नेपाल के शहीद आर्यवीर शुक्राज शास्त्री जी

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लेखक :- श्रद्धेय स्वामी ओमानंद सरस्वती
पुस्तक :- आर्यसमाज के बलिदान
नेपाल राज्य आर्यराज्य होते हुये भी पौराणिक पाखण्डियों के जाल में फंसा हुआ था । आज तक इसी कारण विजय दशमी के पवित्र पर्व पर हजारों मूक निरपराध भैंसे बकरे आदि प्राणियों की बाल कल्पित मिथ्या पत्थर के देवी देवताओं पर चढ़ाई जाती है । इस वाम मार्ग के नंगे बीभत्स नृत्य से उपासना के पवित्र मन्दिरों में भगवान की पूजा के नाम पर रक्त की धारा बहती है । आर्यसमाज के लिये इस प्रकार के अत्याचार असह्य हैं अतः आर्यसमाज के वीरों ने इस प्रकार के दुष्कृत्य के विरुद्ध नेपाल में भी मोर्चा लेना प्रारम्भ किया । आर्यसमाज से प्रभावित एक नाथ सम्प्रदाय के सन्त स्वामी ब्रह्मनाथ जी थे , जिन का जन्म इस आर्य राज्य नेपाल में हुआ था । वे भारत वर्ष में भी भ्रमणार्थ व तीर्थयात्रा के लिये आते जाते रहते थे । वे आर्यसमाज के सच्चे पवित्र सिद्धान्तों के व्याख्यान सुनकर प्रभावित हुये और आर्यसमाजी बन गये । उन्होंने नेपाली भाषा में सत्यार्थप्रकाश छपवाया किन्तु इस पवित्र ग्रन्थ का भी नेपाल के आर्य राज्य में प्रवेश वर्जित था । अतः क्या करते विवशता थी । तुलसीपुर आर्यसमाज सीमा पर था वहां सभी सत्यार्थप्रकाश रखवा दिये गये , वहां से गुप्त रूप से सत्यार्थ प्रकाश नेपाल राज्य में सर्वत्र प्रसारित कर दिये गये । इस तपस्वी साधु ने प्रेरणा करके अनेक विद्यार्थियों को भारत वर्ष में गुरुकुलों में शिक्षार्थ भेज दिया । उसमें ही पं० शुक्रराज शास्त्री , पं० रायसिंह तथा पं० इन्द्रसेन आदि थे जो स्नातक बनकर नेपाल में प्रचारार्थ गये , वहां उन को क्या क्या कष्ट सहने पड़े इन की सच्ची कथा पं० शुक्रराज जी शास्त्री के वृत्त को पढ़ने से ज्ञात हो जायेगी ।
हुतात्मा पं० शुक्रराज जी शास्त्री जी का जन्म आर्य राज्य नेपाल में हुवा था । नेपाल राज्य की राजधानी काठमांडु में एक ब्राह्मण परिवार में नेपाल के राज्य ज्योतिषी श्री पं० माधवराव जोशी के घर हुवा । श्री जोशी जी ने महर्षि दयानन्द जी महाराज के दर्शन काशी में किये तथा उनके व्याख्यान भी सुने । आप आर्यसमाज से प्रभावित होकर नेपाल पहुंचे । वहां सर्वप्रथम इन्होंने यह दृढनिश्चय किया कि पहिले अपनी सन्तान को आर्यसमाजी बनाकर आर्यसमाज की भेंट चढ़ाना चाहिये । जहां आर्यसमाज का प्रचार पं० माधवराव जो ने नेपाल में प्रारम्भ किया वहां अपने दोनों पुत्रों को गुरुकुल सिकन्दराबाद जिला बुलन्द शहर में शिक्षार्थ प्रविष्ट करा दिया । यह गुरुकुल वीतराग महात्मा स्वामी दर्शनानन्द जी ताकिकशिरोमणि शास्त्रार्थ महारथी ने खोला था । इस निःशुल्क गुरुकुल का स्नातक बनकर आपने नेपाल में प्रचारार्थ जाने से पूर्व लाहौर से पंजाब की शास्त्री परीक्षा उत्तीर्ण की । फिर नेपाल में जाकर आपने अपने प्रचार कार्य से हलचल मचादी , जिसे पुराणी किरानी आदि पाखण्डी कैसे सहन कर सकते थे । आप पंडित थे , धुरन्धर विद्वान् थे , आप ने मूर्तिपूजा मृतकश्राद्ध और अवतारवाद का खण्डन किया , इनके विरुद्ध बोलना नेपाल के राणाओं के राज्य में घोर अपराध था , वहां इन के विरुद्ध कोई जबान नहीं खोल सकता था ।
दोहा- ओ जबां खामोश वरना काट डाली जाएगी । गर करी फर्याद तो बाहर निकाली जाएगी । इसलिए यह वीर विद्वान् उन की क्रूर दृष्टि से कैसे बच सकते थे । किन्तु वैदिक धर्म का यह सच्चा वीर किसी से डरनेवाला नहीं था । उस का कारण पैतृक वीरता के संस्कार ही थे जिनका कुछ परिचय पाठकों के ज्ञानार्थ दिया जाता है । यथार्थ में नेपाल में आर्यसमाज का प्रचार नेपालकेसरी वीरशिरामणि पं० माधवराव जोशी के परिवार के साथ मुख्यरूप से जुड़ा हुआ है । श्री पं० शुक्रराज शास्त्री के पिता श्री माधवराव जोशी का जन्म नेपाल के प्रसिद्ध ज्योतिषी श्रीकंठराज जोशी के घर हुआ धार्मिक परिवार होने के कारण जोशी जी को अपने घर में ही पौराणिक सम्प्रदाय की शिक्षा दीक्षा सहज में मिल गई । जैसा वाम मार्ग का प्रचार मांस मदिरा खुलकर नेपाल में होता है । उसी का प्रचार वे भी करते रहे । फिर भी आत्मा में कुछ पुराने संस्कार थे , उन्हें वहां के सन्तों , महन्तों और पुजारियों के पतित पाखण्ड का जीवन अच्छा नहीं लगा । उनकी काली करतूतों को देखकर उन के मन में घृणा उत्पन्न होने लगी और सच्चे धर्म को जिज्ञासा उन के हृदय मन्दिर में उत्पन्न हुई । माधवराव जी बहुत प्रखर बुद्धि के व्यक्ति थे । उन की सच्ची लग्न ने उन्हें घर से भगा दिया । वे बिना माता पिता की प्राज्ञा के ही जगन्नाथ पुरी पहुंच गये । वे पैदल पटना पहुँचे , वहां से रेल गाड़ी द्वारा पुरी गये । वहां भी धर्म के नाम पर पाखण्ड के दर्शन हुये । वहां से प्रस्थान कर धर्मनगरी काशी में आ विराजे । वहां भी पाखण्डी तिलकधारी पण्डों के दुष्कृत्यों को देखकर निराशा ही बढ़ी । उन दिनों स्वामी दयानन्द जी महाराज की सारे देश में बड़ी ही चर्चा थी । इनका सौभाग्य था कि इन्हें महर्षि दयानन्द के वहां पवित्र दर्शन हो गए । महर्षि दयानन्द के भाषणों को सुनकर ये अत्यन्त प्रभावित हुये कि जीवन का कांटा ही बदल गया । वे सच्चे और पक्के वैदिकधर्मी बन गये । स्वामी जी के पवित्र दर्शनों तथा उपदेशों को सुन एक विशेष उत्साह लेकर अपने देश नेपाल लौट गये ।
श्री माधवराव जी ने महर्षि दयानन्द जी महाराज से शंका समाधान के लिये अनेक प्रश्न , जाति , वर्णव्यवस्था , ईश्वर निराकार है वा साकार , परमेश्वर की प्राप्ति के साधन , यम , नियम , योगसाधन तथा शास्त्र के विरोधादि पर पूछकर शंका समाधान किया और शंका समाधान से सन्तुष्ट होकर और ऋषि भक्त बनकर नेपाल लौटे । जोशी नेपाल के राज पुरोहित थे , उनका बड़ा सम्मान था । वे राजकुमारों को शिक्षा देने में अपना अधिक समय लगाते थे । वे चुस्त और हाजिर जवाब होने से बड़े लोकप्रिय थे । स्वामी दयानन्द जी के निर्वाण वा बलिदान से आपको बहुत बड़ा धक्का लगा । उन्हें अपने वर्तमान जीवन से घृणा और ग्लानि हो गई और वे स्वामी दयानन्द के दर्शनों से पवित्र होकर अपने जीवन में परिवर्तन करने के लिए विवश होगये । उन्हें राजघराने की विलासिता तथा फूट से भी वैराग्य उत्पन्न हुवा और वे अपने भ्राता जी को साथ लेकर पुनः काशी चले गये । काशी नगरो में दो वर्ष तक उनका स्वाध्याय तथा सत्संग चलता रहा । उनकी सत्यार्थप्रकाश पढ़ने की बड़ी प्रबल इच्छा थी । किन्तु सत्यार्थप्रकाश की प्राप्ति उन दिनों दुर्लभ थी । प्रयत्न करने पर भी उनको वहां सत्यार्थप्रकाश नहीं मिल सका ।
सत्यार्थप्रकाश पढ़ने की उनकी इच्छा उस समय अधूरी ही रहगई । वे नेपाल लौटगये । एक दिन एक प्रसिद्ध नेपाली ज्योतिषी ने जोशी जी को अपने घर बुलाया वहां परस्पर बातचीत हो ही रही थी कि अकस्मात् जोशी जी का ध्यान रद्दी के टोकरे पर गया जहां एक फटा हुवा सत्यार्थ प्रकाश पड़ा था । उसे देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । बड़ी प्रतीक्षा के पश्चात् उन्हें मनचाही वस्तु मिल गई । वे उसे देखकर उछल पड़े । सत्यार्थप्रकाश का श्रद्धापूर्वक आद्योपान्त स्वाध्याय करने से वैदिक सिद्धान्तों के यथार्थ ज्ञान से उनकी श्रद्धा और अधिक बढ़ गई । सब शंकायें समाप्त हुई और श्रद्वा ने हृदय में स्थान लिया और आर्यसमाज के प्रचार में जोशी जी जुट गये । परिणाम की कोई चिन्ता नहीं की ” बोले सो अभय वैदिक धर्म का जय ‘ यह निर्भयता का जयघोष ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज की ही देन है । जो आर्यसमाज की छत्र छाया में आया वही निर्भता का अमृतपान कर गया । उन्होंने निर्भय होकर आर्यसमाज के प्रचार की दुन्दुभी सारे नेपाल में बजादी , फिर क्या था नेपाल में सर्वत्र आर्यसमाज की चर्चा होने लगी । आर्यसमाज के विरोधियों ने फिर क्या था , जोशी जी के विरुद्ध प्रधानमन्त्री के कान भरने प्रारम्भ कर दिये । इसी कारण जोशी जी को इन शिकायतों के कारण राजदरबार बुलाया गया । उस समय प्रधानमन्त्री ३ सरकार देव शमशेर जंगबहादुर राणा जी थे । वह जोशी जी के बाल प्रेमी थे । बाल्यकाल के सखा होने से अनेक वर्ष साथ साथ खेले थे । प्रधानमन्त्री ने प्रेम से कहा माधव ! तुम इस आर्यसमाज की गंगा में डुबकी मत लगावो । यदि नहीं माने तो इसमें डूब ही जावोगे । अतः इससे बचो तथा औरों को बचायो । जोशी जी ने उत्तर दिया कि हे देव इस अमृतमयी गंगा में डुबकी लगाने से इस के अमृत भरे जल – कण जो मुख में चले जाते हैं तो बहुत स्वादु वा मधुर लगते हैं । श्रीमान् जी देव तुल्य हैं , श्री महाराज भी स्वयं इस अमृत का पान कर आनन्दित हों तथा प्रजा को भी अमृतपान कराके पुण्य के भागी बनेंगे । श्री महाराज ने जोशी जी के वचन सुनकर उनके विरुद्ध जो अभियोग बना था उससे मुक्त कर दिया । इन के प्रेम तथा उदारभाव के कारण जोशी जी बचे रहे । विरोधियों के षड्यन्त्र सफल नहीं हो सके । किन्तु ३ महाराज चन्द्र शमशेर राणा जी के शासन में फिर विरोधियों को षड्यन्त्र करने का सुअवसर मिल गया ।
तिरस्कार
एक बार शास्त्रार्थ के बहाने जोशी जी को दरबार में बुलाकर खूब मार – पीट की गई और एक तंग कोठड़ी में कैद करके बन्द कर दिया । अन्य आर्यसमाजियों पर भी बड़े अत्याचार किये गये । जोशी जी को मार – पीट के पश्चात् क्षतविक्षत तथा लहुलुहान करके , सिपाहियों से पकड़वाकर उनको सारे नगर में बुरी प्रकार से घुमाया गया । अपने पिता जी की यह दुर्दशा शुक्रराज ने अपनी आँखों से बाल्यकाल में ही देख ली थी । इस भयंकर दृश्य ने बालक के सुकोमल हृदय पर एक अमिट छाप छोड़ी । यह सारा दृश्य इस बालक ने एक दुकान पर बैठे हुये अपनी प्रांखों से देखा । जोशी जी के परिवार के अन्य सदस्यों को इसी प्रकार बुरी प्रकार से सताया गया ।
एक धर्मात्मा व्यक्ति के धार्मिक परिवार को ऐसे विकट सङ्कट का सामना करना पड़ा , ऐसी भयङ्कर आपत्ति को देखकर बड़े बड़े धैर्य्यशाली व्यक्तियों का धैर्य भी डगमगा जाता है , किन्तु जोशी जी का परिवार ऐसी परिस्थिति में भी विचलित नहीं हुवा । इस समय र्याद जोशी जी क्षमायाचना कर लेते तो यह सङ्कट टल सकता था , किन्तु उन्होंने तो महाराजा भर्तृहरि विरचित और महर्षि दयानन्द का यह प्रियवचन अपने हृदय में निहित कर रखा था कि-
निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु , लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम् ।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा , न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः ।।
नीतिकुशल लोग हमारी निन्दा करें वा प्रशंसा करें , धन वैभव पाये अथवा चला जाये , आज ही मृत्यु हो जाये अथवा लम्बे समय तक जीवित रहें , ऐसी सभी विषम परिस्थितियों में भी धैर्यवान् और नीतिज्ञ सत्पुरुष कभी भी सन्मार्ग से विचलित होकर उसके प्रतिकूल आचरण नहीं करते ।
इसी आदर्श को सामने रखकर जोशी जी ने क्षमा मांगने से सर्वथा निषेध कर दिया । कारागार में रहते हुये ही उन्हें सूचना मिली कि बाहर निकलते ही उनका बहुत बुरी तरह से अपमान किया जायेगा । काला मुंह करके भैंसे पर बिठाकर नगर में घुमाया जायेगा और गले में एक पट्टी लटकाई जायेगी जिस पर लिखा होगा- ” नेपाल की जनता को भड़काने वाले को यह दण्ड दिया जाता है । ” इसको सुनकर इन्होंने जेल से भागने का निश्चय कर लिया और अवसर पाकर अपने एक साथी के साथ वहां से निकल भागे ।
कारागार से निकल कर अपने परिवार को वीरगंज से लेकर रक्सोल होते हुये ये गोरखपर जा पहुंचे । इनके साहसी कार्यकलापों की चर्चा सुनकर आर्यसमाजों ने इनकी भरपूर सहायता की तथा इनके बच्चों के पढ़ने का भी प्रबन्ध कर दिया । शुक्रराज को भी गुरुकुल सिकन्दराबाद में प्रविष्ट करा दिया , वहां से वे विद्वान् स्नातक बनकर निकले ।
पं० शुक्रराज शास्त्री कार्य क्षेत्र में
भारत से विद्याध्ययन करके पं० शुक्रराज शास्त्री नेपाल में जाकर वहां के महाराणा ३ महाराज चन्द्र शमशेर से मिले । राणा ने जोशी जी के प्रति किये गये व्यवहार के लिए पश्चात्ताप किया तथा शास्त्री जी को निर्भीक और स्वतन्त्र शास्त्रार्थ के लिये आमन्त्रित किया जिसे शास्त्री जी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया । महाराज के गुरु श्री हेमराज से उनका शास्त्रार्थ हुआ । शास्त्रार्थ में शास्त्री शुक्रराज ने मूर्तिपूजा का प्रबल खण्डन किया और हेमराज को निरुत्तर कर दिया । महाराणा को भी यह खण्डन बहुत अखरा किन्तु अपनी प्रतिज्ञानुसार शास्त्री जी को घर जाने दिया ।
शास्त्री जी भी भांप गये कि महाराणा उनसे अप्रसन्न हैं अतः एक बार वे पुनः भारत लौट आये । महाराज भी जान गये कि इस परिवार के रहते हुये नेपाल में आर्यसमाज का प्रचार बढ़ेगा अतः उसने इस परिवार को समूल नष्ट करने का पक्का निश्चय कर लिया । इसी के अनुसार ३ महाराज ने शुक्रराज शास्त्र को किसी मिष से पुनः नेपाल बुला लिया और शास्त्री जी से स्नेह का व्यवहार करने लगे । शास्त्री जी सारे षड्यन्त्र को भांप गये और पुनः भारत लौट आये तथा प्रयाग में रहकर अध्यापन कार्य करने लगे ।
इसी मध्य उन्हें सूचना मिली कि उनके बड़े छोटे भाई तथा उनकी अपनी पत्नी भी स्वर्ग सिधार गये । इससे भी वे अपने लक्ष्य से डिगे नहीं और कहा- ” मेरा विवाह १४ वर्ष की कन्या से हुआ था , मेरा उससे कोई सम्बन्ध नहीं हुआ था । मैं आदित्य ब्रह्मचारी हूं , अब मैं अधिक स्वतन्त्रतापूर्वक नेपाल में आर्यसमाज और सुधार का कार्य कर सकूँगा । इस पवित्र कार्य हेतु यदि मुझे शरीर त्याग भी करना पड़े तो भो सहर्ष करूगा । शास्त्री जी के प्रभाव से ही नेपाल राज्य में यह नियम बन गया कि जो व्यक्ति छोटे बच्चे बच्चियों का विवाह नहीं करेंगे तो उनको जाति बहिष्कृत नहीं किया जाएगा । इन्हीं के प्रभाव से ” त्रिवेन्द्र कालिज ‘ की स्थापना भी हुई ।
पं० मदनमोहन मालवीय से भेंट
इन्हीं दिनों शुक्रराज शास्त्री को पता चला कि कलकत्ता में पं० मदनमोहन मालवीय आये हुये हैं । शास्त्री जी उनसे मिले और नेपाल की स्थिति से अवगत कराया । मालवीय जी उनके परिवार के कार्य से अत्यन्त प्रभावित हुये तथा आगे लगे रहने की भी प्रेरणा दी और आर्थिक सहायता भी की । दार्जिलिंग पहुँच कर शास्त्री जी ने अपना प्रचार कार्य तीव्र गति से प्रारम्भ कर दिया और “ दयानन्द एंग्लो वैदिक हाई स्कूल , हिन्दू महासभा और प्रार्य हिन्दू महासभा की स्थापना की ।
महात्मा गांधी से भेंट
एक बार गांधी जी कलकत्ता गये तो श्री शुक्रराज शास्त्री उनसे भी मिले और नेपाल की स्थिति पर दोनों में लम्बे समय तक विचार विमर्श हुआ । नेपाल के गुप्तचर शास्त्री जी के पीछे लगे हुये थे ही , उन्होंने सब सूचना महाराणा को भेज दी । शास्त्री जी ने उसी समय गांधी जी को ब्रह्मसूत्रशांकर भाष्य की भामती टीका पर किया अपना भाष्य भी भेंट किया । इस भाष्य की एक प्रति मेरे पास भी है ।
सुभाषचन्द्र वसु से भेंट
उसी दिन जब शास्त्री जी गांधी जी से मिलकर लौट रहे थे तो मार्ग में सुभाषचन्द्र बोस से भी भेंट हुई और नेपाल की स्थिति पर वार्तालाप हुा । समाचारपत्रों के संवाददाता भी उस समय वहीं थे । इस भेंट का विस्तृत विवरण दूसरे ही दिन सभी समाचार पत्रों में छप गया कि नेपाल के सामाजिक और राष्ट्रिय नेता पं ० शुक्रराज शास्त्री ने गांधी जी और सुभाषचन्द्र बोस से भेंट की और नेपाल में सुधार सम्बन्धी बातच त हुई । इससे सारे नेपाल में भारी हलचल मच गई । राजपुरोहित और पुजारियों ने इस स्थिति का लाभ उठाया और सरकार को शास्त्री जी के विरुद्ध भड़का दिया । शास्त्री जी के हितेच्छुओं ने शास्त्री जी को कहा कि नेपाल में आपके प्रतिकूल वातावरण है अतः आप इधर आने का प्रयत्न न करें । किन्तु शास्त्री जी को कोई भय नहीं था । उन्होंने कहा- में निर्भीक संन्यासी महर्षि दयानन्द सरस्वती का शिष्य हूं । अपने धर्मप्रचार कार्य में मृत्यु का कोई भय नहीं करता और नेपाल जाकर आर्यसमाज का प्रचार अवश्य करूगा ।
यह निश्चय करके शास्त्री जी नेपाल चले गये और अपने सहयोगियों से मिलकर ‘ प्रजा परिषद् का निर्माण किया । इसे देखकर महाराणा सरकार आपे से बाहर होगई और अपने षड्यन्त्र की आस्था और कार्यवाही प्रारम्भ कर दी । शास्त्री जी और उनकी परिषद् के लोगों को जेल में डाल दिया । शास्त्री जी के विरुद्ध यह अभियोग लगाया गया कि इन्होंने भारत में जाकर क्रान्तिकारी और राष्ट्रिय नेताओं से मिलकर नेपाल सरकार के विरुद्ध षड्यन्त्र किया है । यह दोष लगाकर शास्त्री जी को राणा के सम्मुख लाया गया । शास्त्री जी ने सलाम करने के स्थान पर ‘ नमस्ते ‘ की । इनकी प्रत्युत्तरात्मिका बुद्धि और तर्कपूर्ण वार्तालाप से सभी परिचित थे । वे इन्हें क्रान्तिकारियों का गुरु मानते थे । अतः सबसे पहले इन्हीं को समाप्त करने की योजना बनाई और दूसरा अपराध यह सिद्ध करना चाहा कि शास्त्री जी ने नारायण हट्टी में रक्तपात का काण्ड करवा कर रागानों को मारने की चाल चली थी ।
जनता ने राणा से प्रार्थना की कि वे शास्त्री जी को क्षमा करदें और दूसरी और शास्त्री जी से भी कहा गया कि आप भी क्षमा मांग लें । शास्त्री जी ने तुरन्त विरोध किया और कहा कि मेरा कोई दोष नहीं है , मैं क्षमा किस बात की मांगू । यदि मेरा वास्तव में दोष है तो मुझे दण्ड मिलना ही चाहिए । शास्त्री जी को फांसी की सजा सुनाकर पुनः जेल भेज दिया गया । जनता उनकी धर्म पर दृढ़ता को देखकर अत्यन्त प्रभावित हुई ।
धर्म हेतु सहर्ष जीवन बलिदान
अन्तिम दिन सायंकाल शास्त्री जी भोजन के लिए बैठे ही थे कि बुलावा आगया । भोजन रक्खा ही रह गया । रात के बारह बजे पुलिस कर्मचारियों से भरी गाड़ी जेल में आगई । दूसरी गाड़ी राणा शमशेर तथा अन्य अधिकारी आये । पंडित शुक्रराज शास्त्री को रस्सी से बांधकर दूर जंगल में ले जाया गया । शास्त्री जी को एक वृक्ष के नीचे कुछ ईटों के सहारे खड़ा कर दिया गया । उन्होंने पुलिस कर्मचारियों को पीछे करके फांसी का फंदा स्वयं गले में डाल लिया और “ ओ३म् – ओ३म् ” कहते हुये इस नश्वर शरीर को आर्यसमाज हेतु न्यौछावर कर दिया । साथ ही राणा सरकार ने अपने माथे पर एक अमिट कलंक का टीका लगा लिया । जनता को भयत्रस्त करने के लिये शास्त्री जी का शव ८ पहर तक वहीं लटकाये रक्खा गया और एक गत्ते पर यह लिख कर कि सारे देश को भड़काने वाले क्रान्तिकारियों के गुरु और आर्यसमाजी होने पर ऐसा ही दण्ड मिलना था । शास्त्री जी के गले में लटका दिया ।
यह वृक्ष आज भी भारत नेपाल राजमार्ग पर खड़ा हुआ अमर हुतात्मा पण्डित शुक्रराज जी शास्त्री की याद दिला रहा है । अभी भी जनता इस पेड़ पर तिलक लगाती है । वहां से गुजरने वाले प्रत्येक यात्री का मस्तिष्क शास्त्री जी के प्रति श्रद्धा से झुक जाता है । वस्तुतः आर्यसमाज की बलिवेदी पर स्वयं को आहुत करके शास्त्री जी ने नेपाल में वैदिकधर्म का प्रचार करने के लिए भावी पीढी का मार्ग प्रशस्त कर दिया । युगों तक श्री शास्त्री जी का यह पवित्र बलिदान राष्ट्र सेवकों को प्रेरित करता रहेगा ।
श्री शुक्रराज शास्त्री के पश्चात् उन्हीं के साथी प्रसिद्ध आर्यसमाजी श्री गंगालाल जी को पेड़ से बांधकर गोली से उड़ा दिया गया । दूसरे सहयोगी श्री धर्मभक्त को भी पेड़ पर लटका कर फांसी दे दी गई । पञ्जाब निवासी श्री मास्टर गुरुदयालसिंह भी इसी भांति शहीद हुये । देश से निर्वासित हुये अनेकों को जेल में सताया गया । बहुत से बलिदानियों का नाम तक भी ज्ञात नहीं हो पाया । नेपाल में आज सभी प्रकार का जो परिवर्तन दिखाई दे रहा है वह सब ऐसे वीर हुतात्माओं के पवित्र बलिदान का सुपरिणाम है ।

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