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भारत के 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भाग- 404 [ हिंदी स्वराज के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज पुस्तक से …] हिंदू राष्ट्रनीति व हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज – भाग 2

शिवाजी का चरित्र

शिवाजी के भीतर भारतीय संस्कृति के महान संस्कार कूट-कूट कर भरे थे । वह सदैव अपने माता – पिता और गुरु के प्रति श्रद्धालु और सेवाभावी बने रहे । उन्होंने कभी भी अपनी माता की किसी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया और पिता के विरुद्ध पर्याप्त विपरीत परिस्थितियों के होने के उपरांत भी कभी विद्रोही स्वभाव का परिचय नहीं दिया । वह उनके प्रति सदैव एक कृतज्ञ पुत्र की भांति ही उपस्थित हुए । शिवाजी महाराज को अपने पिता से स्वराज की शिक्षा मिली। जब बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी राजे को बन्दी बना लिया तो एक आदर्श पुत्र की भांति उन्होंने बीजापुर के शाह से सन्धि कर शाहजी राजे को मुक्त करा लिया। इससे उनके चरित्र की उदारता का बोध हमें होता है और हमें पता चलता है कि वह हृदय से कृतज्ञ रहने वाले महान शासक थे। उस समय की राजनीति में पिता की हत्या कराकर स्वयं को शासक घोषित करना एक साधारण सी बात थी । यदि शिवाजी चारित्रिक रूप से महान नहीं होते तो वह अपने पिता की हत्या तक भी करा सकते थे , परंतु उन्होंने ऐसा कोई विकल्प नहीं चुना । शाहजी राजे के निधन के उपरांत ही उन्होंने अपना राज्याभिषेक करवाया । यद्यपि वह उस समय तक अपने पिता से स्वतंत्र होकर एक बड़े साम्राज्य के अधिपति हो गये थे। कहने का अभिप्राय है कि उनकी अधिपति होने की यह स्थिति उनके भीतर अहंकार का भाव उत्पन्न कर सकती थी , परंतु शिवाजी सत्ता को पाकर भी मद में चूर नहीं हुए । उनके नेतृत्व को उस समय सब लोग स्वीकार करते थे । यही कारण है कि उनके शासनकाल में कोई आन्तरिक विद्रोह जैसी प्रमुख घटना नहीं हुई थी। यह भी एक विचारणीय तथ्य है कि जिस समय शिवाजी शासन कर रहे थे , उस समय इस प्रकार की स्वाभाविक स्वामीभक्ति सचमुच हर किसी शासक को उपलब्ध नहीं थी ।
शिवाजी शत्रु के प्रति दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करने की नीति में विश्वास रखते थे ,अर्थात जैसे के साथ तैसा करना वह उचित समझते थे । यही उस समय की राजनीति का तकाजा भी था। तुर्की ब तुर्की प्रत्युत्तर देना राजनीति का धर्म होता है । हमने ‘सद्गुण विकृति ‘ के कारण कई बार अपनी उदारता का परिचय देते हुए शत्रु पर अधिक विश्वास किया और अंत में उससे हानि ही उठाई । परंतु शिवाजी ऐसा करने को कभी भी तत्पर नहीं होते थे । शिवाजी शत्रु को परास्त करने की नीति में विश्वास रखते थे ।
शिवाजी महाराज ने अपने राज्याभिषेक (6 जून 1674) के अवसर पर हिंदू पद पातशाही की घोषणा की थी। वह देश में हिंदू राजनीति को स्थापित कर देश से विदेशियों को खदेड़ देना चाहते थे। उनकी राजनीति का मूल आधार नीति, बुद्घि तथा मर्यादा-ये तीन बिंदु थे। रामायण, महाभारत, तथा शुक्रनीतिसार का उन्होंने अच्छा अध्ययन किया था। इसलिए अपने राज्य को उन्होंने इन्हीं तीनों महान ग्रंथों में उल्लेखित राजधर्म के आधार पर स्थापित करने का पुरूषार्थ किया। वह राष्ट्रनीति में मानवतावाद को ही राष्ट्रधर्म स्वीकार करते थे। शुक्र नीति में तथा रामायण व महाभारत में राजा के लिए 8 मंत्रियों की मंत्रिपरिषद का उल्लेख आता है। इसलिए शिवाजी महाराज ने भी अपने राज्य में 8 मंत्रियों का मंत्रिमंडल गठित किया था। शेजवलकर का मानना है कि ये अष्टप्रधान की कल्पना शिवाजी ने ‘शुक्रनीतिसार’ से ही ली थी ।

इतिहासकारों की मक्कारी

अंग्रेज व मुस्लिम इतिहासकारों ने शिवाजी को औरंगजेब की नजरों से देखते हुए ‘पहाड़ी चूहा’ या एक लुटेरा सिद्घ करने का प्रयास किया है। अत्यंत दु:ख की बात ये रही है कि इन्हीं इतिहासकारों की नकल करते हुए कम्युनिस्ट और कांग्रेसी इतिहासकारों ने भी शिवाजी के साथ न्याय नही किया। छल, छदम के द्वारा कलम व ईमान बेच देने वाले इतिहासकारों ने शिवाजी के द्वारा हिंदू राष्ट्रनीति के पुनरूत्थान के लिए जो कुछ महान कार्य किया गया उसे मराठा शक्ति का पुनरूत्थान कहा ना कि हिंदू शक्ति का पुनरूत्थान।
लाला लाजपत राय अपनी पुस्तक “छत्रपति शिवाजी” के पृष्ठ संख्या 117 पर लिखते हैं “शिवाजी अपने राज्य प्रबंध में लगे हुए थे कि मार्च सन 1680 ई को अंतिम दिनों में उनके घुटनों में सूजन पैदा हो गई। यहां तक कि ज्वर भी आना आरंभ हो गया। जिसके कारण 7 दिन में शिवाजी की आत्मा अपना नश्वर कलेवर छोड़ परम पद को प्राप्त हो गई। 15 अप्रैल सन 1680 को शिवाजी का देहावसान हो गया।” ( संदर्भ : “छत्रपति शिवाजी” लेखक लाला लाजपतराय, प्रकाशक: सुकीर्ति पब्लिकेशंस, 41 मेधा अपार्टमेंट्स, मयूर विहार 01, नई दिल्ली 110091)

शिवाजी की नीति

शिवाजी की नीति धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना करने की थी। खानखां जैसे इतिहास कार ने भी उनके लिए ये कहा है कि शिवाजी के राज्य में किसी अहिंदू महिला के साथ कभी कोई अभद्रता नही की गयी। उन्होंने एक बार कुरान की एक प्रति कहीं गिरी देखी तो अपने एक मुस्लिम सिपाही को बड़े प्यार से दे दी। याकूत नाम के एक पीर ने उन्हें अपनी दाढ़ी का बाल प्रेमवश दे दिया तो उसे उन्होंने ताबीज के रूप में बांह पर बांध लिया। साथ ही बदले में उस मुस्लिम फकीर को एक जमीन का टुकड़ा दे दिया। ऐसी ही स्थिति उनकी हिंदुओं के मंदिरों के प्रति थी। यही था वास्तविक धर्मनिरपेक्ष राज्य।

शुद्घि पर बल दिया

शिवाजी का मुस्लिम प्रेम अपनी प्रजा के प्रति एक राजा द्वारा जैसा होना चाहिए, उस सीमा तक राष्ट्र धर्म के अनुरूप था। इसका अभिप्राय कोई तुष्टिकरण नही था। शिवाजी इसके उपरांत भी हिंदू संगठन पर विशेष बल देते थे। इसलिए उन्होंने निम्बालकर जैसे प्रतिष्ठित हिंदू को मुसलमान बनने पर पुन: हिंदू बनाकर शुद्घ किया। साथ ही निम्बालकर के लड़के को अपनी लड़की ब्याह दी। नेताजी पालेकर को 8 वर्ष मुस्लिम बने हो गये थे-शिवाजी ने उन्हें भी शुद्घ कराया और पुन: हिंदू धर्म में लाए।

शिवाजी की मर्यादा

किसी भी मस्जिद को किसी सैनिक अभियान में शिवाजी ने नष्ट नही किया। इस बात को मुस्लिम इतिहासकारों ने भी खुले मन से सराहा है। गोलकुण्डा के अभियान के समय शिवाजी को यह सूचना मिल गयी थी कि वहां का बादशाह शिवाजी के साथ संधि चाहता है, इसलिए उस राज्य में जाते ही शिवाजी ने अपनी सेना को आदेश दिया कि यहां लूटपाट न की जाए अपितु सारा सामान पैसे देकर ही खरीदा जाए। बादशाह को यह बात प्रभावित कर गयी। जब दोनों (राजा और बादशाह) मिले तो शिवाजी ने बड़े प्यार से बादशाह को गले लगा लिया। शिवाजी ने गौहरबानो नाम की मुस्लिम महिला को उसके परिवार में ससम्मान पहुंचाया। उनके मर्यादित और संयमित आचरण के ऐसे अनेकों उदाहरण हैं अपने बेटे सम्भाजी को भी एक लड़की से छींटाकशी करने के आरोप में सार्वजनिक रूप से दण्डित किया था।
शिवाजी हिंदू पद पातशाही के माध्यम से देश में ‘हिंदू राज्य’ स्थापित करना चाहते थे इसलिए उन्होंने हिंदू राष्ट्रनीति के उपरोक्त तीनों आधार स्तंभों (नीति, बुद्घि और मर्यादा) पर अपने जीवन को और अपने राज्य को खड़ा करने का प्रयास किया।

विशाल हिंदू राज्य के निर्माता

शिवाजी महाराज ने अपने जीवन काल में ही विशाल साम्राज्य की स्थापना कर दी थी। जिसे उनके उत्तराधिकारियों ने और भी अधिक विस्तृत करने में सफलता प्राप्त की। 1707 ईस्वी में मुगल बादशाह औरंगजेब मरा तो उसके सही 30 वर्ष पश्चात अर्थात 1737 ईस्वी में भारत पूर्णतया हिंदू राष्ट्र बना दिया गया। 28 मार्च 1737को मराठों ने तत्कालीन मुगल बादशाह को वेतन भोगी सम्राट बनाकर दिल्ली के लाल किले तक सीमित कर दिया था। इस प्रकार 28 मार्च 1737 भारत के हिंदू राष्ट्र घोषित होने का ऐतिहासिक दिन है। जिसे शिवाजी महाराज की प्रेरणा के कारण ही हम प्राप्त कर सके थे। इतिहास के ऐसे महानायक को शत-शत नमन।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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