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दिलाना होगा तलाक को ही तलाक

मोदी सरकार की अब तक की उपलब्धियों में सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में तीन तलाक पर लाया गया कानून देखा जा रहा है । वास्तव में मुस्लिम समाज में नारियों के साथ पिछली कई शताब्दियों के काल में जो कुछ होता रहा उसे किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता । यह बहुत ही दुखद बात है कि इस मजहब के मानने वाले लोगों ने आज भी अपने आप को पुरुष प्रधान समाज की सीमाओं से बाहर नहीं निकाला है । नारी को पूज्या के स्थान पर भोग्या बना कर रख देने की सोच रखने वाले पुरुष प्रधान समाज ने नारी पर हर वह प्रतिबंध लगाने का काम निरंतर जारी रखा जो उसके व्यक्तित्व को और उसकी प्रतिभा को मुखरित होने पर एक कठोर पहरे के समान सिद्ध हो रहा था । यही कारण है कि मुस्लिम समाज के भीतर बैठे सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति भी भारी सामाजिक सुधारों की अपेक्षा करते रहे हैं ।

यह माना जा सकता है कि वर्तमान परिस्थितियों में तीन तलाक की परंपरा को समाप्त करने वाला यह कानून अपने आप में पूर्ण नहीं है , क्योंकि अभी भी तलाक देने की परंपरा वहां पर बनी रहेगी । अंतर केवल इतना आएगा कि अब एक साथ तीन तलाक नहीं होगा , अपितु अलग-अलग तीन बार तलाक कहने पर यह रस्म पूरी कर ली जाएगी । इसके अतिरिक्त इस नए कानून में ‘ हलाला ‘ जैसी यातनापूर्ण और अपमानजनक परंपरा की स्थिति क्या होगी ? – यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है । जिससे नारी अस्मिता से ‘राक्षस ‘ अब भी खिलवाड़ करता रहेगा। इस सब के उपरांत भी मोदी सरकार के शक्ति दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाने वाले इस ऐतिहासिक कदम का हम सबको स्वागत करना चाहिए । क्योंकि कम से कम एक ऐसी दृढ़ इच्छा शक्ति रखने वाली सरकार को हम काम करते देख रहे हैं , जो किसी भी प्रकार के विरोध की चिंता न् कर सामाजिक सुधार की अपनी डगर को छोड़ने को तैयार नहीं है। इसके अतिरिक्त हमें यह भी अपेक्षा करनी चाहिए कि मुस्लिम समाज के भीतर बैठे सकारात्मक सोच वाले लोगों को समाज को प्रगतिशील बनाने के लिए भी उचित परिवेश मिलेगा । कठमुल्लावाद पर प्रतिबंध लगकर इन लोगों को अपनी आवाज मुखरित करने का अवसर भी उपलब्ध होगा ।

हमें यह मानना चाहिए कि इस नए कानून के बनने के पश्चात निश्चय ही मुस्लिम बहनों को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिलेगा । साथ ही पुरुष प्रधान समाज की उस सोच को परिवर्तित करने में भी हमें कुछ सीमा तक सहायता मिलेगी , जिसके अंतर्गत यह लोग नारी को केवल और केवल भोग्या समझते हैं , उसे माँ, बहन या बेटी समझने को कभी तैयार ही नहीं दिखाई देते हैं । यदि एक नारी में ये लोग माँ , बहन और बेटी का भी रूप देखने लगें तो उसके साथ होने वाले अन्याय पर स्वभाविक रूप से प्रतिबंध लग सकता है । मनुष्य के भीतर की इस सदप्रवृत्ति का विकास ही मानवता का विकास है । जिस पर किन्हीं मजहबी मान्यताओं के आधार पर यदि प्रतिबंध लगता है तो उसे उचित नहीं कहा जा सकता।

जहां तक भारत की नारी संबंधी अवधारणाओं , मान्यताओं व परंपराओं का प्रश्न है तो यहां स्पष्टत: यह मान्यता रही है कि नारी को पूज्या माना जाना चाहिए।

संसार के सबसे पहले ग्रंथ ऋग्वेद में स्पष्टत: लिखा है कि :—

अहं केतुरहं मूर्धाहमुग्रा विवाचानी । ममेदनु क्रतुपतिरू सेहनाया उपाचरेत !! ( ऋग्वेद )

अर्थात “मैं ध्वजारूप (गृह स्वामिनी ), तीव्र बुद्धि वाली एवं प्रत्येक विषय पर परामर्श देने में समर्थ हूँ । मेरे कार्यों का मेरे पतिदेव सदा समर्थन करते हैं ! ”

घर की केतु अर्थात ध्वजा वही हो सकती है जो अत्यंत सम्माननीया हो , जिसके विचार अत्यंत पवित्र हों और जिसे अपने व्यक्तित्व और प्रतिभा के मुखरित करने के सब अवसर वैसे ही उपलब्ध हों जैसे पुरुषों को प्राप्त हों । भारत की नारी ध्वजा बनकर अर्थात गृह स्वामिनी बनकर घर से संसार तक का निर्माण करती रही ।

घर में संस्कार देना हमारे यहां नारी का कार्य था । संस्कार देने के लिए बहुत ही शांत और सम्मानपूर्ण परिस्थितियों का निर्माण करना आवश्यक है । जिससे संस्कार देने वाला शांतमना रहकर चिंतनशील बना रहे और उसके शुद्ध चिंतन का लाभ समाज को मिलता रहे। इसके लिए समाज का पुरुष वर्ग नारी को घर की सीमाओं में रहने के लिए प्रेरित करता था । जिससे घर एक आश्रम बन जाता था । जिसमें साधनाशील महिलाएं बच्चों का निर्माण कर संसार को देती थीं । जिससे संसार संस्कारशील बनता था ।

आज की नारी आजादी चाहती है । वह घर से निकल कर पुरुष की तरह भागदौड़ की जिंदगी जीना चाहती है । नौकरीपेशा होकर उसने घर छोड़ दिया है । संस्कार देने छोड़ दिये हैं । नारी के घर छोड़ते ही हमसे संसार छूट गया है । सारे संसार में मानव समाज के संबंधों में आ रही भावशून्यता और संवेदनहीनता इसी का परिणाम है । सब कुछ अस्त-व्यस्त हो कर रह गया है । इसके उपरांत भी हम भारत की महान परंपरा को समझ नहीं रहे हैं । निश्चित रूप से हम अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम कर रहे हैं।

सच यही है कि संक्रमण काल के इस दौर में तथाकथित प्रसिद्धि पाने की होड़, प्रतिस्पर्धा और आधुनिकता के नाम पर परिवर्तन की दहलीज पर खड़े हम स्त्री के उस जाज्वल्यमान आभा की प्रतीक्षा कर रहे हैं जो सनातन से ही भारतीय मनीषियों के चिंतन का विषय रहा है ! भारतीय मनीषियों ने सदैव से ही स्त्री-पुरुष को न केवल एक दूसरे का पूरक माना अपितु मनु स्मृति में स्त्री को पूजनीय कहकर समाज में प्रतिष्ठित किया गया !

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: !

यत्रेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया: !!

अर्थात जहां महिलाओं को सम्मान मिलता है , वहां समृद्धि का राज्य होता है । जहां महिलाओं का अपमान ( उनकी अस्मिता से खिलवाड़ करने की हलाला जैसी क्रूर परंपरा का निर्वाह होता है )होता है, वहां की सब योजनाएं या कार्य विफल हो जाते हैं ।

नारी की महानता का वर्णन करते हुये ”महर्षि गर्ग” कहते हैं कि :-

यद् गृहे रमते नारी लक्ष्मीस्तद् गृहवासिनी।

देवता: कोटिशो वत्स! न त्यजन्ति गृहं हितत्।।

अर्थात जिस घर में सद्गुण सम्पन्न नारी सुख पूर्वक निवास करती है उस घर में लक्ष्मी जी निवास करती हैं। हे वत्स! करोड़ों देवता भी उस घर को नहीं छोड़ते ।

भारतीय संस्कृति में नारी का उल्लेख ‘श्री’, ‘ज्ञान’ तथा ‘शौर्य’ की अधिष्ठात्री नारी ही है । सचमुच भारत का यह दुर्भाग्य रहा कि भारत में स्वतंत्रता के उपरांत भारत की इस महान संस्कृति को भारत के विद्यालयों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित नहीं किया गया । यदि भारत के शैक्षणिक पाठ्यक्रम में बच्चों को नारी के प्रति ऐसे ही सम्मान पूर्ण भावों को अपनाने की प्रेरणा दी जाती और नारी को घर के आश्रम को पवित्र रखने हेतु उसे गृह स्वामिनी के उच्च पद पर आसीन किया जाता तो आज नारी के साथ जो भी कुछ अत्याचार हो रहे हैं वह सब समाप्त हो गए होते ।

हमारे जनतंत्र की 72 वर्ष की यात्रा का हमारा काल अब बहुत लंबा हो चुका है । इतनी देर पश्चात भी यदि हम 14 वीं शताब्दी की दमनकारी परंपराओं को उखाड़ने में ही लगे हैं तो समझिए कि हम अभी आगे बढ़े नहीं हैं । निश्चित रूप से भारत को आगे बढ़ाने के लिए भारत के अतीत के उस गौरवपूर्ण पक्ष को भारत के विद्यालयों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित करना होगा जो समाज को एक आदर्श व्यवस्था देने में सक्षम है । तभी हम कह सकेंगे कि हम वास्तव में प्रगति कर रहे हैं । अभी तो हम दुर्गति की ओर बढ़ रहे हैं । यदि भारत की मान्यताओं को अपना लिया गया तो भारत से तत्काल तीन तलाक की परंपरा ही समाप्त नहीं होगी , अपितु तलाक को ही ‘ तलाक ‘ मिल जाएगा । हमारा मानना है कि तलाक को ‘ तलाक ‘ देना ही मानवता की पूर्ण विजय होगी , उस दिशा में बढ़ने के लिए अभी हमें बहुत कुछ करना होगा । अच्छा रहेगा कि मोदी जी कुछ उस दिशा में बढ़ने का भी साहस दिखाएं।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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