वैदिक सम्पत्ति – 317 *वैदिक आर्यों की सभ्यता*

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[यह लेखमाला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की वैदिक सम्पत्ति नामक पुस्तक के आधार पर सुधी पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।
प्रस्तुति – देवेंद्र सिंह आर्य
(चेयरमेन उगता भारत)

गतांक से आगे…
इसीलिए कहा है कि मोक्ष से अर्थ और काम को सहायता मिलती है। किन्तु प्रश्न यह होता है कि अर्थ काम से मोक्ष को और मोक्ष से अर्थ काम को परस्पर उचित सहायता दिखानेवाला नियम कौनसा है ? इसका उत्तर स्पष्ट है कि अर्थ, काम और मोक्ष में सामञ्जस्य उत्पन्न करानेवाला धर्म है। धर्मपूर्वक मोक्षसाधन से अर्थ और काम की उचित व्यवस्था हो जाती है और धर्मपूर्वक अर्थ, काम को ग्रहण करने से मोक्ष सुलभ हो जाता है। इस प्रकार से ये चारों पदार्थ एक दूसरे के सहायक हो जाते हैं। यद्यपि ये चारों पदार्थ परस्पर एक दूसरे के सहायक हैं और अपने अपने कार्य में चारों बड़े महत्व के हैं, पर चारों में मोक्ष का स्थान सबसे ऊँचा है। मोक्ष की महत्ता का कारण मृत्यु के दुःखों से छूट जाना है। मनुष्य की समस्त अभिलाषाओं में दीर्घातिदीर्घ जीवन की अभिलाषा ही सर्वश्रेष्ठ है। जिदगी के मुकाबिले में मनुष्य अर्थ, काम, मान, न्याय और ज्ञान की परवाह नहीं करता। इस बात का प्रमाण मरने के समय ही मिलता है। इसलिए जिस साधन से मृत्यु का भय सदैव के लिए दूर हो जाय – जिसके प्राप्त हो जाने पर मृत्यु के कारणरूप इस जन्म ही का अभाव हो जाय – उस मोक्ष की समता कौन कर सकता है ? यही कारण है कि आर्यों ने अपनी सभ्यता को मोक्षप्राप्ति के उच्च आदर्श पर स्थिर किया है और केवल धर्मपूर्वक प्राप्त अर्थ और काम को ही उसका सहायक माना है, धर्माविरुद्ध को नहीं। धर्मपूर्वक अर्थ और काम को ग्रहण करके मोक्ष प्राप्त करने के लिए ही आर्यों को अपना जीवन धार्मिक बनाने की शिक्षा दी गई है। इसलिए वे ब्रह्मचर्याश्रम से लेकर संन्यास पर्यन्त सन्ध्योपासन, प्राणायाम और योगाभ्यास, द्वारा अपने जीवन को मोक्षाभिमुखी बनाते है।

   *मोक्ष की प्रधानता* 

मोक्षप्राप्ति के मार्ग में चलनेवाले को दो बातों की आवश्यकता होती है। एक तो सृष्टि उत्पत्ति के कारणों का जानना और कारणों के कारण ईश्वर को प्राप्त करना, दूसरे सृष्टि के उपयोग करने की विधि का समझना । सृष्टि के कारणों और ईश्वर की प्राप्ति के उपायों के ज्ञान से सृष्टि, प्रलय, जीव, ईश्वर, कर्म, कर्मफल और ईश्वर जीव के संयोग तथा उनकी प्राप्ति आदि का रहस्य खुल जाता है और सृष्टि के उपयोग करने की विधि के ज्ञान से अर्थ और काम के उपभोग का तात्पर्य समझ में आ जाता है, तथा दोनों के मौलिक ज्ञान और उचित उपयोग से मेल हो जाता है। अर्थ और काम के फेर से ही छूटने का नाम मोक्ष है, पर विना इन दोनों के फेर में पड़े मोक्ष होता भी नहीं। ऐसी सूरत में धर्म का सहारा लेकर ही दोनों में सामञ्जस्य उत्पन्न किया जा सकता है। क्योंकि सभी को अर्थ की आवश्यकता है। भोजन, वस्त्र, गृह और गृहस्थी के विना किसी का गुजर ही नहीं होता। ये सभी पदार्थ, संसार (सृष्टि) से ही लेने पड़ते हैं। इसी तरह सबको काम की भी आवश्यकता होती है। सभी लोग स्त्री, बच्चे, शोभा, शृङ्गार और ठाटबाट की इच्छा रखते हैं। ये पदार्थ भी सृष्टि से ही लिये जाते हैं। अर्थात् आदि से अन्त तक व्यक्ति या समाज को जो कुछ आवश्यक होता है, वह सब संसार से ही सृष्टि से ही लिया जाता है, इसलिए जब तक संसार के कारणों का ज्ञान न हो जाय, तब तक उसके कार्य का यथार्थ उपयोग हो ही नहीं सकता-तब तक यह ज्ञात ही नहीं हो सकता कि हमको इस सृष्टि से इस संसार से क्या-क्या, कितना कितना, कव-कब और किस किस प्रकार ग्रहण करना चाहिये। इसलिए आर्यों ने सबसे पहिले संसार के कारणों का पता लगाया है। यहाँ हम अर्थ और काम की देनेवाली सृष्टि के कारणों का वर्णन करते हैं और दिखलाते हैं कि उन कारणों से उत्पन्न कार्य ही अर्थ ओर कामरूप से संसार में विद्यमान है, अतः इसका उचित उपयोग करते हुए ही मोक्ष प्राप्त करना चाहिये ।

कारणों से ही कार्य होता है और कारण ही कार्य में अवतरित होकर अनेक प्रकार के नियमों में परिवर्तित हो जाता है। इसीलिए जब कार्य से कारण का अनुसन्यान किया जाता है तो कार्य के नियमों का ही निरीक्षण किया जाता है। हमें सृष्टि के कारणों को जानना है, अतएव आवश्यक है कि हम भी इस कार्यरूप सृष्टि के कारणों का अनुसन्धान करें।
क्रमशः

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