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आज का चिंतन

सारा आर्य जगत् दयानन्द के जन्म संवत् को ही अमान्य कर बैठा!

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“शान्तिधर्मी” के फरवरी, २०२३ के अंक में विक्रमी संवत् २०७९ और दयानन्दाब्द १९९ अंकित है।
इसके आगे “शान्तिधर्मी” के मई, २०२३ के अंक में विक्रमी संवत् २०८० और दयानन्दाब्द २०० अंकित है। इससे प्रकट होता है कि यह पत्र दयानन्द का जन्मदिन १२ फरवरी को मानता है।

“वानप्रस्थ साधक आश्रम, रोज़ड़” का २०२३ ई. का कलेण्डर जनवरी, २०२३ में विकम संवत् २०७९ और दयानन्दाब्द १९८ दर्शाता है। यही कलेण्डर अगले फरवरी माह में विक्रम संवत् २०७९ और दयानन्दाब्द १९८-१९९ दर्शाता है। अर्थात् वानप्रस्थ साधक आश्रम भी दयानन्द का जन्मदिन १२ फरवरी को ही मानता है। पर इनका दयानन्दाब्द “शान्तिधर्मी” से एक वर्ष पीछे चल रहा है।
वानप्रस्थ साधक आश्रम ने संवत् २०८० का आरम्भ २२ मार्च, २०२३ से किया हुआ है जो अगले वर्ष २०२४ के मार्च माह की किसी तारीख तक चलेगा।
अब विचार करना चाहिए कि दयानन्द के जन्म के २०० वर्ष १२ फरवरी की इस तारीख के अनुसार १२ फरवरी, २०२४ ई. को ही पूरे होंगे जब विक्रमी संवत् २०८० ही होगा। पर दयानन्द ने तो लिखित रूप से अपना जन्म संवत् १८८१ बताया हुआ है जो उनके जन्म के २०० वर्ष बाद २०८१ होना चाहिए था‌ पर अपने को आर्य और आर्यसमाजी बताने वाले किसी भी व्यक्ति की बुद्धि में यह साधारण सी बात भी अब तक समझ में नहीं आ पाई है जो उन्होंने सारे आर्यजगत् को ही भेंड़वत् एक के पीछे एक मूर्खवत् चलने को विवश कर दिया है और अपने इस कृत्य के समर्थन में आर्य समाज के १०वें नियम कि “सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतन्त्र रहें‌।” की दुहाई दे रहे हैं।
देखो आज के आर्यसमाजियों ने दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश के मिशन की कैसी हत्या कर दी है!
ऋषि दयानन्द का वास्तविक जन्मदिन भाद्रपद शुक्ल ९ गुजराती संवत् १८८१ तदनुसार २० सितम्बर, १८२५ ई. मंगलवार (मूल नक्षत्र के चतुर्थ चरण में) है।

  • आदित्यमुनि वानप्रस्थ
    भोपाल, २७ नवम्बर, २०२३ ई .

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