यज्ञ द्वारा जीवन की सफलता शुद्ध सामग्री और व्यवहार से ही संभव

ओ३म्

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वैदिक धर्म ही एक मात्र ऐसा धर्म है जिसके पास परमात्मा का सृष्टि के आरम्भ में दिया हुआ वेद ज्ञान उपलब्ध है। सृष्टि की उत्पत्ति 1.96 अरब वर्ष पूर्व तिब्बत में हुई थी। परमात्मा ने प्रथम बार अमैथुनी सृष्टि करके स्त्री व पुरुषों को युवावस्था में उत्पन्न किया था। यह मान्यता ऋषि दयानन्द ने अनुसंधान कर हमें प्रदान की है। वेदों को आरम्भ में सुन कर स्मरण किया जाता था और उसके शुद्ध उच्चारण व शुद्ध पाठ के लिये उसके 10 विकृति पाठ बनाये गये थे। आज भी दक्षिण भारत में वेद मन्त्रों के इन विकृति पाठों के द्वारा वेदों का शुद्ध रूप बनाये रखने के लिये कुछ वेदभक्त परिवारों द्वारा वेदों को स्मरण कर उनके विकृति पाठों का भी अभ्यास किया जाता है जिससे यह परम्परा लगभग दो अरब वर्ष बाद भी अपने यथार्थ रूप में जारी है। वेदों का ज्ञान परमात्मा ने चार ऋषियों को उत्पन्न कर उनकी हृदय गुहा में उपस्थित आत्मा में प्रेरणा देकर स्थापित किया था। परमात्मा सर्वातिसूक्ष्म है। वह सभी जीवात्माओं तथा स्थूल पदार्थों सहित इस ब्रह्माण्ड में सर्वव्यापक एवं सब जीवों के भीतर बाहर भी व्यापक है। इसी कारण उसे सर्वान्तर्यामी कहते हैं। अतः उसके लिये जीवों को प्रेरणा कर वेदों का ज्ञान देना युक्ति एवं तर्कसंगत है। इस विषय को विस्तार से जानने के लिये सत्यार्थप्रकाश एवं आर्य विद्वानों के ग्रन्थों को देखना उचित है। इन वेदों में ही परमात्मा ने मनुष्यों व सृष्टि में रहने वाले सभी प्राणियों के कल्याण के लिये गृहस्थी मनुष्यों को प्रतिदिन प्रातः व सायं अग्निहोत्र करने की प्रेरणा वा आज्ञा की है। सृष्टि के आरम्भ से ही ऋषि, महर्षि, गृहस्थी, विद्वान तथा सभी लोग प्रतिदिन अग्निहोत्र यज्ञ करते आ रहे हैं।

अग्निहोत्र यज्ञ से भौतिक लाभ भी होते हैं और आत्मा की उन्नति भी होती है। भौतिक लाभों में मुख्य लाभ तो वायु एवं जल की शुद्धि का होता है। यज्ञ का मुख्य द्रव्य देशी गाय का शुद्ध घृत होता है। घृत की गुणवत्ता के लिये गाय की नस्ल अच्छी होनी चाहिये, उसको अच्छा भोजन वा चार दिया जाता हो, उसके रहने के लिये उपयुक्त आवास हो तथा उन गायों का पालन गो प्रेमियों द्वारा पे्रम व भक्ति भाव से किया जाता हो। ऐसे ही गोघृत से उत्तम गोघृत से यज्ञ करने से वायु व वर्षा जल की शुद्धि होती है। ऋषि दयानन्द ने लिखा है कि यज्ञ करने से दुर्गन्ध का नाश होता है। वायु के सभी दोष भी यज्ञ करने से दूर होते हैं। यज्ञ करने से यज्ञ के स्थान का वायु यज्ञ की गर्मी से हल्का होकर बाहर चला जाता है और बाहर का शुद्ध वायु गृह में प्रवेश करता है। इससे बहुत से हानिकारक कृमियों के घर से बाहर जाने से भी यज्ञकर्ता को लाभ मिलता है। जहां यज्ञ होता है वहां के शुद्ध व पवित्र वातावरण में रोग के हानिकारक कृमि नहीं रहते, वह उस स्थान से बाहर चले जाते हैं। पं. लेखराम जी के जीवन की एक घटना है जिसमें उन्होंने यज्ञ के द्वारा एक घर के अन्दर बिल में रहने वाले अनेक सर्पों को यज्ञ के धूम्र से बिल से बाहर आने पर विवश किया था। यज्ञ करके घर के द्वार व खिड़कियां बन्द कर दी गई थी जिससे बाहर का वायु भीतर प्रवेश नहीं कर सकता था। रात्रि में सांप बिलों से घर के अन्दर आये और यज्ञ के धूम्र से बेहोश हो गये थे जिन्हें अगले दिन उठा कर बाहर छोड़ दिया गया था। यज्ञ से जो वातावरण बनता है उससे मनुष्य के स्वास्थ्य पर वायु प्रदुषण का प्रभाव नष्ट हो जाता व बहुत कम रह जाता है। यही कारण था कि प्रातः प्रतिदिन यज्ञ करने वाले एक परिवार के सदस्यों व उनके गाय आदि पशुओं की भोपाल गैस दुर्घटना में रक्षा हुई थी जबकि आस-पास के प्रायः सभी लोग गैस के प्रभाव से मृत्यु को प्राप्त हुए थे अथवा गम्भीर रूप से रूग्ण हो गये थे। यज्ञ के लाभों से सम्बन्धित ऐसे अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं। यज्ञ का लाभ तभी होता है कि जब यज्ञ में आहुति के रूप में दी जाने वाली सभी सामग्री, घृत, सुगन्धित पदार्थ, मिष्ट पदार्थ, ओषधि एवं पुष्टि कारक शुष्क फल व मेवे आदि पूरी तरह से शुद्ध व पवित्र हों।

अग्निहोत्र यज्ञ करने से मनुष्य को अपने जीवन व परिवार में सुख व शान्ति का लाभ भी मिलता है। वैदिक सिद्धान्तों के अनुसार सद्कर्मों को करने से मनुष्य को सुख का लाभ होता है। यज्ञ करके मनुष्य वायु को शुद्ध करता है जो दूर दूर तक फैल कर उन सभी व्यक्तियों को लाभ पहुंचाती है जो उस वायु में श्वास लेते हैं। इस यज्ञीय कर्म से परमात्मा की ओर से यज्ञकर्ता को यज्ञ से दूसरे मनुष्यों को होने वाले लाभ की मात्रा के अनुरूप ही सुख प्राप्त होता है। इसी कारण ऋषियों ने यज्ञ को संसार का सबसे श्रेष्ठतम कर्म अर्थात् सभी अच्छे व पुण्य कार्यों में सबसे अधिक श्रेष्ठ कर्म बताया है। यज्ञ करने से परमात्मा की वेदों में यज्ञ करने की जो आज्ञा है उसका पालन भी होता है। वेदों के मन्त्र परमात्मा के बनाये हुए एवं उसी की भाषा में हैं। यज्ञ में ‘अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व’ मन्त्र से यजमान द्वारा पांच घृत आहुतियां दी जाती हैं। इसमें ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा गया है कि हे सब पदार्थों में विद्यमान परमेश्वर! यह मेरा आत्मा तेरे लिए समिधारूप है। हे अग्ने – प्रकाशस्वरूप ज्ञानस्वरूप परमेश्वर! इससे तू मुझमें प्रकाशित हो और अवश्य ही वृद्धि को प्राप्त हो। तू हमको भी बढ़ा और हमें पुत्र-पौत्र, सेवक आदि अच्छी प्रजा (सन्तान) से, गौ आदि पशुओं से, वेद-विद्या के तेज से और धन-धान्य, घृत, दुग्ध, अन्न आदि से समृद्ध कर। स्विष्टकृदाहुति मन्त्र में ईश्वर से यह प्रार्थना की जाती है कि वह परमात्मदेव हमारी सब शुभ इच्छाओं को जानता है और वह हमारी इच्छाओं को कृपा करके पूर्ण कर दे। यज्ञ में परमात्मा से बल व आयु की प्रार्थना भी की गई है। इसी प्रकार की प्रार्थना ईश्वर की स्तुति व प्रार्थना के एक मन्त्र में भी है। इसी मन्त्र से प्राजापत्याहुति आहुति दी जाती है। इसमें परमात्मा से प्रार्थना करते हुए कहा गया है कि हे प्रजापालक परमेश्वर! सब उत्पन्न हुए जड़-चेतनादिकों को आपने अधिकारपूर्वक रचा है। आपके सिवा सृष्टि आदि को बनाने का सामथ्र्य अन्य किसी परमेश्वर से इतर मनुष्य में नहीं है। जिस-जिस पदार्थ की कामना वाले होके हम आपका आश्रय और वांछा करें, वह-वह हमारी कामना सिद्ध होवें जिससे हम धनैश्वर्यों के स्वामी होंवे। ईश्वर सर्वशक्तिमान है। संसार का समस्त ऐश्वर्य उस परमात्मा का ही है। वह हमारे जीवन की पात्रता के अनुसार हमें ऐश्वर्य व सुख आदि देता है। यज्ञ करने से मनुष्य को ईश्वर से सीधे वह लाभ प्राप्त होते हैं जो अन्य किसी लौकिक कर्म आदि से प्राप्त नहीं होते। अतः जीवन को पूर्ण सुखी, समृद्ध, ज्ञान, ऐश्वर्य एवं दीर्घायु से युक्त जीवन की प्राप्ति के लिये प्रत्येक मनुष्य को अग्निहोत्र यज्ञ अवश्य करना चाहिये।

अग्निहोत्र के अतिरिक्त मनुष्य को प्रातः यज्ञ से पूर्व ब्रह्मयज्ञ वा सन्ध्या भी करनी होती है। वेद एवं ऋषियों के प्राचीन शास्त्रीय ग्रन्थों के आधार पर ऋषि दयानन्द ने हमें सन्ध्या की विधि तैयार कर प्रदान की है। सन्ध्या में हम शिखा बन्धन, आचमन, इन्द्रिय स्पर्श, मार्जन, प्राणायाम, अघमर्षण, मनसा परिक्रमा, उपस्थान, समर्पण एवं नमस्कार के मन्त्रों का पाठ करते हैं। इन मन्त्रों के अर्थ भी हमें उपलब्ध हैं जिनका पाठ किया जाता है और इन्हें स्मरण करने का प्रयास भी करना होता है। मन्त्र का पाठ व इनके अर्थ को पढ़कर मन्त्र के समग्र अर्थ को हृदयगम कर उसकी भावना के अनुरूप अपने मन व आत्मा को बनाना चाहिये। सन्ध्या का समय प्रतिदिन प्रातः सायं न्यून से न्यून एक घंटा बताया गया है। सन्ध्या के समर्पण मन्त्र में ईश्वर से प्रार्थना करते हुए साधक व उपासक प्रार्थना करता है कि हे परमेश्वर दयानिधे! आपकी कृपा से जप और उपासना आदि कर्मों को करके हम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि को शीघ्र प्राप्त होवें। धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष यह चार पुरुषार्थ ही हमें सिद्ध करने हैं जिनकी प्राप्ति ब्रह्मयज्ञ एवं देवयज्ञ दोनों को करने से होती है। सन्ध्या व अग्निहोत्र से मोक्ष की सिद्धि होने पर मनुष्य सभी दुःखों से छूटकर जन्म-मरण व आवागमन के चक्र से भी मुक्त हो जाता है। यही मनुष्य जीवन में जीवात्मा का सर्वोच्च लक्ष्य है। इससे बड़ा अन्य कोई लक्ष्य हो भी नहीं सकता। इसी कारण हमारे देश के सभी विद्वान व पूर्वज अपना जीवन वेद तथा वैदिक साहित्य के अध्ययन सहित ईश्वर की उपासना व अग्निहोत्र यज्ञ में लगाते थे और कृतकार्य होते थे। अतः स्वाध्याय सहित सन्ध्या व यज्ञ करने से मनुष्य का जीवन सफल होता है। हमने बहुत संक्षेप में यज्ञ विषयक कुछ बातों को इस लेख में प्रस्तुत किया है। हम आशा करते हैं कि इससे हमारे पाठक मित्र लाभान्वित होंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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