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महाभारत की शिक्षाप्रद कहानियां अध्याय – ७ ख गौओं का अपहरण और बृहन्नला

जैसा अर्जुन ने सोचा था, वैसा ही हुआ। राजकुमार उत्तर ने जैसे ही कौरव दल के हाथियों, घोड़ों और रथों से भरी हुई विशाल सेना को देखा तो उसके रोंगटे खड़े हो गए । उसने अर्जुन से कह दिया कि मुझ में कौरवों के साथ युद्ध करने का साहस नहीं है । डर के कारण मेरे रोंगटे खड़े हो गए हैं। मेरा हृदय व्यथित सा हो गया है। मेरे पास कोई सैनिक नहीं है। मैं अकेला बालक हूं और मैंने अस्त्र विद्या में कोई अधिक परिश्रम नहीं किया है। अतः तुम मेरे रथ को लौटा लो।”
तब बृहन्नला ने कहा कि तुमने अपने राजभवन में स्त्रियों के मध्य तो कौरवों को हराने की प्रतिज्ञा की थी और अपनी आत्म- प्रशंसा करते थक नहीं रहे थे ? अब तुम्हें क्या हो गया है? यदि तुम गायों को बिना जीते ही घर लौटोगे तो वीर पुरुष तुम पर हंसेंगे। अब गायों को जीत कर वापस लिए बिना नगर में जाना उचित नहीं होगा। अर्जुन के लाख समझाने पर भी उत्तर कुमार आगे बढ़ने को तैयार नहीं था। तब अर्जुन ने उसे अपना सारथि बनने के लिए तैयार किया। अर्जुन ने कहा कि “अब तुम मेरे सारथि बनकर इस रथ को दूर जंगल में खड़े अमुक शमीवृक्ष की ओर लेकर चलो।”
वहां पहुंचकर शमी वृक्ष के ऊपर रखे अस्त्र शस्त्रों की ओर संकेत कर अर्जुन ने उत्तर कुमार से कहा कि “तुम इन अस्त्र-शस्त्रों को उतार कर लाओ।” अर्जुन ने बताया कि “यह सभी अस्त्र-शस्त्र धनुष आदि पांडवों के हैं। जब उत्तर कुमार ने उस पेड़ से उतारकर उन धनुषों को देखा तो वह दंग रह गया। उसने कहा कि जो पांडव इन अस्त्र-शस्त्रों को धारण करते थे, अब वे कहां है ? तब अर्जुन ने उसे स्पष्ट बता दिया कि “मैं ही अर्जुन हूं।” इसी प्रकार अपने शेष भाइयों का भेद भी अर्जुन ने खोल दिया।
उसने बताया कि “राजा की सभा के माननीय सदस्य कंक धर्मराज युधिष्ठिर हैं। तुम्हारे पिता के भोजनालय में रसोइये का काम करने वाले बल्लव ही भीमसेन है। अश्वों की देखभाल करने वाले ग्रंथिक ही नकुल हैं और गौशाला के अध्यक्ष तन्तिपाल ही सहदेव हैं। इसी प्रकार सैरंध्री द्रौपदी है।”
अर्जुन से सारी सच्चाई को जानकर उत्तर कुमार का भय दूर हो गया। अर्जुन ने वीरोचित साज सज्जा कर अपने गांडीव को धारण किया और बड़े वेग से धनुष पर प्रत्यंचा चढाकर उसकी टंकार की। धनुष की टंकार के समय बड़ा प्रचंड शब्द हुआ। मानो किसी महान पर्वत को पर्वत से ही टक्कर लगी हो।
अर्जुन के गांडीव की टंकार को सुनकर दुर्योधन समझ गया कि यह जो योद्धा उसकी सेना की ओर बढ़ता आ रहा है, यह कोई और नहीं बल्कि अर्जुन ही है। तब उसने भीष्म ,द्रोणाचार्य आदि से आकर कहा कि अभी पांडवों के अज्ञातवास का समय पूर्ण नहीं हुआ है। उससे पूर्व ही अर्जुन आज प्रकट होकर हमारे साथ युद्ध करने आ रहा है। उसने स्पष्ट किया कि पांडव क्योंकि अपने अज्ञातवास में समय से पहले ही प्रकट हो गए हैं इसलिए जुए की शर्त के आधार पर अभी उन्हें 12 वर्ष के लिए फिर से वनवास में जाना होगा। दुर्योधन के इस प्रकार के मूर्खतापूर्ण वचनों को सुनकर भीष्म जी ने उसे कालचक्र व पक्ष, मास आदि का हिसाब लगाकर बताया कि पांडव अपने समय से ६ दिन अधिक का समय अज्ञातवास में व्यतीत कर चुके हैं, इसलिए अब उनका प्रकट होना जुए की किसी शर्त का उल्लंघन नहीं है।
समय थोड़ा था और अर्जुन पूर्ण वेग के साथ कौरव दल की ओर बढ़ता आ रहा था। तब भीष्म जी ने व्यवस्था दी कि इस समय दुर्योधन को एक चौथाई सैन्य दल लेकर हस्तिनापुर की ओर प्रस्थान करना चाहिए । जबकि एक चौथाई सैन्य दल गायों की रक्षा के लिए काम करे। शेष आधा सैन्य दल मिलकर अर्जुन का सामना करेगा । सभी की सहमति इसी पर बनी।
जब अर्जुन युद्ध क्षेत्र के निकट आकर रुक गया तो उसने दो बाण द्रोणाचार्य के पैरों की ओर मारे, जबकि दो बाण उनके कानों को छूकर निकल गए। अर्जुन के इस पराक्रम को देखकर द्रोणाचार्य समझ गए कि उन्होंने पहले दो बाणों से उन्हें प्रणाम किया है और दो बाणों से मेरा कुशल मंगल पूछते हुए युद्ध के लिए आज्ञा मांगी है।
आगे बढ़ते हुए अर्जुन ने जब देखा कि कौरव दल में कहीं पर भी दुर्योधन दिखाई नहीं दे रहा है तो उन्होंने वहां पर खड़े हुए सभी महारथियों से युद्ध न करने का निर्णय लिया और जिधर दुर्योधन बढ़ा हुआ चला जा रहा था उसकी ओर प्रस्थान कर दिया। आगे बढ़कर अर्जुन ने दुर्योधन को चुनौती दी। अर्जुन ने स्पष्ट रूप में अपना नाम घोषित कर दुर्योधन की सेना पर आक्रमण कर दिया। कौरव दल के पांव उखड़ते जा रहे थे। यहां तक कि कर्ण भी घायल हो गया । उसके घोड़े और सारथी के मारे जाने और रथ के नष्ट हो जाने पर सारी सेना में भगदड़ मच गई। अर्जुन ने द्रोणाचार्य को 73 , दु:सह को 10, अश्वत्थामा को 8, दुशासन को बारह , कृपाचार्य को तीन , शांतनु नंदन भीष्म को साठ और राजा दुर्योधन को क्षीरप्र नाम वाले बाणों से घायल कर दिया।
कुंती पुत्र धनंजय ने विजय के लिए प्रथम भीष्म की छाती में 10 तीक्ष्ण बाण मार कर गहरी चोट पहुंचाई। भीष्म रथ का कूबर पकड़कर बहुत देर तक निश्चेष्ट बैठे रह गए। वे बेहोश से थे। भीष्म युद्ध क्षेत्र छोड़कर कुछ देर के लिए दूर हट गए । इसी प्रकार अर्जुन ने कौरव दल के प्रत्येक योद्धा की स्थिति दयनीय बनाकर रख दी थी । किसी को भी यह अनुमान नहीं था कि मत्स्यराज पर की गई इस चढ़ाई के दौरान उन्हें अर्जुन से मुकाबला करना पड़ सकता है। उस समय दुर्योधन रक्त की उल्टियां करता हुआ भागता जा रहा था। उसकी ऐसी हालत देखकर अर्जुन ने उसे ललकारते हुए कहा कि “तू युद्ध से पीठ दिखाकर क्यों भागा जा रहा है ? ऐसा करके तू अपनी कीर्ति और महान यश से हाथ धो बैठा है । आज तेरी विजय के बाजे पहले जैसे नहीं बज रहे हैं । राजा का आचार और व्यवहार कैसा होना चाहिए ! थोड़ा इस पर भी तुझे इस समय विचार करना चाहिए।”
अंत में कौरव दल के सभी योद्धाओं ने मिलकर अर्जुन पर सामूहिक प्रहार करना आरंभ किया। इस सामूहिक प्रहार में भीष्म जी भी साथ थे । तब अर्जुन ने देश,काल और परिस्थिति पर विचार करते हुए सम्मोहन नमक दूसरा शस्त्र छोड़ दिया। जिसका निवारण करना उनमें से किसी के लिए भी संभव नहीं था। कुंती पुत्र अर्जुन ने भयंकर शब्द करने वाले अपने प्रचंड शंख को दोनों हाथों से थामकर बजाया। उसकी ध्वनि संपूर्ण दिशा-विदिशाओं में, आकाश और पृथ्वी में गूंजने लगी। कौरव दल के सभी महारथी उस समय मूर्च्छित हो चुके थे।
तब अर्जुन ने उत्तरा की कही हुई बात को स्मरण कर उत्तर से कहा कि “जब तक यह कौरव होश में आएं ,उससे पूर्व ही सेना के बीच से निकल जाओ और आचार्य द्रोण और कृपाचार्य के शरीर पर जो श्वेत वस्त्र सुशोभित है, कर्ण के अंगों पर जो पीले रंग का वस्त्र है, अश्वत्थामा एवं राजा दुर्योधन के शरीर पर जो नीले रंग के वस्त्र हैं ,उन सबको उतार कर ले आओ। पर ध्यान रखना पितामह भीष्म इस समय भी होश में हैं। तुम उनके घोड़ों को बांई और छोड़ कर जाना । क्योंकि जो बेहोश न हो ऐसे वीरों के निकट से जाना हो तो इसी प्रकार जाना चाहिए।”
उत्तर अर्जुन के कहने के अनुसार बेहोश पड़े कौरवों के कपड़े उतार कर ले आता है। इसके बाद विजयी मुद्रा में अर्जुन उत्तर कुमार के साथ विराट नगरी की ओर प्रस्थान कर जाते हैं।
कहानी बताती है कि अपने गोपनीय भेद कभी किसी को बताने नहीं चाहिए , संकट काल में कभी भी धैर्य नहीं खोना चाहिए। कृतज्ञता ज्ञापित करना शूरवीरों का कार्य है। न्याय के लिए संघर्ष जारी रखना चाहिए और जब आपको यह दिख रहा हो कि शत्रु भविष्य में कष्ट देगा तो अर्जुन की भांति समय रहते तैयारी करके रखनी चाहिए। न जाने जीवन के किस मोड़ पर आपको अपने हथियार उठाने पड़ जाएं?

डॉ राकेश कुमार आर्य

( यह कहानी मेरी अभी हाल ही में प्रकाशित हुई पुस्तक “महाभारत की शिक्षाप्रद कहानियां” से ली गई है . मेरी यह पुस्तक ‘जाह्नवी प्रकाशन’ ए 71 विवेक विहार फेस टू दिल्ली 110095 से प्रकाशित हुई है. जिसका मूल्य ₹400 है।)

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