राष्ट्रवाद को स्वामी दयानंद ने दी नई परिभाषा

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राष्ट्रवाद पर स्वामी दयानन्द का चिंतन

#डॉविवेकआर्य

स्वामी दयानन्द के राष्ट्रवादी चिंतन से हम इस लेख के माध्यम से अवगत करवाएंगे।
अंग्रेजी राज में भारतीयों का स्वाभिमान लुप्त हो गया था। स्वदेशवासी स्वदेशवासी पर अत्याचार करने पर उतारू था। स्वामी दयानन्द ने सर्वप्रथम देशवासियों को मनुष्य की बनने की प्रेरणा दी।
स्वामी जी सत्यार्थ प्रकाश में मनुष्य की परिभाषा करते हुए लिखते है-

“मनुष्य उसी को कहना कि मनन-शील होकर स्वात्मवत् अन्यों के सुख-दुःख और हानि लाभ को समझे, अन्यायकारी बलवान से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे। इतना ही नहीं किन्तु अपने सर्व सामर्थ्य से धर्मात्माओं की चाहे वे महा अनाथ, निर्बल और गुणरहित क्यों न हो। उनकी रक्षा, उन्नति, प्रिय आचरण; और अधर्मी चाहे चक्रवर्ती सनाथ महाबलवान भी हो तथापि उसका नाश, अवनति और अप्रियाचरण सदा किया करे। इस काम में चाहे उसको कितना ही दारुण दुःख प्राप्त हो, चाहे प्राण भी चले जावें परंतु इस मनुष्य रूपी धर्म से पृथक कभी न होवे। ”
स्वामी दयानन्द ने स्वदेशीय राज्य सर्वोपरि और उत्तम बताया। उन्होंने लिखा-

अब अभागोदय से और आर्यों के आलस्य, प्रमाद, परस्पर के विरोध से अन्य देशों के राज्य करने की तो कथा ही क्या कहनी किन्तु आर्यावर्त में भी आर्यों का अखंड, स्वतंत्र, स्वाधीन, निर्भय भारत इस समय नहीं है।जो कुछ है सो कुछ भी विदेशियों के पादाक्रांत हो रहा है। कुछ थोड़े राज्य स्वतंत्र हैं। दुर्दिन जब आता है तब देशवासियों को अनेक प्रकार से दुःख भोगने पड़ते हैं। कोई कितना ही करे किन्तु जो स्वदेशीय राज्य होता है, वह सर्वोपरि उत्तम होता है।
विदेशियों का राज्य कभी भी पूर्ण सुखदायक नहीं है। स्वामी जी लिखते है कि मत-मतान्तर के आग्रह रहित, अपने और पराये का पक्षपात शुन्य, प्रजा पर पिता-माता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं हैं। विदेशियों के आर्यावर्त में राज्य होने का कारण आपस की फूट, मतभेद, ब्रह्मचर्य का सेवन न करना, विद्या न पढ़ना-पढ़ाना, बाल्यावस्था में अस्वयंवर विवाह, विषयासक्ति कुलक्षण, वेद-विद्या का कुप्रचार आदि कुकर्म है।
स्वामी जी आगे लिखते है कि जब आपस में भाई भाई लड़ते है तभी तीसरा विदेशी आकर पंच बन बैठता है। जब से विदेशी मांसाहारी इस देश में आके गौ आदि पशुओं के मारने वाले मद्यपानी राज्याधिकारी हुए हैं। तब से आर्यों के दुःख की बढ़ती होती जाती हैं।
आपस की फूट से कौरव पाण्डव और यादव का सत्यानाश हो गया। परन्तु अब तक भी वही रोग पीछे लगा है। न जाने यह भयंकर राक्षस कभी छूटेगा या आर्यों को सब सुखों से छुड़ा कर दुःख सागर में डुबा मारेगा? (सत्यार्थप्रकाश)
पारस मणि पत्थर सुना जाता है, वह बात झूठी है। परन्तु आर्यावर्त्त देश ही सच्चा पारस मणि है कि जिसको लोह रूपी दरिद्र विदेशी छूते के साथ ही सुवर्ण अर्थात् धनाढ्य हो जाते हैं। (सत्यार्थप्रकाश)
जब लोग वर्तमान और भविष्यत में उन्नतशील नहीं होते तब लोग आर्यावर्त्त और अन्य देशस्य मनुष्यों की बुद्धि नहीं होती। जब बुद्धि के कारण वेदादि सत्य शास्त्रों का पठनपाठन, ब्रह्मचर्य्यादि आश्रमों के यथावत् अनुष्ठान, सत्योपदेश होते हैं तभी देशोन्नति होती है। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ७)
आर्यों के राज्य के लाभों को गिनाते हुए स्वामी जी सत्यार्थ प्रकाश में लिखते है कि-
“एक गाय के शरीर से दूध, घी, बैल, गाय उत्पन्न होते से एक पीढ़ी में चार लाख पचहत्तर हज़ार छः सौ मनुष्यों को सुख पहुँचता है। वैसे पशुओं को न मारें, न मारने दे। देखो! जब आर्यों का राज्य था तब ये महोपकारक गाय आदि पशु नहीं मारे जाते थे।तभी आर्यवर्त अन्य भूगोल देशों में मनुष्य आदि प्राणी बड़े आनंद में वर्तते थे, क्योंकि दूध, घी, बैल आदि पशुओं की बहुताई से अन्न, रस पुष्कल प्राप्त होते थे।”
स्वामी जी भारतीयों को यूरोपियन का स्वदेश प्रेम सिखाते हुए लिखते है-
“देखो यूरोपियन अपने देश के बने हुए जूते को कचहरी और कार्यालय में जाने देते हैं इस देश के जूते नहीं। इतने ही में समझ लो कि अपने देश के बने जूतों की भी जितनी मान प्रतिष्ठा करते हैं, उतनी भी अन्य देशस्थ मनुष्यों की नहीं करते।”
“देखो, सौ वर्ष से कुछ ऊपर इस देश में आये यूरोपीयनों को हुए, और आज तक ये लोग मोटे कपड़े आदि पहनते हैं। जैसा कि अपने स्वदेश में पहनते थे,परंतु उन्होंने अपना चाल चलन नहीं छोड़ा। और तुम में से बहुत लोगों ने उनका अनुसरण कर लिया। इसी से तुम निर्बुद्धि और वे बुद्धिमान ठहरते हैं।”
स्वामी जी निष्पक्ष होने का विचार प्रकट करते हुए सत्यार्थ प्रकाश में लिखते है-
“यद्यपि मैं आर्यावर्त देश में उत्पन्न हुआ और बसता हूं तथापि जैसे इसके मत-मतान्तरों की झूठी बातों का पक्षपात किये बिना यथातथ्य प्रकाश करता हूं। वैसा ही बर्ताव दूसरे देश के मतवालों के साथ करता हूं। मेरा मनुष्यों की उन्नति का व्यवहार जैसा स्वदेशियों के साथ है वैसा ही विदेशियों के है। ”
आर्याभिविनय में स्वामी दयानंद स्पष्ट रूप से लिखते है-
-अन्य देशवासी राजा हमारे देश में कभी न हो तथा हम कभी पराधीन न हो।
-हे कृपासिंधु भगवन ! हम पर सहायता करो जिससे सुनीति युक्त होके हमारा स्वराज्य अत्यंत बढ़े।
स्वामी दयानन्द राजा के उच्च आचरण पर जोर देते हुए सत्यार्थ प्रकाश में लिखते है-
“जैसा राजा होता है वैसी ही उसकी प्रजा होती है इसलिए राजा और राजपुरुषों को अति उचित है कि कभी दुष्टाचार न करें किन्तु सब दिन धर्म न्याय से बर्तकर सबके सुधार के दृष्टा बने।”
कुछ लोग अनेकता में एकता की और विविधता में सुंदरता की बात कर रहे थे। स्वामी दयानन्द का चिंतन उसके बिलकुल विपरीत है।
स्वामी जी 1877 में एकता परिषद में प्रस्ताव में कहते है-
“हम भारतवासी सब परस्पर एकमत हो कर एक ही रीती से देश का सुधार करें तो आशा है भारत देश सुधर जायेगा। किन्तु कतिपय मौलिक मंतव्य में मतभेद होने के कारण सब एकता सूत्र में आबद्ध नहीं हो सके।”
सत्यार्थप्रकाश उत्तरार्द्ध की अनुभूमिका में स्वामी जी लिखते है कि
“जब तक इस मनुष्य जाति में परस्पर मिथ्यामतान्तर का विरुद्ध वाद न छूटेगा तब तक अन्योऽन्य को आनन्द न होगा। ”
स्वामी दयानंद से जब पूछा गया कि भारत का पूर्ण हित कब होगा? यहां जातीय उन्नति कब होगी?
स्वामी जी उत्तर देते है- एक धर्म, एक भाषा और एक लक्ष्य बनाये बिना भारत का पूर्ण हित और जातीय उन्नति का होना दुष्कर कार्य है। सब उन्नतियों का केंद्र स्थान ऐक्य हैं।
श्रीमद्ददयानंदप्रकाश में स्वामी जी का विचार इस प्रकार से मिलता है।
“जहाँ भाषा-भाव और भेष में एकता आ जाय वहां सागर में नदियों की भांति सारे सुख एक एक करके प्रवेश करने लग जाते हैं। मैं चाहता हूं देश के राजे-महाराजे अपने शासन में सुधार और संशोधन करें। अपने राज्यों में धर्म, भाषा और भावों में एकता उत्पन्न कर दें। फिर भारत में आप ही आप सुधार हो जायेगा।”
स्वदेशी भाषा को एकता का सूत्र मानने वाले स्वामी दयानन्द से जब वेदों का अन्य भाषा में अनुवाद रूपी प्रश्न पूछा गया तो स्वामी जी कहते है-
“अनुवाद तो विदेशियों के लिए हुआ करता है। नागरी के अक्षर थोड़े दिनों में सीखे जा सकते हैं। आर्यभाषा का सीखना कोई कठिन नाम नहीं। फारसी और अरबी के शब्दों को छोड़कर, ब्रह्मावर्त की सभ्य भाषा ही आर्यभाषा है। यह अति कोमल और सुगम है। जो इस देश में उत्पन्न होकर अपनी भाषा को सिखने में कोई भी परिश्रम नहीं करता, उससे और आशा क्या की जा सकती है? उसमें धर्म लग्न है, इसका भी क्या प्रमाण है?आप तो अनुवाद की सम्मति देते है परंतु दयानंद के नेत्र तो वह दिन देखना चाहते हैं, जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक और अटक से कटक तक नागरी अक्षरों का ही प्रचार होगा। मैंने आर्यावर्त में भाषा का एक्य संपादन करने के लिये ही अपने सकलग्रन्थ आर्यभाषा में लिखे और सम्पादित किये है। ”
स्वामी जी का मूल चिंतन वेदों पर आधारित था। वेदों में अनेक मन्त्रों में राष्ट्र एकता एवं स्वाधीनता का सन्देश मिलता हैं।
वेदों में स्वदेशी राज्य का सन्देश –
मनुष्यों को चाहिए कि पुरुषार्थ करने से पराधीनता छुड़ाके स्वाधीनता को निरंतर स्वीकार करे। – यजुर्वेद १५/५
इस संसार में किसी मनुष्यों को विद्या के प्रकाश का अभ्यास, अपनी स्वतंत्रता और सब प्रकार से अपने कामों की उन्नति को न छोड़ना चाहिए। – यजुर्वेद ५/ ४३
राजपुरुषों को योग्य है कि भोजन, वस्त्र और खाने पीने के पदार्थों से शरीर के बल को उन्नति देवें, किन्तु व्यभिचार आदि दोषों में कभी प्रवृत न होवें। -यजुर्वेद ८/३९
जिस देश में पूर्ण विद्या वाले राजकर्मचारी हों वहां सब की एक मती होकर अत्यंत सुख बढ़े। – यजुर्वेद ३३/६८
राजा प्रजाजनों को चाहिए कि विद्वानों की सभा में जाकर नित्य उपदेश सुनें जिससे सब करने और न करने योग्य विषयों का बोध हो। – ऋग्वेद १/४७/१०
लाला लाजपत राय ने स्वामी दयानंद के राष्ट्रवाद रूपी चिंतन पर गंभीर एवं अति महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए अपनी पुस्तक आर्य समाज में लिखा है-
“स्वामी दयानन्द का एक एक शब्द चाहे उसे सत्यार्थ प्रकाश में पढ़िए, चाहे आर्याभिविनय में अवलोकन कीजिये, चाहे वेद भाष्य में देखिये, राजनैतिक स्वाधीनता की अभिलाषा से परिपूर्ण है। स्वामी दयानंद पूर्ण देशभक्त थे और जब कभी इस देश की स्वाधीनता का इतिहास लिखा जायेगा तो स्वामी जी का नाम उन महापुरुषों की प्रथम श्रेणी में अंकित होगा जिन्होंने उन्नीसवीं शताब्दी में इस देश को स्वतंत्र करवाने की नींव डाली। ”

यही 1947 के पश्चात वेदों पर आधारित और स्वामी दयानन्द द्वारा प्रतिपादित एकता का सन्देश हमारे संविधान में अपनाया जाता तो आज हमारे देश में जितनी भी समस्याएं हैं जैसे भाषावाद, प्रांतवाद, मतवाद, परम्परावाद, जातिवाद, क्षेत्रियवाद आदि का निराकरण कब का हो गया होता।

स्वामी दयानन्द के राष्ट्रवाद रूपी चिंतन को अपनाया जाना चाहिए। जिससे भारत देश फिर से संसार में शिरोमणि कहला सके। क्योंकि मनुष्य जन्म का होना सत्यासत्य के निर्णय करने कराने के लिए है, न कि वादविवाद विरोध करने कराने के लिए।- स्वामी दयानन्द

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