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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

वीर सावरकर की माफ़ी और अंग्रेज

डॉविवेकआर्य
(26 फरवरी को पुण्य तिथि के उपलक्ष पर प्रचारित)
वीर सावरकर भारत देश के महान क्रांतिकारियों में से एक थे। कांग्रेस राज की बात है। मणिशंकर अय्यर ने मुस्लिम तुष्टिकरण को बढ़ावा देने के लिए अण्डेमान स्थित सेलुलर जेल से वीर सावरकर के स्मृति चिन्हों को हटवा दिया। यहाँ तक उन्हें अंग्रेजों से माफ़ी मांगने के नाम पर गद्दार तक कहा था। भारत देश की विडंबना देखिये जिन महान क्रांतिकारियों ने अपना जीवन देश के लिए बलिदान कर दिया। उन क्रांतिकारियों के नाम पर जात-पात, प्रांतवाद, विचारधारा, राजनीतिक हित आदि के आधार पर विभाजन कर दिया गया। इस विभाजन का एक मुख्य कारण देश पर सत्ता करने वाला एक दल भी रहा। जिसने केवल गांधी-नेहरू को देश के लिए संघर्ष करने वाला प्रदर्शित किया। जिससे यह भ्रान्ति पैदा हो गई हैं कि देश को स्वतंत्रता गांधी जी/कांग्रेस ने दिलाई? वीर सावरकर भी स्वाधीनता के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले, सर्वस्व समर्पित करने वाले असंख्य क्रांतिकारियों, अमर हुतात्माओं में से एक थे जिनकी पूर्ण रूप से उपेक्षा की गई।
<span;>वीर सावरकर ने अपनी कहानी में अंडमान की यात्राओं पर प्रकाश डालते हुए कोल्हू में बैल की तरह जुत कर तेल पेरने का बड़ा ही सजीव वर्णन किया है | उन्होंने लिखा है –
<span;>”हमें तेल का कोल्हू चलने का काम सोंपा गया जो बेल के ही योग्य माना जाता है | जेल में सबसे कठिन काम कोल्हू चलाना ही था | सवेरे उठते ही लंगोटी पहनकर कमरे में बंद होना तथा सांय तक कोल्हू का डंडा हाथ से घुमाते रहना | कोल्हू में नारियल की गरी पड़ते ही वः इतना भारी चलने लगता की हृदय पुष्ट शरीर के व्यक्ति भी उसकी बीस फेरियां करते रोने लग जाते | राजनीतिक कैदियों का स्वास्थ्य खराब हो या भला, ये सब सख्त काम उन्हें दिए ही जाते थे | चिकित्सा शास्त्र भी इस प्रकार साम्राज्यवादियों के हाथ की कठपुतली हो गया | सवेरे दस बजे तक लगातार चक्कर लगाने से श्वास भारी हो जाता और प्रायः सभी को चक्कर आ जाता या कोई बेहोश हो जाते | दोपहर का भोजन आते ही दरवाजा खुल पड़ता, बंदी थाली भर लेता और अंदर जाता की दरवाजा बंद |

“यदि इस बीच कोई अभागा केडी चेष्टा करता की हाथ पैर धोले या बदन पर थोड़ी धूप लगा ले तो नम्बरदार का पारा चढ़ जाता | वह मा बहन की गालियाँ देनी शुरू कर देता था | हाथ धोने का पानी नहीं मिलता था, पीने के पानी के लिए तो नम्बरदार के सैंकड़ों निहार करने पड़ते थे | कोल्हू को चलाते चलाते पसीने से तर हो जाते, प्यास लग जाती | पानी मांगते तो पानी वाला पानी नहीं देता था | यदि कहीं से उसे एकाध चुटकी तम्बाकू की दे दी तो अच्छी बात होती , नहीं तो उलटी शिकायत होती की ये पानी बेकार बहाते हैं जो जेल में एक बड़ा भारी जुर्म होता | यदि किसी ने जमादार से शिकायत की तो वः गुस्से में कह उठता – ” दो कटोरी पानी देने का हुक्म है , तुम तो तीन पि गया | और पानी क्या तुम्हारे बाप के यहाँ से आएगा ? ” नहाने की तो कल्पना करना ही अपराध था | हां , वर्षा हो तो भले नाहा लें | ” केवल पानी ही नहीं अपितु ” भोजन की भी वाही स्थिति थी | खाना देकर जमादार कोठरी बंद कर देता और कुछ देर में हल्ला करने लगता – ” बैठो मत , शाम को तेल पूरा हो नही तो पीते जाओगे | और जो सजा मिलेगी सो अलग | ” इसे वातावरण में बंदियों को खाना निगलना भी कठिन हो जाता | बहुत से ऐसा करते की मुंह में कौर रख लिया और कोल्हू चलाने लगे | कोल्हू पेरते पेरते , थालियों में पसीना टपकाते टपकाते , कौर को उठाकर मुंह में भरकर निगलते कोल्हू पेरते रहते | ” १०० में से एकाध ऐसे थे जो दिन भर कोल्हू में जुतकर तीस पौंड तेल निकाल पाते | जो कोल्हू चलाते चलाते थककर हाय हाय कर दते उन पर जमादार और वार्डन की मार पड़ती | तेल पूरा न होने पर उपर से थप्पड़ पड़ रहे हैं , आँखों में आंसुओं की धारा बह रही है | ”

वीर सावरकर जानते थे कि यह अत्याचार क्रांतिकारियों पर अंग्रेजों द्वारा इसलिए किया जा रहा है ताकि वे मानसिक रूप से विक्षिप्त होकर या तो पागल हो जाये अथवा मर जाये। अंग्रेजों की छदम न्यायप्रियता का यह साक्षात उदहारण था। इतिहास फिर से दोहरा रहा था। औरंगजेब ने भी कभी अंग्रेजों के समान शिवाजी को कैद कर समाप्त करने का सोचा था ताकि शिवजी दक्कन का कभी दोबारा मुँह न देख सके। जन्मभूमि से इतनी दूर जाकर इस प्रकार से मरना वीर सावरकर को किसी भी प्रकार से स्वीकार्य नहीं था। उन्हें लगा की उनका जीवन इसी प्रकार से नष्ट हो जायेगा। मातृभूमि की सेवा वह कभी नहीं कर पाएंगे। उन्होंने साम,दाम, दंड और भेद की वही नीति अपनाई जो वीर शिवाजी ने औरंगज़ेब की कैद में अपनाई थी। उन्होंने अंग्रेजों से क्षमा मांग कर मातृभूमि जाने का प्रस्ताव उनके समक्ष रखा। अंग्रेज उनकी कूटनीति का शिकार बन गए। वीर सावरकर को सशर्त रिहा कर दिया गया। अपने निर्वासित जीवन में उन्हें न रत्नागिरी से बाहर नहीं निकलना था और न ही किसी भी प्रकार की क्रांतिकारी गतिविधि में भाग लेना था। वीर सावरकर ने अवसर का समुचित लाभ उठाया। उन्होंने अण्डेमान जेल के कैदियों के अधिकारों के लिए आंदोलन किया। उससे भी बढ़कर उन्होंने छुआछूत रूपी अन्धविश्वास के विरोध में आंदोलन चलाया। वीर सावरकर ने पतित पावन मंदिर की स्थापना की जिसमें बिना किसी भेदभाव के ब्राह्मण से लेकर शूद्र सभी को प्रवेश करने की अनुमति थी। सामूहिक भोज का आयोजन किया जिसमें शूद्रों के हाथ से ब्राह्मण भोजन ग्रहण करते थे। दलित बच्चों को जनेऊ धारण करवाने से लेकर गायत्री मंत्र की शिक्षा दी। रत्नागिरि में वीर सावरकर ने छुआछूत रूपी अभिशाप को समाप्त करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली आंदोलन किया। इसके साथ साथ जनचेतना के लिए उनका लेखन कार्य अविरल चलता रहा।
खेद हैं कि वीर सावरकर के इस चिंतन, श्रम और पुरुषार्थ की अनदेखी कर साम्यवादी इतिहासकार अपनी आदत के मुताबिक उन्हें गद्दार कहकर अपमानित करते हैं। उनकी माफ़ी मांगने की कूटनीति को कायरता के रूप में प्रेषित करते है। धिक्कार है ऐसे पक्षपाती लेखकों को और ऐसे राजनेताओं को जो वीर सावरकर के महान कार्यों की उपेक्षा कर अपने राजनीतिक हितों को साधने में लगे हुए हैं। उन्हें गद्दार कहते है। वीर सावरकर गद्दार नहीं अपितु स्वाभिमानी थे। देशभक्त थे। धर्मयोद्धा थे। अनेक क्रांतिकारियों के मार्गदर्शक थे। कूटनीतिज्ञ थे। प्रबुद्ध लेखक थे। आत्मस्वाभिमानी थे। समाज सुधारक थे।
आईये आज वीर सावरकर की जयंती पर हम लोग यह प्राण करे कि हम भी उनके समान छुआछूत मिटाने, धर्म रक्षा, देश भक्ति के लिए पुरुषार्थ करेंगे।
हमारे क्रांतिकारी महान है गद्दार कभी नहीं। गद्दार तो वो है जो उनकी आलोचना करते है।
VeerSavarkar

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