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महर्षि दयानंद जी का स्वलिखित जीवन चरित्र, भाग 7 विभिन्न स्थानों पर गुरुओं द्वारा योगसाधन की क्रियात्मक शिक्षा (संवत् १९०६ वि०)

जब यह सुना कि व्यासाश्रम में योगानन्द नामक एक स्वामी रहते हैं, वे योगविद्या में अति निपुण हैं तो शीघ्र वहां पहुंचा और उनके पास योगविद्या पढ़ने लगा और उसके आरम्भ के सब ग्रन्थ अच्छी प्रकार पढ़कर और क्रिया सीख कर चित्तौड़” नगर को गया क्योंकि एक कृष्णशास्त्री चितपावन दक्षिणी ब्राह्मण उसके आस-पास में रहते थे। उनके पास जाकर कुछ व्याकरण का अभ्यास करके फिर चाणोद कन्याली में आकर ठहरा और राजगुरु से वेदों को सीखा और वहां कुछ समय तक निवास किया। यहां कुछ दिन पीछे ज्वालानन्द पुरी और शिवानन्द गिरि नामक दो योगियों से भेंट हुई। उनके साथ योग का साधन किया और हम तीनों मिलकर सदैव योगशास्त्र की चर्चा करते रहे। फिर वे दोनों योगी अहमदाबाद को चले गये और मुझ को आज्ञा दे गये कि एक मास के पीछे तुम हमारे पास आना हम तुमको इस स्थान पर योगसाधन के पूरे-पूरे तत्त्व और उसकी सब विधियां अच्छी प्रकार समझा देंगे। हम वहां नदी के ऊपर दुग्धेश्वर महादेव में ठहरेंगे। फिर एक मास पश्चात उनकी आज्ञा के अनुसार अहमदाबाद के पास दुग्धेश्वर महादेव के मन्दिर में उनसे जाकर मिला, जहां उन्होंने योग विद्या के अत्यन्त सूक्ष्म तत्त्वों और उसके प्राप्त करने की विधि बताने की प्रतिज्ञा की थी। वहां उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण की और अपने वचनानुसार मुझ को निहाल कर दिया अर्थात् उन्हीं महात्मा योगियों के प्रभाव से मुझ को पूर्ण योगविद्या और उसकी साधनक्रिया अच्छी प्रकार विदित हो गई। इसलिए मैं उनका अत्यन्त कृतज्ञ हूं। वास्तव में उन्होंने यह मुझ पर बड़ा उपकार किया। जिसके कारण मैं उनका अत्यन्त ही आभारी हूं। इसके पश्चात् मुझ को विदित हुआ और सुना कि राजपूताने में आबू पर्वत की चोटियों पर बड़े-बड़े उत्तम योगिजन निवास करते हैं। इसलिए उनकी प्रशंसा सुन उस ओर चल दिया। वहां जाकर उनकी खोज करता हुआ अर्बुदा भवानी ” नामक चोटी पर और अन्य स्थानों पर योगिराजों से जा मिला। ये उन महात्माओं से अधिक ज्ञानी तथा विद्वान थे। उनसे और भी विशेष योगसाधन के सूक्ष्म तत्त्वों को प्राप्त किया।

उत्तराखंड में पौने दो वर्ष तक विद्वानों तथा योगियों की खोज

संवत् १९११ तक इसी प्रकार भिन्न-भिन्न स्थानों में फिर कर महात्मा विद्वानों और योगिजनों से मिलकर आत्मिक उन्नति और मानसिक शान्ति के उपाय तथा साधन प्राप्त करता रहा और विद्यार्थी बनकर जो मिलता था उससे विद्योपार्जन किया करता था। इसी प्रकार अनेक महात्माओं का सत्संग करता हुआ चलते चलते तीस वर्ष की अवस्था में संवत् १९१२ तदनुसार ११ अप्रैल सन् १८५५ हरिद्वार के कुम्भ के मेले की धूम सुनकर पहली बार वहां पहुंचा क्योंकि वहां पर श्रेष्ठ सुयोग्य योगी व तपस्वी प्रायः होते और परस्पर मिलते हैं जिनकी यह व्यवस्था किसी को विदित भी नहीं होती । मैं वहां आकर बहुत साधुओं और संन्यासियों से मिला और जब तक मेला रहा, नडी के पर्वत के जंगल में योगाभ्यास करता रहा और जब सब यात्री चले गये और मेला हो चुका तो वहां से ऋषिकेश को गया। वहां बड़े-बड़े महात्मा संन्यासी और योगियों से योग की रीति सीखता और सत्संग करता रहा।
तत्पश्चात् कुछ दिनों तक अकेला ऋषिकेश में रहा। इसी समय एक ब्रह्मचारी और दो पहाड़ी साधु मुझसे और आ मिले और हम सब के सब मिलकर स्थान टिहरी को चले गये।

टिहरी में पहली बार तन्त्र ग्रन्थ दर्शन तथा उनसे घृणा-

यह स्थान विद्या की वृद्धि के कारण साधुओं और राजपंडितों से पूर्ण और प्रसिद्ध था। इन पंडितों में से एक दिन एक पंडित ने अपने यहां मुझे निमन्त्रण दिया और नियत समय पर एक मनुष्य भी बुलाने को भेजा। उसके साथ में और ब्रह्मचारी दोनों उसके स्थान पर पहुंचे परन्तु मुझको वहां एक पंडित को मांस काटते और बनाते देखकर अत्यन्त घृणा आई। आगे जाकर बहुत से पंडितों को मांस और अस्थियों के ढेर तथा पशुओं के भुने हुए सिरों पर काम करते देखा। इतने में ही गृहस्वामी ने प्रसन्नतापूर्वक अत्यन्त सौहार्द से हमसे कहा कि भीतर चले आइये। मैंने कहा कि आप अपना काम किये जाइये, मेरे लिए कुछ कष्ट न कीजिये । यह कहकर झट वहां से निकल उल्टे पाँव अपने स्थान का मार्ग लिया। थोड़े समय पश्चात् वही मांसभक्षी पंडित मेरे पास आया और मुझ से निमन्त्रण में चलने को कहा और साथ ही यह भी कहा कि यह मांसादि उत्तम भोजन केवल आप ही के लिए बनाये गये हैं। मैंने उससे स्पष्ट कह दिया कि यह सब वृथा और निष्फल है क्योंकि आप मांसभक्षी है। मेरे योग्य तो केवल फलादि हैं। मांस खाना तो दूर रहा मुझे तो उसके देखने से ही रोग हो जाता है। यदि आपको मेरा न्यौता करना ही है तो कुछ अन्न और फलादि वस्तु भिजवा दीजिये, मेरा ब्रह्मचारी यहां पर भोजन बना लेगा। इन सब बातों को उक्त पंडित स्वीकार कर और लज्जित होकर अपने घर लौट गया।
तत्पश्चात् मैं कुछ दिन तक स्थान टिहरी में रहा और उन्हीं पंडित जी से कुछ पुस्तकों और प्रन्थों का वृत्तान्त, जिन्हें मैं देखना चाहता था, पूछता रहा और पता लगाता रहा कि वे ग्रंथ इस नगर में कहां मिल सकते हैं? यह सुनकर पंडित जी ने संस्कृत व्याकरण, कोश जो बड़े-बड़े कवियों के बनाए हुए थे, ज्योतिष और तंत्रादि पुस्तकों का नाम लिया। इनमें से तन्त्र की पुस्तकें मेरी देखी नहीं थीं इसलिए उनसे मांगी और उन्होंने शीघ्र थोड़ी सी पुस्तकें इस प्रकार की ला दी। उनके खोलते सही मेरी दृष्टि ऐसी अत्यन्त अश्लील बातों, झूठे भाष्यों और बेहूदा वाक्यों पर पड़ी जिनको देख कर मेरा जी कांपने लगा । उसमें लिखा था कि मां, बहन, बेटी, चूढ़ी, चमारी आदि से भोग करने और उन्हें नग्न खड़ा करके पूजने और इसी प्रकार मद्य मांस, मछली, मुद्रा, मैथुन और विविध जन्तुओं का मांस खाने और ब्राह्मण से लेकर चंडाल पर्यन्त एक साथ भोजन करने इत्यादि बातों के लिए आज्ञा है और यह भी स्पष्ट लिखा था कि इन्हीं पांच शब्दों अर्थात् मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन आदि साधनों से जिनका नाम मकार से आरम्भ होता है. मोक्ष प्राप्ति हो सकती है। सारांश यह कि तन्त्र की पुस्तकों के पढ़ने से जिनको वे धर्म समझते हैं, उनके लेखकों की धूर्तता और स्वार्थी दुष्ट कवियों द्वारा उनकी रचना का मुझको अच्छी तरह विश्वास हो गया।
क्रमशः

डॉ राकेश कुमार आर्य

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