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मातृभाषा स्वरूप और चुनौतियां  

कश्मीरी मातृभाषा स्वरूप और चुनौतियां 

डॉ० शिबन कृष्ण रैणा

1961 की जनगणना के अनुसार कश्मीरी भाषियों की कुल संख्या 19,37818 थी जो 1971 में बढ़कर 19,56115 तक पहुंच गई।

1981 में हुई जनगणना के अनुसार कश्मीरी 30,76398 व्यक्तियों की भाषा थी। (1991 में जनगणना नहीं हुयी) ताज़ा जानकारी के अनुसार इस समय कश्मीरी भाषियों की कुल संख्या (विस्थापित कश्मीरी जन-समुदाय को सम्मिलित कर) अनुमानतः 56,00000 के आसपास है।

कश्मीरी पण्डितों को अपने वतन से विस्थापित हुए अब लगभग 33 वर्ष हो चले हैं।इन्हें वादी में वापस ले जाने,वापस बसाने और इनमें आत्मविश्वास जगाने के अनेक प्रयास हर स्तर पर हुए हैं और अब भी हो रहे हैं। दरअसल,दिक्कत यह है कि तैन्नीस  वर्षों की इस लम्बी अवधि के दौरान जो विस्थापित पंडित घर छोड़कर देश के विभिन्न शहरों में रहने लग गए, उन्होंने छोटी-मोटी नौकरियां कर लीं,लाचारी में पुश्तैनी घर छोड़कर दूसरी जगहों पर नये घर बना लिए,उनके बच्चे स्कूल-कालेजों में पढने लग गए आदि।इस बीच बड़े-बुज़ुर्ग या तो गुजर गये या फिर इस काबिल नहीं रहे कि वे वापस अपने घर जा सकें।विस्थापन के समय जो बालक चार-पांच साल का था, वह देखत-देखते लगभग तीस का हो गया।अपने छूटे/बिछुड़े  वतन का न तो  उसे कोई मोह (गम)रहा और न ही वापस जाने की कोई ख्वाहिश ।वह अपने “वर्तमान” से ही खुश है जिसको बनाने में उसने और उसके माँ-बाप ने जाने कितनी तकलीफें झेलीं हैं! कश्मीरी विस्थापितों के लिए वर्तमान सरकार यदि कोई कार्य-योजना अमल में लाती है, तो उक्त दिक्कतों का सामना उसे करना पड़ सकता है।
समाज-विज्ञानियों का कहना है कि विस्थापन की त्रासदी ने कश्मीरी पंडितों को बेघर ही नहीं किया है अपितु उनके सामाजिक सरोकारों को भी आहत कर दिया  है। अपने रीति-रिवाज भले ही वे भूल न रहे हों, पर अपनी भाषा वे भूल रहे हैं और इसी तरह जवान हो रही पीढ़ी के लिए विवाह-योग्य वर ढूँढ पाना  भी अब उनके लिए अपेक्षाकृत अधिक कठिन हो गया है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले 30 वर्षों के दौरान कश्मीरी-पंडित-समुदाय में जितने अन्तर्जातीय विवाह हुए, उतने शायद पहले कभी नहीं हुए थे।कुल मिलकर, विस्थापन और बिखराव की त्रासदी ने समूची पंडित-जाति को संक्रमण के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। कौन नहीं जानता कि अमन-चैन में परम्पराएँ  सुरक्षित रह पाती हैं,अशांति-विस्थापन में उनका घुलनशील तथा समावेशी हो जाना स्वाभाविक है।

मुझ से मित्र अक्सर यह पूछते हैं कि कश्मीर से जो पंडित बाहर आ गये हैं,वे घरों में ज्यादातर हिंदी ही क्यों बोलते हैं?अपनी मादरी ज़बान कश्मीरी क्यों नहीं बोलते?जैसे बंगला या मराठी या फिर तमिल भाषी अपने घरों में अपनी-अपनी भाषाएँ बोलते हैं।

मैं ने कहीं पढ़ा है कि भाषा की परम्परा और अस्मिता को सुरक्षित रखने में उस भाषा के बोलने वालों का एक ही जगह पर रहना बहुत ज़रूरी है। सामुदायिकता का भाव भाषा को मजबूती प्रदान करता है और इस तरह से उसका प्रचार-प्रसार अबाधित रहता है।समुदाय के बिखराव/टूटन से भाषा/साहित्य को नुक्सान तो होता ही है,कालान्तर में उसके बोलने वालों की संख्या भी घटती चली जाती है। कश्मीर में जो रह रहे हैं,वे तो यह भाषा बोल लेते हैं (क्योंकि वे एक ही जगह पर रह रहे हैं)और जो खदेड़े गये अथवा बिखर गए उनके लिए इस भाषा को जीवत रखने के उपायों से अपने अस्तित्व को जीवित रखना शायद ज्यादा जरूरी है। अमन/चैन में ही भाषा-साहित्य पनपता है,अशांति/विस्थापन में उसका अधोमुखी अथवा तार-तार हो जाना स्वाभाविक है।

डॉ० शिबन कृष्ण रैणा

सम्प्रति दुबई में.

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