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इतिहास का विकृतिकरण और नेहरू

इतिहास का विकृतिकरण और नेहरू अध्याय – 15

इतिहास का विकृतिकरण और नेहरू (डिस्कवरी ऑफ इंडिया की डिस्कवरी) अध्याय – 15

महाकाव्य और खयाली इतिहास

  • डॉ राकेश कुमार आर्य

हम सभी जानते हैं कि जिस समय राम मंदिर आंदोलन चल रहा था और राम जन्मभूमि का मामला न्यायालय में भी विचाराधीन था तो उस समय कांग्रेस ने किस प्रकार रामायण और राम को काल्पनिक कहा था? वास्तव में कांग्रेस के इतिहास संबंधी चिंतन पर नेहरू जी के विचारों का सीधा प्रभाव है। उसी के वशीभूत होकर कांग्रेस ने ऐसा शपथ पत्र न्यायालय में दाखिल किया था। इस एक घटना से ही स्पष्ट हो जाता है कि नेहरू जी जैसे इतिहास लेखक के विचारों ने देश को किस सीमा तक प्रभावित किया है? इसका कारण केवल एक है कि नेहरू जी अभी तक के प्रधानमंत्रियों में अकेले ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने सबसे अधिक देर तक भारतवर्ष पर राज किया है।

महाकाव्य रामायण और महाभारत के साथ-साथ पुराणों के बारे में लिखते हुए नेहरू जी ने अपना मत प्रकट किया है। वे लिखते हैं कि-

“इनमें सच्ची घटनाएं और गढ़े हुए किस्से इस तरह एक दूसरे में मिल गए हैं कि दोनों अंशों को अलग करना गैरमुमकिन है और इस तरह का गड्ड-मड्डु खयाली इतिहास की जगह ले लेता है।”

बात स्पष्ट है कि यदि भारतीय इतिहास को रामायण, महाभारत या इसी प्रकार के प्राचीन भारतीय विद्वानों के द्वारा लिखी गई पुस्तकों के आधार पर तैयार किया जाता है तो नेहरू जी ऐसे इतिहास को ‘ख्याली इतिहास’ मानते हैं। इसका अभिप्राय हुआ कि रामायण, महाभारत और भारतीय विद्वानों की पुस्तकों की अंतःसाक्षी उन्हें स्वीकार नहीं थी। भारतीय आर्य विद्वान वेदों में इतिहास तो नहीं मानते, परंतु इतिहास में वेद को अवश्य मानते हैं अर्थात वेद के अनुसार इतिहास की परंपरा कितनी देर तक चली? कितनी देर वेद का मानवतावाद और राजनीतिक दर्शन भारत और विश्व समाज का मार्गदर्शन करता रहा? यह भारतीय विद्वानों की लेखन शैली का एक अनिवार्य अंग होता है। जिसकी अपेक्षा नेहरू जी से दूर-दूर तक भी नहीं की जा सकती ।

नेहरू जी ऐसे खयाली इतिहास के बारे में लिखते हैं कि-

“जो चाहे हमें यह ना बता सके कि दरअसल हुआ क्या? लेकिन जो हमें उतनी ही महत्व की दूसरी सूचना देता है, यानी लोग क्या हुआ समझते रहे हैं? उनकी समझ में उनके वीर पूर्वज कैसे-कैसे काम कर सकते थे और उनके क्या आदर्श थे? इस तरह यह सारी सच्ची घटनाएं हों, चाहे गढ़े हुए किस्से, यहां के रहने वालों की जिंदगी का यह जीते जागते जुज बन जाते हैं और उन्हें अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की नीरसता और कुरूपता से बचाकर उनकी दुनिया की तरफ खींचते रहे हैं और आदर्श तक पहुंचना चाहे जितना भी कठिन रहा हो, हमेशा कर्तव्य और सही जीवन का रास्ता दिखाते रहे हैं।” (पृष्ठ 116)

भारत के बारे में विदेशी इतिहासकारों की मान्यता रही है कि भारत के लोग अपने इतिहास को संजोकर रखने की ओर अधिक संवेदनशील नहीं थे। इसका कारण उनका नासमझ होना अर्थात अनपढ़ और मूर्ख होना माना जाता है। इसके विरुद्ध आर्य परंपरा के इतिहास लेखन की मान्यता है कि भारत की वैज्ञानिक ऋषि परंपरा में राजनीति पर लिखना अधिक रुचिकर नहीं माना जाता था। क्योंकि अध्यात्म की अपेक्षा राजनीति बहुत ही नीरस विषय है। वाल्मीकि जी ने जब पद्य शैली में कुछ लिखने की तैयारी की तो इसके लिए उन्होंने नारद जी से पूछा कि एक ऋषि के लिए लिखने योग्य पात्र कौन हो सकता है? तब उन्हें दिव्य गुणों से युक्त रामचंद्र जी के बारे में परामर्श दिया गया कि वे दशरथनंदन श्री राम पर लिखें। रामचंद्र जी के भीतर वे सभी गुण थे, जिन पर किसी ऋषि कवि की लेखनी को चलने में गर्व की अनुभूति हो सकती थी। कहने का अभिप्राय है कि हमने नरसंहार करने वाले कातिलों पर लिखना उचित नहीं माना। हमने नारी शक्ति का अपमान करने वाले, बालकों को भी भाले की नोंक पर लटकाकर पटककर मारने वाले, वृद्धों को भी अपमानित कर उनका सर कलम करने वाले जालिमों पर नहीं लिखा, न ही उनके गुण गाए। हमने उनको अपनी लेखनी का पात्र बनाया जो नरसंहार करने वाले रावण का भी संहार करने की क्षमता रखते थे या कंस और दुर्योधन का अंत करने वाले कृष्ण हो सकते थे।

भारत के मर्म को न समझने वाले विदेशी विद्वानों के कथनों के आधार पर नेहरू जी ने भारत के बारे में पृष्ठ 117 पर लिख दिया कि-

” यूनानियों, चीनियों और अरब वालों की तरह कदीम हिंदुस्तानी इतिहासकार नहीं थे। यह एक दुर्भाग्य की बात है और इसके कारण आज हमारे लिए तिथियां या कालक्रम निश्चित करना मुश्किल हो गया है, घटनाएं एक दूसरे से गुंध जाती हैं और बड़ा उलझाव पैदा हो जाता है… सच पूछा जाए तो सिर्फ एक किताब है यानी कल्हण की राजतरंगिणी जो ईसा की 12वीं शताब्दी में लिखा हुआ कश्मीर का इतिहास है। जिसे हम इतिहास कह सकते हैं। बाकी इतिहास के लिए हमें महाकाव्य के कल्पित इतिहास की (अर्थात रामायण और महाभारत) या पुस्तकों की मदद लेनी पड़ती है या शिलालेखों, कला के कारनामों या इमारत के खंडहरों, सिक्कों या विस्तृत संस्कृत साहित्य से जहां-तहां इशारे मिल जाते हैं। हां, विदेशी यात्रियों के सफरनामों से भी मदद मिलती है। खासकर यूनानी और चीनियों और बाद के जमाने के लिए अरबों के सफरनामों से।”

नेहरू जी विदेशी विद्वानों के यात्रा संस्मरणों को रामायण, महाभारत या भारत की आर्य परंपरा के इतिहास लेखन के ग्रंथों के लेखकों की पुस्तकों से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं।

नेहरू जी भारतीय इतिहास की हिंदू वैदिक परंपरा के प्रति पूर्णतया नीरसता का भाव रखते थे। उसमें उनकी कोई रुचि नहीं थी। इसलिए उनका अनुसंधान भारतीय इतिहास की वीर परंपरा के इतिहास लेखन की ओर नहीं गया। उन्होंने इस बात पर कहीं शोध नहीं किया कि भारत के पास भी इतिहास की एक गौरवपूर्ण परंपरा है। तभी तो उन्होंने संपूर्ण एशिया और यूरोप पर शासन करने वाले, विक्रमी संवत का प्रचलन करने वाले और सम्राटों के सम्राट चक्रवर्ती सम्राट महाराजा विक्रमादित्य के बारे में भी लिख दिया कि-

“विक्रम बहुत जमाने से एक कौमी सूरमा और आदर्श राजा समझा जाता रहा है। उसकी याद एक ऐसे शासक के रूप में की जाती है, जिसने विदेशी हमला करने वालों को मार भगाया … लेकिन यह विक्रम था कौन? और वह कब हुआ? इतिहास की दृष्टि से यह बात बिल्कुल अस्पष्ट है।”

इतना ही नहीं, नेहरू जी यह बात मानने को भी तैयार नहीं हैं कि 57 ईसा पूर्व कोई विक्रमादित्य नाम का शासक शासन कर रहा था। इसलिए वह इस तथ्य को भी अस्वीकार करते हैं कि ऐसा कोई शासक हुआ है, जिसके नाम से विक्रम संवत चला। वह कहते हैं कि-

“ईसा से 57 वर्ष पहले जब इस संवत का आरंभ होता है, इस तरह के किसी शासक का पता नहीं है। हां, उत्तर हिंदुस्तान में चौथी शताब्दी में एक विक्रमादित्व था जो हूणों के साथ लड़ा था और जिसने उन्हें मार भगाया था मध्य भारत की मालवा रियासत में 57 ईसा पूर्व से शुरू होने वाला एक संवत चला आ रहा था। विक्रम के बहुत बाद यह संवत उसके नाम के साथ किसी तरह जुड़ गया और उसका नया नामकरण हुआ, लेकिन यह सभी बातें अस्पष्ट और अनिश्चित हैं।”

भारत की गौरवशाली आर्य वीर परंपरा के साथ नेहरू जी ने कितना छल किया?- यह इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है। (पृष्ठ 118)

द डिस्कवरी ऑफ इंडिया में नेहरू जी की कहीं पर भी हम ऐसा लिखते हुए नहीं देखते कि त्रेतायुग में अर्थात भगवान राम के काल से भी हजारों वर्ष पूर्व स्वायंभुव मनु के पौत्र और प्रियन्नत के पुत्र ने इस भारतवर्ष को बसाया था। नेहरू जी सुनी सुनाई बातों पर अधिक विश्वास करते हैं। अनुसंधान और शोध में उनका विश्वास नहीं है। भारतवर्ष के बारे में हमने वायु पुराण में पढ़ा है कि महाराज प्रियव्रत का अपना कोई पुत्र नहीं था। तब महाराज प्रियव्रत ने अपनी पुत्री के पुत्र अग्नीन्ध्र को गोद ले लिया था। इसी अग्नीन्ध्र का पुत्र नामि था। नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ, उसका नाम ऋषभ था। इसी ऋषभ के पुत्र भरत थे तथा इन्हीं भरत के नाम पर इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ पड़ा।

हम पूर्व में भी यह स्पष्ट कर चुके हैं कि नेहरू जी को रामायण और महाभारत के रचनाकाल का कोई ज्ञान नहीं था। इस संबंध में अपनी अज्ञानता को प्रकट करते हुए वह 121 पृष्ठ पर लिखते हैं-

“महाकाव्यों का समय बताना कठिन है। इनमें उस कदीम जमाने का हाल है, जबकि आर्य हिंदुस्तान में बस रहे थे और अपनी जड़ जमा रहे थे। जाहिरा तौर पर इन्हें बहुत से लेखकों ने लिखा है या इनमें मुख्तलिफ वक्तों में इजाफा किया गया है।

रामायण ऐसा महाकाव्य है, जिसमें बयान में थोड़ी बहुत एकता है। महाभारत प्राचीन ज्ञान का एक बड़ा और फुटकर संग्रह है।”

यह कितने आश्चर्य की बात है कि देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू यह नहीं जानते थे कि हमारे रामायण और महाभारत ग्रंथों का निर्माण वाल्मीकि जी और वेदव्यास जी ने किया था। इसके विपरीत वह कहते हैं कि इनका निर्माण बहुत लंबे समय तक होता रहा।

अपनी पुस्तक के 122 वें पृष्ठ पर वह एक जानकारी देते हुए

हमें बताते हैं कि-

“आर्यों में एक स्त्री के कई पति होने का चलन नहीं था, फिर भी हम पाते हैं कि महाभारत की एक खास पात्री के पांच पति हैं जो आपस में भाई-भाई हैं।”

स्पष्ट है कि उनका संकेत द्रोपदी की ओर है। नेहरू जी की मान्यता को पकड़कर कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने इसी बात का दुष्प्रचार किया कि भारत में एक पत्नी के पांच-पांच पति हो सकते थे?

इसी पृष्ठ पर नेहरू जी आगे लिखते हैं कि भारत का एक और पहले का नाम आर्यावर्त या आर्यों का देश था, लेकिन यह मध्य हिंदुस्तान के विंध्य पहाड़ तक फैले हुए उत्तरी हिंदुस्तान तक सीमित था। शायद उस जमाने के आर्य इस पहाड़ के सिलसिले के पार नहीं पहुंचे थे। (संपूर्ण भूमंडल की जानकारी रखने वाले भारत के ऋषि पूर्वजों और उनकी वंश परंपरा के राजाओं, विद्वानों और शासकों के संबंध में ऐसा कहना नेहरू जी की अज्ञानता को ही प्रकट करता है।)

इसके पश्चात नेहरू जी अपनी अज्ञानता को और भी अधिक स्पष्ट करते हुए लिख देते हैं कि-

“रामायण की कथा आर्यों के दक्षिण में पैठने का इतिहास है। राम रावण का युद्ध ईसा से केवल चौदह सौ साल पहले हुआ। … इस युद्ध के बाद हिंदुस्तान को भारतवर्ष के रूप में कल्पना किए जाने की शुरुआत होती है।”

पृष्ठ 124 पर नेहरू जी गीता के बारे में अपने अज्ञान को प्रकट करते हुए लिखते हैं कि-

“भगवदगीता महाभारत का अंश है। एक बहुत बड़े नाटक की एक घटना है। (नेहरू जी द्वारा श्रीमदभागवत गीता को महाभारत नाम के एक नाटक अर्थात एक काल्पनिक कहानी की एक घटना लिखने से स्पष्ट है कि वे यह नहीं मानते थे कि महाभारत का युद्ध वास्तव में हुआ था और उस युद्ध के मैदान में श्री कृष्ण जी ने गीता का उपदेश दिया था।) लेकिन उसकी अपनी अलग जगह है और वह अपने में संपूर्ण है। यह 700 श्लोकों का छोटा सा काव्य है।”

यदि नेहरू जी को संस्कृत का ज्ञान होता और वह संस्कृत के विद्वान होते तो निश्चित रूप से भारत के संदर्भ में वह मनु महाराज के इस कथन से अक्षरशः सहमत हो जाते कि-

एतद्देशेप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥

भावार्थ : भारत देश में उत्पन्न हुए ब्राह्मणों-विद्वानों के सान्निध्य से पृथिवी पर रहने वाले सब मनुष्य अपने-अपने आचरण तथा कर्तव्यों की शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्राचीन काल से आते रहे और यहां से अपने-अपने देश में लौटकर आचरण और कर्तव्य अर्थात मानव मात्र के धर्म का प्रचार करते रहे। जिससे संसार में व्यवस्था बनाए रखने में सहायता प्राप्त हुई।

क्रमशः

– डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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