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देश का वास्तविक गद्दार कौन ? – गांधी , नेहरू या सावरकर ,भाग – 1

कांग्रेस ने स्वात्रय वीर सावरकर ‘गद्दार’ कहकर राष्ट्रीय भावनाओं के साथ एक बार पुन: ‘गद्दारी’ की है। वीर सावरकर एक ऐसे व्यक्तित्व का नाम है जिनका समकालीन राजनीति में हर मुद्दे पर अपना ऐसा स्पष्ट चिंतन रहा जो कालातीत बन गया, और आज तक नवीन बना हुआ है। उनकी स्पष्टवादिता और शुद्घ राष्ट्रवादी दृष्टिकोण कांग्रेस और ब्रिटिश सत्ताधीशों को सदा चुभते थे। कांग्रेस का यह दुर्भाग्य रहा है कि इस पार्टी ने हमारे देश के बहुत से स्वतंत्रता सेनानियों (विशेषत: क्रांतिकारियों को) को उसी दृष्टिकोण से देखा जिस दृष्टिकोण से उन्हें अंग्रेज देखा करते थे। अत: जिस दृष्टिकोण से अंग्रेजों ने सावरकर को देखा उसी दृष्टि से कांग्रेस ने भी उनका मूल्यांकन किया। स्वतंत्रता के पश्चात की तीसरी पीढ़ी के उत्तराधिकारी कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी वीर सावरकर के विषय में प्रारंभिक ज्ञान भी नही रखते होंगे। उन्हें सावरकर के विषय में केवल इतना ज्ञान हो सकता है कि यदि इस व्यक्ति का नाम कहीं आए तो इसे उन्हें कांग्रेसी होने के कारण अपशब्दों से संबोधित करना है। क्यों? इसका उत्तर उनके पास संभवत: यही होगा कि इनके विषय में हम कांग्रेसी परंपरा से यही सुनते आए हैं कि यह हमारे विरोधी रहे हैं इसलिए इनके प्रति असहिष्णु होकर बात करना हम कांग्रेसियों की प्रवृत्ति है।

वीर सावरकर इस देश की मिट्टी से बने थे, उन्हें इस भूमि के कण-कण से राष्ट्रवाद की सुगंधि निकलती अनुभव होती थी। जबकि गांधी-नेहरू को इस देश की मिट्टी पर अंग्रेजों की ‘आधुनिकता और खुलेपन’ के अहसानों की सुगंध का रंग चढ़ा दिखाई देता था। वीर सावरकर और गांधी-नेहरू के चिंतन में यही मौलिक अंतर था।

इस आलेख में हम वीर सावरकर जी का हिंदी भाषा संबंधी दृष्टिकोण स्पष्ट करना चाहेंगे। वह भारत में भाषा शुद्घि आंदोलन के प्रणेता थे। उनकी इच्छा थी कि हमारे देश में हिंदी का प्रचार-प्रसार हो तथा इस भाषा को संस्कृतनिष्ठ शब्दों से सुभूषित किया जाए। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए वीर सावरकर जी ने लिखा था-‘‘अपनी हिंदी भाषा को विशुद्घ बनाने के लिए हमें सबसे पहले हिंदी भाषा में घुसाए गये अंग्रेजी व उर्दू के शब्दों को बाहर करना चाहिए। संस्कृतनिष्ठ हिंदी ही हमारी राष्ट्र भाषा है। हिंदी में अंग्रेजी व उर्दू शब्दों के मिश्रण से यह वर्ण संकरीभाषा बन गयी है।’’

वीर सावरकर के इस चिंतन से प्रेरित होकर कई हिंदी भाषा के विद्वान सामने आए और उन्होंने संस्कृतनिष्ठ हिंदी को अपने लेखन का आधार बनाया। राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन ने स्वीकार किया था कि मुझे संस्कृतनिष्ठ हिंदी के आंदोलन की प्रेरणा वीर सावरकर से ही प्राप्त हुई थी। वीर सावरकर की प्रेरणा से ही उनके क्रांतिकारी साथी श्रीगणेश रघुनाथ वैशंपायन ने पुणे में हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की थी।

वीर सावरकर जी की हिंदी के प्रति यह श्रद्घाभावना उनके राष्ट्रप्रेम और संस्कृतिप्रेम को प्रकट करने वाली थी। उन्हें यह भलीभांति ज्ञात था कि जब तक भारत अपनी भाषा में सोचना, विचारना आरंभ नही करेगा तब तक स्वतंत्रता आंदोलन गतिमान नही हो सकेगा, और यदि स्वतंत्रता मिल भी गयी तो उसका कोई मूल्य नही होगा, क्योंकि किसी राष्ट्र के आगे बढऩे के लिए उसकी अपनी भाषा का होना आवश्यक है। इसके लिए वह किसी प्रकार का समझौता करने को तैयार नही थे। उनका यह शुद्घ राष्ट्रवाद था। जिसे वह अकेले आगे लेजाकर बढ़ते जा रहे थे। इस शुद्घ राष्ट्रवाद को कांग्रेस, ब्रिटिश सत्ताधीश और मुस्लिम लीग मिलकर पलीता लगा रहे थे।

इन तीनों की भावनाओं का एकीभूत पुंज गांधीजी थे। जिन्होंने देश में हिंदी, उर्दू मिश्रित ‘हिन्दुस्तानी’ नाम की भाषा को आगे बढ़ाने का और भारत में विकसित करने का राष्ट्रघाती कार्य किया। उनके इस प्रकार के कार्य से हिंदी को खिचड़ी भाषा बनाने में सहायता मिली। गांधीजी के राजनीतिक उत्तराधिकारी नेहरूजी ने ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा के इस लक्ष्य को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उसी का परिणाम है कि आज भारत में संस्कृतनिष्ठ हिंदी हिंदी लेखकों की भाषा में से भी लुप्त सी हो गयी है। हमारे देश की इस समय कोई भाषा नही है। इसे हम गांधी-नेहरू की साम्प्रदायिक लोगों के साथ मिलकर देश के हितों के साथ समझौता करने की उनकी राष्ट्रघाती नीति का एक अंग मानते हैं।

गांधीजी ने अपनी ‘हिंदुस्तानी’ भाषा में भगवान राम को जब शहजादा राम, महाराजा दशरथ को बादशाह दशरथ, और सीताजी को बेगम सीता कहते हुए महर्षि बाल्मीकि को मौलाना बाल्मीकि शब्दों से संबोधित करना आरंभ किया तो वीर सावरकर ने गांधी जी की इस प्रकार की अनुचित और अतार्किक भाषाशैली को अपनी वैज्ञानिक संस्कृत भाषा को विकृत करने वाली निम्नकोटि की चाल समझकर उसके लिए गांधीजी की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि गांधी की ऐसी सोच देश की आत्मा हिंदुत्व पर प्राणघातक प्रहार है। इसके पश्चात पुणे में राजर्षि टंडन की अध्यक्षता में राष्ट्र भाषा सम्मेलन का आयोजन हुआ। तो सावरकर जी के प्रयासों से गांधीजी का ‘हिंदुस्तानी’ भाषा का प्रभाव गिरा दिया गया, और लोगों ने सावरकरजी का संस्कृतनिष्ठ हिंदी का प्रस्ताव पारित कर दिया।

सावरकरजी को उस समय तो अपने प्रयास में सफलता मिल गयी, परंतु कालांतर में जब सत्ता गांधीजी की कांग्रेस के हाथों में आई तो उसने अपनी पुरानी मान्यता को ही अपनाया और नेहरूजी ने जानबूझकर देश में ‘हिंदुस्तानी’ को प्रचलन में लाने का राष्ट्रघाती कार्य किया। यह लोकतंत्र की भावना के विरूद्घ था क्योंकि पुणे सम्मेलन में उपस्थित लोगों ने हिंदुस्तानी के प्रस्ताव को गिरा दिया था। परंतु गांधीजी और नेहरूजी दोनों ही हठीले व्यक्ति थे, इसलिए उन्हें अपने ही प्रस्ताव को और अपनी ही सोच को सबकी सोच पर हावी रखने की एक हठ हो जाती थी। यह हठ निश्चय ही देश के लिए विश्वासघाती बनी। उन्होंने ‘हिंदुस्तानी’ को केवल इसलिए लागू कराया कि उन्हें वीरसावरकर के शुद्घ राष्ट्रवाद से घृणा थी और वह नही चाहते थे कि स्वतंत्र भारत में कोई भी ऐसी नीति अपनाई जाए जिस पर सावरकरजी का चिंतन हावी हो। सावकर संभवत: इस देश के एकमात्र ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने हिंदी भाषा को शुद्घ संस्कृतनिष्ठ बनाने के लिए एक हिंदी शब्दकोश भी रचना की थी। इसमें उन्होंने शहीद के लिए ‘हुतात्मा’ प्रूफ के लिए उपमुद्रित, मॉनोपोली के लिए एकत्व, मेयर के लिए महापौर जैसे शब्दों का चयन किया था। उन्होंने अनेक बार ‘परकीय शब्दों का बहिष्कार करो’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया था।

यदि सावकर की भाषा संबंधी यह नीति देश में अपनाई जाती तो आज हिंदी की कुछ और ही स्थिति होती। संस्कृत का एक शब्द लें-पश्च या पृष्ठ। ये दोनों शब्द गांधी, नेहरू की ‘हिन्दुस्तानी’ में इस रूप में स्वीकार न करके पीछे, और पीठ के रूप में स्वीकार किये गये हैं। जिनका कोई वैज्ञानिक अर्थ नही है। इन्हीं दोनों शब्दों से ‘हिन्दुस्तानी’ ने पच्छिम, पीछे, पछवा, पीठ, पछतावा, पिछवाड़ा जैसे अवैज्ञानिक शब्द हिंदी (‘हिन्दुस्तानी’) में रूढ़ या प्रचलित हो गये हैं। यदि सावरकर जी की चलती तो इन शब्दों के स्थान पर पश्चिम, पृष्ठ भाग, पश्चात, पश्चिमाभिमुख, पृष्ठ, पश्चात्ताप, प्रायश्चित जैसे शुद्घ वैज्ञानिक शब्दों का प्रचलन हमारी भाषा में होता। नेहरू की कांग्रेस से पुरस्कार पाने के लिए चाटुकार साहित्यकारों ने हिंदी को ‘हिन्दुस्तानी’ बनाने का संकल्प लिया। ऐसे कितने ही साहित्यकारों ने मनोवांछित पुरस्कार ले लिया हैं-यह अलग बात है कि उनके द्वारा हिंदी की बहुत बड़ी क्षति कर दी गयी है। पर जब शासन का उद्देश्य ही अपनी भाषा की क्षति कराना हो तो इसमें चाटुकार साहित्यकारों का क्या दोष? वास्तव में कांग्रेस आज भी इसी रास्ते पर आगे बढ़ रही है। यह कांग्रेस का दोगला राष्ट्रवाद है। सावरकरजी इसी राष्ट्रवाद के विरूद्घ थे। यही कारण है कि कांग्रेस को सावरकर गद्दार दिखाई देते हैं। पर गद्दार कौन था? संस्कृतिद्रोही और धर्मद्रोही कौन था? इसे निश्चित करने वाली कांग्रेस नही है। इसे निश्चित करेंगे इस देश की संस्कृति में और धर्म व इतिहास में आस्था रखने वाले वे करोड़ों लोग जो अब जाग चुके हैं और पिछले 70 वर्ष के काल में कांग्रेस के संस्कृतिद्रोही आचरण के किसी न किसी प्रकार से शिकार हुए हैं।

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