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जनस्वीकृति की हिन्दी भारत की कब होगी राष्ट्रभाषा

          संजय पंकज 

हिंदी भाषा है। जैसे संसार की बहुत सारी भाषाएं हैं। हर देश की अपनी एक सर्वमान्य भाषा होती है। लेकिन भारत के लिए सर्वमान्य और सर्व स्वीकृत हिंदी नहीं है। यहां मातृभाषा और राजभाषा की बातें होती हैं। अलग-अलग जनपदों की जो अपनी बोलियां हैं उसी को तर्क और कुछ हद तक विवेक से भाषा का जामा पहना दिया गया है। लोक में प्रचलित जो बोली है उसे ही कालक्रम में उसकी व्यापकता के कारण भाषा के रूप में स्वीकार्यता मिली है। तुलसीदास जैसी विराट रचनात्मक प्रतिभा के महाकवि जब अवधी भाषा में रामचरितमानस जैसा कालजई महाकाव्य सृजित करते हैं तो अवधी बोली न रहकर भाषा का रूप ले लेती है। वैसे ही कोई सूरदास सूरसागर जैसा वैभवशाली ग्रंथ प्रस्तुत करता है तो उसकी व्यापकता ब्रज की बोली को ब्रजभाषा के सिंहासन पर समादृत कर देती है। लोक- प्रचलन की बोली ही अनुशासन और शिष्टाचार में प्रभावशाली होती हुई लोकभाषा हो गई है। बोली मौखिक होती है और जब बोली साहित्य में आ जाती है तो वह भाषा हो जाती है। भारत विविधताओं का बड़ा देश है। इसके अलग-अलग अनेक जनपद हैं। हर जनपद की अपनी बोली या भाषा है। बोलियों की एकरूपता के लिए व्याकरण लिखते हुए रचनात्मक विद्वानों ने उसे भाषा का दर्जा दे दिया है। इसे मातृभाषा कहकर गौरवान्वित किया गया। भारत के कई राज्यों में कई-कई मातृभाषाएं हैं। बिहार राज्य में प्रमुख रूप में भोजपुरी, मैथिली, अंगिका, बज्जिका, मगही जैसी मातृभाषाएं हैं। इसके क्षेत्रों की सीमा भी है मगर सीमांत पर एक दूसरे से मिलकर भाषा का स्वरूप हर जगह बदलता चला गया है। इसके अतिरिक्त भी आदिवासी क्षेत्र की अपनी भाषा है। वह कहीं संथाली है तो कहीं नगपुरिया है। खोरठा, पंचपरगनिया भी बिहार के क्षेत्र विशेष की बोलियां हैं। अन्य राज्यों में भी ऐसी ही कई बोलियां हैं।
कई राज्यों की बोलियां जो मातृभाषा के रूप में जानी जाती हैं वे हिंदी की उपभाषाएं हैं। सभी जानते हैं कि मेरठ के एक छोटे से क्षेत्र से खड़ी बोली के रूप में हिंदी का उदय हुआ और वह आगे बढ़ता चला गया। उसका विस्तार हुआ तो उसमें अनेक जनपदों की शब्दावलियां समाहित होती चली गईं। उदारता के साथ अभिव्यक्ति के लिए किसी भी भाषा या बोली के शब्द को स्वीकार करने में हिंदी ने परहेज नहीं किया। आज हिंदी की व्यापकता भारत के अलावे भी कई देशों में पहुंच गई है और इसका निरंतर प्रसार तथा फैलाव हो रहा है। अंग्रेजी दासता से मुक्ति के लिए जिस पराधीन भारत ने हिंदी को पूरे देश में संपर्क भाषा के रूप में स्वीकार करते हुए स्वतंत्रता के लिए औजार की तरह इस्तेमाल किया उसी स्वतंत्र भारत में हिंदी को आज तक राष्ट्रभाषा राजकीय या सरकारी का सम्मान नहीं दिया गया। हिंदी भारत सरकार की राजभाषा है जबकि जन स्वीकार्यता और लोक संस्कृति में यह प्रचलित रूप से राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकृत और गौरवान्वित है। राजनीतिक कारणों से एक-आध प्रांत के क्षेत्रीय नेताओं का विरोध है। वे हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं जबकि उस प्रांत के लोगों का हिंदी से कोई भी स्वाभाविक विरोध नहीं है। वे भारत के दूसरे प्रांतों में कौटुंबिक, शैक्षणिक या व्यापारिक कारणों से आते-जाते रहते हैं। उनके यहां भी दूसरे प्रांतों के, विशेष रूप से हिंदी भाषा-भाषी लोग आते-जाते रहते हैं। हिंदी फिल्मों तथा रामकथा और श्रीमद्भागवत कथा के विद्वान संतों एवं प्रवचनकर्ताओं के भक्ति-भाव के प्रभाव में अहिंदी भाषा-भाषी लोगों की बड़ी संख्या है। हिंदी प्रदेशों के तीर्थ-दर्शन के लिए वे आते हैं तो उन्हें कदम-कदम पर हिंदी को सुनना पड़ता है। हिंदी एक सहज भाषा है जिसे सुनते हुए तुरंत ग्रहण किया जा सकता है।
हिंदी का विस्तार सहज स्वाभाविक रूप में होता चला गया है। इसका सम्मोहन और वैशिष्ट्य इसकी देवनागरी लिपि के कारण भी है। इसमें जो बोला जाता है वही लिखा जाता है। हिंदी के प्रचार-प्रसार में आम आदमी का महत्वपूर्ण योगदान है। हिंदी को साहित्य की भाषा मानने की जो विचित्र समझदारी है उससे मानसिकता को मुक्त होने की जरूरत है। यह ठीक है कि हिंदी भाषा में लिखे गए साहित्य ने अपनी उदारता और मनीषा से इसे व्यापक फलक पर पहुंचाया है। विश्व के सारे विकसित देशों की अपनी भाषा है और उसी भाषा में उसकी शिक्षा-पद्धति है। यह भारत की मानसिक गुलामी है जो तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में अंग्रेजी भाषा को ही सर्वोपरि मानती है। अब तक सरकारी स्तर पर बेकार के तर्क दिए जाते रहे कि चिकित्सा और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अंग्रेजी भाषा ही कारगर और एकमात्र आधार है। यह कहते और मानते हुए हम भूल जाते हैं कि भारतीय चिकित्सा पद्धति जो पूर्णतः प्रकृति आधारित आयुर्वेद रही है, वह संस्कृत भाषा के माध्यम से ही मानक बनकर प्रचलन में आज भी है। चरक और सुश्रुत जैसे अनेक विश्व विश्रुत आयुर्वेदिक चिकित्सक हुए हैं। उनके चिकित्सा शास्त्र के ग्रंथ आज भी उपलब्ध हैं जो आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति की रीढ़ हैं। वर्तमान समय में प्रसन्नता की बात है कि मध्य प्रदेश सरकार ने चिकित्सा और इंजीनियरिंग की पढ़ाई हिंदी में शुरू की तो उसका अनुकरण अन्य प्रांतों ने भी किया। अब हिंदी भाषा में तकनीकी पढ़ाई भी हो रही है और पुस्तकें भी उपलब्ध हैं।
हिंदी के हिमायती अहिंदी क्षेत्रों के बड़े-बड़े विद्वान और नेता हुए हैं। उनकी परंपरा में आज भी अनेक व्यक्तित्व हैं जो पूरी निष्ठा और तन्मयता से हिंदी की सेवा कर रहे हैं। हिंदी के लिए उनके मन में सहज प्रेम है। हम जिस भारतीय संस्कृति की दुहाई देते हैं वह संस्कृति उसी हिन्दी की है जो देवभाषा संस्कृत से निसृत हुई है। भारत के विश्व गुरु होने का मूलाधार वैदिक और पौराणिक ज्ञान-संपदा है। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये ज्ञान- संपदाएं हिंदी की जननी संस्कृत भाषा की मेधा और प्रज्ञा की ही उपलब्धियां हैं। हिंदी भाषा की समृद्धि उसकी सर्व समावेशी प्रवृत्ति और उदारता के कारण है। इसके पास किसी भी स्थिति और वस्तु स्वभाव के लिए साफ-साफ और पूर्ण अर्थ देने वाले शब्दों का भरा भंडार है। एक महा समुद्र की तरह है हिंदी जिसमें केवल भारत की भाषाएं ही नहीं बल्कि संसार की कई भाषाएं अपने अर्थगंभीर शब्दों के साथ अभिव्यक्ति-प्रवाह में नदी समान उतर आती हैं। इसे भी नहीं नकारा जा सकता है कि हमारे ही बहुत सारे शब्द दूसरी भाषाओं के रास्ते हमारे पास वापस लौटे हैं और लौट रहे हैं। ये शब्द संस्कृत के भी हैं, बौद्ध धर्म के भी हैं और लोक के भी हैं। संसार की समस्त भाषाओं में सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा और लिपि हिंदी तथा देवनागरी है। जहां दूसरे देश हमारी संस्कृति और बाजार के लिए हमारी भाषा को अंगीकार कर रहे हैं वहीं हम फैशनपरस्ती में अभी अंग्रेजीयत से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। यही स्थिति हमारे लिए दयनीय और चिंतनीय है। जाने क्यों पढ़े-लिखे संभ्रांत वर्ग; विशेषकर नौकरशाह हिंदी को हीनता की और अंग्रेजी को गर्व की भाषा मानते हैं तभी तो अपने घर में भी अधिकांशतया वे अंग्रेजी का ही प्रयोग करते हैं। विरले ही अपनी मातृभाषा या राजभाषा हिंदी का प्रयोग करते हैं। इस मानसिकता और क्रियान्वयन से उबरे बिना हम भारत का समग्र विकास कर लेंगे यह संभव नहीं है।
भूमंडलीकरण और विश्व बाजार के दौर में हिंदी विश्व भाषा बन गई है। मीडिया के फैले संजाल ने हर देश को एक दूसरे के बहुत पास ला दिया है। इस माध्यम से भाषा भी अनेक प्रकार और विधाओं से अपना प्रभाव तथा दायरा बढ़ा रही है। हिंदी भाषा की लयात्मकता तथा गतिशीलता हृदय को छूती है। इसके प्रति आकर्षण में भाषा का माधुर्य और आत्मीय होना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। संसार की स्वीकृति के बावजूद हिंदी भाषा के प्रति भारत में जो निष्ठा का अभाव और उदासीनता है उसी का परिणाम है कि सरकार इसे राष्ट्रभाषा के रूप में दृढ़ता के साथ लागू नहीं कर पा रही है। सत्ता का लोभ लालच भी राजनीति की बलिवेदी पर बार-बार हिंदी को लहूलुहान करता रहा है। यह सुखद है कि आज हमारा राष्ट्रीय नेतृत्व अपने हिंदीनिष्ठ पूर्वजों का अनुसरण करता हुआ लगातार अपनी वैदेशिक यात्राओं में भी हिंदी में गर्व, शौर्य और पराक्रम के साथ संवाद तथा संबोधन कर रहा है। हम अपने वैदिक ऋषियों की तरह हर दिशा से आने वाले अच्छे विचारों का स्वागत करें मगर भारतीयता के मूल्य पर कोई आंच नहीं आने दें तभी हमारी निजी, मौलिक और श्रेष्ठतम पहचान सुनिश्चित रहेगी। सभी भाषाओं का आदर करते हुए, उन्हें सीखते हुए हिंदी को हाशिए पर नहीं धकेल कर उसे विकास की मुख्यधारा में अगर सदा अग्रणी रखते हैं तो भारत की श्रेष्ठता भी हम बरकरार रखते हैं। विकास और व्यवस्था के चारों स्तंभों में न्यायपालिका आज भी हिंदी के मामले में बहुत शिथिल और निष्क्रिय है। सरकारी निबंधन और प्रबंधन की भाषा भी हिंदी नहीं है। वकील, डॉक्टर, इंजीनियर तथा सरकारी पदाधिकारी छोटा-सा और साधारण काम या संवाद भी अंग्रेजी में ही करते हुए धन्य होने का भ्रम पाले रखते हैं। यह हीनता और सांस्कृतिक उदासीनता नहीं तो और क्या है? हिंदी स्वाभिमान की भाषा है, स्वतंत्रता की भाषा है, पूर्वजों की भाषा है, संस्कृति की भाषा है। हिंदी मां है तो इसे उसी उच्चता और श्रेष्ठता के साथ सदा अपने संग-साथ मन, चित्त, हृदय, बुद्धि, प्राण, आत्मा और चेतना में संजो कर रखना पड़ेगा। हमारी धड़कनों में स्पंदित होती हुई हिंदी हमारी सांसों में सतत प्रवाहित होती रहे तभी हमारे और हमारे महान देश भारत के होने का विश्वव्यापी अर्थ है।

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