जहां नारियों का सम्मान होता है वहां देवता वास करते हैं

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मनुस्मृति का श्लोक है कि
” पूज्यते यत्र नार्यस्तु रमंते तत्र देवता”

आज 8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस एवं महर्षि दयानंद के बोध दिवस के अवसर पर हम भारत की सन्नारियां, वीरांगनाओं को नमन करते हैं। स्त्री शिक्षा पर जितना जोर स्वामी दयानंद ने दिया उतना किसी अन्य महापुरुष ने नहीं दिया। वेदों की शिक्षा का अधिकार महिलाओं को व शूद्रों को है यह सबसे प्रथम उद्घोष करने वाले केवल महर्षि दयानंद थे। जिन्होंने सत्यार्थ प्रकाश में इस को उद्घाटित किया है।
आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का पर्व है।
हमें अपनी आधी आबादी पर गर्व है ।
आज ही महाशिवरात्रि का पावन त्यौहार भी है जिस रात्रि में महर्षि दयानंद ने सच्चे शिव को प्राप्त करने का प्रण लिया था। तथा उनका शिवजी की मूर्ति से मोह भंग हो गया था। यह एक सुखद संयोग है कि आज ही अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस भी है।
विश्व भर में भारतवर्ष एकमात्र ऐसा देश है जहां पर अनेकों वीर, वीरांगनाऐं ,ऋषि, ऋषिकाओं का अवतरण हुआ है ‌। भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति को धनी करने में अनेकों वीरांगनाओं और ऋषिकाओं का महत्वपूर्ण योगदान है। इसीलिए आज हम अपनी उन महान माताओं के लिए गर्व से श्रद्धानत होकर हृदय से नमन करते हैं।

देखिए संस्कृति कितनी महान् है, जिसने पुरुष से भी अधिक नारी को सम्मान दिया है । भारत में अनेक विदुषी नारियां हुई हैं, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में पुरुष से भी आगे बढकर कार्य किया है । जब – जब पुरुष से प्रतिस्पर्धा का समय आया , नारियों ने स्वयं को उनसे आगे सिद्ध किया है ।
ऐसी विदुषी नारियों में हमारी चरित्र नायक अपाला भी एक थी। आओ हम इस अपाला को कुछ जानने का यत्न करें ।

इस दिव्यांग बालिका के पिता का नाम अत्री था जो अपने समय के एक महान् शिक्षक थे । निराश पिता के मन में आया कि इस भयंकर रोग से ग्रसित बालिका को उच्च से उच्च शिक्षा दे कर एक महान् विद्वान् बना दिया जावे क्योंकि सुन्दर न होने पर भी गुणवान् का प्रत्येक सभा में आदर हुआ करता है । इस पर जब पिता ने ध्यान दिया तो सुशील अपाला कुछ ही समय में अपने काल के युवकों से भी कहीं अधिक सुशिक्षित हो गयी । शिक्षा में तीव्र अपाला के साथ जब – जब कोई शास्त्रार्थ करता, निश्चिय ही उसे पराजयी होना पड़ता | अपाला का विवाह कुशाग्र नामक एक युवक से हुआ , जो नाम ही के अनुरूप वास्तव में ही कुशाग्र था।

अपाला इतनी महान् तथा वेद की विदुषी थी की ऋग्वेद पर उसने अपना पूर्ण प्रभाव दिखाया तथा वह वेद की उच्चकोटि की विद्वान् हो गयी । उसने ऋग्वेद के अष्टम मण्ड्ल के सूक्त संख्या ९१ की प्रथम सात ऋचाओं पर एकाधिकारी स्वरुप चिन्तन किया तथा प्रकाश डाला। इस कारण वह इन सात ऋचाओं की “ऋषिका” कहलायी । इस प्रकार अपाला ने न केवल अपने स्नेह , प्रेम व यत्न से अपने पति के मन को ही जीत लिया अपितु अपने समय के सब पुरुषों से भी अधिक विद्वान् होकर वेद की महान् पण्डिता तथा सब से बडे वेद ऋग्वेद के अष्टम मण्ड्ल के एक नहीं अपितु सात सूक्तों की ऋषिका बनी । इस कारण भारत में ही नहीं समग्र विश्व में अपाला को सन्मान की दृष्टि से देखा जाता है
भारतवर्ष में प्राचीन काल से यह परंपरा रही है कि “पूज्यते यत्र नार्यस्तु रमंते तत्र देवता”।
अर्थात जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं इसलिए जिस घर में ,जिस समाज में और जिस राष्ट्र में नारी की प्रमुखता को सहजता से स्वीकार किया जाए और नारी के व्यक्तित्व के विकास को अवसर प्राप्त कराया जाए निश्चित रूप से वह घर, वह समाज और वह राष्ट्र उन्नति के मार्ग पर गतिमान होता है।
महाराज मनु ने मनुस्मृति के तृतीय अध्याय में स्त्रियों का आदर करने से दिव्य लाभों की प्राप्ति होना बताया है। तथा स्त्रियों के आदर का विधान और उसका फल शुभ होना मनुस्मृति में लिखा है। इसके अलावा स्त्रियों के शोक ग्रस्त रहने से परिवार के विनाश होने की बात भी लिखी है। स्त्रियों का सदा सत्कार और सम्मान करते रहें। पति-पत्नी की परस्पर संतुष्टि से ही परिवार का कल्याण संभव है। पति-पत्नी में पारस्परिक अप्रसन्नता से संतान नहीं होती है अथवा यूं कह लें कि अच्छी संतान नहीं होती है। स्त्री की प्रसन्नता पर कुल में प्रसन्नता रहती है। इसलिए स्त्री का सम्मान भारतवर्ष में सदैव से होता रहा है।
महर्षि दयानंद ने अपने अमर -ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में विद्या का अधिकार सबको होना चाहिए ऐसा उल्लेख किया अर्थात नारी को शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता ।नारी को शिक्षित करने का तात्पर्य होता है सारे परिवार की भावी पीढ़ी को, समाज को, राष्ट्र को शिक्षित करना।
यहीं पर यह उल्लेख करना भी आवश्यक समझा जाता है कि शूद्रों को भी समान शिक्षा का अधिकार है। अर्थात शुद्र को भी शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। क्योंकि जब सब वर्णों में विद्या सुशिक्षा होती है तब कोई भी दंभी झूठा पाखंड रूप अधर्म युक्त मिथ्या व्यवहार को तथाकथित ब्राह्मण भी नहीं चला सकता ।इससे यह सिद्ध हुआ कि छत्रिय आदि को नियम में चलाने वाला ब्राह्मण और तथा सन्यासी को सुनियम में चलाने वाले क्षत्रिय होते है। इसलिए सब वर्णों के स्त्री पुरुषों में विद्या और धर्म का प्रचार अवश्य होना चाहिए ।
नारी एवं शूद्र भी वेद पढ़े । अर्थात प्रत्येक मनुष्य मात्र को पढ़ने का अधिकार है ।
यह महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में तृतीय समुल्लास में प्रावधान किया है।
भारतवर्ष में नारी के सम्मान की एवं उचित शिक्षा की परंपरा वैदिक काल से चली आई है। इसलिए भारतवर्ष में अनेकों विदुषी महिलाएं हुई हैं, जिनमे माता मदालसा, विदुषी गार्गी , माता पार्वती, माता सावित्री, माता कैकेई,माता कौशल्या, माता सीता ,माता कुंती, माता देवकी, माता रुकमणी, द्रोपदी, महान विदुषी उदय भारती, राजा दाहिर की वीर पत्नी एवं पुत्रियां,कण्णगी, महारानी पद्मिनी, माता अरुंधति, विदुषी कन्या अग्नि तृष्णा, माता शबरी, माता अपाला, मुद्गल गोत्रिय ऋषियों की जन्मदात्री माता सोमलता,माता जीजाबाई, माता पन्नाधाय गुर्जरी, रानी दुर्गावती, हाडा रानी, रानी लक्ष्मीबाई, रानी झलकारी बाई, रानी अहिल्याबाई, कित्तूर की रानी चेन्नम्मा, रानी सारंधा, रानी कर्णावती अथवा कर्मवती,माता देवकी, महारानी तपस्विनी, माता मरूद्धति, क्रांतिकारी दुर्गा भाभी, रानी किरणमई अथवा किरण देवी, लक्ष्मीबाई केलकर ( मौसी जी) वीरांगना रामप्यारी गुर्जरी, माता गुर्जरी( गुरु गोविंद सिंह की पत्नी), जैसी अनेकों सन्नारियां हुई हैं।
जिनका महान इतिहास है । प्रत्येक का अलग-अलग इतिहास बहुत ही विस्तृत और विशाल है बहुत ही गौरवशाली है।
माता अनुसूया व अत्रि मुनि त्रेता युग में परमाणु विद्या के विशेषज्ञ थे ।जिन्होंने सीता माता को उपदेश दिया कि जब तक वन में रहना है तो वनचरी रहना है। भोगचर में नहीं जाना है ।गृहस्थ में नहीं जाना है ।राम को आश्रम से विदा करते समय एक अस्त्र दिया था ।जिसके अंतरिक्ष में प्रहार करने से जलवर्षा हो जाती थी। राम रावण युद्ध में जब मेघनाद ने अस्त्र चलाकर अग्नि वर्षा की तो सेना को बचाने के लिए राम ने इसी वरुणास्त्र का प्रयोग किया था।
भारद्वाज ऋषि की शिष्या महर्षि कुरतुक महाराज की कन्या शबरी थी जो त्रेता युग में पैदा हुई थी। जिन्होंने भारद्वाज ऋषि की विज्ञानशाला में उपकरणों और यंत्र द्वारा यज्ञशाला में एक यंत्र का निर्माण किया। उसी यंत्र में यह विशेषता थी कि एक रक्त का बिंदु यंत्र में प्रवेश किया और उस यंत्र में जिस मानव का रक्त का वह बिंदु था उस मानव का स्वरूप दृष्टिपात होने लगा ।वह शबरी उपकरणों और यंत्रों के द्वारा विज्ञानवेत्ता बन गई। यह वही शबरी थी जिसके द्वारा राम को जब रावण को विजय करने चले तो भारद्वाज मुनि ने अपने सर्व यंत्रों को उन्हें प्रदान किया था। यह कहा था कि तुम यह राम को प्रदान कर देना ।वह यंत्रों को लेकर वहां पहुंच गई थी।
भीलनी क्यों कहते है शबरी को?
क्योंकि वह भारद्वाज ऋषि के आश्रम से गमन कर राम के राष्ट्र में प्रवेश कर के शूद्र का कार्य करने लगी थी । वह एक गुप्तचर का वेश धारण करती थी । जैसे आज भी सीआईडी के लोग अपनी पहचान छिपाकर अस्तव्यस्त कपड़े पहन कर गुप्तचरी का कार्य करते हैं। ऐसे ही माता शबरी करती थी। उसके अस्त-व्यस्त कपड़े और केशों को देखकर लोगों को भ्रांति होती थी भिलनी अथवा शूद्र समझने लगे थे।
परंतु वह प्रत्येक वस्तु पर दृष्टि रखकर गुप्तचर का कार्य करके अपने प्रतिभा और कार्यकुशलता का सूचक बनी हुई थी। वह राम की प्रिय भक्त थी। राजा को भोजन भी परीक्षण करने के पश्चात कराना चाहिए इसी नीति के दृष्टिकोण से अपने स्पर्श किए फलों को राम को प्रदान करती
थी । राम श्रद्धा से ओतप्रोत होने के कारण उसे ही खाया करते थे। वह विज्ञान में प्रवीण थी। भारद्वाज मुनि के आश्रम में शिक्षा अर्जित करती थी। इसलिए शबरी को उन्होंने गुप्तचर विभाग में नियुक्त किया था ।शबरी ने जितना भी उनके पास भारद्वाज मुनि का ज्ञान -विज्ञान का कोष और नाना यंत्र थे सभी राम को प्रदान कर दिए थे। और ऐसा ही स्वातिनाम का यंत्र सूर्य की किरणों में जो प्राणवर्धक तत्व होते थे उनको अपने में स्थापित कर लेता था ।अब यदि किसी राष्ट्र को भस्म करना है तो अग्नि वाले परमाणु प्रदीप्त हो जाते थे। जिससे राष्ट्र भस्म हो जाता था ।ऐसे अनेकों यंत्र शबरी ने राम को अर्पित किए थे। राम ने यंत्र लेकर अपने को धनी किया। शबरी महान दरिद्रता में रहती थी। परंतु प्रभु का चिंतन करती थी। राम की भक्त थी। राम उन्हें माता कहकर उनके चरणों को छुआ करते थे। एक समय शबरी रामचंद्र जी से वन में मिलने आई और धर्म क्या पदार्थ है प्रश्न किया। राम ने कहा कि हे देवी! हमारे अंतःकरण में पवित्रता हो, और वाणी में नम्रता हो, यही धर्म की महत्ता है। अपने कर्तव्य का पालन ही धर्म है ।नम्रता ही मानव को धार्मिक बनाने का सबसे बड़ा साधन है ।ऐसी थी सबरी ।यह वह सबरी नहीं थी जिन्होंने रामचंद्र जी को अपने झूठे बेर खिला दिए हो। यह कथानक गलत है।
हमें स्वयं को अपनी वर्तमान एवं आगामी पीढ़ी को सुशिक्षित गुणवान बनाने के दृष्टिकोण से सत्य को ग्रहण तथा प्रस्तुत करना चाहिए। हमें माता शबरी को एक वैज्ञानिक एवं विदुषी नारी के रूप में स्थापित करना चाहिए ।उसका शुद्ध रूप एवं भीलनी नहीं दिखाना चाहिए।

एक लेख के माध्यम से सभी भारतीय सन्नारियों का गुणगान नहीं किया जा सकता हमारी अपनी मर्यादा हैं।

वर्तमान समय में भारत की महिलाएं प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रही हैं और राष्ट्र की उन्नति में महत्वपूर्ण सहायक भूमिका निभा रही हैं।
हमें गर्व है अपनी आधी आबादी पर। हम उस देश के वासी हैं जिस देश में वीरांगना ,ऋषिकाऐं हुईं हैं।

देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन : उगता भारत समाचार पत्र

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