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मेरे मानस के राम : अध्याय – 45 , राम रावण युद्ध

जब रामचंद्र जी के साथ सभी दिव्य शक्तियों के सहयोग और संयोग की बात की जाती है तो उसका अभिप्राय यह समझना चाहिए कि न्याय, धर्म और सत्य जिसके साथ होता है, उसके साथ परमपिता परमेश्वर की शक्ति आशीर्वाद के रूप में सदा साथ बनी रहती है। प्रकृति की सकारात्मक ऊर्जा सात्विक भाव के रूप में उसके भीतर विराजमान हो जाती है। जिससे उसकी आत्म शक्ति में कई गुणा वृद्धि हो जाती है। उसका मनोबल सदा ऊंचा रहता है और वह एक सच्चे योद्धा की भांति युद्ध क्षेत्र में उतरकर संग्राम करता है। सारी प्रतिकूलताएं उसके अनुकूल होती चली जाती हैं। अधर्म, अनीति और अन्याय की दीर्घकालिक रात्रि वैसे ही छिन्नभिन्न होती चली जाती है, जैसे सूर्योदय के समय अंधेरा भाग जाता है। रामचंद्र जी के जीवन में अनेक प्रकार के कष्ट आए, पर उन्होंने अपने मर्यादा पथ को नहीं छोड़ा। बहुत ही सात्विक भाव से मर्यादाओं का पालन करते हुए अपने पथ पर वे बढ़ते रहे। जिसका परिणाम यह हुआ कि बड़ी से बड़ी बाधा और कष्ट को भी उन्होंने सहर्ष झेल लिया। वह भाई के लिए दु:खी हुए तो केवल इसलिए कि माता सुमित्रा से जाकर क्या कहूंगा ? जब वह देखेंगे कि मेरा लक्ष्मण साथ नहीं है तो क्या जवाब दूंगा? वह बहानेबाज नहीं थे। इसलिए दु:ख के क्षणों में भी वह कोई बहाना नहीं खोजते थे। उन्हें मां सुमित्रा के आंसू दिख रहे थे, जो उनकी अपनी आंखों से बह रहे थे। वह सोचते थे कि मां यह भी कह सकती है कि अपनी पत्नी के लिए मेरे बेटे की बलि देकर आया है ? इस मर्यादा की रक्षा के लिए उनकी आंखों में आंसू आ रहे थे।

रामचंद्र की हो रही , रावण के संग जंग ।
योद्धा दोनों पक्ष के , होकर रह गए दंग।।

सत्य राम के साथ था, रावण के संग झूठ ।
सात्विकता संग राम के, उधर तामस की लूट।।

बुराई करती जा रही , अच्छाई पर वार।
धर्म राम के साथ है, एक – मात्र हथियार।।

रावण ने जितने किए , रामचंद्र पर वार ।
काट दिए श्री राम ने , दु:खी रावण लाचार।।

ध्वज कटा लंकेश का , लखन वीर के तीर ।
सारथि का सिर कटा , हुआ रावण भयभीत।।

विभीषण जी ने कूद कर, घोड़े का किया अंत ।
रावण के अब क्रोध का , आदि रहा ना अंत ।।

विभीषण जी को इस प्रकार रामचंद्र जी का साथ देते देखकर रावण के क्रोध की कोई सीमा नहीं रही। उसने सोचा कि अब युद्ध क्षेत्र में रामचंद्र जी से पहले इस कुलकलंक विभीषण को ही परलोक भेज देता हूं। अतः विभीषण जी का अंत करने की भावना से प्रेरित होकर रावण ने उनकी ओर बरछी फेंकी । जिसे लक्ष्मण जी ने अपने तीर से बीच में ही रोक दिया।

साथ विभीषण राम के , रावण करे गरूर।
अंत निश्चय मान ले , रावण करे जरूर।।

शक्ति बरछी हाथ ले , फेंकी विभीषण ओर ।
लक्ष्मण जी ने तीर से, दिया उसे वहीं रोक।।

विभीषण जी तो बच गए , बढ़ा रावण का कोप।
वही शक्ति अबकी चली , लक्ष्मण जी की ओर ।।

लक्ष्मण जी को आ लगी , फटा हृदय तत्काल ।
रथ से नीचे आ गिरे , बन गया रण भूचाल।।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है। )

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