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इतिहास की पड़ताल पुस्तक से …. जयद्रथ और अभिमन्यु -अध्याय 3

पने ज्येष्ठ पिताश्री धर्मराज युधिष्ठिर और अन्य पांडवों के आग्रह और आदेश को स्वीकार कर अभिमन्यु ने भयंकर युद्ध करना आरंभ किया। वह जिधर भी निकलता उधर ही कौरव दल में हड़कंप मच जाता। उसका साहस और उसकी वीरता आज देखने लायक थी। आज दैवीय शक्तियाँ भी अभिमन्यु की वीरता और युद्ध कौशल को रुककर देखने के लिए लालायित थीं। कौरव दल को कुछ देर में ही यह आभास हो गया कि यदि आज अर्जुन युद्ध क्षेत्र में नहीं है तो उसकी कमी उसके सुपुत्र अभिमन्यु ने पूरी कर दी है। यद्यपि अभिमन्यु के सारथी ने उसे कुछ हतोत्साहित करने का प्रयास किया परंतु उसने अपने सारथी से यह स्पष्ट कह दिया था कि “सारथे! इन द्रोणाचार्य अथवा संपूर्ण क्षत्रिय मंडल की तो बात ही क्या है? विश्वविजयी मामा श्रीकृष्ण और पिता अर्जुन को भी युद्ध में विपक्षी के रूप में सामने पाकर मुझे भय नहीं होगा।”

अभिमन्यु का पराक्रम

उसने अपने सारथी को आदेश दिया कि “अब तुम बिना विलंब किए शीघ्र द्रोणाचार्य की सेना की ओर चलो।”

अति भयंकर संग्राम करते हुए द्रोणाचार्य के देखते-देखते अर्जुन कुमार अभिमन्यु चक्रव्यूह का भेदन कर अंदर प्रवेश करने में सफल हो गया। इस प्रकार गुरु द्रोणाचार्य की सारी योजनाओं पर पानी फिर गया। अभिमन्यु के शौर्य और साहस को देखकर वह स्वयं आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें यह तो आभास था कि अभिमन्यु अपने पिता अर्जुन की अनुपस्थिति में उनके द्वारा रचे गये चक्रव्यूह को तोड़ने का प्रयास करेगा, परंतु वह यह नहीं जानते थे कि वह न केवल प्रयास करेगा अपितु उन्हें परास्त करने की सीमा तक पहुँच जाएगा। चक्रव्यूह में प्रविष्ट होते ही शत्रु समूहों का विनाश करता हुआ अभिमन्यु निर्विघ्न आगे बढ़ता जा रहा था।

महाबली वीर अभिमन्यु शीघ्रतापूर्वक युद्ध करने में कुशल, शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलाने वाला और शत्रुओं के मर्म स्थलों को जानने वाला था। जैसे यज्ञ में वेदी पर कुश बिछाए जाते हैं उसी प्रकार अभिमन्यु ने तुरंत ही शत्रुओं के शरीरों तथा विभिन्न अवयवों से सारी युद्धभूमि को पाट दिया। शवों के लगे इस ढेर को देखकर दुर्योधन की आँखें फटी की फटी रह गई। वह समझ गया कि अभिमन्यु भी अपने पिता अर्जुन से किसी प्रकार कम नहीं है। अभिमन्यु के बारे में बताया गया है कि वह वीर योद्धा युद्ध के लिए उत्साह से भरा हुआ था। यही कारण था कि वह घूम घूम कर द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य, शल्य, अश्वत्थामा और महाबली भोज- इन सब महारथियों पर बाणों का तीव्र प्रहार कर निरंतर आगे बढ़ता जा रहा था।

प्रफुल्लित द्रोणाचार्य बोले- “उस समय महाबुद्धिमान और प्रतापी वीर द्रोणाचार्य के नेत्र हर्ष से खिल उठे। उन्होंने युद्ध विशारद अभिमन्यु को युद्ध में स्थित देखकर दुर्योधन के मर्म स्थल पर चोट सी करते हुए कृपाचार्य को संबोधित करते हुए कहा- “यह पार्थ कुल का प्रसिद्ध तरुणवीर सुभद्रा कुमार अभिमन्यु अपने समस्त सुहृदों और राजा युधिष्ठिर को आनंद प्रदान करता हुआ जा रहा है। मैं दूसरे किसी धनुर्धर वीर को युद्ध क्षेत्र में इसके समान नहीं मानता। यदि यह चाहे तो इस सारी सेना को नष्ट कर सकता है, परंतु यह न जाने ऐसा क्यों नहीं कर रहा।”

गुरु द्रोण के ऐसे शब्द निश्चय ही उस वीर बालक की वीरता को प्रकट करने के लिए पर्याप्त हैं। यदि गुरु द्रोणाचार्य जैसे लोग अभिमन्यु की वीरता के समक्ष नतमस्तक हो जाएँ तो समझना चाहिए कि आज अभिमन्यु अप्रतिम वीरता का प्रदर्शन करते हुए युद्ध कर रहा था। गुरु द्रोणाचार्य के मुख से अर्जुन पुत्र वीर अभिमन्यु के संबंध में ऐसे प्रशंसात्मक शब्द सुनकर दुर्योधन को मानो आग लग गई। उसने गुरु द्रोणाचार्य को यह उपालंभ भी दिया कि वह अर्जुन पुत्र अभिमन्यु की रक्षा कर रहे हैं और उस पर जिस प्रकार प्रहार करना चाहिए वह वैसा प्रहार जानबूझकर नहीं कर रहे हैं। वास्तव में दुर्योधन सदा बौखलाहट का शिकार रहा परंतु इन शब्दों से उसकी बौखलाहट और वीर अभिमन्यु की वीरता के प्रति उसकी अप्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति स्पष्ट होती है।

“महावीर की भाँति अपने पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए वीर अभिमन्यु ने दुर्योधन के अनुज दुःशासन को बुरी तरह घायल कर दिया। वह बाणों की गहरी चोट खाकर व्यथित होकर रथ की बैठक में बैठ गया।”

कर्ण और अभिमन्यु

इसके पश्चात् कर्ण पर भी अभिमन्यु भारी पड़ा। दो ही घड़ी में महापराक्रमी वीर अभिमन्यु ने एक बाण मारकर कर्ण के ध्वज और धनुष को काटकर पृथ्वी पर गिरा दिया। कर्ण जैसे महारथी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस अर्जुन को वह लक्ष्य बनाकर चल रहा है, उसके सुपुत्र के हाथों उसे इस प्रकार की पराजय झेलनी पड़ेगी? अपमानित हुआ कर्ण ठगा सा देखता रह गया और वीर अभिमन्यु अपनी वीरता का प्रदर्शन करते हुए आगे बढ़ गया।

कर्ण को संकट में पड़ा देख उसका छोटा भाई सुदृढ़ धनुष हाथ में लेकर तुरंत ही सुभद्रा कुमार का सामना करने के लिए आ पहुँचा। अपने भाई और कौरव सेना के गौरव कर्ण के लिए सुदृढ़ का इस प्रकार आना स्वाभाविक था।

यद्यपि उसने यह विचार नहीं किया कि जो अभिमन्यु उसके महा धनुर्धर भाई कर्ण को पराजित कर सकता है उसके लिए वह किस खेत की मूली है? अभिमन्यु ने अपनी वीरता का प्रदर्शन करते हुए कर्ण के उस भाई का मस्तक एक ही बाण से काटकर धरती पर गिरा दिया। इस प्रकार सुदृढ़ अभिमन्यु के समक्ष बहुत ही शिथिल सिद्ध हुआ और वह कुछ क्षणों में ही संसार से चला गया।

पांडव और जयद्रथ

 उधर युधिष्ठिर, भीमसेन, शिखंडी, सात्यकि, नकुल, सहदेव, धृष्टद्युम्न, विराट और अन्य योद्धा सभी युद्ध भूमि में आगे बढ़े। अभिमन्यु के ताऊ, चाचा और मामा गण अपनी सेना को भी व्यूह द्वारा संगठित करके प्रहार करने के लिए उद्यत हौ अभिमन्यु की रक्षा के लिए उसी के बनाए मार्ग से व्यूह में प्रविष्ट होने के लिए एक साथ दौड़ पड़े।

 उन वीरों को आक्रमण करते देख जयद्रथ ने उन्हें स्थिरतापूर्वक स्थापित करने की इच्छा से उनसे संघर्ष करना आरंभ कर दिया। तब जयद्रथ ने अकेले ही अपने अस्त्रों के तेज से क्रोध में भरे हुए पांडवों को रोक लिया। उसने अनीतिपरक कार्य करते हुए पांडवों के लिए सुभद्राकुमार अभिमन्यु ने जो मार्ग बनाया था, उसे बंद कर दिया। पांडव पक्ष की ओर से जिस किसी ने भी किसी रास्ते से निकलने का प्रयास किया उसी को जयद्रथ ने धृष्टतापूर्वक बंद कर दिया। उसका यह कार्य युद्ध नियमों के विरुद्ध था। इसी को पांडव पक्ष ने उसका अधर्म समझा और जब इस बात की जानकारी अर्जुन को हुई तो उसने यह प्रतिज्ञा की कि जयद्रथ कल का सूर्यास्त नहीं देख पाएगा और यदि मैं कल के सूर्यास्त से पहले उसका वध नहीं कर सका तो मैं स्वयं अग्नि समाधि ले लूंगा।

इसी युद्ध में वीर अभिमन्यु के द्वारा दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण का भी वध किया गया था। जिससे झुंझला कर दुर्योधन ने अपने सभी महारथियों को आदेश दिया कि तुम सब मिलकर अभिमन्यु को मार डालो। तब आचार्य द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, वृहदबल और कृतवर्मा इन 6 महारथियों ने अभिमन्यु को घेर लिया। ये सारे के सारे महारथी न केवल महारथी थे बल्कि विद्वान भी थे। परंतु उनकी मति मारी गई और उन्होंने युद्ध नियमों का उल्लंघन करते हुए वीर अभिमन्यु को घेर लिया। महाभारत के उपरोक्त प्रकरण में स्पष्ट रूप से उल्लिखित किए गए
इन 6 नामों से यह स्पष्ट हो जाता है कि 7 महारथियों के द्वारा अभिमन्यु का वध नहीं किया गया था बल्कि उनकी संख्या 6 थी।

कर्ण-द्रोणाचार्य का संवाद- उस समय कर्ण ने युद्ध भूमि में द्रोणाचार्य से यह पूछा था कि “आचार्य! अभिमन्यु हम लोगों को मार डाले, इससे पूर्व ही हमें शीघ्र यह बताइए कि इसका वध किस प्रकार होगा? “इस वक्तव्य से कर्ण की बौखलाहट और निराशा स्पष्ट झलकती है।

इस पर द्रोणाचार्य ने कहा कि कर्ण! अभिमन्यु का कवच अभेद्य है और यह तरुणवीर शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करने वाला है। परंतु मनोयोग पूर्वक चलाये गये बाणों से इसके धनुष और प्रत्यंचा को काटा जा सकता है। साथ ही इसके घोड़ों की बागडोरों को, घोड़ों को और दोनों पार्शवरक्षकों को भी नष्ट किया जा सकता है। महा धनुर्धर राधा पुत्र! यदि कर सको तो यही करो। अभिमन्यु को युद्ध से विमुख करके फिर इस पर प्रहार करो। धनुष हाथ में लिए रहने पर तो इसे संपूर्ण देवता और असुर भी नहीं जीत सकते। यदि तुम इसे परास्त करना चाहते हो तो इसके रथ और धनुष को नष्ट कर दो।"

आचार्य द्रोण के मुख से ऐसे शब्द सुनकर कर्ण ने वैसा ही किया जैसा उसे बताया गया था। इसके बाद 6 निर्दयी महारथी एक साथ ही उस वीर युवक अभिमन्यु पर बाणों की वर्षा करने लगे। गुरु द्रोणाचार्य ने अभिमन्यु की मुट्ठी में स्थित मणिमय मूठ से युक्त खड्ग को काट दिया। कर्ण ने अपने तीखे तीरों द्वारा उसकी उत्तम ढाल के टुकड़े टुकड़े कर डाले। खड्ग और ढाल से रहित हो जाने पर अभिमन्यु चक्र हाथ में ले कुपित हो द्रोणाचार्य की ओर दौड़ा। तब सारे महारथियों ने मिलकर उस चक्र के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।

दुःशासन ने किया प्रहार

  उस समय दुःशासन ने उस पर अपनी गदा का ऐसा प्रहार किया जो उसके मस्तक पर गहरी चोट कर गया। गदा के उस महान् वेग और परिश्रम से मूर्छित होकर शत्रु वीरों का संहारक अभिमन्यु पृथ्वी पर गिर पड़ा। जिस पर कौरव दल के महारथी अति प्रसन्न होकर सिंहनाद करने लगे। जबकि पांडव वीरों के नेत्रों से आँसू बहने लगे। तब पांडव सेना में भगदड़ मची देख धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने पक्ष के उन वीरों को वीरता भरे वचन सुनाते हुए कहा कि तुम सब लोग धैर्य धारण करो। भयभीत मत होओ। हम लोग युद्ध भूमि में शत्रु को अवश्य जीतेंगे।

सुभद्रा कुमार अभिमन्यु के पृथ्वी पर गिर जाने के बाद जहाँ धर्मराज युधिष्ठिर ने विलाप करते हुए अन्य बातें कहीं, वहीं उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि मैंने ही अपने प्रिय कार्य की इच्छा तथा विजय की अभिलाषा रखकर सुभद्रा, श्री कृष्ण और अर्जुन का यह अप्रिय कार्य किया है।

 लोभी (अर्थात् मैं राज्य के लोभ में स्वयं लोभी बन गया) मनुष्य किसी कार्य के दोष को नहीं समझता। वह लोभ और मोह के वशीभूत होकर उसमें संलग्न हो जाता है। मैंने मधु के समान मधुर लगने वाले राज्य को पाने की इच्छा रखकर यह नहीं देखा कि इसमें ऐसे भयंकर पतन का भय है। जिसको भोजन और शयन करने, सवारी पर चलने तथा आभूषण और वस्त्र पहनने में आगे रखना चाहिए था उसे हम लोगों ने युद्ध में आगे कर दिया।"

 धर्मराज युधिष्ठिर के इस कथन से भी इस बात की पुष्टि होती है कि उन्होंने ही अभिमन्यु को युद्ध में आगे किया था।

   *अर्जुन और कृष्ण पहुँचे अपने शिविर में* - जब अर्जुन और श्री कृष्ण अपने शिविर में पहुँचे तो अर्जुन ने अपने भाइयों की ओर कौतूहल भरी दृष्टि से देखते हुए कहा कि- "मैंने सुना है कि आज आचार्य द्रोण ने चक्रव्यूह की रचना की थी। आप लोगों में से अभिमन्यु कुमार के सिवा दूसरा कोई उस व्यूह का भेदन नहीं कर सकता था। मैंने उसे अभी चक्रव्यूह से निकलने का ढंग नहीं बताया था। कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि आप लोगों ने उस बालक को शत्रु के व्यूह में भेज दिया हो। शत्रु बीरों का संहारक महाधनुर्धर सुभद्रा कुमार अभिमन्यु युद्ध में शत्रुओं के उस व्यूह का अनेक बार भेदन करके अंत में वहीं मारा ती नहीं गया?"

   अर्जुन का यह कथन फिर इस बात की पुष्टि कर रहा है कि सुभद्रा कुमार अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदन का ज्ञान माता के गर्भ में न होकर उसके पिता के द्वारा कराया गया था। महाभारत के द्रोण पर्व के आठवें अध्याय के 43 वें श्लोक से हमें पता चलता है कि महाराज युधिष्ठिर ने अपने भाई अर्जुन को सारा वृत्तांत बताते हुए यह भी स्पष्ट किया कि हम लोगों ने ही सुभद्रा कुमार अभिमन्यु से कहा था कि "तात! तुम इस व्यूह का भेदन करो, क्योंकि तुम ऐसा करने में समर्थ हो।"

     महाराज युधिष्ठिर ने अर्जुन को यह भी बताया कि "तत्पश्चात् द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, वृहदबल, कृतवर्मा-इन 6 महारथियों ने सुभद्रा कुमार को चारों ओर से घेर लिया।"

           महाभारत के उपरोक्त प्रसंग में कहीं पर भी यह उल्लेख नहीं है कि अभिमन्यु के शरीर को या सिर को जयद्रथ ने लात मारी थी। द्रोण पर्व के आठवें अध्याय के 49 वें श्लोक में धर्मराज युधिष्ठिर ने यह भी स्पष्ट किया है कि दुःशासन के पुत्र द्वारा सभी महारथियों द्वारा रथहीन किए हुए अभिमन्यु को गदा के प्रहार से मार डाला गया।

          *अर्जुन ने ली और प्रतिज्ञा- इ* सी अध्याय में अर्जुन ने कहा कि मैं आप लोगों के समक्ष सत्य प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि कल जयद्रथ को अवश्य मार डालूंगा। महाराज! यदि वह मारे जाने के भय से डरकर धृतराष्ट्र के पुत्रों को छोड़ नहीं देगा, मेरी, पुरुषोत्तम श्री कृष्ण की अथवा आपकी शरण में नहीं आ जाएगा तो कल उसे अवश्य मार डालूंगा। जो धृतराष्ट्र के पुत्रों का प्रिय कर रहा है जिसने मेरे प्रति अपना सौहार्द भुला दिया है और जो बालक अभिमन्यु के वध में प्रमुख कारण बना है, मैं उस पापी जयद्रथ को कल अवश्य मार डालूंगा।"

अर्जुन की इस प्रतिज्ञा में भी कहीं पर भी यह नहीं कहा गया है कि जिस जयद्रथ ने मेरे पुत्र अभिमन्यु के शव को लात मारी मैं उसे कल अवश्य मार डालूंगा।

इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि अभिमन्यु को चक्रव्यूह तोड़ने का ज्ञान अपनी माता के गर्भ में नहीं हुआ था बल्कि उसके पिता के द्वारा बताने और
समझाने पर हुआ था। दूसरे, उसे चक्रव्यूह तोड़ने के लिए उसके ज्येष्ठ पिता श्री धर्मराज युधिष्ठिर और उनके भाइयों ने ही तैयार किया था। तीसरे, लोक प्रचलित मान्यता के अनुसार जयद्रथ ने अभिमन्यु की मृत देह को लात नहीं मारी थी, बल्कि उसके द्वारा पांडवों को गलत ढंग से रोक लेने की घटना से प्रेरित व आहत होकर अर्जुन ने उसका वध करने की प्रतिज्ञा ली थी।

(यह लेख हमने स्वामी जगदीश्वरानंद जी कृत ‘महाभारत’ के आधार पर तैयार किया है। जिसके प्रकाशक ‘विजयकुमार गोविंदराम हासानंद’ है।)
क्रमशः

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