जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस को 17 जनवरी को मिला था ‘नेताजी’ का ख़िताब

भारत को क्रांति के माध्यम से स्वतंत्रता दिलाने का संकल्प ले चुके नेताजी सुभाष चंद्र बोस आजीवन अंग्रेजों की आंखों की किरकिरी बने रहे थे। अपनी योजना को फलीभूत करने के लिए 22 जून 1940 को वह सावरकर जी से मिल चुके थे और उनसे आशीर्वाद ले चुके थे कि उन्हें भारत छोड़कर रासबिहारी बोस से जाकर मिलना चाहिए और आजाद हिंद फौज का दायित्व लेना चाहिए । परंतु इससे पहले कि वह अपनी योजना को सिरे चढ़ाते अंग्रेजी सकार ने उन्हें 27 जुलाई, 1940 को बिना कोई मुकदमा चलाये, अलीपुर जेल में डाल दिया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अत्याचारी अंग्रेजी सरकार कब दूर करने के लिए 29 दिसम्बर, 1940 को जेल में ही अनशन आरम्भ कर दिया।

नेताजी के इस अनशन के समक्ष अंत में अंग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा और उसने सुभाष चन्द्र बोस को 5 जनवरी, 1940 को जेल से रिहा कर दिया। अब उन्हें कोलकाता में उन्हीं के घर में नजरबन्द कर दिया गया। कुछ समय पश्चात ही नेताजी अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस की सहायता से 17 जनवरी, 1941 की रात 1:30 बजे मौलवी का वेश बनाकर अंग्रेजी सरकार की आंखों में धूल झोंककर अंग्रेजों की नजरबंदी से निकल भागे । 18 जनवरी, 1941 को इस कार से नेताजी, शिशिर के साथ गोमो रेलवे स्टेशन (तब बिहार में, अब झारखंड में) पहुंचे थे और वहां से कालका मेल पकड़कर दिल्ली पहुंचे थे।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपने साथी भगतराम के साथ 31 जनवरी, 1941 को काबुल जा पहुँचे। नेताजी काबुल पहुँचने के बाद 3 अप्रैल, 1941 को जर्मन मंत्री पिल्गर के सहयोग से मास्को होते हुए हवाई जहाज से बर्लिन पहुँच गये। नेताजी ने 22 मई, 1942 को जर्मनी के सर्वोच्च नेता हिटलर से मुलाकात की।

जब नेताजी ने आजाद हिंद सरकार की स्थापना की तो उन्होंने एक आजाद हिंद बैंक की भी स्थापना की थी । यह 1943 की घटना है। इस बैंक के साथ दस देशों का समर्थन था। आजाद हिंद बैंक ने दस रुपये के सिक्के से लेकर एक लाख रुपये का नोट जारी किया था। एक लाख रुपये के नोट पर सुभाष चंद्र बोस का चित्र छपा था।

सुभाष चन्द्र बोस ने 17 जनवरी, 1941 को ही बर्लिन रेडियो से अपना ऐतिहासिक सम्बोधन दिया। यह भाषण संभवत: टेप रिकॉर्डर के माध्यम से संपन्न हुआ था । बहुत संभव है कि यह कार्य भी जब वह नजरबंदी में थे तभी संपन्न कर लिया गया हो । 17 जनवरी को इधर से भागना और उधर बर्लिन रेडियो से उनका प्रसारण होना बहुत साहस भरे कार्य हैं। अपने इसी संबोधन के माध्यम से नेता जी ने अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध खुले युद्ध की घोषणा की थी। मां भारती के इस सच्चे सपूत की वीरता , साहस और शौर्य को देखते हुए जर्मन सरकार ने उन्हें ‘फ्यूचर ऑफ इण्डिया’ के सम्मान से सम्मानित किया था। यही वह क्षण थे जबसे उन्हें लोगों ने नेताजी कहना आरंभ किया था । इस प्रकार आज के दिन से ही नेताजी का सम्मानजनक विशेषण उनके नाम के साथ लगा ।

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस की सहायता से 60,000 भारतीयों की ‘आजाद हिन्द फौज’ पुनर्गठित की। इसके साथ ही नेताजी ने 21 अक्तूबर, 1943 को ‘अर्जी-हुकूमत-ए-आजाद हिन्द’ के रूप में अस्थायी सरकार स्थापित कर दी। इस अस्थायी सरकार के ध्वज पर दहाड़ते हुए शेर को अंकित किया गया। निश्चय ही यह भारत वासियों के शौर्य , साहस और वीरता को प्रकट करने वाला चिन्ह था ।नेताजी ने महिला ब्रिगेड ‘झांसी रानी रेजीमेंट’ गठित की । उन्होंने रानी झांसी रेजीमेंट की कैप्टन लक्ष्मी सहगल को बनाया।

नेताजी 4 जुलाई, 1944 को, आजाद हिन्द फौज के साथ बर्मा पहुँचे। यहीं पर नेताजी ने ऐतिहासिक संबोधन के साथ ओजस्वी आह्वान करते हुए कहा था कि ‘‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।’’ इसके जवाब में आजादी के दीवानों ने नेताजी को विश्वास दिलाया कि ‘‘वे स्वाधीनता की देवी के लिए अपना खून देंगे।’’ जनरल शाहनवाज के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज ने ब्रिटिश सेना के छक्के छुड़ाते हुए भारत में लगभग 20,000 वर्गमील के क्षेत्र पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था।

इस प्रकार 17 जनवरी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के क्रांतिकारी जीवन में एक ऐतिहासिक तिथि है। जिस पर हमें अपने इस क्रांतिकारी नेता को नमन करना चाहिए और आज विचार करना चाहिए कि ऐसी कौन सी परिस्थितियां रहीं कि हम फिर कोई नेता जी पैदा नहीं कर सके ? 17 जनवरी को जब उन्हें नेताजी का खिताब मिला था तब तो यह प्रश्न बहुत गंभीरता से विचारणीय हो जाता है , जिसका उत्तर और मिलना ही चाहिए ।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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