सज्जनों से द्वेष और दुष्ट व असत्य आचरण वालों से प्रेम उचित नहीं

ओ३म्

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द्वेष किसी से नफरत करने को कहते हैं। इसके अनेक कारण होते व हो सकते हैं। कुछ लोग अच्छे होते हैं परन्तु हम अपने किन्हीं स्वार्थों के कारण उनसे द्वेष करते हैं। ऐसा करना वस्तुतः बुरा है। परन्तु कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो अपने स्वार्थ के लिये दूसरों के हितों की उपेक्षा ही नही करते अपितु जाबूझकर उनकी हानि भी करते हैं। ऐसे अनेक प्रकार के अपराध होते हैं। एक अपराध भ्रष्टाचार को ही लें। भ्रष्टाचार से एक व्यक्ति को लाभ होता तो है परन्तु वह अपने इस दुष्कृत्य से अनेकों निर्दोष लोगों व उनके हितों को दुःख, पीड़ा व हानि पहुंचाता हैं। भ्रष्टाचार चाहे छोटे स्तर पर किया जाये चाहे बड़े स्तर पर किया जाये, वह बुरा होता है। बड़ा भ्रष्टाचार देश को दीमक की तरह से खोखला कर देता है। भारत की आजादी के बाद देश में अनेक बड़े-बड़े भ्रष्टाचार हुए जिन्हें करने वाले देश के शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्ति थे। बहुत से ऐसे कुकृत्यों को राजनीतिक शीर्ष लोगों का संरक्षण प्राप्त रहता है और उनके द्वारा उन्हें बचाया भी जाता है। भ्रष्टाचार करने व करवाने वालों सहित उनको बचाने वाले व छुपाने वाले भी उतने ही दोषी व देश, समाज व ईश्वर के अपराधी होते हैं। ऐसे लोगों के प्रति यदि कोई कहता है कि भ्रष्टाचारी से द्वेष मत करो तो यह कुछ अटपटा लगने के साथ ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि यह बात करने वाला उस भ्रष्टाचारी व भ्रष्टाचारियों का समर्थक है।

हमें निर्दोष या मिथ्या आरोपियों से तो सहानुभूति रखनी चाहिये परन्तु जिनकी प्रवृत्ति, नियत, क्रियाकलाप तथा महत्वाकांक्षायें बड़ी हैं, जो सच्चे आस्तिक न होकर अपने व्यवहार से नास्तिक होने का परिचय देते हैं और जिनका ईश्वर की कर्म-फल व्यवस्था पर विश्वास नहीं है, ऐसे लोगों के प्रति सहानुभूति रखना उनसे घृणा व द्वेष न करना, ऐसे लोगों का एक प्रकार से समर्थन प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि कहीं न कहीं द्वेष को हर स्थिति में बुरा मानने वाला व्यक्ति बुरे कामों का समर्थन कर रहा है। ऐसा ही कुछ कुछ अहिंसा के प्रति भी किया जाता है। जो हिंसा को हर स्थिति में बुरा मानते हैं वह अहिंसा और हिंसा को ठीक प्रकार से जानते ही नहीं हैं। किसी एक व्यक्ति अथवा कुछ लोगों को प्रताड़ना व हिंसा से यदि सहस्रों व लाखों लोगों वा प्राणियों की जान बचती है तो वह हिंसा नहीं अपितु अहिंसा ही होती है। राम चन्द्र जी ने रावण को मारा था इससे अनेक धर्म पारायण ऋषि मुनियों व सज्जन लोगों के प्राणों व जीवन की रक्षा हुई थी। अनेक निर्दोष राजा जो रावण ने अपने कारागार में अपनी शक्ति के नशे में बन्द किये हुए थे और जिनका स्वत्व वा राज्य का हरण रावण ने किया था, वह सब राजा और उनकी प्रजा रामचन्द्र जी के रावण पर अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध आक्रमण से सुखी हुई थी। इससे यही सन्देश मिलता है कि अहिंसा हर हाल में अच्छी नहीं होती और हिंसा भी हर परिस्थिति में बुरी नहीं होती। जहां सम्भव हो अहिंसा से ही काम लेना चाहिये परन्तु अनेक परिस्थितियों में हिंसा का सहारा व्यक्तिगत रूप से भले ही ठीक न लगे परन्तु देश, समाज व निर्दोष लोगों की रक्षा के लिये आत्मरक्षा व समाज की रक्षा में कुछ उचित निर्णय लेना ही पड़ता है। हमारे कानून में भी कुछ वीभत्स अपराधों के लिये कारावास, सश्रम कारावास और मृत्यु दण्ड तक का विधान है। यह यही बताता है कि कुछ ऐसे अपराधी होते हैं जिनके प्रति दया, करूणा, प्रेम, सद्व्यवहार, उनकी रक्षा व उनसे सहानुभूति उचित नहीं होती। उनको उनके अपराध के अनुसार व उनकी प्रवृत्ति के अनुरूप यथायोग्य व्यवहार जो न्याय से युक्त हो, वैसा व्यवहार वा दण्ड देना उचित होता है।

मनुष्य को अनावश्यक किसी से द्वेष नहीं करना चाहिये। हमारा पड़ोसी, मित्र व शत्रु भी यदि सद्कर्मों व सद्व्यवहार से प्रतिष्ठा, धन, सम्पत्ति, सुविधायें एवं यश प्राप्त करता है तो हमें उससे प्रेरणा लेकर स्वयं उसी प्रकार के कार्य करने चाहियें। ऐसा करने से हमें लाभ होता है और ऐसे सज्जन पुरुषों से द्वेष करने से हमें वर्तमान सहित भविष्य में भी हानि होती है। वेदों में भी द्वेष को बुरा कहा गया है और सन्ध्या में ईश्वर की उपासना करते हुए कहा जाता है कि जो कोई हमसे द्वेष करता है या जिस किसी से हम द्वेष करते हैं, उस द्वेष को हम ईश्वर की न्याय व्यवस्था में प्रस्तुत कर देते हैं। इसका अभिप्राय है कि हम उससे लड़कर अपनी शक्ति नष्ट करने और अपने मन में अशान्ति उत्पन्न करने से अच्छा है कि हम उसकी उपेक्षा करें और अपने कर्तव्य कर्मों एवं शुभ कार्यों में किसी प्रकार की बाधा न आने दें। उसके और अपने द्वेष को परमेश्वर की न्याय व्यवस्था में समर्पित कर दें। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि हर स्थिति में हम द्वेष करने वाले अपने विरोधी व शत्रु की हर प्रकार की प्रताड़ना को सहन करते रहें और अपने प्राण व परिवार के हितों को भी स्वाहा व अन्त्येष्टि ही कर दें। ऐसे लोगों के लिये ही ऋषि दयानन्द जी ने वेदों के ज्ञान के अनूकूल व अनूरूप नियम बनाया है कि ‘सबसे प्रीतिपूर्वक धर्मानुसार यथायोग्य वर्तना चाहिये।’ इस धर्मानुसार शब्द में द्वेष के कारण पर सत्य और असत्य की दृष्टि से विचार कर पक्षपातरहित व न्यायपूर्ण निर्णय लेने की बात कही गई है।

जब हम शक्तिशाली होते हैं तो लोग हमसे द्वेष करते हुए डरते हैं। उनको यह भय होता है कि हम उसके द्वेष का यथोचित उत्तर व प्रतिक्रिया दे सकते हैं। द्वेष करने वाले व्यक्ति प्रायः अपने से कमजोर लोगों से ही द्वेष करते हैं और उनके साथ अनुचित व अतार्किक व्यवहार, उनका शोषण, उनके प्रति अत्याचार व हिंसा का व्यवहार करते हैं। अरब देशों में दण्ड के नियम कठोर हैं और अनुमान होता है कि वहां त्वरित न्याय होता है जिससे वहां अपराध कम होते हैं। न्याय का सिद्धान्त भी यही है कि अपराध करने वाले को यथाशीघ्र, अपराध के अनुरूप, न कम और न अधिक दण्ड अविलम्ब मिले। उसमें किसी प्रकार का किसी स्तर से पक्षपात न हो। शक्तिशाली लोग उसको बचायें न। लेकिन इस सिद्धान्त का पालन देश व समाज में होता दिखाई नहीं देता। राजनीति में देखें तो प्रायः सभी अपने लोगों को बचाते व दूसरे दलों पर न केवल सत्य आरोप लगाते व उनकी आलोचना ही करते हैं अपितु स्वार्थ से प्रेरित होकर अच्छे को भी बुरा बताने में तत्पर रहते व जनता को गुमराह करते हैं। यह बातें सभी को स्पष्ट हैं। इसका प्रतिवाद नहीं किया जा सकता। आज के आधुनिक युग में भी हम मनुष्य को सत्य के प्रति निष्ठावान नहीं बना पाये यह मनुष्य की सबसे बड़ी विफलता व आश्चर्य है। परमात्मा मनुष्य के मन व आत्मा में बैठा हुआ उसे अच्छे काम करने पर उत्साहित व आनन्दित करता है और बुरे काम करने पर उसकी आत्मा में भय, शंका व लज्जा को उत्पन्न करता है परन्तु हम व हमारे देश व समाज के लोग ऐसे हैं जो ईश्वर की आवाज भी नहीं सुनते और अपने स्वार्थ व प्रवृत्ति के अनुरूप काम करते हैं जो अनेक परिस्थितियों में सत्य व उचित नहीं होता। आज के युग में मनुष्य के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती मनुष्य को मनुष्य बनाना है जो सत्य को धारण व ग्रहण करने की प्रवृत्ति वाले हों तथा असत्य का त्याग करने सहित असत्य के प्रति उसके मन में तीव्र घृणा का भाव हो।

ऋषि दयानन्द ने मनुष्य को मनुष्य बनाने के काम पर विशेष ध्यान दिया था। इसी कारण से उन्होंने संस्कार विधि ग्रन्थ लिखा। उनके सभी ग्रन्थ मनुष्य को मनुष्य, सत्य पर चलने वाला व असत्य का त्याग करने वाला, मननशील एवं दूसरों से स्वआत्मवत व्यवहार करने वाला बनाने की दृष्टि से ही लिखे गये हैं। यही कारण है कि ऋषि दयानन्द मनुष्य के लिये प्रतिदिन पांच महायज्ञों अर्थात् पांच महाकर्तव्यों का विधान करते हैं। पंचमहायज्ञों में प्रथम सन्ध्या का स्थान है। सन्ध्या में मनुष्य को ईश्वर के सत्यस्वरूप का ध्यान करते हुए उसके सत्य गुण, कर्म व स्वभाव को दृष्टि में रखकर उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना करनी होती है। इसका परिणाम यह होता है कि ईश्वर के गुणों का ध्यान व चिन्तन करने से हमारे दुर्गुण, दुव्र्यस्न व दुःख आदि दूर होते हैं और हमारी आत्मा ईश्वर के गुणों, कर्म व स्वभावों के अनुकूल व अनुरूप बनती है। इससे मनुष्य परोपकार, देशहित, समाज हित, दूसरों की सेवा, दान व पुरुषार्थमय जीवन व्यतीत करते हुए मानवता की अन्यतम सेवा करता है। अग्निहोत्र यज्ञ करने से भी वायु व जल शुद्धि सहित मनुष्य का आत्मा यज्ञीय भावनाओं के अनुरूप सत्य गुणों से युक्त व परोपकारी स्वभाव वाली बनती है। पितृयज्ञ करते हुए माता, पिता व वृद्ध जनों की बिना किसी स्वार्थ तथा कर्तव्य भावना से सेवा की जाती है। इससे माता-पिता आदि हमारे जन्मदाता व पालनकर्ताओं को सुख मिलता है। बलिवैश्व देव में पशु-पक्षियों की रक्षा व उनका हित होता है और अतिथि यज्ञ में विद्वान सत्पुरुषों व आचार्यों को सम्मान देने व उन्हें द्रव्य दान करने से उनका जीवन भी सुखी व समाज व देश को समुन्नत करने में लगता है। वह यशस्वी जीवन व्यतीत करते हैं और देश के बच्चों को सद्गुणों की शिक्षा देते हैं। यह शिक्षा ही आज समाज से लुप्त हो गयी है। आज का हर माता-पिता अपनी सन्तानों को धनवान देखना चाहता है। यह भावना तो अनुचित नहीं परन्तु उन्हें अपनी सन्तानों को यह भी बताना चाहिये कि अनुचित साधनों से धन मत कमाना। ऐसे माता-पिता देश व संसार में शायद कम ही होंगे।

हम द्वेष की चर्चा कर रहे हैं। सत्पुरुषों से द्वेष करना गलत है और देश के लिये हानिकारक लोगों व इतिहास पुरुषों के कुकृत्यों को छिपाना तथा उनसे द्वेष के स्थान पर उनका कीर्तिज्ञान करना भी अनुचित है। बहुत से लोग राम, कृष्ण, चाणक्य, वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, गुरु गोविन्द सिंह जी के श्रेष्ठ व अच्छे कार्यों की प्रशंसा नहीं करते। ऐसे जो लोग हुए हैं व समाज में हैं वह सब द्वेष के अवतार कहे जा सकते हैं। बिना देश हित व समाज हित के किसी व्यक्ति विशेष या समुदाय से द्वेष करना अनुचित है परन्तु जो लोग अनुचित कार्य व व्यवहार करते हैं, जिनके विचार व प्रेरणायें लोगों को अनावश्यक दुःख व कष्ट में डालती हैं तथा जो अपने लोगों के दुष्कृत्यों पर मौन रहते हैं, उनकी खुलकर आलोचना, निन्दा व भत्र्सना नहीं करते हैं, उनसे द्वेष न रखकर सहानुभूति रखना व उनसे प्रेम करना किसी दृष्टि से उचित नहीं है। सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार व यथायोग्य व्यवहार करने का सिद्धान्त ही उचित है।

द्वेष बुरी चीज है। इसे तभी दूर किया जा सकता है कि जब दूसरे भी हमसे द्वेष न करें। यदि कोई हमसे द्वेष करता है और हम उससे किंचित द्वेष व अपनी रक्षा न करें तो इसका परिणाम बुरा हो सकता है। उस सीमा तक जिससे हमें किसी प्रकार की हानि न हो, हमें द्वेष करने वालों से सावधान रहते हुए उनके स्वभाव परिवर्तन के उचित उपाय करना भी आवश्यक है। यदि हमारे अन्दर सामथ्र्य है तो हमें द्वेष करने वालों का उचित रीति से द्वेष दूर कर देना चाहिये। इसके चार तरीके शास्त्रों ने सुझायें हैं। यह हैं साम, दाम, दण्ड और भेद। एक कहावत यह भी सुनने को मिलती हैं कि कुछ लोग बहुत ही अधिक अमानवीय प्रवृत्ति के होते हैं। उनके लिये कहावत है ‘लातो के भूत बातों से नहीं मानते’। यदा-कदा कुछ परिस्थितियों में यह बातें उचित प्रतीत होती है। पड़ोसी देश ने हमारे देश के विरुद्ध कई दशकों से आतंकवाद और अन्य अनेक प्रकार से हमें चुनौतियां दी हैं और प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से हमें कमजोर करने का प्रयत्न किया। हमारी कमजोर सरकारें उसकी उन हरकतों की उपेक्षा करती रहीं। इसके परिणामों से हमें अपने देश के कई सैनिकों एवं नागरिकों के जीवनों से हाथ धोना पड़ा है। यहां तक की हमारी संसद पर हमला भी कराया गया। उनका ऐसा करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं था। यहां यथायोग्य अपितु उससे कुछ अधिक कठोर व्यवहार करना उचित था। हमारे देश के वर्तमान प्रधान मंत्री के नेतृत्व में यथायोग्य व्यवहार की नीति का हल्का सा अनुसरण किया गया है जिससे उन्हें देश के लोगों का अत्याधिक प्यार और समर्थन मिला है। नीति यह होनी चाहिये कि हम इतने बलवान एवं कठोर हों कि कोई हमारे विरुद्ध कुछ अप्रिय करने की सोच भी न सके। अमेरिका, इजराइल, चीन, रूस आदि इसी नीति का पालन करते हुए दीखते हैं। हमारे देश में वोट बैंक की राजनीति करने वालों को यह सत्य एवं देशहितकारी नीति समझ में नहीं आती। हिंसा व अहिंसा विषय पर देश के अन्तर्राष्ट्रकवि डा. सारस्वत मोहन मनीषी जी की एक महत्वपूर्ण कविता है। उसकी पहली पंक्ति है अहिंसा अच्छी चीज है, यह मन की कस्तूरी है पर दुष्ट यदि न माने तो हिंसा बहुत जरूरी है। यह पूरी कविता अत्यन्त प्रेरणादायक एवं विचारोत्तेजक है। सबको इसको सुनना व पढ़ना चाहिये। इसी के साथ लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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