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इतिहास के पन्नों से

महाभारत में प्रक्षिप्त (मिलावट) है, एकलव्य का कथानक

  • लेखक – आर्य सागर

वैदिक कालीन गुण कर्म स्वभाव पर आधारित श्रेष्ठ सामाजिक वर्ण आश्रम व्यवस्था पर भारतीय वामपंथी व मूल निवासी गैंग का एक चिर परिचित विधवा विलाप 20वीं सदी से ही चल रहा है विशेष तौर पर महाभारत ग्रंथ को लेकर। तथाकथित समतावादी वामपंथी दुराग्रही ढीठ मानसिकता का परिचय भारतीय ऐतिहासिक महाकाव्य रामायण व महाभारत को लेकर देते हैं। एक तरफ तो वह इन ग्रंथो को काल्पनिक इनमें वर्णित पात्रों को कोई ऐतिहासिक मान्यता प्रदान नहीं करते तो वही गुरु द्रोण द्वारा तथाकथित एकलव्य से गुरु दक्षिणा में अंगूठा मांगना क्योंकि वह वनवासी जनजाति से था इस कारण गुरु द्रोण जातिवादी थे तो वहीं श्री राम द्वारा तथाकथित तपस्वी दलित शम्बूक के वध की घटना को राम द्वारा दलित शम्बूक के साथ किए गए अमानवीय अत्याचार के तौर पर प्रस्तुत करते हैं।

महाभारत पर अनुसंधान करने वाले भारतीय विद्वान एक स्वर में इस तथ्य से सहमत है कि समय-समय पर इस ग्रंथ के कलेवर व श्लोक सामग्री को बढ़ाया गया है। इस संबंध में सबसे पहले चिंतन करने वाले विचारक आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद ही थे। इस प्रसंग में वह अपने ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश के एक प्रकरण में लिखते हैं।मध्यकाल में रचित राजा भोज के ग्रंथ ‘संजीवनी’ में यह उल्लेख मिलता है जिसमें महाभारत ग्रंथ को लेकर राजा भोज की स्वीकारोक्ति है कि मूल महाभारत ग्रंथ 10000 श्लोकी था और उनकी उम्र में आते-आते यह 30000 श्लोक युक्त पुस्तक के रूप में मिलता है ।यदि ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन इस पुस्तक को ऊंट पर लाधा जाएगा।राजा भोज की भविष्यवाणी आज सत्य सिद्ध हो रही है आज गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा 1 लाख से अधिक श्लोक का महाभारत प्रकाशित होता है। महर्षि व्यास के काल से लेकर 21वीं शताब्दी तक इस ग्रंथ का कलेवर 10 गुना से अधिक बढ गया है।

मूल जय ग्रंथ जिसका नाम भारत हुआ और भारत से महाभारत हुआ उसके केवल तीन ही आदि प्रवक्ता वे तीन ही श्रोता थे जिसमें शामिल है स्वयं महर्षि व्यास उनके शिष्य वैशम्पायन जन्मेजय ऋषि लोमहर्षण के पुत्र सौति, शौनक ऋषि आदि। मूल 10000 श्लोकी महाभारत में एकलव्य नाम के किसी भी पात्र का उल्लेख नहीं मिलता जब उल्लेख नहीं मिलता तो ब्राह्मण धनुर्वेद के आचार्य द्रोण द्वारा वनवासी होनहार प्रतिभावान युवक एकलव्य के साथ अत्याचार की घटना कब किसने जोड़ी यह साहित्यक अनुसंधान का विषय है।

वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूं आधुनिक रसूल तथाकथित समतावादी मानवतावादी ई रामास्वामी पेरियार को ऐसी कपोल कल्पना करने भारतीय समाज को तोड़ने वैदिक संस्कृति को कलंकित करने में भ्रांत धारणाओं के दुष्प्रचार में मास्टर डिग्री हासिल थी उनके द्वारा लिखित कपोल कल्पनाओं का पुलिंदा सच्ची रामायण लघु ग्रंथ इसका प्रमाण है।

वेदों को छोड़कर वैदिक वांग्मय में जितना भी साहित्य उपलब्ध मिलता है सभी में कहीं ना कहीं मिलावट की गई है कम या ज्यादा मनमाने श्लोक सूत्र भाष्य जोड़े गए हैं जिनको दुषप्रचारित दुष्प्रयोग प्रयोग भारतीय वामपंथ करता है अपने जहरीली विचारधारा को प्रचारित प्रसारित करने के लिए।

वही मूल महाभारत ग्रंथ प चर्चा करें तो वामपंथी तथा मूलनिवासी गैंग के प्रवक्ता इस ग्रंथ की दो सामाजिक समरसता समता को स्थापित करने वाले घटनाओं पर कभी चर्चा तक नहीं करते जो इस ग्रंथ की मूल आत्मा है। दुर्भाग्य तो यह है महाभारत आदि की कथा करने वाले पौराणिक कथावाचक भी महाभारत के मूल आदर्श को प्रस्तुत नहीं कर पाते वहीं वामपंथी अपनी काल्पनिक कथाओं को भी सत्य के तौर पर स्थापित प्रसारित कर भारतीय समाज को विभाजित करते हैं।

ऐतिहासिक ग्रंथ महाभारत के एक पात्र विदुर की बात हम करते हैं यह जग जाहिर है विदुर नियोग से उत्पन्न संतान थे जिनका जन्म एक दासी की कोख से हुआ दासी पुत्र होने के बावजूद भी यह उस काल की श्रेष्ठ गुण कर्म स्वभाव योग्यता के सम्मान को समर्पित राजनीतिक व सामाजिक व्यवस्था का प्रमाण है वह हस्तिनापुर जैसे वैभवशाली साम्राज्य के महामंत्री बने और इतना ही नहीं धृतराष्ट्र जैसे सम्राट को उनके 100 पुत्रों के जीवित रहते हुए भरी सभा में विदुर फटकार लगाते हैं योगेश्वर श्री कृष्ण उनके घर पर अतिथि भोज करते हैं दुर्योधन के भोज को ठुकराकर सोचिए वैदिक संस्कृति कितनी महान रही होगी जहां एक दासी के पुत्र को भी इतने बड़े साम्राज्य का महामंत्री नियुक्त किया जाता है क्या दुनिया के किसी सभ्यता के इतिहास में जिसमें यूनान रोम मिश्र व चीन की सभ्यता शामिल है वहां ऐसा उदाहरण दिखाई देगा वहां दासों की क्या स्थिति रही है यह जग जाहिर है दासों पर अत्याचारों से यूरोप का इतिहास भरा हुआ है। आधुनिक सुपर पावर अमेरिका तो दास प्रथा को लेकर अब्राहम लिंकन के कार्यकाल तक बदनाम रहा है।

महाभारत कालीन भारत में कुल गोत्र जन्म स्थान के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं था इस तथ्य को सिद्ध करने वाले ऐतिहासिक ग्रंथ महाभारत के दूसरे पात्र महारानी राजमाता सत्यवती की चर्चा करते हैं।

हस्तिनापुर जैसे आर्य वैदिक संस्कृति के मुख्य केंद्र चक्रवर्ती साम्राज्य की राजमाता बनने से पूर्व आखिरी सत्यवती कौन थी सत्यवती एक मल्लाह व मछुआरे की पुत्री थी जो अत्यंत रुपमती थी जो नौकाचालन कर अपने पिता का हाथ बटाती थी ।

महाराजा प्रतीप का पुत्र महाराजा शांतनु जब उससे मिलता है तो उसके रूप पर आसक्त होकर उसके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखता है ।सत्यवती अपने पिता से मिलने के लिए महाराज शांतनु से कहती है कि वह अपने प्रस्ताव को उनके समक्ष रखे । अब यही से भारत की राजव्यवस्था द्वारा प्रदत्त स्थापित लोकतांत्रिक मूल्यों साधारण से साधारण व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निर्भीकता का आदर्श उदाहरण हमें मिलता है। जब महाराज शांतनु सत्यवती के पिता से मिलते हैं तो वह महाराज शांतनु के समक्ष यह शर्त लगा देता है कि में अपनी पुत्री का विवाह तुम्हारे साथ कर सकता हूं लेकिन मेरी एक शर्त है राज्य का उत्तराधिकारी तुम्हारा पहली पत्नी से उत्पन्न पुत्र जिसे तुमने युवराज घोषित किया है देवव्रत अर्थात भीष्म नहीं मेरी पुत्री की कोख से जन्म लेने वाला पुत्र होगा। सोचिए ऐसा उदाहरण आपको दुनिया की अन्य संस्कृति राजव्यवस्था में मिल सकता है ।महाराज शांतनु धन वैभव बल से संपन्न थे । वह चाहते तो सत्यवती का बलपुर्वक हरण कर सकते थे लेकिन उस काल में कितनी सुंदर लोकतांत्रिक व्यवस्था थी जहां एक बेटी का पिता भी निर्भीकता से एक सम्राट से अपनी शर्तों मानवता है अपनी बेटी के सुखद भविष्य के लिए।

इन सब आदर्श राजव्यवस्थाओं के पीछे मनु आदि ऋषियों का विधान मनुस्मृति थी जहां राजा पर धर्म मर्यादा व नैतिकता के कठोर नियम लागू होते थे। भारत के प्राचीन राजा महाराजा कभी भी स्वेच्छाचारी निरंकुश असंयमित नहीं रहे।

आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में बहन बेटियों के साथ धनवान बलवान क्या-क्या नहीं करते स्त्री की सहमति का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता आए दिन की घटनाएं इस पर मोहर लगाती है। यूरोप के राजवंशों का जहां इतिहास मिलता है वहां स्त्रियों को जबरन महल में कैद कर लिया जाता था कामी विलासी राजाओं के द्वारा। वही अरब आक्रांता इस्लामी लुटेरे जिहादियों का तो इस संबंध में कहना ही क्या?

तथाकथित समतावादीयो मूल निवासी गैंग वामीयो को महाभारत जैसे प्राचीन ऐतिहासिक महाकाव्य के यह आदर्श दिखाई नहीं देते दिखाई देते भी होंगे तो स्वार्थ विद्वेष का पर्दा उनकी आंखों पर पड़ा रहता है।

लेखक – आर्य सागर
तिलपता ग्रेटर नोएडा

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