विवेकानंदी बनता जा रहा आर्य समाज और आरएसएस

” हम बढ़ें हमारे जीवन में , बरबस तूफान अधीर उठें , सदियों से सोते भारत के तरकस का तीखा तीर उठे । युग युग से परवशता पिंजरे का बंदी भारत कीर उठे ,है जंग लगा जिसमें पावन वह वीरों की शमशीर उठे । हम जलती आंहों से रिपु के प्राणों को जलता छोड़ चलें,’जय हिंद ‘ हमारा नारा है हम लाल किले की ओर चलें।। ”क्षेमचंद्र ‘ सुमन ‘ जी मूल रूप से आर्य समाजी विचारधारा से प्रेरित थे । उनके लेखन में आर्य समाज के विचारों की झलक स्पष्ट दिखाई देती थी । उनकी उपरोक्त पंक्तियां आर्य समाज के उस पौरुष , शौर्य और वीरता का बखान करती हैं जिसे इस महान संस्था ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय अपनाकर अपने संस्थागत चरित्र का एक अभिन्न अंग बना लिया था । 1875 में जन्मी इस संस्था ने अपने जन्म के पहले दिन से ही देश जागरण का महान कार्य संपादित करना आरंभ किया । यही कारण रहा कि इसने भारत की उस सनातन परंपरा का निर्वाह किया जो शांति के लिए क्रांति करना आवश्यक समझती रही है , अर्थात जिसने शस्त्रपूजा इसलिए की कि शास्त्रपूजन में किसी प्रकार का अवरोध उत्पन्न न हो । आर्यसमाज का संगठन ही वह पवित्र मंच बना जिसने भारत को किसी भी प्रकार के छद्म अहिंसावादी विचारों से मुक्ति दिलाकर यह आभास कराया कि यदि संसार में स्वतंत्रता , समानता और बंधुत्व के विचारों को अपनाकर आगे बढ़ना है तो एक हाथ में शस्त्र और दूसरे हाथ में शास्त्र लेकर चलना ही होगा । कहने का अभिप्राय यह है कि 1925 में जन्मे आरएसएस से 50 वर्ष पूर्व आर्यसमाज भारतवर्ष में वह कार्य कर रहा था , जिसका आंशिक अनुकरण करना आरएसएस ने बहुत देर बाद जाकर आरंभ किया । हमने आंशिक अनुकरण शब्द इसलिए प्रयोग किया है कि आर्यसमाज ने जहां हमारे वैदिक सनातन धर्म के सत्यार्थ का हमारे सामने प्रकाश किया वहीं आरएसएस उस पौराणिकवाद में उलझ कर रह गया जो इस देश की सनातन परंपरा के सर्वथा विपरीत था । इस मौलिक अंतर को हमें आरएसएस और आर्य समाज दोनों के संदर्भ में सदा ही स्मरण रखना चाहिए।

संघ अपने इसी पौराणिकवादी विचार को अपना सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहता है और इसी को ‘ सत्य सनातन धर्म ‘ कहकर इसकी जय बोलता है । जबकि ‘ सत्य सनातन धर्म ‘ वैदिक धर्म है । जिससे आरएसएस के चिंतन का कोई लेना देना नहीं है । संघ के साथ रहने वाले आर्यसमाजी लोग जो ‘ सत्य सनातन धर्म ‘ की जय बोलते हैं , के विषय में माना जा सकता है कि वह वैदिक धर्म की जय बोलते समय अपने मन – मन में इसका अर्थ वैदिक धर्म से ही लगाते हैं । परंतु वहां पर उपस्थित लोगों का जो जमावड़ा होता है वह तो संघ के अनुसार पौराणिकवाद के लिए जयकारे लगाता है । यह भी सच है कि वहां पर इसी प्रकार के लोगों के जमावड़े को देखकर आर्यसमाज के लोग मौन रह जाते हैं । कहने का अभिप्राय है कि मिथ्यावाद का विरोध करने का साहस अब आर्य समाज के भीतर नहीं रहा , जिसके लिए वह जाना जाता था । आर्यसमाज के लोगों के भीतर साहस नहीं होता कि वह यह भी स्पष्ट कर सकें कि सत्य सनातन धर्म है क्या ? और हम किसकी जय बोल रहे हैं ? हमें किस की जय बोलनी चाहिए और किस की जय नहीं बोलनी चाहिए ?महर्षि दयानंद जहां वेदों के सत्यार्थ के प्रकाश के प्रकाशक हैं , वहीं आरएसएस के वैचारिक मार्गदर्शक विवेकानंद सर्वथा वेदविरुद्ध , प्रकृति नियमों के विरुद्ध और बुद्धिवाद के विरुद्ध पौराणिकवाद के माध्यम से भारत की उन्नति का सपना देखा करते थे । आरएसएस ने दुर्भाग्य से विवेकानंद की विचारधारा को पकड़ लिया और उसी को वर्तमान भारत की सारी समस्याओं का एकमात्र समाधान मानकर आगे बढ़ना आरंभ किया । माना जा सकता है कि आरएसएस ने देश जागरण का बहुत बड़ा कार्य किया है और सामाजिक समस्याओं पर भी इसने प्रशंसनीय कार्य किया है , परंतु जब वैचारिक धरातल पर आरएसएस और आर्यसमाज को हम तोल कर देखते हैं तो आर्यसमाज की विचारधारा के समक्ष आरएसएस कहीं भी नहीं टिक पाता ।

आरएसएस के यहां सर्वभक्षी लोग मिलते हैं । जिन्हें आम बोलचाल की भाषा में सरभंगी कहा जाता है । यही कारण है कि आरएसएस गौरक्षा के लिए भी उतना अधिक कार्य नहीं कर पाया , जितना उसे करना चाहिए था , या जितना आर्य समाज अपने मंचों के माध्यम से कर चुका था। इसका कारण यह है कि वहां पर गोमांस खाने वाले लोगों का प्रवेश भी संभव है , जिस कारण ऐसे प्रांतों या अंचलों में संघ गौ रक्षा की बात नहीं करता , जहां पर गौमांस के खाने वाले लोग रहते हैं । संघ ने आर्यसमाज की राष्ट्रवादी परंपरा को आगे बढ़ाने का आधा अधूरा संकल्प लिया । आज का आर्यसमाजी यह मानता है कि भारत में राष्ट्रवाद आरएसएस का मौलिक चिंतन है , जबकि ऐसा नहीं है । उसने आर्यसमाज से राष्ट्रवाद को सीखा और उस पर आगे बढ़ना आरंभ किया । इसके उपरांत भी उसके राष्ट्रवाद में और आर्यसमाज के राष्ट्रवाद में मौलिक अंतर है । वह जिस राष्ट्रवाद की बात करता है , वह उतना उत्कृष्ट सांस्कृतिक राष्ट्रवाद नहीं है , जितना उत्कृष्ट सांस्कृतिक राष्ट्रवाद आर्यसमाज ने अपने चिंतन से भारत के लिए प्रस्तुत किया ।आर्य समाज वैदिक राष्ट्रवाद का समर्थक है। जिसमें वह आर्य – श्रेष्ठ लोगों की संकल्पना को लेकर आगे बढ़ता है ।आर्य समाज के राष्ट्रवाद में एक भी व्यक्ति मांसाहारी नहीं होगा , किसी भी स्थिति में किसी भी सामाजिक संगठन , समुदाय , जाति या बिरादरी की बातें नहीं की जाएंगी और ना ही उससे किसी भी प्रकार का समझौता किया जाएगा । यह आर्यसमाज का सांस्कृतिक वैदिक राष्ट्रवाद है ।आज आर्यसमाज के लोग आरएसएस में राष्ट्रवाद की भावना से प्रेरित होकर जाते हैं और वहां पर आर्य समाज के लोगों को आरएसएस विवेकानन्दी बनाता जा रहा है ।

इस प्रकार आरएसएस आर्यसमाज के लिए वह ‘ ब्लैकहोल ‘- बन चुका है जो सृष्टि के इस दैदीप्यमान सूर्यसम संगठन को निगलता जा रहा है । आरएसएस की अंधेरी सुरंग में आर्यसमाज ने अपने आपको प्रविष्ट तो करा दिया है , परंतु जब यह इस अंधेरी सुरंग से बाहर निकलेगा तो यह निश्चित मानो कि उस समय दयानंदी आर्य समाज न् होकर विवेकानंदी आर्य समाज होगा । वैसे इसमें संदेह है कि आर्य समाज इस अंधेरी सुरंग से सुरक्षित बचकर बाहर निकल पाएगा । महर्षि दयानंद के आर्य समाज के साथ कुछ वैसे ही होगा जैसे आदि शंकराचार्य जी के साथ हुआ था । उन्होंने बौद्ध धर्म की अकर्मण्यता और अहिंसावादी नीति का विरोध इस बात को लेकर किया था कि वह वैदिक विचारधारा के विरुद्ध कार्य कर रहा है , परंतु धीरे-धीरे उनकी विचारधारा को जंग लगा और आदि शंकराचार्य की विचारधारा को उनके ही अनुयायियों ने धीरे धीरे क्षरण की ओर बढ़ाना आरंभ कर दिया ।आज पौराणिक पंथी लोग और आदि शंकराचार्य के अनुयायी एक जैसे हो गए हैं । यही स्थिति आर्यसमाज के साथ हो जाएगी , जब धीरे-धीरे विवेकानंद की विचारधारा का प्रभाव आर्यसमाज पर बढ़ेगा और दयानंदी आर्यसमाज विलीन होकर विवेकानंदी आर्य समाज में जाकर विनष्ट हो जाएगा । सचमुच वह स्थिति बहुत ही पीड़ादायक होगी । जिस प्रकार आरएसएस मांसाहार तक की छूट देता है , उसी प्रकार वह नैतिक रूप से या चारित्रिक रूप से दुर्बल व्यक्तियों को भी अपने साथ लगाने को केवल इस आधार पर तैयार हो जाता है कि वह राष्ट्रवाद की विचारधारा को लेकर उनके साथ चले । आरएसएस के लिए अपने संगठन का सदस्य बनाने के लिए किसी व्यक्ति के भीतर इतना होना ही पर्याप्त है। यदि यही स्थिति आर्यसमाज की बनी तो क्या होगा ,? वर्तमान परिस्थितियों में यदि सच कहें तो आर्यसमाज संघ के साथ मिलकर ऐसी ही पीड़ादायक स्थिति की ओर बढ़ने लगा है ।

आर्य समाज के लोगों का कहना होता है कि आरएसएस राष्ट्र के लिए अच्छा कार्य कर रहा है। इसलिए हम दोनों को ‘ कॉमन मिनिमम एजेंडा ‘ के आधार पर कार्य करना चाहिए । यह तर्क अपने आप में ठीक हो सकता है , लेकिन ‘ कॉमन मिनिमम एजेंडा ‘ पर कार्य करने का अभिप्राय यह नहीं है कि आप अपनी विचारधारा को दूसरों के समक्ष जाकर पूर्णतया त्याग दें। विचारधारा का आत्मसमर्पण सबसे घातक आत्मसमर्पण होता है , जिसे आर्य समाज के लोग बड़ी संख्या में अपनाते जा रहे हैं । कॉमन मिनिमम एजेंडा पर कार्य करने के लिए यह आवश्यक होता है कि दो बात आप दूसरों की मानें और चार बात उससे अपनी मनवाने की भी शक्ति और सामर्थ्य आपके पास होनी चाहिए । राष्ट्रवाद के बहाने जिस प्रकार पौराणिकवाद को आरएसएस ने बढ़ावा दिया है , उसको भी आर्यसमाज के वे लोग जो उसके मंच पर पहुंच चुके हैं , स्वीकार कर चुके हैं अर्थात उनका विवेकानंदीकरण हो चुका है । इसी को संघ पौराणिक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहता है और इसी विवेकानंदी पौराणिक राष्ट्रवाद के समक्ष आर्यसमाज यदि घुटने टेकता जा रहा है तो समझो कि वह आत्महत्या की ओर बढ़ रहा है , जिसे किसी भी जीवंत संस्था को अपनाना नहीं चाहिए।पौराणिक गप्पों के सामने अब कई आर्यसमाजी इसलिए चुप हो जाते हैं कि कोई बात नहीं , यह आरएसएस वालों की अपनी मान्यता है, हम इस पर मौन साध लेते हैं । यह मौन साध लेने की प्रवृत्ति ही आत्महत्या की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति है । इसी ने हमारा अतीत में बहुत अहित किया है। अच्छा यह होता कि आर्यसमाज और आरएसएसस से वैदिक मान्यताओं के अनुसार पौराणिक गप्पों का निराकरण करवाता और जो वेदविरुद्ध , विज्ञानविरुद्ध , तर्कविरुद्ध और बुद्धि विरुद्ध बातें पुराणों में भारी पड़ी हैं ,उन सबके निराकरण के लिए भी एक राष्ट्रीय शोध संस्थान स्थापित किया जाता । जिसमें आर्यसमाज के विद्वानों को सम्मिलित करना संघ अपने लिए स्वीकार करता और आर्य समाज द्वारा प्रतिपादित वेदसंगत ,तर्कसंगत और प्रकृति नियमों के अनुकूल सिद्धांतों को अपनाने का साहस दिखाता , परंतु ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है । अच्छा हो कि आर्य समाज के जागरूक लोग अपने आपको इस संस्था के प्रवाह में बहने से रोकें । इसको सहायता देना एक अलग बात है और इसके अच्छे कार्य की सराहना करना भी एक अच्छी बात है , परंतु अपने सिद्धांतों को त्यागकर इसके सिद्धांतों के साथ अपने आपको प्रवाहित कर लेना समझो एक चट्टान का नदी के प्रवाह के समक्ष झुक जाना है , टूट जाना है और अपने आपको मिट जाने के लिए समर्पित कर देना है ।

हमें क्षेमचंद्र ‘ सुमन ‘ जी की उपरोक्त पंक्तियों पर विचार करते हुए सोचना होगा कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के जागरण के जिस बड़े कार्य को हमने किया था , उसको संघ कुछ टूटी फूटी अवस्था में आगे बढ़ा रहा है । हमारा चिंतन इस संदर्भ में और भी ऊंचा , उत्कृष्ट और पवित्र है । अपने उसी ऊंचे , उत्कृष्ट और पवित्र चिंतन को आर्यसमाज यदि आगे लेकर बढ़ेगा तो निश्चय ही भारत विश्वगुरु बनेगा और यहां पर सारे मत – मतान्तरों , अज्ञान और अतार्किक , प्रकृति विरुद्ध बातों का भी निराकरण होगा ।ऋषि के जीवन काल में ही आर्यों का राष्ट्रीय स्वर कितना ऊंचा हो चुका था और आर्य लोग देश में कितनी राजनीतिक गर्मी पैदा कर चुके थे , इसका प्रमाण एक कविता के निम्न पद हैं :—-यह माना कि तुम पहले ‘ लंदन ‘ हो साहबजमाना तुम्हारा , हुकूमत तुम्हारी ।मगर खैर अब वक्त वह आ गया हैचलेगी ना कुछ भी शरारत तुम्हारी ।।क्या आर्य समाज में आज इतना साहस है कि वह आरएसएस के लिए यह कह सके कि — ‘ चलेगी ना कुछ भी शरारत तुम्हारी ? ‘

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