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पर्व – त्यौहार हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

बुद्ध-पूर्णिमा और गौतम बुध*

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डॉ डी के गर्ग

निवेदन: ये लेख 6 भागो में है ,पूरा पढ़े / इसमें विभिन्न विद्वानों के द्वारा समय समय पर लिखे गए लेखो की मदद ली गयी है । कृपया अपने विचार बताये।

भाग- 2 –बुद्ध से सम्बंधित कुछ प्रश्नोत्तरी : साभार- विद्यासागर वर्मा ,पूर्व राजदूत

प्रश्न १ : क्या महात्मा बुद्ध नास्तिक थे ?

उत्तर : महात्मा बुद्ध नास्तिक नहीं थे। वे एक पवित्र आत्मा, सिद्ध पुरुष, समाज सुधारक, नैतिक जीवन मूल्यों के प्रचण्ड प्रचारक और मध्यम मार्ग के संस्थापक थे। ईसापूर्व वर्ष 623 में इस दिव्य आत्मा का जन्म कपिलवस्तु ( वर्तमान नेपाल ) नरेश महाराज शुशोधन के सुपुत्र के रूप में हुआ। इनका नाम सिद्धार्थ रखा गया। कालान्तर में स्वनामधन्य ‘सिद्धार्थ’ सिद्धपुरुष गौतमबुद्ध नाम से विश्वविख्यात हुए।
योग की परिभाषा में राजकुमार सिद्धार्थ ” भव प्रत्यय ” थे। भव का अर्थ है “जन्म” और प्रत्यय का अर्थ है “ज्ञान” अर्थात् जिन्हें जन्म से ही आध्यात्मिक विषयों का ज्ञान होता है। यह ज्ञान पूर्व जन्म में की गई साधना एवं स्वाध्याय के बल पर योग-लक्ष्य की प्राप्ति हेतु नवजात में प्रकट होता है।
राजकुमार सिद्धार्थ ने पारम्परिक विधि से गुरुकुल में शिक्षा ली तथा वेदाध्ययन किया। “ललित विस्तार” नामक बुद्ध के जीवन चरित्र में लिखा है :
” स ब्रह्मचारी गुरुगेहवासी
तत्कार्यकारी विहितान्नभोजी।
सायं प्रभातं च हुताशसेवी
व्रतेन वेदांश्च समध्यगीषट।।”
अर्थात् सिद्धार्थ गौतम ने ब्रह्मचारी बन कर गुरुकुल में निवास समय उनकी सेवा करते हुए, शास्त्र विहित भोजन करते हुए, प्रातः सायं हवन करते हुए, व्रतों को धारण करते हुए, वेदों का अध्ययन किया।
इसमें कोई संदेह नहीं कि महात्मा बुद्ध की सभी शिक्षाओं पाली भाषा में मिलती हैं जो संस्कृत भाषा का विकृत रूप है। वह इसलिए क्योंकि जन सामान्य संस्कृत की बजाय पाली भाषा बोलते थे।
यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महात्मा बुद्ध ने संस्कृत भाषा का तथा वेदों और उपनिषदों का गहन अध्ययन नहीं किया होगा, परन्तु यह निष्कर्ष निकालना अनुचित होगा कि उन्हें वैदिक दर्शन व संस्कृति का ज्ञान नहीं था। हम पूर्व में कह चुके हैं कि ऐसे अध्यात्म पुरुष पूर्व जन्म में किए स्वाध्याय एवं साधना के फल स्वरूप गहन आध्यात्मिक ज्ञान अपनी आत्मा में संजोए रखते हैं। क्या गुरु नानक और सन्त कबीर को ,संस्कृत भाषा की अनभिज्ञता के कारण, आध्यात्मिक विषयों में अज्ञानी कहेंगे ?
इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी किसी समाज में कुरीतियां, सत्यशास्त्र विरुद्ध आचरण , अन्यायपूर्ण व्यवहार का बोलबाला होता है, कोई महान् आत्मा उनका विरोध करता है, अपने सत्याचरण से लोगों में जागृति पैदा करता है तथा समाज को सत्यमार्ग पर चलने की प्ररेणा करता है।
महात्मा बुद्ध , शान्तिप्रिय, अहिंसा के पुजारी थे। यज्ञों में पशुबलि को देख कर उनका हृदय द्रवित हुआ। इस अमानवीय कुप्रथा का उन्होंने विरोध किया। तथा-कथित ब्राह्मणों ने तर्क दिया कि पशुबलि वेदविहित है। महात्मा बुद्ध ने कहा ” मैं ऐसे वेदों को नहीं मानता।” ब्राह्मणों ने पशुबलि की वैधता सिद्ध करने के लिए कहा ,” वेद तो ईश्वरीय ज्ञान है।” अध्यात्मनिष्ठ बुद्ध ने निस्संकोच कहा, “मैं ऐसे ईश्वर को नहीं मानता।”
नास्तिक शब्द के दो अर्थ हैं। एक, जो ईश्वर में विश्वास नहीं रखता। दूसरा, “नास्तिको वेदनिन्दक:” अर्थात् जो वेद की निन्दा करता है।

पहले हम दूसरे अर्थ को लेते हैं। महात्मा बुद्ध ने वेदों का गहन अध्ययन चाहे न किया हो, परन्तु कुछ अध्ययन अवश्य किया है। उनके जीवन चरित्र ‘ ललित विस्तार ‘ में इसका स्पष्ट उल्लेख है। इसके अतिरिक्त उनके ” सुत्तनिपात ” में वेदों का गुणगान पाया जाता है। वे वेदनिन्दक नहीं, वेद प्रशंसक थे।

महात्मा बुद्ध के वेदों पर उपदेश ध्यान से पढ़ें –

i) ” विद्वा च वेदेहि समेच्च धम्मम | न उच्चावच्चं गच्छति भूरिपज्जो ||”
( सुत्तनिपात श्लोक २९२ )

अर्थात महात्मा बुद्ध कहते हैं – जो विद्वान वेदों से धर्म का ज्ञान प्राप्त करता है, वह कभी विचलित नहीं होता |

ii) ” विद्वा च सो वेदगु नरो इध भवाभावे संगम इमं विसज्जा |
सो वीततन्हो अनिघो निरासो अतारि सो जाति जरान्ति ब्रूमिति ||” ( सुत्तनिपात श्लोक १०६० )

अर्थात वेद को जानने वाला विद्वान इस संसार में जन्म या मृत्यु में आसक्ति का परित्याग करके और तृष्णा तथा पापरहित होकर जन्म और वृद्धावस्थादि से पार हो जाता है ऐसा मैं कहता हूँ |

iii) ” ने वेदगु दिठिया न मुतिया स मानं एति नहि तन्मयो सो |
न कम्मुना नोपि सुतेन नेयो अनुपनीतो सो निवेसनूसू || “( सुत्तनिपात श्लोक ८४६ )

अर्थात् वेद को जानने वाला सांसारिक दृष्टि और असत्य विचारादि से कभी अहंकार को प्राप्त नही होता | केवल कर्म और श्रवण आदि किसी से भी वह प्रेरित नहीं होता | वह किसी प्रकार के भ्रम में नहीं पड़ता |

iv) ” यो वेदगु ज्ञानरतो सतीमा सम्बोधि पत्तो सरनम बहूनां |
कालेन तं हि हव्यं पवेच्छे यो ब्राह्मणो पुण्यपेक्षो यजेथ || “( सुत्तनिपात श्लोक ५०३ )

अर्थात जो वेद को जानने वाला,ध्यानपरायण, उत्तम स्मृति वाला, ज्ञानी, बहुतों को शरण देने वाला हो , जो पुण्य की कामना वाला यज्ञ करे , वह उसी को भोजनादि खिलाये |
यदि उपरोक्त विचार-विमर्श पर दृष्टि डाली जाए, यहां न तो महात्मा बुद्ध ने वेद की निन्दा की है ,न ही ईश्वर की सत्ता को नकारा है। वेद में पशुबलि के विधान को अमान्य ठहरा कर, वे वेद के यथार्थ स्वरूप को प्रतिपादित कर रहे हैं। यह वेद की निन्दा कैसे कही जा सकती है ? स्वामी दयानन्द ने भी तो यज्ञों में पशुबलि-विधान का खण्डन किया है।
यदि महात्मा बुद्ध नास्तिक नहीं थे, उनकी छवि ऐसी क्यों बन गई ?
ऐसा अंधविस्वास ,अशिक्षा के कारण। महात्मा बुद्ध ने जन्मना जाति प्रथा का विरोध किया, उपेक्षित समाज के बहुत से लोगों ने बौद्ध मत अपना लिया। कलिंग युद्ध के रक्तपात से द्रवित सम्राट अशोक ने बौद्ध मत की शरण ली। बौद्ध मत के राजकीय संरक्षण के उपरान्त , बौद्ध मत में अनुयायियों की बाढ़ आ गई।

इतना जरूर है की महात्मा बुद्ध ने ईश्वर सम्बन्धी विषयों पर कोई विचार व्यक्त नहीं किये। इतने बड़े समुदाय का सैद्धान्तिक विषयों पर मार्ग दर्शन का भार नव आगन्तुक अनुयायियों पर आ पड़ा जिन्हें स्वयं संस्कृत एवं सैद्धान्तिक विषयों का विशेष ज्ञान नहीं था।

उन्हें दृश्य प्रकृति विषयक थोड़ा बहुत ज्ञान था कि यह परिवर्तनशील है, क्षण-क्षण बदलती रहती है। इसे उन्होंने क्षणिकवाद की संज्ञा (नाम) दी। तदुपरान्त, इस क्षणिकवाद का विस्तार उन्होंने आत्म-तत्त्व पर भी लाद दिया। तदानुसार आत्मा भी हर विचार के साथ बदलती रहती है। परिवर्तित होने से अनित्य है। इसको ज्ञान भी चित्त/ मन के माध्यम से होता है। जो वस्तु मन को ज्ञात है , वह है, जो नहीं है, वह है ही नहीं। इस प्रकार की तर्कहीन चर्चा ( Fallacious Arguments) से अनात्मवाद, निरीश्वरवाद और शून्यवाद का जन्म हुआ। अर्थात् कुछ है ही नहीं, सब मन की परिकल्पना है।

अवैदिक निरीश्वरवादी बौद्ध मत की लगभग 500 वर्ष तक दुन्दभी बजती रही परन्तु ईश- परायण भारतीय जनता के जन मानस में यह जगह नहीं बना पाया, अन्तत: लुप्तप्राय हो गया। विधि की विडम्बना देखो, सदाशय महात्मा बुद्ध ने वैदिक धर्म को पशुबलि, जन्मना जाति प्रथा से कुरीतियों से मुक्त करने हेतु जन जागरण अभियान चलाया, ताकि वेद अपना प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त कर सकें, उनके अनुयायी ही निरीश्वरवादी, वेदविरोधी बन बैठे !

अगला प्रश्न क्या महात्मा बुद्ध ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं करते थे ?

एक, बुद्ध वह है जिसको आत्म बोध हो गया हो। ईश्वर सर्वव्यापक है, सर्व अन्तर्यामी है। शांख्यायन आरण्यक का कथन है : “आत्मनि ब्रह्म ” ईश्वर आत्मा में वास करता है। जब बुद्ध ने आत्म साक्षात्कार किया, उन्होंने परमात्म साक्षात्कार भी किया। योगदर्शन (1.2) का सूत्र है :
” तदा द्रष्टु: स्वरूपेsवस्थानम्।”

” तब होती है आत्मा, स्वस्वरूप में स्थित।
( जब होती दक्षता, चित्त नियन्त्रण में सिद्ध)
जब होती है आत्मा, स्वस्वरूप में स्थित,
स्वत: स्वयं को पाती है, ब्रह्म स्वरूप में स्थित। “

दूसरा, सिद्ध पुरुष आत्म अनुभूति को सार्वजनिक नहीं करते। ईश्वर अवर्णनीय है। मैत्रेयी उपनिषद् (6.34) का कथन है : ” न शक्यते वर्णयितुं गिरा “अर्थात् वाणी उसका वर्णन करने में असमर्थ हैं। जिस प्रकार गूंगा गुड़ की ढीली को चाट कर , उसके स्वाद को व्यक्त नहीं कर पाता, उसी प्रकार सिद्ध पुरुष उसका बखान करने में अपने को सक्षम नहीं समझते । इसलिए महात्मा बुद्ध ने ईश्वर के प्रति कोई व्याख्या नहीं की।‌

तीसरा, महात्मा बुद्ध ने वेद उपनिषद् आदि का इतना गहन अध्ययन नहीं किया था; न हीं वे संस्कृत भाषा के प्रकाण्ड विद्वान थे। वे ब्राह्मणों के साथ इस विषय पर वाद- विवाद में नहीं पड़ना चाहते थे क्योंकि वे शास्त्रार्थ करने में सक्षम नहीं थे।

चौथा, वे इस विषय पर अधिकतर मौन रहे। ईश्वर उपासना की बजाए, वे अपने अनुयायियों को नैतिक कार्य, नैतिक जीवन यापन पर बल देते थे। वैसे देखा जाए, अन्ततो गत्वा कर्म की ही प्रधानता है। ज्ञान अर्जन भी कर्म है; ईश्वर प्रणिधान भी कर्म।

परन्तु इसका कदाचित् यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि वे ईश्वर के स्वरूप के विषय में अनभिज्ञ थे।

प्रश्न २ क्या महात्मा बुद्ध अनात्मवादी थे ?

क्या उन्हें आत्मा और परमात्मा की सत्ता में विश्वास नहीं था ? जी, ऐसा बिलकुल नहीं है। स्पष्टत: जो सिद्ध पुरुष हो, जिसने आत्म- साक्षात्कार किया हो, वह अनात्मवादी कैसे हो सकता है ? इसके अतिरिक्त, बौद्ध ग्रंथों में विवरण मिलता है कि महात्मा बुद्ध ने अपने 500 पूर्व जन्मों का साक्षात्कार किया। यदि वे आत्मा की सत्ता में ही विश्वास ही नहीं रखते थे, तो उन्होंने 500 पूर्व जन्मों में साक्षात्कार किसका किया ?

आदि शंकराचार्य ने कहा है कि आप किसी भी वस्तु की सत्ता को नकार सकते हैं, परन्तु आप अपनी सत्ता को नहीं नकार सकते क्योंकि नकारने की क्रिया में ही आपकी सत्ता सिद्ध हो जाती है।

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