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लेखक – आर्य सागर

एक युवक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद के किसी गांव का है। इसके विषय में प्रचारित हैं कि इसने 41दिन अनवरत खड़े होकर आज के परिपेक्ष्य में जिसे तपस्या कहा जाता है उसे करने का संकल्प लिया है।13 जनवरी से यह खड़ा है 23 फरवरी को 41 दिन की अवधि इसकी पुर्ण हो जायेगी।

लंबे समय तक खड़े होने की वजह से इस युवक के दोनों पैर काफी सूज गए हैं।जैसा कि जाहिर है मानव शरीर खड़े होकर चलने के लिए बना है एक ही स्थान पर दीर्घ अवधि तक खड़े होने के लिए यह नहीं बना है। विशेषज्ञों के मुताबिक यदि हम इस तरह लंबे समय तक एक ही स्थान पर खड़े रहते हैं तो हमारे पैरों में खून का संचार बाधित होता है खून नीचे की ओर जमता है जिसे सूजन आती है। पैरों के डैमेज होने के साथ-साथ वेरीकोज वेंन, फुट अल्सर से लेकर पैर की मसल्स व नसों का परमानेंट डैमेज भी हो सकता है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक यह युवक गांव की सुख शांति के लिए तप कर रहा है इस युवक का भाव निसंदेह पवित्र है।

लेकिन हम आध्यात्मिक वैदिक योग परंपरा पर विचार करें तो तप की गणना अष्टांग योग एक अंग नियमों में की गई है नियम का फल व्यक्तिगत होता है इसका कभी भी सामूहिक फल नहीं मिलता उदाहरण के लिए शौच या स्वच्छता भी एक नियम है यदि कोई व्यक्ति अपने शरीर की शुद्धि करता है तो उसका फल उसे ही मिलता है उसके शरीर की शुद्ध करने मात्र से पूरे गांव की शुद्ध नहीं हो सकती । ऐसे में हमें तप के वैदिक स्वरूप पर विचार करना होगा जब-जब तप शब्द हम सुनते हैं तो हमारे मस्तिष्क में प्राचीन ऋषि मुनियों की साधनारत छवि अनायास ही उमड़ पड़ती है। योग विद्या सनातन है । जो तपस्वी है वही योगी हो सकता है प्रत्येक योगी तपस्वी होता है महर्षि व्यास ने पतंजलि ऋषि के योग दर्शन पर अपने भाष्य में कहा भी है – नातपस्विनो योग: सिध्यति अर्थात जो तपस्वी नहीं है उसका योग सिद्ध नहीं होता।

महर्षि व्यास महाभारत युग के सबसे बड़े योगी थे वेदांत सूत्रों के रचयेता व महाभारत ग्रंथ के भी वह रचयेता थे। योग दर्शन के द्वितीय पाद प्रथम सूत्र के भाष्य में क्रियायोग की व्याख्या जिसमें तप भी शामिल है उसके विषय में उन्होंने शारीरिक तप की सीमाएं बांधी । उन्होंने कहा है-

तच्च चिक्त प्रसादनमबाधमानमनेनाऽऽसेव्यमिति मान्यते।

महर्षि व्यास के अनुसार साधक को तपस्या ऐसे करनी चाहिए उसका मन प्रसन्न रहे और उसकी शरीर में कोई व्याधि पीड़ा रोग उत्पन्न न हो।

अन्य मोक्ष शास्त्रों उपनिषद् आदि में जो तप का स्वरूप मिलता है वह भी इसी प्रकार मिलता है कि चमड़ी को अग्नि में तपाना या शरीर के किसी अंग को उठाकर रखना खड़े रहना या देर तक बैठे रहना तप नहीं है अपितु धर्म आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हुए सुख-दुख, मान -अपमान ,जीत -हार जो द्वंद हैं उनको श्रद्धा से सहना उपवास मौन आदि को तप माना गया है।

महाभारत रामायण मनुस्मृति आदि में सत्य भाषण ब्रह्मचर्य विद्वानों की सेवा, विद्या के अध्ययन व प्रचार को तप माना गया है। निष्कर्ष यही निकलता है वह प्रत्येक शारीरिक मानसिक क्रियाकलाप जिसके कारण हमारे मन की अशुद्धि वासनाएं दूर होती है तप कहलाता है।

ऐसे में ऋषियों की कसौटी शास्त्रीय प्रमाणों के अनुसार यदि हमारे किसी क्रियाकलाप से हमारे शरीर में रोग पीड़ा वेदना उत्पन्न हो रही है धर्म अर्थ काम मोक्ष का साधन यह शरीर हानी को प्राप्त हो रहा है तो यह तप नहीं तप के नाम पर की जाने वाली अव्वल दर्जे की मूर्खता है। वैदिक परंपरा विशेष तौर पर योगियों की परंपरा में पतंजलि योग में यहां तक की गीता आदि में ऐसे किसी भी तप का उल्लेख अनुमोदन व प्रचार नहीं किया गया है।

लेकिन आज जो हम तप का जो यह विकृत स्वरूप देख रहे हैं यह ज्यादा प्राचीन नहीं है यह सब मध्यकाल की देन है जहां अनेकों वैदिक परंपराओं में विकृति आयी ।

हमारे उपर हमारे पुर्वजों ऋषि मुनियों संतो का ऋण है यदि हम ऋषि ऋण को चुका नहीं सकते तो हमें उनकी परंपराओं को विकृत करने का भी कोई अधिकार नहीं है हमें खुले हृदय से दुराग्रह को छोड़कर अपनी वैदिक जप तप दान की परंपराओं का निर्वहन करना चाहिए।

इस युवक का भाव शुद्ध है लेकिन साधन निकृष्ट है ऐसे में ईश्वर से यही कामना है यह नौजवान युवक तप के सही वैदिक स्वरूप को समझे जैसी तपस्या हमारे पूर्वज करते थे सादा जीवन उच्च विचार वाली तपस्या जिससे साधन भी सुरक्षित रहे और साध्य की भी सिद्धि हो जाए।

ओ३म् इति शम।

लेखक – आर्य सागर
तिलपता, ग्रेटर नोएडा।

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