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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

स्वामी दयानंद जी महाराज का महान व्यक्तित्व और उनकी 200 वीं जयंती

महर्षि दयानंद की 200वीं जयंती के अवसर पर विशेष प्रस्तुति।

राष्ट्र महर्षि दयानंद की 200वीं जयंती बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मना रहा है। वास्तव में महर्षि दयानंद का हम पर बहुत ऋण है। हम उनके ऋण से उऋण नहीं हो सकते ।

मुझे विधि व्यवसाय के दृष्टिकोण से इलाहाबाद (प्रयाग) जाने का अवसर अनेक बार जीवन में प्राप्त हुआ है। मैंने भारद्वाज ऋषि का आश्रम, जहां रामचंद्र जी वनवास जाते समय कुछ समय के लिए प्रवचन, उपदेश सुनने के लिए गंगा जी के तट पर रुके थे ,संगम,नैनी का किला, किले के अंदर स्थित अक्षय वट, चंद्रशेखर आजाद पार्क,आनंद भवन आदि प्रमुख स्थानों का भ्रमण किया है। उपरोक्त के अतिरिक्त हरिद्वार, ऋषिकेश, ओंकारेश्वर, ममलेश्वर,रामेश्वरम, कन्याकुमारी, रामनाथपुरम, मदुरई, तिरुपति बालाजी ,द्वारका, कामाख्या मंदिर गुवाहाटी, वैष्णो देवी,महाकालेश्वर उज्जैन, क्षिप्रा नदी उज्जैन, संदीपनी ऋषि का आश्रम उज्जैन , महाराज भर्तृहरि की तपोस्थली स्थित क्रमश:क्षिप्रा नदी के किनारे उज्जैन‌ तथा हरि की पौड़ी गंगा के किनारे हरिद्वार, अलवर जिले में तिजारा एवं एक अन्य वन क्षेत्र , मथुरा,वृंदावन, काशी, सोमनाथ, अमृतसर का अमृत तालाब, तपोवन, नैमिषारण्य, सारनाथ, अर्बुदाचल चल पर्वत पर स्थित दिलवाड़ा के मंदिर ,गंगा, नर्मदा, यमुना, कृष्णा ,कावेरी,क्षिप्रा आदि भिन्न-भिन्न कथित तीर्थों को भ्रमण करके‌ भी देखा है। परंतु उनके माहात्म्य को स्वीकार नहीं किया क्योंकि ये सब मिथ्या है।
मेरा उद्देश्य इन तीर्थो को देखकर पाखंड एवं अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है बल्कि मैं वहां पर जाने वाले लोगों की मानसिकता को अथवा उनकी साइकोलॉजी को पढ़ने के लिए जाता हूं।
जैसे महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मंदिर को तोड़ा, लूटा और पुजारियो की हत्या की, यह सब पुजारियों की अविद्या का ही परिणाम था।
मैं कितनी बार इलाहाबाद जाने के बावजूद तथा जिन लोगों के साथ जाता हूं उनके आग्रह के पश्चात भी केवल जमुना और गंगा भौतिक नदियों के संगम को निहारने के लिए जाता हूं। मैं वहां पर स्नान नहीं करता।वहां कोई सरस्वती नदी नहीं है जिसका लोग भ्रम पालते हैं, ऐसी कोई नदी वहां पर नहीं है लेकिन लोगों की उस भ्रांति को देखने में ,अनुभव करने में मुझे आनंद आता है और साथ ही साथ उनकी बुद्धि पर तरस भी आता है। क्योंकि सरस्वती नदी तो हिमालय से निकलकर वर्तमान के हरियाणा राजस्थान से होती हुई गुजरात के पास स्थित समुद्र में गिरती थी।आर्य समाज के सिद्धांतों में विश्वास रखने वाले एवं वेद की शिक्षा और विद्या को मानने वाले परिवार में माता-पिता के आशीर्वाद से जन्म लेने के कारण गंगा यमुना और सरस्वती नदियां ईड़ा ,पिंगला सुषुम्ना को जानता हूं जो तीनों हमारे शरीर में बहती हैं। स्वर्गीय महाशय श्री राजेंद्र सिंह आर्य श्रद्धेय पिताश्री के बताने के अनुसार इन्हीं तीनों नदियों में जब जीव नहाता है ,इसमें गोते लगता है तो उससे जीव का कल्याण संभव है। वहीं से कुंडली जागरण होता है। भौतिक नदियों में नहाने से नहीं।
अर्थात जिनका उल्लेख मैंने ऊपर किया अथवा अन्य स्थान भी जो मैंने तीर्थ के नाम पर देखें और भ्रमण किया अन्यथा वो गया , जगन्नाथ, हिंगलाज, ज्वालामुखी, गुप्तकाशी, देवप्रयाग,बद्री नारायण, विंध्येश्वरी, अयोध्याआदि जो मैंने अभी तक अपने जीवन में नहीं देखे, ये सब तीरथ नहीं है। यह केवल तीर्थ के नाम पर व्यापार है ,दुकानदारी है,क्षुधा शांति का एक उपाय है। महर्षि दयानंद के अनुसार यह केवल उन्हीं को उचित है जो आंख के अंधे और गांठ के पूरे होते हैं। यह केवल अंधी भेड़ों की भीड़ है।
जो भेंट धरवाते हैं, और पाप छुड़वाते हैं, और जो भेंट प्राप्त करने के बाद देवी देवताओं के अथवा ईश्वर की मूर्ति के दर्शन कराते हैं वे लोग धूर्त हैं वह लोग नरक के गामी हैं, नरक के अधिकारी हैं। वह स्वयं भी अविद्या के कारण नरक में जाएंगे और दूसरों को भी नरक में ले जाएंगे।
महर्षि दयानंद ने अमर ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश के एकादश समुल्लास में तीर्थ की व्याख्या की है। जिसमें महर्षि दयानंद कहते हैं कि” जैसे आजकल पोप लीला में पाप बढ़कर हो रहे हैं । मूढ़ों को विश्वास है कि हम पाप करने के बाद नाम स्मरण वा तीर्थ यात्रा करेंगे तो पापों की निवृत्ति हो जाएगी ।इसी विश्वास पर पाप करके इस लोक और परलोक का नाश करते हैं, पर किया हुआ पाप भोगना ही पड़ता है।”
इससे आगे एकादश समुल्लास के अंदर ही महर्षि दयानंद ने यथार्थ तीर्थ का उल्लेख किया है। जो निम्न प्रकार बताए गए हैं।
” वेदादि सत्य शास्त्रों का पढ़ना- पढ़ना, धार्मिक विद्वानों का संग, परोपकार, धर्मानुष्ठान, योगाभ्यास, निर्वैर, निष्कपट, सत्य भाषण ,सत्य का मानना, सत्य करना, ब्रह्मचर्य, आचार्य- अतिथि -माता-पिता की सेवा, परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना ,शांति, जितेंदियता, सुशीलता, धर्मयुक्तपुरुषार्थ, ज्ञान- विज्ञान आदि शुभ गुण कर्म, दुखों से उतारने वाले होने से तीर्थ हैं। और जो जलस्थलमय है वह तीर्थ कभी नहीं हो सकते , क्योंकि
जना:येस्तरन्ति तानि तीर्थानि मनुष्य जिन्हें करके दुखों से तरें उनका नाम तीर्थ है। जलस्थलमय तराने वाले नहीं किंतु डूबा कर
मारने वाले हैं। प्रत्युत नौका आदि का नाम तीर्थ हो सकता है क्योंकि उनसे समुद्र आदि को हम तरते हैं।
जो ब्रह्मचारी एक आचार्य और एक शास्त्र को साथ-साथ पढ़ते हो वे सब सतीर्थ्य अर्थात समान तीर्थसेवी होते हैं। जो वेदादि शास्त्र और सत्यभाषणादि धर्म लक्षणों में साधु हो, उनको अन्नादि पदार्थ देना और उनसे विद्या लेनी इत्यादि तीर्थ कहाते हैं।”

महर्षि दयानंद ने जो ऊपर गुण और कर्म स्वभाव बताए हैं ।ज्ञानी पुरुषों के लिए आवश्यक नहीं है उपरोक्त सभी शब्दों की व्याख्या करना अथवा गुणो के बारे में बताना । परंतु कुछ गुणों की चर्चा करूंगा।
इसमें बहुत ही साधारण शब्दों में महर्षि ने लिखा है।
महर्षि दयानंद ने एक अन्य बहुत छोटी सी पुस्तक लिखी है जिसका नाम है आर्योद्देश्यरत्नमाला। इसमें महर्षि दयानंद ने 100 सिद्धांतों की व्याख्या की है। पुस्तक छोटी आवश्यक है परंतु अध्ययन करने के योग्य है। ज्ञान का भंडार है। प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य पढ़नी चाहिए। बहुत अधिक मूल्य भी नहीं है केवल ₹10 में आती है। इस पुस्तक में महर्षि दयानंद ने तीर्थ शब्द की व्याख्या की है। जो निम्न प्रकार है।

तीर्थ क्या है?
जिनके करने से जीव दुख सागर से तर जा सकते हैं।
शब्दों पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
शब्द आया है जिसके करने से अर्थात ऐसे काम करने से, ऐसा गुण- कर्म -स्वभाव बनाने से । इसमें यह नहीं आया कि जहां जाने से अथवा वहां पर स्नान करने से दुख सागर से तरा जा सकता हो। जैसे नदी में स्नान करने से दुख सागर से नहीं तरा जा सकता। जैसे हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन आदि में नदी के जल से स्नान करने से दुख से नहीं छूटा जा सकता।
विद्याभ्यास—-
बल्कि विद्याभ्यास से दुखों से छूटा जा सकता है। सांख्य दर्शन के प्रथम अध्याय के प्रथम सूत्र के अनुसार त्रिविद्ध दुख आधिआत्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक होते हैं। योग दर्शन के अनुसार संस्कार दुख, ताप दुख, परिणामदुख ,गुणवृत्ति विरोध दुख, चार प्रकार के दुख होते हैं ।इन दुखों से अत्यंत निवृत्ति प्राप्त करनी है तो विद्या अभ्यास करना होगा। सत्य विद्या को ग्रहण करना होगा। असत्य को छोड़ना होगा। सांप को सांप और रस्सी को रस्सी समझना होगा। रस्सी और सांप में भेद करना होगा। केवल ऐसा समझ लेना वा मान लेना कि “माने तो देव नहीं तो भीत का लेव” भ्रांत धारणा है।

इस सिद्धांत के अनुसार सांप को रस्सी समझ कर छेड़ने से या उठा लेने से सांप के डसने का डर होगा और उससे मृत्यु भी कारित हो सकती है। जिससे दुख होगा। इसी प्रकार से अविद्या में रहने से दुख ही दुख है।
अच्छा एक बात विचार करें।

विष्ठा को मिष्ठान मानकर खा सकते हैं क्या?

ऐसे ही स्कूटर को हवाई जहाज मान सकते हैं क्या?

दोनों ही प्रश्नों का उत्तर निश्चित रूप से नहीं होगा।

जब यह सिद्धांत इस विषय में लागू नहीं है तो यह सिद्धांत सार्वभौमिक एवं सर्वमान्य नहीं हुआ।इसलिए कामाख्या अथवा वैष्णो देवी पर तीर्थ नहीं माना जा सकता। हमारे मान लेने से कुछ नहीं होता। अर्थात हमारे मान लेने से यह तीर्थ नहीं हो जाते। बल्कि यह भ्रांति है जैसे रस्सी को सांप मान लिया था।
उपरोक्त में उल्लेखित तीनों दुखों को अत्यंत पुरुषार्थ से ही दूर किया जा सकता है। वह पुरुषार्थ है अभ्यास,वैराग्य, और ईश्वर प्राणिधान। ये ही हमको तरा सकते हैं।
इस प्रकार की विद्या जो पढता है जो इस प्रकार की ‌विद्या पर आचरण करता है,वही दुखों से तर सकता है। तो हमें ऐसी विद्या पढ़नी चाहिए तभी हम दुखों से तर सकते हैं।
सुविचार —–हमें जीवन में सुविचार करना चाहिए।दूसरों के प्रति अच्छे विचार रखने चाहिए।
दूसरों की सहायता, रक्षा, दया, सहयोग करना चाहिए। यम- नियम का पालन करना चाहिए। काम, क्रोध ,लोभ, मोह , अहंकार से छुटकारा करना चाहिए। इस प्रकार से हम दुखों से छूट सकते हैं। यम- नियम के पालन करने से हम जब दूसरों को दुख नहीं देंगे और हम समाज के लिए उपयोगी हो जाएंगे तो यही समाज हमको दुख नहीं देगा। बल्कि हमारा प्रत्येक स्थान पर जाने पर यही समाज सम्मान करेगा। इसलिए हमें अपने आत्मा का परिष्कार करना, परिमार्जन करना प्रथमतया आवश्यक है।
हमें ईश्वरोपासना करनी चाहिए। ईश्वरोपासना करने से चिंता तनाव दूर होते हैं। ईश्वर की उपासना करना इसीलिए चिंता और तनाव से दूर होने के लिए आवश्यक है। जब चिंता और तनाव नहीं होगा तो हम दुखी भी नहीं होंगे। हम उन दुखों से तर जाएंगे। व्यक्ति की चिंताएं ईश्वर उपासना के पश्चात कम हो जाती हैं ।ऐसे तीर्थ का सेवन करना चाहिए।
धर्मानुष्ठान — सत्य बोलना, यम- नियम का पालन करना ,न्याय पूर्वक व्यवहार करना, धर्म के अनुसार आचरण करना ,दूसरों को मूर्ख नहीं बनाना, चोरी नहीं करना ,दान देना, मदद करना ,ये सभी वेदोक्त कार्य हैं, ऐसे कार्य करने चाहिए। तभी हम दुखों से तर सकते हैं ।लेकिन जल में स्नान करने से नहीं तर सकते।
सत्संग अर्थात सत्य का संग—
सत्य का संग करना भी तीर्थ है सत्य को सत्य ही जानना और सत्य को ही मानना, सत्य को ही पहचानना, सत्य का ही आचरण करना चाहिए। इसी से आत्म संतुष्टि ,आत्मविश्वास, आत्मबल, एवं आत्म परिष्कार प्राप्त होगा।
इनको हमें अपनी मन बुद्धि से स्वीकार करना चाहिए ।इन बातों पर हमको विचार करना चाहिए। अच्छी पुस्तक का अध्ययन एवं अच्छे लोगों का संग करना चाहिए। तभी दुखों से तर सकते हैं।
ब्रह्मचर्य–
ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए महर्षि दयानंद ने व्यवहार भानु एवं सत्यार्थ प्रकाश में ब्रह्मचर्य की परिभाषा करते हुए लिखा है कि ब्रह्मचर्य का पालन करने से शरीर की शक्ति बढ़ती है ।आत्मविश्वास बढ़ता है। आनंद की प्राप्ति होती है ।भोग से दूर रहना चाहिए। काम पिपाशा अथवा लंपट्ता को शांत करना चाहिए। ब्रह्मचर्य का अर्थ है ब्रह्म की चरी अर्थात ईश्वर, आत्मा और प्रकृति में विचरण करना चाहिए। शरीर सौष्ठव,शारीरिक बल प्राप्त करना चाहिए
जितेंद्रियता—-
दसों इंद्रियों को जीत लेना, अपने वश में करना चाहिए ।यह कठिन तो है परंतु संभव है क्योंकि जितेंद्रियता से मनुष्य इंद्रियों का दास नहीं होता। इंद्रियों पर संयम रखना सीख जाता है ।मनअथवा इंद्रियों का गुलाम नहीं होना चाहिए ।यह भी दुखों से पार लगता है ।एक भी इंद्री पर असंयम नहीं होना चाहिए। क्योंकि इससे सारी बुद्धि असंयमता के कारण हमसे दूर हो जाएगी।रसना का संयम, श्रोत्रिय इंद्री पर संयम,चक्षु इंद्रिय पर संयम, वाणी पर संयम करना चाहिए। अपने मन पर भी संयम करना चाहिए। यह बार-बार भागता है। सारी इंद्रियां इसी के पीछे भागती है ।जैसे रानी मक्खी के पीछे सारी मक्खियों भागती हैं चलती हैं। इसीलिए कहा गया कि मन इंद्रियों का राजा है। इसलिए मन को वश में रखने की बात भी कही गई। क्योंकि मन के बाहर जाने से, मन के इधर-उधर भाग जाने से सारी इंद्रियों की शक्ति बर्हिगामी हो जाएगी। जबकि हमें अपनी शक्तियों को बाहर खर्च नहीं करना चाहिए बल्कि हम अपनी इंद्रियों को अंतर्मुखी करें।
लेकिन प्रश्न उठता है की मन पर संयम कैसे करें ?
यह भी एक ज्वलंत प्रश्न है। क्योंकि लोग कहते हैं कि मन नहीं मानता। यह भ्रांत्र धारणा है ,क्योंकि हमारा मन जड़ है और आत्मा चेतन है ।यह हम जानते हैं कि जड़ को चेतन चलाता है। इसलिए इस सिद्धांत के अनुसार मन जो जड़ है उसको आत्मा चेतन परिचालन करती है। अर्थात मन आत्मा के चलने से चलता है। जैसे आपका स्कूटर आपके चलाने से चलता है क्योंकि आप चेतन है और स्कूटर जड़ है।
एक सैनिक की राइफल अथवा बंदूक उसके चलने से चलती है वह बंदूक अथवा राइफल चेतन के अधीन है वैसे ही मन आत्मा के अधीन है।
जैसे हम अपने स्कूटर को मोड सकते हैं, रोक सकते हैं, ब्रेक लगा सकते हैं ,उसी प्रकार हम अपने मन को भी रोक सकते हैं ,मोड सकते हैं।
न्याय दर्शन के अनुसार हम जानते हैं कि आत्मा में छह गुण होते हैं ज्ञान, प्रयत्न, सुख, दुख ,राग, द्वेष। उसके गुण कुछ स्वाभाविक है कुछ नैमित्तिक है। उनमें से एक गुण है प्रयत्न।
जहां प्रयत्न होगा उससे पहले इच्छा होगी। इसलिए इच्छा गुण आत्मा का है। अर्थात इच्छा आत्मा में पैदा होती है। फिर आत्मा मन को देती है। मन उसको ले बढ़ता है। मन संकल्प विकल्प करता है। क्योंकि आत्मा इच्छा करके मन पर छोड़ देती है।
मन जड़ होने के कारण एक मशीन की तरह कार्य करता है। और आत्मा रूपी चेतन उस मशीन रूपी मन को चलाता है। वह उसका ड्राइवर है। इसलिए मन केवल बदनाम होता है कि मन है कि जो मानता नहीं है। आत्मा स्वयं इच्छा करती है। क्योंकि मन तो आत्मा की इच्छाओं के अनुसार भागता रहता है संकल्प विकल्प में फंसा रहता है। मन आत्मा को कुछ समय के पश्चात फिर अपने साथ घसीट लेता है। और यही एक अनुचित स्थिति बन जाती है। मन में प्रयत्न आत्मा के द्वारा ही नहीं देना चाहिए था। इसके लिए योग दर्शन में मन के निरुद्ध करने के लिए अभ्यास और वैराग्य दो प्रकार के ब्रेक बताए हैं ।इसलिए अभ्यास और वैराग्य से मन को रोका जा सकता है। उस पर ब्रेक लगाए जा सकते हैं। आत्मा ही राग- द्वेष को कम रखे क्योंकि इनके अधिक बढ़ने पर परेशानी आएगी।
हम जानते हैं कि राग और द्वेष के अधिक बढ़ने से संसार में झगड़ा उत्पन्न होते हैं । आत्म निरीक्षण करने से क्रोध, लोभ, मोह, अभिमान रोके जा सकते हैं। ऐसा बार-बार अभ्यास करने से मनुष्य विजयी हो सकता है। मन पर नियंत्रण होने से संस्कार दुख ,ताप दुख ,परिणाम दुख, गुणवृत्ति विरोध दुख सभी समाप्त हो जाते हैं ।इसी से वैराग्य होगा क्योंकि सुखानुशयी राग और दुखानुशयी द्वेष होता है, अर्थात किसी वस्तु में दुख देखने से वैराग्य और द्वेष उत्पन्न हो जाता है। दुख उत्पन्न हो जाने से बुद्धिमान व्यक्ति वैराग्य उत्पन्न करता है । तथा संसार को शून्य निरर्थक समझता है। एक सुख पाने से चार गुना दुख आते हैं, यह बुद्धिमान समझता है। इसी से मन पर कंट्रोल बुद्धिमान करता है। मनुष्य के राग द्वेष भी तभी दूर हो जाएंगे। राग द्वेष दूर होने के पश्चात ही प्रवरता, प्रखरता, निखरता प्राप्त होगी।
ऐसे तीर्थ से मनुष्य दुख सागर से तर सकता है।

विषय विस्तार के दृष्टिकोण से लेखनी को विराम देता हूं। क्योंकि आप सभी विद्वान एवं सुधी पाठक हैं। मेरा विनम्र सुझाव है कि‌ महर्षि दयानंद कृत अमर ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश, व्यवहार भानु, आर्योद्देश्यरत्नमाला, योग दर्शन, सांख्य दर्शन ,न्याय दर्शन आदि के समेकित एवं तुलनात्मक अध्ययन से आप स्वयं स्थिति को मुझसे बेहतर समझ सकते हैं।
देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट अध्यक्ष उगता भारत समाचार पत्र, ग्रेटर नोएडा
चलभाष 9811838317

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