्रयास किया। हालांकि नीतीश कुमार को यह भी पता होना चाहिए कि बिहार से बाहर वह नरेन्द्र से टक्कर लेने की स्थिति में नही है। उनके पक्ष में केवल यही बात जाती है कि अभी हाल के जल्दी के दिनों में किसी प्रांत के मुख्यमंत्री ने दिल्ली के दिल में रैली आयोजित कर दिल्ली को दहलाने में कामयाबी हासिल की है। इससे बढ़कर उनके लिए इस रैली से और कोई लाभ हो भी नही सकते। राजनीति में यह भी सच है कि कभी कभी तात्कालिक लाभ भी यदि मिलते हैं तो व्यक्ति राजनेता बनने की ओर चलने लगता है। इसमें नीतीश कितने सफल होते हैं, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल मोदी उन पर भारी हैं, आज का सच तो यही है।

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