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आज का चिंतन

मूल कर्त्तव्य और वेद का राष्ट्र संगठन

वेद मानवजाति के लिए सृष्टि के आदि में ईश्वरप्रदत्त ‘संविधान’ हैं। अतः ऐसा नहीं हो सकता कि हमारा आज का मानव कृत संविधान तो नागरिकों के मूल कर्त्तव्यों का निरूपण करे और वेद इस विषय पर चुप रहे। वेदों में मानव और मानव समाज के आचार विचार और लोक व्यवहार से सम्बन्धित ऋचाऐं अनेक हैं। वेद हमारे लिए राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक व आर्थिक सभी क्षेत्रों में सुव्यवस्था के प्रतिपादक हैं। प्रत्येक पग पर वहाँ हमारे लिए ‘कर्त्तव्यवाद’ एक धर्म बनकर खड़ा है। ‘सत्यम् वद धर्मम् चर’ कहकर वेद ने हमारी मर्यादा और मर्यादा पथ दोनों का ही निरूपण कर दिया है। अब हम यहाँ वेद के राष्ट्र संगठन पर विचार करेंगे। वेद से हम मात्र दस मंत्रों का चयन कर रहे हैं, जो हमारे मूल कर्त्तव्यों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं। ये मन्त्र इस प्रकार हैं:-

समानो मन्त्रः समिति समानी समानं व्रतं सहचित्तमेषाम् । समानेन वो हविषा जुहोमि समानं चेतो अभिसंविशध्वम् ।।

(अथर्व. 6-64-2)

वेद की यह ऋचा हमारे लिए बहुत ही सुन्दर कर्त्तव्य का मार्ग दर्शन कर रही है। इसका कहना है कि ‘हे मनुष्यों! तुम्हारे विचार समान हों। तुम्हारी सभा सबके लिए समान हो। तुम सबका संकल्प एक समान हो। तुम सबका चित्त एक समान भाव से भरा हो। एक विचार होकर किसी भी कार्य में एक मन से लगो। इसीलिए तुम सबको समान हवि या मौलिक शक्ति मिली है।”
वेद की यह ऋचा हम सभी राष्ट्रवासियों से अपील कर रही है कि हमारा एक लक्ष्य हो, एक विचार हो, एक भाव हो। क्योंकि लक्ष्य, विचार और भाव की भिन्नता व्यक्ति को भटकाती है, राष्ट्र में नये-नये विवाद उत्पन्न करती है। इसलिए राष्ट्रीय एकता के लिए इन तीनों बिन्दुओं पर हमारी एकता स्थापित होनी अति आवश्यक है। हमारी सभाएँ अर्थात् हमारी विधानसभाएँ और संसद सभी नागरिकों के लिए समानता का व्यवहार करने वाली हों। इनमें जातीय आरक्षण का लफड़ा ना हो। हां, इनमें आर्थिक आधार पर पिछड़े लोगों के उत्थानार्थं विधि विधानों का प्रतिपादन होता हो।

  1. दूसरा वेदमन्त्र है:-

ॐ सं गच्छध्वम् सं वद्धवम् सं वो मनाँसि जानताम् ।
देवा भागम् यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते ।।

(अथर्व, 6/64/1 )

अर्थात् हे मनुष्यो! (यह तुम्हारा कर्त्तव्य है कि तुम समान ज्ञान प्राप्त करो। समानता से एक दूसरे के साथ सम्बन्ध जोड़ो, समता भाव से मिल जाओ। तुम्हारे मन समान संस्कारों से युक्त हों। कभी एक दूसरे के साथ हीनता का भाव न रखो। जैसे अपने प्राचीन श्रेष्ठ लोक के समय ज्ञानी लोग अपना कर्त्तव्य पालन करते रहे, वैसे तुम भी अपना कर्त्तव्य पूरा करो।”

उच्च और संस्कारित जीवन के लिए यह वैदिक ऋचा ‘कर्त्तव्य पालन’ को मानव समाज के लिए अनिवार्य बनाती है। यह स्पष्ट करती है कि जैसे प्राचीन काल में श्रेष्ठ लोग अपने कर्त्तव्य पालन में रत रहे वैसे ही हम भी उनका अनुकरण करते हुए कर्त्तव्य पालन में रत रहें। लोक व्यवस्था के लिए यह कर्तव्य कर्म परमावश्यक है। यदि पहले मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय ‘भावात्मक एकता’ स्थापित करना है तो इस मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय हमारी कर्त्तव्य पारायणता है। दोनों ही बातें राष्ट्रीय एकता अखण्डता और शान्ति व्यवस्था के लिए बहत ही आवयक हैं।

  1. तीसरा वेदमन्त्र है:-

समानी व आकूतीः समाना हृदयानि वः ।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति । अथर्व 6-64-3)

अर्थ- ‘हे मनुष्यो ! तुम सबका संकल्प एक जैसा हो। तुम्हारा हृदय समान हो, तुम्हारा मन समान हो। तुमसें परस्पर मतभेद न हो। तुम्हारे मन के विचार भी ममता युक्त हों। यदि तुमने इस प्रकार अपनी एकता और संगठन स्थापित की तो तुम यहाँ उत्तम रीति से आनन्दपूर्वक रह सकते हो और कोई शत्रु तुम्हारे राष्ट्र को हानि नहीं पहुंचा सकता है।”

इस वेद मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय ‘समान संकल्प’ है। सारे राष्ट्रवासियों का एक संकल्प हो जाना बहुत बड़ी बात है। जिस परिवार का भी ‘एक संकल्प’ हो जाता है उसके विषय में भी देखा जाता है कि वह दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करता है। इसलिए एक शिवसंकल्प से भर जाना सारे राष्ट्रवासियों का परम कर्त्तव्य है, जब देश पराधीन हो रहा था तो उस समय सारे राष्ट्र में एक संकल्प’ का ही तो अभाव था। जब वह ‘एक संकल्प’ इस बात को लेकर बनने लगा कि अब अंग्रेजों को भारत से भगाना ही है तो अंग्रेजों को भारत छोड़ना ही पड़ गया। इसलिए एक ‘शिव संकल्प’ से बंध जाना भी सभी राष्ट्रवासियों का परम कर्तव्य है।

  1. चौथा वेद मन्त्र है:-

समानो प्रपा सहवोऽन्नभाग समाने योकों सहवो युनज्मि ।
समयञ्चोअग्निं सपर्यतारा नाभिमिवामितः ।

(यजु. 03/30/06)

“हे मनुष्यो! तुम्हारे जल पीने का स्थान एक हो और तुम्हारे अन्न का भाग भी साथ-साथ हो। मैं तुम सबको एक ही जुए में साथ साथ जोड़ता हैं। तुम सब मिलाकर ईश्वर की पूजा करो, जैसे पहिए के आर केन्द्र स्थान में जुड़ रहते हैं, वैसे ही तुम भी अपने समाज में एक दूसरे के साथ मिलकर रहा।”

इस वेद मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय हमारे द्वारा देश में ‘सामाजिक समरसता’ की स्थापना करना है। वेद का सभी राष्ट्रवासियों से आग्रह है कि वो देश में सामाजिक समरसता की स्थापना के लिए अपने अपने स्थान पर सक्रिय हो। बिना सामाजिक समरसता के कोई भी राष्ट्र उन्नति नहीं कर सकता। आज हमारी अवन्नति का कारण सामाजिक विषमताएं हैं। सामाजिक समरसता का देश में नितान्त अभाव है। लोग अपने-अपने स्तर के अनुसार अलग-अलग कॉलोनियाँ बसाते जा रहे हैं। उनमें एक ही स्तर के लोग रहेंगे। दूसरों के लिए वहां प्रवेश तक निषिद्ध है। खाने-पीने और रहने सहने के स्थान अलग-अलग हैं। इसलिए ‘सामाजिक समरसता’ हमारे लिए मृग मरीचिका बन गयी है। वेद कहता है कि सामाजिक समरसता की स्थापना कर समाज में आत्मीय भाव का विकास करो। इसे अपना जीवन व्रत बना लो।

  1. पाँचवां वेद मन्त्र है:-

सहृदयं सामनस्यम् विद्वेषं कृणोमि वः ।
अन्यो अन्यभाभिर्ह्यत वत्सं जातमिवाध्या ॥

(अथर्व 3/30/1)

हे मनुष्यो ! तुम लोग हृदय के भाव प्रेमपूर्ण, मन में शुभ विचार और परस्पर निर्वैरता अपने मन में स्थिर करो। तुममें से हर एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से प्रेमपूर्ण बर्ताव करें , जिस प्रकार कि नवजात बछड़े से उसकी गौ माता प्यार करती है। ‘निःस्वार्थ प्रेमपूर्ण व्यवहार’ इस वेद मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय है। वेद का आदेश है कि उत्तम राष्ट्र सृजन के लिए परस्पर प्रेमपूर्ण व्यवहार को अपने राष्ट्रीय चरित्र का एक आवश्यक अंग बना लो। इस प्रकार के व्यवहार से समस्त राष्ट्रवासी आपस में निर्वैरता और अहिंसा भाव से भर जायेंगे। गाँधीजी देश में लोकप्रिय इसलिए हुए कि उन्होंने निःस्वार्थ प्रेम, अहिंसा और बन्धुत्व की बातें कीं। यह और बात है कि गाँधी जी लोकप्रिय होकर भी अपने उद्देश्य में असफल सिद्ध हुए। क्योंकि गाँधीजी की इन बातों को देश के कुछ लोगों ने नहीं माना। उन लोगों का संकल्प घृणा के आधार पर राष्ट्र का विभाजन कराना बन गया। गांधीजी किसी एक वर्ग की इस घृणा को प्रेम में परिवर्तित नहीं कर पाये।

इसलिए राष्ट्र का विभाजन हो गया। ये मंत्र हमें यह बताता है कि सभी राष्ट्रवासियों को परस्पर प्रेमपूर्ण बर्ताव करना चाहिए अन्यथा घृणा पांव पसार लेगी और उसका परिणाम होगा विभाजन और केवल विभाजन।

  1. छठा (अथर्व. 3/30/7 ) का मंत्र है:-

सनीची नान्वः संमन सस्कृणोम्येक श्नुनुष्टीन्त्सं वनेन सर्वान्।
देवा इवामृतं रक्षमाणाः सामं प्रातः सौमनसौ वो अस्तु ॥

“हे मनुष्यो ! तुम परस्पर सेवा भाव से सबके साथ मिलकर पुरूषार्थ करो। उत्तम ज्ञान प्राप्त करो। समान नेता की आज्ञा में कार्य करने वाले बनो। दृढ संकल्प से कार्य में दत्त चित्त हो तथा जिस प्रकार देव अमृत की रक्षा करते हैं। इसी प्रकार तुम भी सायं प्रातः अपने मन में शुभ संकल्पों की रक्षा करो।”

यहाँ हम वेद की अनूठी बात देखते हैं। यहाँ वेद कह रहा है कि तुम सब राष्ट्रवासियों का परम पुरूषार्थी हो जाना राष्ट्र का भाग्य (विधान) बदलने के लिए, उसके भाग्य की रेखाओं को अपने ढंग से लिखने के लिए सचेष्ट हो उठना है। वेद मंत्र का अगला भाग एक प्रधान (एक नेता) की बात कह रहा है। जबकि मन्त्र का अन्तिम भाग अपने मन के शुभ संकल्पों को जीवन की पताका बना लेना है। शिव-संकल्प व्यक्ति को ऊँची ऊड़ान उड़ाते हैं। इसलिए शुभ संकल्प पताका के ही समान हैं। राष्ट्रवासियों के लिए आवश्यक इस कर्त्तव्य को हमारे वर्तमान संविधान ने पूर्ण नही किया है। एक नेता के नेतृत्व में राष्ट्र तेजस्विता को प्राप्त होता है जैसा कि हम आजकल देख रहे हैं।

  1. वेद का सातवाँ निर्दिष्ट कर्तव्य है :-

सं वो मनांसि सं व्रता समाकूती न मामसि ।
अभी ये विव्रता स्थान तान्वः सं नयमामसि ॥

(अथर्व. 3/8/5)

अर्थात् हे मनुष्यो! “तुम अपने मन एक करो। तुम्हारे कर्म एकता के लिए हों, तुम्हारे संकल्प एक हों, जिससे तुम संघ शक्ति से युक्त हो जाओ। जो ये आपस में विरोध करने वाले हैं, उन सबको हम एक विचार से एकत्र हो झुका देते हैं।”
संघ शक्ति के प्रति समर्पण इस वेद मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय है। संघ शक्ति में विश्वास रखने वाला व्यक्ति कभी भी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का शत्रु नही हो सकता।

  1. आठवाँ मन्त्र है:-

अदार सृद भवतु सोमा स्मिन्यज्ञे मसतो मृऽतानः ।
मा नो विददभिमा मो अशस्तिमां नो विदद् वृजिना द्वेष्या या ।।

(अथर्व. 1/20/1)

★ सोमदेव! हम सबमें से परस्पर की फूट हटाने वाला कार्य होता रहे। हे असतो! इस यज्ञ में हमें सुखी करो। पराभव या पराजय हमारे पास न आवे। कलंक हमारे पास न आवे और जो द्वेष भाव बढ़ाने वाले कुटिल कृत्य हैं, भी हमारे पास न आयें।”

इस मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय “हमारे मध्य पारस्परिक फूट का नितान्त अभाव” हो जाना है। पारस्परिक फूट का नितान्त अभाव मनों की एकता से आता है। मानसिक धरातल पर उपजने और विकसित होने वाले विचार जब सर्वमंगल कामना से अभिभूत हो उठें तो उस समय यह मानना चाहिए कि वास्तव में पारस्परिक फूट को विदा करने के लिए हम तत्पर हैं। यही वह अवस्था है जब दूसरे की पीड़ा को हम अपनी पीड़ा मानकर उसे दूर करने के लिए सक्रिय हो उठते हैं। जब मानसिक धरातल पर हम एक होने के विचारों अभिभूत होंगे तो हमारे कर्म तो स्वयं ही एकता के लिए समर्पित हो जायेंगे। इसका अभिप्राय होगा कि हम राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की शत्रु शक्तिों को भी पहचानने लगेंगे और उनके हाथ की कठपुतली बनकर यहाँ पुनः ‘राष्ट्रघाती’ खेलों की परम्परा को चालू नही करेंगे।

  1. वेद का नवाँ मन्त्र है-

मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षमा स्वसारमुत स्वसा ।
सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया ॥

(अथर्व. 3/30/3)

“भाई भाई से द्वेष न करें, बहन बहन से द्वेष न करें। एक विचार वाले होकर और एक कर्म वाले होकर हम सब आपस में बातचीत एवम् व्यवहार करें।” इस वेद मन्त्र की शिक्षा है कि यदि राष्ट्र में वास्तव में शान्ति स्थापित करना चाहते हो तो परस्पर द्वेषभाव की नीति को त्याग दो। परस्पर द्वेषभाव का सर्वथा अभाव कर लेना हमारा एक परम पावन कर्तव्य बन जाये, धर्म बन जाये। प्राचीन काल में रावण ने अहंकारवश अपने भाई विभीषण से द्वेष किया और उसे अपने राज्य से निकालकर बाहर कर दिया। विभीषण श्रीराम से जाकर मिला और परिणाम हुआ कि रावण का साम्राज्य ही समाप्त हो गया। इसी प्रकार दुर्योधन ने द्वेषभाव के कारण ही अपने भाइयों युधिष्ठिर आदि को अपना भाई कभी नहीं माना। फल क्या हुआ-सभी जानते हैं। इसलिए वेद ने सभी राष्ट्रवासियों के लिए मूल कर्तव्य प्रतिपादित किया कि परस्पर द्वेष भाव नहीं रखना है। ऐसी किसी भी सम्भावना को अपने पास फटकने तक नहीं देना है, जिससे कि परस्पर द्वेष भाव बढ़ता हो।

  1. वेद का दसवाँ मंत्र जो हमें अपने किसी मूल कर्तव्य का स्मरण कराता है, वो ये है :-

दत्ते दहं मा मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्। मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे ।।

(यजु. 36/18)

“सब व्यक्ति मुझे मित्र की दृष्टि से देखें। मैं भी सभी व्यक्तियों को मित्र की दृष्टि से देखूं। सभी परस्पर मित्र की दृष्टि से देखा करें। हे दृढ़ता के देव प्रभो! इस प्रसंग में आप हमें दृढ़ता दीजिए।”

यह वेद मंत्र परस्पर मित्रतापूर्ण व्यवहार को लोक व्यवहार की मान्यता दिलाने के लिए प्रयत्नशील समाज का चित्रण कर रहा है। हमारी प्रार्थना भी ऐसी होनी चाहिए कि जिससे व्यक्ति व्यक्ति के मध्य ही नहीं अपितु प्राणिमात्र के मध्य भी ऐसा ही लोकव्यवहार निष्पादित हो। इससे सभी प्राणियों के जीवन का सम्मान करना हमारा स्वभाव बन जायेगा। जिससे पर्यावरण सन्तुलन नहीं बिगड़ेगा। क्योंकि आज हमारे हृदयों में जीवों के प्रति दयाभाव का समाप्त होना। ही पर्यावरण और प्राकृतिक सन्तुलन को बिगाड़ने में सबसे अधिक भूमिका निभा रहा है।

संविधान और वेद के ये मन्त्र

हमारे संविधान के द्वारा जो मूल कर्त्तव्य हमारे लिए रखे गये है उनमें इतनी गम्भीरता नहीं झलकती जितनी इन वेद मंत्रों में निष्पादित मूल कर्त्तव्यों की भाषा में है। महर्षि दयानन्द की आस्था तो वेदों में अथाह थी, परन्तु संविधान निर्माताओं या बाद में अभी तक आयी सरकारों की उतनी आस्था वेदों में नहीं रही जितनी आस्था की अपेक्षा की जाती थी। यही कारण रहा कि देश के स्वातन्त्रय आन्दोलन पर अपने व्यक्तित्व और कृतित्व की अमिट छाप छोड़ने वाले महर्षि दयानन्द के चिन्तन से प्रभावित लोग संविधान सभा में रहकर भा वेदों के गंभीर विद्यार्थी ना होने के कारण उतनी गहराई से चीजों को खोजकर लाने में असफल रहे, जितनी उनसे अपेक्षा की जाती थी। इसलिए बहुत से अनुच्छेद संविधान में या तो ‘शो-पीस’ बनकर रह गये या उन संवैधानिक अनुच्छेदा की मूल भावना के अनुकूल यहाँ कार्य नहीं किया गया।

वेद की भाषा की अपेक्षा कम गम्भीर होकर भी संविधान में डाले गय मूल कर्त्तव्यों का बहुत महत्व है। ये हमारे धर्म का और राष्ट्रीय चरित्र का निर्धारण करते हैं। इसलिए होना ये चाहिए कि वेद जिस प्रकार अपने मंत्रों को प्रार्थना के माथ जोड़ता है, कर्त्तव्य कर्म की पूर्ति के लिए सर्व समाज को स्फूर्तिमान बनाने का प्रयास करता है, वह प्रयास संविधान का यह अनुच्छेद भी करे। परंतु दुर्भाग्यवश यह अनुच्छेद 51 (क) ऐसा नहीं करता। इसलिए ये मूल संविधान के शो पीस बनकर रह गये हैं। इसके अतिरिक्त वेद ने अपने कर्तव् का एक ईकाई से अर्थात् व्यक्ति से आरम्भ किया है और उसे वह राष्ट्र तक ले गया है। वेद पहले व्यष्टि का सुधारना चाहता है, फिर समष्टि की और चलता है। संविधान का यह अनुच्छेद व्यष्टि से समष्टि की बात तो करता है, परन्तु व्यष्टि के द्वारा खड़े किये गये कृत्रिम विभाजनों (भाषा, सम्प्रदाय, क्षेत्र, जाति आदि) को समाप्त करने का ठोस उपाय नहीं दे पाया है, इसलिए इस संवैधानिक अनुच्छेद माध्यम से देश में समष्टिवादी मानस के निर्माण की और विशेष कदम नहीं उठाये जा सके हैं। मूल रूप से भारतीय संस्कृति समष्टिवादी है, परन्तु यहां हम देख रहे हैं कि अब देश में व्यष्टिवाद बढ़ता जा रहा है।

वेद हमारे कर्म को धर्म के साथ जोड़ देना चाहता है। जबकि यह संवैधानिक अनुच्छेद कर्म से धर्म को अलग करके चलता है।

हमने वेद और महर्षि के चिन्तन को इन कर्त्तव्यों में यथावत स्थान नही दिया और ना ही अपने वेदों के अनुकूल इनमें कर्म और धर्म का उचित समन्वय स्थापित किया।

वैदिक कालीन भारत की राजनीतिक व्यवस्था और उसमें नागरिकों के कर्तव्य कर्म की चर्चा करते हुए लाला लाजपतराय अपनी पुस्तक ‘युग प्रवर्तकः स्वामी दयानन्द’ में लिखते हैं:-

“सचमुच उस समय का भारत स्वर्गेपम था। यह धरा कर्म भूमि के साथ-साथ धर्मभूमि भी थी। प्रत्येक मनुष्य-माता-पिता पुत्र या पुत्री, पति या पत्नी, राजा और प्रजा, गुरु और शिष्य सभी अपने कर्त्तव्यों को जानते थे और उन पर आचरण भी करते थे। सारे देश में आर्यों का राज्य था। सभी वर्णों के लोग स्व स्व कर्त्तव्यों के पालन में लगे थे।”

वेद कर्त्तव्यों की जानकारी और उनको आचरण में लाने का प्रबल पक्षधर है। आचरणहीन व्यक्ति को वैदिक समाज हेय दृष्टि से देखता था। जबकि हमारे आज के संविधान ने मूल कर्तव्यों को किसी के द्वारा आचरण में न लाने पर उसे हेय दृष्टि से देखने या ऐसे ही किसी अन्य उपाय की चर्चा नहीं की है। जिससे इन कर्त्तव्यों को लोगों ने अपने लिए अनिवार्य नहीं माना है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक उगता भारत समाचार पत्र

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