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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

स्वामी दयानंद जी महाराज ने दिखाया भारतवासियों को उनका वास्तविक स्वरूप, भाग 3

“और अन्त में जब कई एक भद्र पुरुषों को ऐसा प्रतीत हुआ कि अब समाज की स्थापना होती ही नहीं, तब कुछ धर्मात्माओं ने मिलकर राजमान्य राज्य श्री पानाचन्द आनन्द जी पारेख को नियत किए हुए नियमों (राजकोट में निर्धारित 26 नियम) पर विचारने और उनको ठीक करने का काम सौंप दिया। फिर जब ठीक किए हुए नियम स्वामीजी ने स्वीकार कर लिए, तो उसके पश्चात् कुछ भद्र पुरुष, जो आर्यसमाज स्थापित करना चाहते थे और नियमों को बहुत पसन्द करते थे, लोकभय की चिन्ता न करके, आगे धर्म के क्षेत्र में आये और चैत्र सुदि 5 शनिवार, संवत् 1932, तदनुसार 10 अप्रैल, सन् 1875 को शाम के समय, मोहल्ला गिरगांव में डाक्टर मानक जी के बागीचे में, श्री गिरधरलाल दयालदास कोठारी बी.ए., एल.एल.बी. की प्रधानता में एक सार्वजनिक सभा की गई और उसमें यह नियम (28 नियम) सुनाये गये और सर्वसम्मति से प्रमाणित हुए और उसी दिन से आर्यसमाज की स्थापना हो गई।”
आर्य समाज लाहौर में आर्य समाज के निम्नलिखित नियम प्रतिपादित किए गए :-
• 1. सब सत्यविद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदिमूल परमेश्वर है।

• 2. ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करने योग्य है।

• 3. वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना–पढ़ाना और सुनना–सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।

• 4. सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोडने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।

• 5. सब काम धर्मानुसार, अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिए।

• 6. संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।

• 7 . सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिये।

• 8. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।

• 9. प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से संतुष्ट न रहना चाहिये, किंतु सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये।

• 10. सब मनुष्यों को सामाजिक, सर्वहितकारी, नियम पालने में परतंत्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम पालने में स्वतंत्र रना चाहिए।

इन नियमों के अवलोकन से भी स्पष्ट है कि स्वामी जी महाराज का वैश्विक चिंतन इनमें स्पष्ट परिलक्षित होता है। यह ऐसे नियम है जिन्हें भारतवर्ष के शासन को भी अपनाना चाहिए, सामाजिक संगठनों को भी अपनाना चाहिए और परिवारों को भी अपनाना चाहिए। इनमें इस प्रकार का चिंतन मंथन प्रस्तुत किया गया है जिससे पारिवारिक, सामाजिक और वैश्विक शांति स्थापित करने के लिए हमें वास्तविक सहयोग प्राप्त हो सकता है। स्वामी दयानंद जी महाराज के पश्चात आर्य समाज के अनेक महान क्रांतिकारी नेताओं , समाज सुधारकों , विद्वानों, लेखकों और उपदेशकों ने इन नियमों को अपनाकर धूम मचा दी थी। नियमों में व्यक्तिगत शुचिता परिलक्षित होती है। जिसने आर्य लोगों को मनोबल प्रदान किया। अपने दिव्य मनोबल के आधार पर आर्य जनों ने अनेक ऐसे असंभव कार्य पूर्ण कर दिखाए,जिनकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। उन्होंने अनेक प्रकार के शास्त्रार्थों के माध्यम से विरोधियों की चुनौतियों से पार पाया। इसके अतिरिक्त विदेशी शक्ति सत्ता भी जिस प्रकार उस समय लोगों के जीवन को व्यथित कर रही थी, उसकी वेदना से मुक्ति दिलाने के लिए भी आर्य समाज ने कमर कसी और विदेशी शक्ति सत्ता को खुली चुनौती दी। एक दिन समय आया कि आर्य समाज की इस चुनौती के परिणाम स्वरूप देश की युवा पीढ़ी ने खड़ा होकर विदेशी सत्ता को भारत से भागने के लिए विवश कर दिया। जब नवाब हैदराबाद ने शक्ति सत्ता का दुरुपयोग करते हुए सनातन को प्रतिबंधित करना आरंभ किया तो आर्य समाज ने वहां जाकर भी नवाब को चुनौती दी, जिसका परिणाम यह हुआ कि नवाब को झुकना पड़ा।
क्रमशः

डॉ राकेश कुमार आर्य

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