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महाभारत की शिक्षाप्रद कहानियां अध्याय – १० क भीष्म पितामह का अनुकरणीय जीवन

( महाभारत का युद्ध तो हुआ पर इससे वैदिक संस्कृति का भारी अहित हुआ । करोड़ों वर्ष से जिस संस्कृति के माध्यम से विश्व का मार्गदर्शन हो रहा था उसे इस युद्ध ने बहुत अधिक क्षतिग्रस्त कर दिया। 18 अक्षौहिणी सेना के अन्त से इतना अधिक राष्ट्र का अहित नहीं हुआ जितना वैदिक संस्कृति के पतन से हुआ। महाभारत का युद्ध वैदिक धर्म व संस्कृति के अस्त होने का कारण बना। इस युद्ध में बड़े-बड़े योद्धा और वैज्ञानिक समाप्त हो गए।
भीष्म पितामह इस युद्ध का सबसे बड़ा बलिदान था।
भीष्म पितामह की कहानी मर्यादा की कहानी है। राष्ट्र के प्रति समर्पित होकर जीने वाले एक ऐसे योद्धा की कहानी है जिसने मर्यादाओं का सदा पालन किया। उन्होंने हस्तिनापुर नरेश के रूप में अपने पिता में तो पिता के दर्शन किये ही अपने उन भतीजों और पौत्रों तक में भी पिता के दर्शन किए जो उनके जीवन काल में हस्तिनापुर के राजा बने।
आदर्श और सिद्धांतों के प्रति उनका इतना अधिक समर्पण और नैतिकता के सामने शीश झुकाकर खड़े हो जाने की उनकी पवित्र भावना उन्हें इतिहास का एक अमर नायक तो बनाती ही है साथ ही इतनी ऊंचाई पर बैठा देती है कि उस ऊंचाई को छूने के लिए लोगों को पता नहीं कितने जीवन खपाने पड़ जाएंगे ? उनका निष्कलंक और पवित्र जीवन कहीं से भी यह संकेत नहीं देता कि यहां पर भीष्म ने नैतिकता की हत्या की, आदर्श की अवहेलना की अथवा मर्यादा का उल्लंघन किया। – लेखक)

   भीष्म जी भीष्म बनने से पहले देवव्रत थे। पर जब उन्होंने यह भीषण प्रतिज्ञा की कि वह आजीवन ब्रह्मचारी रहेंगे और हस्तिनापुर के राजसिंहासन पर जो भी शासक बैठेगा , उसमें वह पिता के ही दर्शन करेंगे तो वह देवव्रत से भीष्म हो गए। उन्होंने सत्यवती से विवाह कराने में अपने पिता की इच्छा को पूर्ण करने में सहायता दी। मानव जाति के इतिहास में शायद ही कोई दूसरा भीष्म हुआ हो जिसने अपने पिता की इच्छा पर पुष्प अर्पित करते हुए इस प्रकार अपनी मानवोचित अभिलाषाओं और आकांक्षाओं का बलिदान दिया हो। यद्यपि उनका इस प्रकार का दिया गया बलिदान ही उनके लिए जी का जंजाल बन गया । पर यह अलग बात है। यहां केवल यह देखना है कि उन्होंने जिन सिद्धांतों और आदर्शों को लेकर जीवन जिया ,उनके प्रति वह जीवन भर निष्ठावान बने रहे। सिद्धांतों के प्रति निष्ठावान बने रहना ही किसी भी व्यक्ति की कहानी को दूसरों के लिए शिक्षाप्रद बनाता है। यदि वह टूटती हुई मर्यादाओं के उस भयानक जंगल में अपने आपको मर्यादाओं के रक्षक के रूप में स्थापित न करते तो आज कोई नहीं जानता कि जब राजनीति के शुष्क जंगल में मर्यादाएं आत्महत्या कर रही थीं , तब उनके रक्षक के रूप में कोई भीष्म भी यहां आया था ? जब वीरता दुर्योधन और दु:शासन जैसे पातकी लोगों के माध्यम से नारी शक्ति का अपमान करते हुए कलंकित हो रही थी, तब एक निष्कलंक और पवित्र जीवन का श्वेत वस्त्रधारी वीर रक्षक सच्ची वीरता के प्रति निष्ठा व्यक्त करते हुए अपने ढंग से उन पातकियों का विरोध कर रहा था। माना कि युद्ध के समय भीष्म जी दुर्योधन पक्ष से कौरव सेनापति के रूप में लड़े , पर पांडवों को जीवन का अभय दान देकर उन्होंने उनकी जीत का मार्ग प्रशस्त किया। ऐसा उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए किया। 

इसके साथ ही उन्होंने युद्ध में सम्मिलित होकर यह भी सिद्ध किया कि वह अपनी प्रतिज्ञा से बंधे होकर हस्तिनापुर नरेश की आज्ञा का पालन करने के लिए अभिशप्त हैं। वह जानते थे कि इस अभिशाप का अंतिम परिणाम उनके जीवन का बलिदान होगा, पर उन्होंने इस सबको स्वीकार किया। वह युद्ध से भागे नहीं। उन्होंने संन्यास भी नहीं लिया और अपनी पहले वाली प्रतिज्ञा को तोड़कर उसमें कोई नई किंतु परंतु लगाकर सही समय पर पाला बदलकर पांडवों के पक्ष में जाकर खड़े भी नहीं हुए। उन्होंने समझ लिया कि इस युद्ध में अब अपनी इच्छा मृत्यु के वरदान को पूर्ण करते हुए आत्मोत्सर्ग करना ही धर्म के अनुकूल होगा।
हमारे यहां पर व्यक्ति के जीवन को चार आश्रमों में विभक्त किया गया था – प्रथम ब्रह्मचर्य, दूसरा गृहस्थ, तीसरा वानप्रस्थ और चौथा संन्यास आश्रम। हम सभी जानते हैं कि प्रथम ब्रह्मचर्य आश्रम जन्म से आरम्भ होकर लगभग 25 वर्षों तक का होता है। जिसमें 5 वर्ष की आयु के बाद बालक व बालिका को माता-पिता की सहायता से शिक्षा हेतु गुरूकुल, पाठशाला या विद्यालय में प्रवेश करना अनिवार्य होता था। 25 वर्ष तक इन्द्रियों को पूर्ण संयम में रखकर विद्याग्रहण करना उस समय अनिवार्य माना जाता था। इस दौरान शरीर को बलिष्ठ ,ऊर्जावान और स्फूर्तिवान बनाया जाता था। मस्तिष्क को भी तेज बनाकर विज्ञान आदि में उन्नति की जाती थी। महर्षि मनु प्रतिपादित धर्म शास्त्र ‘मनुस्मृति’ में आश्रमों के धर्म निश्चित किए गए थे। इस आश्रम धर्म में प्रत्येक व्यक्ति तन्मयता के साथ लीन रहता था। जिससे समाज और राष्ट्र की उन्नत दशा बनी रहती थी।
भीष्म पितामह इस प्रकार की आश्रम व्यवस्था में विश्वास रखते थे । वह राष्ट्र के प्रत्येक निवासी को आश्रम व्यवस्था के प्रति समर्पित रहकर धर्म के निर्वाह में सन्नध रखने के पक्षधर थे। वह राष्ट्र के प्रति समर्पित थे और राष्ट्र को उन्नत बनाने के लिए ऋषियों की प्रत्येक वैज्ञानिक और वैदिक बात को मानते थे।
जब उन्होंने हस्तिनापुर के राज्य सिंहासन पर बैठने वाले प्रत्येक शासक में अपने पिता के दर्शन करने का संकल्प लिया था तब उन्हें यह पता नहीं था कि उनके जीते जी हस्तिनापुर के राज्य सिंहासन पर धृतराष्ट्र और दुर्योधन जैसे लोग अपना नियंत्रण स्थापित कर लेंगे। उन्होंने जल्दबाजी में प्रतिज्ञा ली और उस प्रतिज्ञा से बंधकर वह अपने आपको असहाय अनुभव करने लगे। सर पटक – पटककर मारने और हताश निराश होकर अपने वचन से बंधे रहने के लिए अभिशप्त हुए भीष्म सबके प्रेरणा स्रोत होकर भी कई बार ऐसा लगता था कि जैसे वह दुर्योधन आदि की उपेक्षा के पात्र बनकर तिरस्कार का जीवन जी रहे हैं।
उन्होंने दुर्योधन और उसकी चांडाल चौकड़ी के उस प्रत्येक निर्णय का हर समय विरोध किया जिससे मर्यादाओं का हनन होना संभावित था या हस्तिनापुर के राजवंश की मान्य परंपराओं का जिनसे हनन हो सकता था । उन्होंने मनु प्रतिपादित राज्य व्यवस्था का पालन करते हुए काम करना चाहा, इसके साथ ही हस्तिनापुर के राज्य सिंहासन पर बैठने वाले प्रत्येक शासक से भी यही अपेक्षा की। यद्यपि धृतराष्ट्र और दुर्योधन उनकी इस प्रकार की अपेक्षा पर कभी खरे नहीं उतरे।
वह पांडवों के प्रति और विशेष रूप से धर्मराज युधिष्ठिर के प्रति इसलिए झुकाव रखते थे कि वे लोग धर्म का पालन करने में विश्वास रखते थे। श्री कृष्ण जी के प्रति भी उनकी श्रद्धा इसीलिए थी कि श्री कृष्ण जी भी मर्यादाओं का पालन करने में विश्वास रखते थे। इसके उपरांत भी वे हस्तिनापुर को छोड़कर नहीं जा सकते थे। इस प्रकार भीष्म पितामह का जीवन एक अजीब से पालने में झूलता रहा। परिस्थितियां कभी उन्हें पालने की भांति इस ओर धकेलती तो कभी उस ओर धकेलती थीं। उस पालने में सोने वाला भीष्म रूपी बच्चा सदा ही अपने आप को दु:खी सा अनुभव करता रहा। यद्यपि उस झूलने वाले बालक के बारे में यह भी सर्वविदित तथ्य है कि वह अत्यंत बुद्धिमान, धर्म प्रेमी, विद्यानुरागी, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला और सत्यव्रती व्यक्तित्व का धनी था। उनके तेजस्वी व्यक्तित्व का सामना करना हर किसी के बस की बात नहीं थी। यह दुर्योधन का हठीला और दुराग्रही स्वभाव ही था जो भीष्म पितामह की बुद्धिमत्ता और जितेंद्रियता का भी मजाक उड़ा लिया करता था। परंतु ध्यान रहे कि दुर्योधन का इस प्रकार का मजाक उड़ाना ही उसके अंत का कारण बना। यदि वह भीष्म पितामह के अनुभवों का लाभ उठाता तो वह भी इतिहास का एक सम्मानित अमर नायक बन सकता था।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( यह कहानी मेरी अभी हाल ही में प्रकाशित हुई पुस्तक “महाभारत की शिक्षाप्रद कहानियां” से ली गई है . मेरी यह पुस्तक ‘जाह्नवी प्रकाशन’ ए 71 विवेक विहार फेस टू दिल्ली 110095 से प्रकाशित हुई है. जिसका मूल्य ₹400 है।)

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