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आज का चिंतन इतिहास के पन्नों से

आर्ष विद्या , सुधारक व क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र रहे गुरुकुल महाविद्यालय सिकंदराबाद का इतिहास*]

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लेखक आर्य सागर खारी 🖋️

गुरुकुल महाविद्यालय सिकंदराबाद की स्थापना सन् 1898 आर्ष जगत व दर्शनों के उद्भट्ट मूर्धन्य विद्वान स्वामी दर्शनानंद ने की थी। जिनका पूर्व नाम पंडित कृपाराम था।उनके दार्शनिक ज्ञान का डंका जालंधर से लेकर काशी तक बजता था |इस गुरुकुल में अध्ययन प्राप्त अनेक आचार्य, स्नातकों विद्वानों शास्त्रियों पुरोहितों ने देश देशांतर में भारतीय ज्ञान विज्ञान मेधा का प्रचार प्रसार किया अनेकों क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र भी है यह गुरुकुल रहा है.. नेपाल की राजशाही के विरुद्ध क्रांति का वैचारिक सूत्रपात इसी गुरुकुल से हुआ। पंडित सुक्राज शास्त्री उसके अगुवा रहे जिन्हें अखंड आर्यावर्त का हिस्सा रहे नेपाल में वैदिक धर्म को पुनः स्थापित करने करने के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया।

सांख्य दर्शन का इतिहास जैसा कालजयी ग्रंथ लिखने वाले ,कौटिल्य अर्थशास्त्र जैसे जटिल ग्रंथ के व्याख्याकार शहीदे- आजम -भगत सिंह के गुरु महान दार्शनिक आचार्य उदयवीर शास्त्री ने भी इसी गुरुकुल में अपना प्राथमिक अध्ययन किया था|आजादी से पूर्व लाहौर की क्रांतिकारी गतिविधियों इस गुरुकुल से जुड़ी हुई रहती थी। इस गुरुकुल से जुड़े हुए ऐसे अनेक ऐतिहासिक संस्कृत प्रसंग तथ्य है जिनमें अधिकांश तो काल के प्रवाह में धूमिल हो गए हैं। जो उपलब्ध है वह मानसिक श्रम साध्य है। गहन अनुसंधान विवेचना का विषय है।

इस संस्थान के आद्य शिल्पी स्वामी दर्शनानंद जी के मन में इस गुरुकुल की स्थापना का विचार 1895-96 के अपने बिजनौर प्रवास में आया था। स्वामी दर्शनानंद ने गुरुकुल स्थापना हेतु इस भूमि परिक्षेत्र को ही को ही क्यों चुना? यह भी विचारणीय विषय है इसका उत्तर हमें 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में मिलता है 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में दनकौर सिकंदराबाद दादरी क परिक्षेत्र में अंग्रेजों के विरुद्ध जबरदस्त क्रांति का सूत्रपात हुआ स्थानीय किसानों ने जमीदारों ने अंग्रेजों के दांत खट्टे किए सिकंदराबाद दनकौर के सैकड़ो गांव के असंख्य बलिदानी पूर्वजों ने जिनमें अधिकांश गुर्जर समुदाय से संबंध रखते थे अपना बलिदान दिया उनके रक्त से यह भूमि धन्य हो गई थी ऐसे में स्वामी जी ने इस भूमि को ही अपने मंतव्य की सिद्धि के लिए उपयुक्त जाना।प्रचंड पुरुषार्थी अद्भुत इच्छा शक्ति के धनी स्वामी जी ने अपने संकल्प को 3 वर्षों के दौरान ही 1899 में गंगा जमुना के दोआबे की पवित्र भूमि महाभारत कालीन नगरी दनकौर के निकट दनकौर रेलवे स्टेशन के पास आज के मंडी श्याम नगर कस्बे में गुरुकुल की स्थापना कर पूर्ण किया। गुरुकुल की स्थापना होते ही स्थानीय किसानों के सहयोग पंडित जीवाराम जी श्री मधुसूदन जी पंडित इंदु शर्मा पंडित श्याम लाल जी आचार्य नरदेव जी शास्त्री पंडित शंकर दत्त जी व पंडित मुरारीलाल शर्मा जैसी महान विभूतियों के त्याग तप से गुरुकुल समूचे ब्रिटिश भारत में वैदिक शिक्षा व सुधारात्मक राजनीतिक व क्रांतिकारी गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र बन गया। स्वामी दर्शनानंद ने दर्जनों गुरुकुलों की स्थापना समूचे भारतवर्ष में की लेकिन उनके द्वारा स्थापित गुरुकुल सिकंदराबाद उनका प्रथम गुरुकुल ही नहीं महाभारत काल के बाद महर्षि दयानंद प्रौक्त आर्ष पद्धति से संचालित ब्रिटिश भारत का सर्वप्रथम गुरुकुल था। स्वामी श्रद्धानंद द्वारा स्थापित गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना गुरुकुल सिकंदराबाद के पश्चात ही हुई। गुरुकुल सिकंदराबाद को आधुनिक भारत का प्रथम गुरुकुल होने का सौभाग्य प्राप्त है। स्वामी दर्शनानंद यह मानते थे गुरुकुल के स्थापित होने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है प्रथम आचार्य दूसरे ब्रह्मचारी तीसरी गौ। स्वामी जी यह मानते थे गाय का दूध पीने वाले ब्रह्मचारी कुछ बने बगैर रह ही नहीं सकते। गुरुकुल में दुधारू गौ से युक्त गौशाला की स्थापना की गई। स्वामी जी ने अपनी समस्त गतिविधियों का केंद्र बनाकर इस गुरुकुल को भारत वर्ष की प्रसिद्ध संस्था बना दिया। तिरुपति शैली में स्वामी जी ने इस गुरुकुल में उपदेश श्रेणी की भी स्थापना की ।जिसमें आर्य समाज के उपदेशको तैयार किया जाता था इस गुरुकुल से 100 से अधिक उपदेश निकले जिन्होंने पूरे भारतवर्ष में वैदिक धर्म आर्य समाज की मान्यताओं का प्रचार किया सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन किया। स्वतंत्रता आंदोलन में नई चेतना प्रदान की। उपदेशको के प्रशिक्षण का कार्यभार शास्त्रार्थ महारथी पंडित मुरारी लाल शर्मा को सोपा गया । जिनकी कृति भजन पचासा आज भी भजन उपदेशको में सर्वाधिक प्रसिद्ध है। पंडित जीवाराम शर्मा उपाध्याय जैसे संस्कृत भाषा के महानतम स्कॉलर भी इस गुरुकुल में सेवारत रहे उनकी पुस्तक संस्कृत शिक्षा आज भी बेजोड़ मानी जाती है। मूलतः आंध्र प्रदेश निवासी दक्षिण भारतीय पंडित नरदेव शास्त्री वेद तीर्थ को भी इस गुरुकुल का सानिध्य मिला वह स्वतंत्रता सेनानी संस्कृत वेद के मूर्धन्य विद्वान व आजादी के बाद की उत्तर प्रदेश राज्य की प्रथम विधानसभा के 1952 से 1957 तक सदस्य रहे। गुरुकुल महाविद्यालय सिकंदराबाद ऐसे असंख्य विद्वानों कर्मयोगी वैदिक संस्कृति के आराध्यको की यह कर्म स्थली रहा है।
अपनी स्थापना के एक-दो वर्ष पश्चात ही इस गुरुकुल से उर्दू का प्रसिद्ध मासिक गुरुकुल समाचार पत्र भी निकलता था गुरुकुल की एक स्वतंत्र प्रेस थी। उसे अखबार में स्वामी दर्शनानंद जी के विविध दार्शनिक विषयों पर लेख तथा क्रांतिकारी तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भीक लेख प्रकाशित होते थे। यहां उल्लेखनीय होगा कि गुरुकुल ना केवल आर्ष विद्या के माध्यम से प्राचीन वैदिक संस्कृति के वृक्ष को सिंचित कर रहा था अपितु पराधीन भारत की बेडीयो को काटने के लिए भी पूरी वैचारिक उग्रता से तत्पर था।

यह भी उल्लेखनीय होगा वर्ष 1905 में ही आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश ने इसे अपने हाथों में ले लिया ।अब इस संस्था का स्वरूप प्रान्तीय हो गया ।न केवल प्रतिनिधि सभा का भी संरक्षण मिलने लगा अनेक वर्षों तक उत्तर प्रदेश आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश का यह मुख्य कार्यालय रहा।
1916 की आर्य डायरेक्टरी के अनुसार सन् 1915 में इस गुरुकुल में 55 ब्रह्मचारी थे।

स्वामी दर्शनानंद जी अपने जीवन के अंतिम दिवसों में आमश्य रोग से ग्रस्त थे तो वह इसी गुरुकुल में रहे स्थानीय लोग बड़े प्रेम से उनकी सेवा करते थे ।बाद में उनके एक भक्त श्री डॉक्टर कृष्णप्रसाद उन्हें हाथरस ले गए।

गौतम बुध नगर की दो दिवंगत शख्सियत आदरणीय रामचंद्र विकल जी( पूर्व सांसद )आदरणीय तेज सिंह मंत्री जी उत्तर प्रदेश सरकार, इसी गुरुकुल की छत्रछाया में रहकर वैचारिक रूप से परिपक्व व उनका राजनीतिक चिंतन विकसित हुआ था| दोनों महानुभाव आर्य समाजी , गुरुकुल की संचालन समिति से लंबे समय तक जुड़े रहे| आर्य समाजी व महान किसान नेता देश के पूर्व प्रधानमंत्री आदरणीय चौधरी चरण सिंह जी भी स्वामी भीष्म जी के माध्यम से इस गुरुकुल से जुड़े रहे… ।क्रांति नायक दादा गुरु स्वामी भीष्म जी का इस गुरुकुल से अनूठा वैचारिक भावनात्मक लगाव था स्वामी भीष्म जी ने उपदेशक श्रेणी में शिक्षक के रूप में इस गुरुकुल की बहुत सेवा की थी इस गुरुकुल के छात्र है व स्वामी भीष्म जी के शिष्य रहे स्वामी रामेश्वरानंद आजादी के पश्चात करनाल से सांसद चुने गए| आदरणीय रामचंद्र विकल जी भी स्वामी भीष्म जी के ही शिष्य थे |गुरुकुल महाविद्यालय सिकंदराबाद का गौरव अंगूठा अपूर्व है। इस संस्था का बलिदानी राष्ट्रभक्त चरित्र रहा है। इस संस्था के आचार्य जनों व शिष्यों ने इस संस्था के गौरव को बढ़ाया है। अपनी स्थापना से लेकर आधी शताब्दी तक गुरुकुल अपने चरम उत्कर्ष पर रहा इस दौरान असंख्य ब्रह्मचारियों विद्यार्थियों ने इसमें विद्या अर्जित की इसमें अर्जित करने वाले अनेकों छात्र स्नातकआगे चलकर प्रख्यात शिक्षाविद साहित्यकार पत्रकार वकील नौकरशाह संस्कृत के स्कॉलर, राजनेता देश की नीतियों के निर्माता बने।

गुरुकुल महाविद्यालय सिकंदराबाद का अतीत स्वर्णिम रहा है हम इस संस्था के उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं।

आर्य सागर खारी ✍✍✍

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