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आज का चिंतन

शिव और पार्वती का विवाह का यथार्थ*

डॉ डी के गर्ग

हिन्दू समाज को भ्रमित करने में साहित्यिक अज्ञानता का बहुत बड़ा हाथ है। बची कुछ कमी अधर्मी पंडो ,कथाकारों, और अंधविस्वास में डूबे जल्दी ही चमत्कार की उम्मीदे लिए हिन्दू समाज ने पूरी कर दी। बिना दिमाक लगाए झूटी ,अवैज्ञानिक और अप्रमाणिक ,गप्प कथाओं को सच मान लेना मानव के बुद्धिमान होने पर प्रश्न चिन्ह लगाता है।
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरियाली तीज या मधुश्रवा तीज का पर्व मनाया जाता है। इस दिन सभी विवाहित स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु,दांपत्य जीवन में प्रेम तथा भाग्योदय के लिए व्रत करती हैं। इस दिन प्रचलित पौराणिक अलंकारिक कथा पर विचार करें —

कथा के अनुसार भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं कि हे पार्वती ! बहुत समय पहले तुमने हिमालय पर मुझे पति के रूप में पाने के लिए घोर तप किया था। इस दौरान तुमने अन्न-जल त्याग कर सूखे पत्ते चबाकर दिन व्यतीत किए थे। किसी भी मौसम की परवाह किए बिना तुमने निरंतर तप किया। तुम्हारी इस स्थिति को देखकर तुम्हारे पिता बहुत दुखी थे। ऐसी स्थिति में नारदजी तुम्हारे घर पधारे। जब तुम्हारे पिता ने नारदजी से उनके आगमन का कारण पूछा, तो नारद जी बोले- हे गिरिराज ! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां आया हूँ। आपकी कन्या की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर वह उससे विवाह करना चाहते हैं। नारदजी की बात सुनकर पर्वतराज अति प्रसन्नता के साथ बोले- हे नारदजी। यदि स्वयं भगवान विष्णु मेरी कन्या से विवाह करना चाहते हैं, तो इससे बड़ी कोई बात नहीं हो सकती। मैं इस विवाह के लिए तैयार हूं।”

इसका मतलब आप समझने का प्रयास करें। ग्रीष्म ऋतू के चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ के महीनो में पर्वतो से लेकर भूतल तक भरी गर्मी ,पानी की कमी और सूखे के कारण त्राहि त्राहि मच जाती है। नदिया सूखने लगती है , जल के अभाव में पशु पक्षी प्राण त्यागने लगते है। जंगलो में ,पर्वतो पर सूखे पत्ते अचानक जलने लगते है और जंगल की आग इतनी फ़ैल जाती है की इसमें कितने ही जीव और वनस्पतिया ख़ाक हो जाती है। चारो तरह एक ही प्रार्थना सुनाई देती है की जल्दी मानसून आ जाये। वर्षा सुरु हो जाये। और ऐसा सौभाग्य श्रावण, भाद्रपद महीने में भरपूर मिलता है जब खूब वर्षा होती है ,फिर से हरियाली छाने लगती है ,तालाब फिर से भर जाते है और नदिया बहने लगती है ,वृक्षारोपण का भी ये सबसे उपयुक्त समय होता है। इस खुशनुमा मौसम में सुहागिने हाथो पर मेहदी लगाए ,मंडी बयार में झूले का आनंद लेती है और लोक गीत गाती है।
इसलिए कहा जाता है की पृथ्वी पर फिर से नए जीवन का आगाज हुआ है। ये सिलसिला सृष्टि के प्रारम्भ से चल रहा है और प्रतिवर्ष अनवरत चलता रहेगा। इसको ही कवि और साहित्यकारों ने शिव और पार्वती के प्रतिवर्ष विवाह की उपमा से वर्णन किया है।
अब कुछ विशेष शब्दों का भावार्थ भी समझ लेते है –शिव, शंकर, महादेव, गणेश, भगवान आदि शब्दों का अर्थ
वेदों में एक ईश्वर के अनेक नाम बताये गए है। ईश्वर का हर नाम ईश्वर के गुण का प्रतिपादन करता हैं। ईश्वर के असंख्य गुण होने के कारण असंख्य नाम है। 1 (रुदिर् अश्रुविमोचने) इस धातु से ‘णिच्’ प्रत्यय होने से ‘रुद्र’ शब्द सिद्ध होता है।’यो रोदयत्यन्यायकारिणो जनान् स रुद्र:’ जो दुष्ट कर्म करनेहारों को रुलाता है, इससे परमेश्वर का नाम ‘रुद्र’ है।
यन्मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति, यद्वाचा वदति तत् कर्मणा करोति यत् कर्मणा करोति तदभिसम्पद्यते।।
यह यजुर्वेद के ब्राह्मण का वचन है।
जीव जिस का मन से ध्यान करता उस को वाणी से बोलता, जिस को वाणी जे बोलता उस को कर्म से करता, जिस को कर्म से करता उसी को प्राप्त होता है। इस से क्या सिद्ध हुआ कि जो जीव जैसा कर्म करता है वैसा ही फल पाता है। जब दुष्ट कर्म करनेवाले जीव ईश्वर की न्यायरूपी व्यवस्था से दुःखरूप फल पाते, तब रोते हैं और इसी प्रकार ईश्वर उन को रुलाता है, इसलिए परमेश्वर का नाम ‘रुद्र’ है।
2 (डुकृञ् करणे) ‘शम्’ पूर्वक इस धातु से ‘शङ्कर’ शब्द सिद्ध हुआ है। ‘य: शङ्कल्याणं सुखं करोति स शङ्कर:’ जो कल्याण अर्थात् सुख का करनेहारा है, इससे उस ईश्वर का नाम ‘शङ्कर’ है।
3’महत्’ शब्द पूर्वक ‘देव’ शब्द से ‘महादेव’ शब्द सिद्ध होता है। ‘यो महतां देव: स महादेव:’ जो महान् देवों का देव अर्थात् विद्वानों का भी विद्वान्, सूर्यादि पदार्थों का प्रकाशक है, इस लिए उस परमात्मा का नाम ‘महादेव’ है।
4 (शिवु कल्याणे) इस धातु से ‘शिव’ शब्द सिद्ध होता है। ‘बहुलमेतन्निदर्शनम्।’ इससे शिवु धातु माना जाता है, जो कल्याणस्वरूप और कल्याण करनेहारा है, इसलिए उस परमेश्वर का नाम ‘शिव’ है।
5- गणेश- (गण संख्याने) इस धातु से ‘गण’ शब्द सिद्ध होता है, इसके आगे ‘ईश’ वा ‘पति’ शब्द रखने से ‘गणेश’ और ‘गणपति शब्द’ सिद्ध होते हैं। ‘ये प्रकृत्यादयो जडा जीवाश्च गण्यन्ते संख्यायन्ते तेषामीशः स्वामी पतिः पालको वा’ जो प्रकृत्यादि जड़ और सब जीव प्रख्यात पदार्थों का स्वामी वा पालन करनेहारा है, इससे उस ईश्वर का नाम ‘गणेश’ वा ‘गणपति’ है।
6 -शक्ति -(शकॢ शक्तौ) इस धातु से ‘शक्ति’ शब्द बनता है। ‘यः सर्वं जगत् कर्तुं शक्नोति स शक्तिः’ जो सब जगत् के बनाने में समर्थ है, इसलिए उस परमेश्वर का नाम ‘शक्ति’ है।
7- पार्वती –पार्वती संस्कृत भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ है ” पहाड़ की बेटी ” जो की यहाँ पर्वतो से बहने वाली नदी , जलधारा के लिए प्रयोग हुआ है।
8 विवाह होना -इसमें ये एक मुहावरा भी प्रयोग हो सकता है और अलंकारिक भाषा का भी।
विवाह क्या है ? विवाह एक पवित्र बंधन है जिसको भगवान ने पहले पुरुष और महिला को एक साथ मिलकर एक में एकीकृत करने के लिए बनाया। न केवल पति और पत्नी अन्य मानवीय रिश्तों से बेजोड़ घनिष्ठ संबंध का आनंद लेते हैं, बल्कि प्रजनन के कार्य में, पति और पत्नी एक नए मानव को जन्म देते हैं जो कि, सचमुच, दोनों एक में संयुक्त होते हैं। इसी आलोक में साहित्यकारों ,कवियों ने प्रकृति ,बादल ,नदिया ,वर्षा आदि का मानवीयकरण कर अलंकार की भाषा में तरह तरह की उपमा देकर अपनी सुंदर रचनाये प्रस्तुत की है। संस्कृत भाषा में कालिदास ,भवभूति, हिंदी कवियों में निराला ,जयशंकर प्रसाद, ,भारतेन्दु हरिश्चंद ,हजारी प्रसाद दिवेदी आदि प्रमुख है।
बादलो से पर्वतो पर बरसती जलधारा ,उसको बहते हुए एक विशाल नदिया का रूप लेना,और विशाल भूतल पर नदियों द्वारा की जाने वाली सिचाई ,प्राणियों के लिए जल व्यवस्था के कारण ही नदियों को माता का स्वरूप दिया गया है। उदाहरण के लिए जीवन दायनी गंगा माँ जो सैकड़ो किलोमीटर तक कलरव करती बहती है और पीने को पानी ,सिचाई के लिए जल और जिसमे खरबो जीव पलते है और आसपास की हरियाली ,वनस्पति ,जड़ी बूटिया आदि का श्रोत है।
8 घोर तप का भावार्थ :यहाँ तप का अर्थ आग के आगे बैठ जाना ,एक पैर पर खड़े रहना ,भूखे रहना नहीं है। तप के एक अर्थ है की कितनी भी मुसीबते आये फिर भी विचलित नहीं होना। यथार्थ शुद्ध भाव, सत्य मानना, सत्य बोलना, सत्य करना, मन को अधर्म में न जाने देना, वाह्य इन्द्रियों को अन्यायाचरण में जाने से रोक रखना अर्थात शरीर, इन्द्रिय और मन से शुभ कर्मों का आचरण करना, वेदादि सत्य विद्याओं का पढ़ना-पढ़ाना, वेदानुसार आचरण करना आदि उत्तम धर्मयुक्त कर्मों का नाम तप है।
शिव पार्वती विवाह का विकृत स्वरूप : असलियत में तो किसी ने शिव ईश्वर के दर्शन किसी ने नहीं किये है क्योकि ईश्वर निराकार है। और हिमालय के राजा शिव को भी किसी ने नहीं देखा इसलिए एक पुरुष को शिव और अन्य पुरुष या महिला को पार्वती नाम से एक काल्पनिक चित्र / विशेष आकृति की भांति तैयार करके गाड़ी में बैठा देते है। और बरात चलने लगती है। और आगे आगे बंद बाजा बजता है ,शिव पार्वती अपना हाथ ऊपर उठा कर आशीर्वाद देते रहते है। शिव और पार्वती का रूप धारण करने के लिए कोई योग्यता नहीं चाहिए। ज्यादातर शिव को भांग खाकर नशा करने वाला चित्रित किया जाता है जबकि हिमालय पर भांग पैदा ही नहीं होती।
ये एक विशाल सामूहिक मनोरंजन होता है और इसमें कोई भक्ति या ज्ञानवर्धन दिखाई नहीं देता।

वास्तव में शिव क्या है ? वेदों के शिव को समझने का प्रयास करें –साभार प्रियांशु सेठ
हिन्दू समाज में मान्यता है कि वेद में उसी शिव का वर्णन है जिसके नाम पर अनेक पौराणिक कथाओं का सृजन हुआ है। उन्हीं शिव की पूजा-उपासना वैदिक काल से आज तक चली आती है। किन्तु वेद के मर्मज्ञ इस विचार से सहमत नहीं हैं।उनके अनुसार वेद तथा उपनिषदों का शिव निराकार ब्रह्म है।
पुराणों में वर्णित शिव जी परम योगी और परम ईश्वरभक्त थे। वे एक निराकार ईश्वर “ओ३म्” की उपासना करते थे। कैलाशपति शिव वीतरागी महान राजा थे। उनकी राजधानी कैलाश थी और तिब्बत का पठार और हिमालय के वे शासक थे। हरिद्वार से उनकी सीमा आरम्भ होती थी। वे राजा होकर भी अत्यंत वैरागी थे। उनकी पत्नी का नाम पार्वती था जो राजा दक्ष की कन्या थी। उनकी पत्नी ने भी गौरीकुंड, उत्तराखंड में रहकर तपस्या की थी। उनके पुत्रों का नाम गणपति और कार्तिकेय था। उनके राज्य में सब कोई सुखी था। उनका राज्य इतना लोकप्रिय हुआ कि उन्हें कालांतर में साक्षात् ईश्वर के नाम शिव से उनकी तुलना की जाने लगी।
वेदों के शिव परम पिता का स्मरण –
हम प्रतिदिन अपनी सन्ध्या उपासना के अन्तर्गत नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नम: शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च(यजु० १६/४१)के द्वारा परम पिता का स्मरण करते हैं।
अर्थ- जो मनुष्य सुख को प्राप्त कराने हारे परमेश्वर और सुखप्राप्ति के हेतु विद्वान् का भी सत्कार कल्याण करने और सब प्राणियों को सुख पहुंचाने वाले का भी सत्कार मङ्गलकारी और अत्यन्त मङ्गलस्वरूप पुरुष का भी सत्कार करते हैं,वे कल्याण को प्राप्त होते हैं।
इस मन्त्र में शंभव, मयोभव, शंकर, मयस्कर, शिव, शिवतर शब्द आये हैं जो एक ही परमात्मा के विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुए हैं।
वेदों में ईश्वर को उनके गुणों और कर्मों के अनुसार बताया है–
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्। -यजु० ३/६०
विविध ज्ञान भण्डार, विद्यात्रयी के आगार, सुरक्षित आत्मबल के वर्धक परमात्मा का यजन करें। जिस प्रकार पक जाने पर खरबूजा अपने डण्ठल से स्वतः ही अलग हो जाता है वैसे ही हम इस मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो जायें, मोक्ष से न छूटें।
या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी।
तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि।। -यजु० १६/२
हे मेघ वा सत्य उपदेश से सुख पहुंचाने वाले दुष्टों को भय और श्रेष्ठों के लिए सुखकारी शिक्षक विद्वन्! जो आप की घोर उपद्रव से रहित सत्य धर्मों को प्रकाशित करने हारी कल्याणकारिणी देह वा विस्तृत उपदेश रूप नीति है उस अत्यन्त सुख प्राप्त करने वाली देह वा विस्तृत उपदेश की नीति से हम लोगों को आप सब ओर से शीघ्र शिक्षा कीजिये।
या ते रुद्र शिवा तनू: शिवा विश्वाहा भेषजी।
शिवा रुतस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे।। -यजु० १६/४९
हे राजा के वैद्य तू जो तेरी कल्याण करने वाली देह वा विस्तारयुक्त नीति देखने में प्रिय ओषधियों के तुल्य रोगनाशक और रोगी को सुखदायी पीड़ा हरने वाली है उससे जीने के लिए सब दिन हम को सुख कर।
उपनिषदों में भी शिव की महिमा निम्न प्रकार से है-
स ब्रह्मा स विष्णु: स रुद्रस्स: शिवस्सोऽक्षरस्स: परम: स्वराट्।
स इन्द्रस्स: कालाग्निस्स चन्द्रमा:।। -कैवल्यो० १/८
वह जगत् का निर्माता, पालनकर्ता, दण्ड देने वाला, कल्याण करने वाला, विनाश को न प्राप्त होने वाला, सर्वोपरि, शासक, ऐश्वर्यवान्, काल का भी काल, शान्ति और प्रकाश देने वाला है।
यहां शिव का अर्थ शान्त और आनन्दमय के रूप में देखा जा सकता है।
सर्वाननशिरोग्रीव: सर्वभूतगुहाशय:।
सर्वव्यापी स भगवान् तस्मात्सर्वगत: शिव:।। -श्वेता० ४/१४
जो इस संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का कर्ता एक ही है, जो सब प्राणियों के हृदयाकाश में विराजमान है, जो सर्वव्यापक है, वही सुखस्वरूप भगवान् शिव सर्वगत अर्थात् सर्वत्र प्राप्त है।
इसे और स्पष्ट करते हुए कहा है-
सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य सृष्टारमनेकरुपम्।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति।। -श्वेता० ४/१४
परमात्मा अत्यन्त सूक्ष्म है, हृदय के मध्य में विराजमान है, अखिल विश्व की रचना अनेक रूपों में करता है। वह अकेला अनन्त विश्व में सब ओर व्याप्त है। उसी कल्याणकारी परमेश्वर को जानने पर स्थाई रूप से मानव परम शान्ति को प्राप्त होता है।
नचेशिता नैव च तस्य लिंङ्गम्।। -श्वेता० ६/१
उस शिव का कोई नियन्ता नहीं और न उसका कोई लिंग वा निशान है।
निष्कर्ष- उपरोक्त लेख द्वारा योगी शिव और निराकार शिव में अन्तर बतलाया है। ईश्वर के अनगिनत गुण होने के कारण अनगिनत नाम है। शिव भी इसी प्रकार से ईश्वर का एक नाम है। आईये निराकार शिव की स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना करे।

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