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इतिहास के पन्नों से

राम की तरह मत्स्य अवतार की घटना अयोध्या में हुआ था : आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

अयोध्या हिंदुओं और उससे उद्भृत बौद्धों, जैनियों और सिक्खों का सबसे प्राचीन नगर रहा है। वह सात पवित्र (सप्त तीर्थ पुरियों) में एक है। अथर्ववेद में इसे ईशपुरी कहा गया है। इसके वैभव की तुलना स्वर्ग से की गई है। इसका निर्माण भगवान राम के जन्म से बहुत पहले हो चुका था। अयोध्या में भगवान राम का जन्म हो इसके लिए देवताओं और ऋषि- मुनियों ने इसकी चौरासी कोस की परिधि में सालों तक कठोर तप किया, जिसके परिणाम स्वरूप भगवान विष्णु ने राम का अवतार लिया था । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। वैवस्वत मनु ने ही कोसल देश बसाया और अयोध्या को उसकी राजधानी बनाया था ।
वैवस्वत मनु को श्रद्धा देव और सत्यव्रत भी कहा जाता है, वर्तमान मनु हैं मानव जाति के पूर्वज रहे। वह हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान के वर्तमान कल्प के 14 मनुओं में से सातवें हैं। वह सूर्य देवता विवस्वान के पुत्र रहे ,जिन्हें सूर्य के नाम से भी जाना जाता है । मत्स्य पुराण में लिखा है कि अपना राज अपने बेटे को सौंप कर मनु मलय पर्वत पर तपस्या करने चले गये। दक्षिण भारत के एक पर्वत का नाम मलय है। यह पश्चिमी घाट में मैसूर राज्य के दक्षिण और ट्रावंकोर के पूर्व में है । आजकल इसको ‘तिरुवांकुर की पहाड़ी’ कहते हैं। यहाँ हजारों वर्ष तक तपस्या करने पर ब्रह्मा उनसे प्रसन्न होकर बोले – “बर मांग”।
राजा उनको प्रणाम करके बोले, “मुझं एक ही बर मांगना है। प्रलय काल में मुझे जड़ चेतन सब की रक्षा की शक्ति मिले” | इसपर ‘एवमस्तु’ कहकर ब्रह्मा अन्तर्धान हो गये और देवताओं ने फूल बरसाये थे। इसके अनन्तर मनु फिर अपनी राजधानी को लौट आये ।
एक दिन पितृ तर्पण करते हुये उनके हाथ से पानी के साथ एक नन्ही सी मछली गिर पड़ी। दयालु राजा ने उसे उठाकर घड़े में डाल दिया। परन्तु दिन में वह नन्ही सी मछली इतनी बड़ी हो गयी कि घड़े में न समायी। मनु ने उसे निकाल कर बड़े मटके में रख दिया ।
जब मछली तीन हाथ की हो गयी और मनु से कहने लगी , राजन आप हम पर दया कीजिये और हमें बचाइये । तब मनु ने उसे मटके में से निकाल कर कुयें में डाल दिया । थोड़ी देर में कुआं भी छोटा पड़ गया तब वह मछली एक बड़े तलाव में पहुँचा दी गयी । यहाँ वह योजन भर लम्बी हो गई तब मनु ने उसे (गंगा = सरयू नदी) में डाला । वहाँ भी वह बढ़ी तो महासागर भेज दी गयी। फिर भी उसकी बाढ़ न रुकी तब तो मनु बहुत घबराये और कहने लगे “क्या तुम असुरों के राजा हो ? या साक्षात् बासुदेव हो जो बढ़ते बढ़ते सौ योजन के हो गये । हम तुम्हें पहचान गये, तुम केशव हृषीकेश जगन्नाथ और जगद्धाम हो।”
भगवान् बोले “तुमने हमें पहचान लिया । थोड़े ही दिनों में प्रलय होने वाली है , जिसमें बन और पहाड़ सब डूब जायेंगे । सृष्टि को बचाने के लिये देवताओं ने यह नाव बनायी है । इसी में स्वंदज, अण्डज, उद्भिज और जरायुज रक्खे जायेंगे । तुम इस नाव को ले लो और आनेवाली विपत्ति से सृष्टि को बचाओ। जब तुम देखना कि नाव बही जाती है तो इसे हमारे सींघ में बाँध देना । दुखियों को इस संकट से बचाकर तुम बड़ा उपकार करोगे । तुम कृतयुग में एक मन्वन्तर राज करोगे और देवता तुम्हारी पूजा करेंगे।”
मनु ने आगे मत्स्य रूपा प्रभु से पूछा कि प्रलय कब होगी और आप के फिर कब दर्शन होंगे। मत्स्य भगवान् ने उत्तर दिया कि “ सौ वर्ष तक अनावृष्टि होगी, फिर काल पड़ेगा और सूर्य की किरणें ऐसी प्रचंड होंगी कि सारे जीव जन्तु भस्म हो जायेंगे फिर पानी बरसेगा और सब जल – थल हो जायगा। उस समय हम सींगधारी मत्स्य के रूप में प्रकट होंगे। तुम इस नाव में सब को भर कर इस रस्सी से हमारे सींग में बाँध देना।
मत्स्य रूपा प्रभु ने अयोध्यापुरी का वर्णन करते हुए कहा कि जिस प्रकार मत्स्य का आकार होता है। उसी प्रकार से अयोध्या का आकार होगा । अयोध्या 12 योजन लंबी और 3 योजन चौड़ी है। सृष्टि के शुरुआत में, भगवान ब्रह्मा ने पृथ्वी के पहले चार पीढ़ी इस प्रकार बनाई थी। शुरुवात में पहली पीढ़ी की शुरूआत सबसे पहले ब्रह्मा की उत्पत्ति से हुई। दूसरी पीढ़ी में ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि हुए थे। तीसरी पीढ़ी में मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। चौथी पीढ़ी में कश्यप के पुत्र हुए विवस्वान हुए। ये सब ब्रह्म देव की प्रेरणा और आशीर्वाद से आगे बढ़ते रहे। भगवान सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु को बनाया। भगवान सूर्य के पुत्र होने के कारण मनु जी सूर्यवंशी कहलाए और उन्हीं से यह वंश सूर्यवंश कहलाया। बाद में अयोध्या के सूर्यवंश में प्रतापी राजा रघु ने कहा। राजा रघु से इस वंश को रघुवंश कहा गया। इक्ष्वाकु वंश के आचार्य वशिष्ठ जी थे जिन्होंने इस प्रकार श्री राम के वंश का वर्णन किया है –
“इक्ष्वाकु वंश सूर्य वंश या रघुवंश के राम के पूर्वजों को
पांचवी पीढ़ी में विवस्वान के पुत्र वैवस्वत हुए। जैसा कि रामायण में बताया गया है, अयोध्या की खोज मूल रूप से हिंदू कानून-निर्माता मनु ने की थी। जल प्लावन मत्स्य अवतार वेदों की रक्षा और अयोध्या नगर को बसाने में सतयुग की ब्रह्मा आदि सहित पांच पीढ़ियां अपने को न्योछावर कर दी थीं।
भगवान विष्णु का यह अवतार सृष्टि के अंत में हुआ था जब प्रलय काल आने में कुछ वक्त बचा था। मत्स्य अवतार भगवान विष्णु के प्रथम अवतार रहा है। मछली के रूप में अवतार लेकर भगवान विष्णु ने एक ऋषि सत्यव्रत मनु को सब प्रकार के जीव-जंतु एकत्रित करने के लिए कहा था। आप एक बड़ी सी नाव बना लीजिए और उसमें सभी प्रकार की औषधि और बीज रख लीजिए ताकि प्रलय के बाद फिर से सृष्टि के निर्माण का कार्य पूरा हो सके।
प्रलय आने से पहले भगवान सत्यव्रत के पास आए और उनसे कहा कि आप अपनी नाव को मेरी सूंड में बांध दीजिए। सत्यव्रत परिवार सहित नाव पर सभी प्रकार के बीज और औषधि लेकर सवार हो गए और प्रलय काल के अंत तक भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार के सहारे महासागर में तैरते रहे। मत्स्य अवतार में भगवान ने चारों वेदों को अपने मुंह में दवाए रखा और जब पुनः सृष्टि का निर्माण हुआ तो ब्रह्मा जी को वेद सौंप दिए। इस तरह भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लेकर प्रलय काल से लेकर सृष्टि के फिर से निर्माण का काम पूरा किया।
एसी भी कथा है कि सृष्टि के निर्माण के समय जब चारों तरफ जल ही जल था तब पृथ्वी की स्थापना के लिए मत्स्य भगवान ही महासागर के तल में जाकर अपने मुंह में मिट्टी लेकर आए थे और इससे जल के ऊपर पृथ्वी का निर्माण किया गया था।
एक दूसरी मान्यता के अनुसार एक बार ब्रह्माजी की असावधानी के कारण एक राक्षस ने जब वेदों को चुराकर सागर की अथाह गहराई में छुपा दिया । उस दैत्य का नाम हयग्रीव था। वेदों को चुरा लिए जाने के कारण ज्ञान लुप्त हो गया। चारों ओर अज्ञानता का अंधकार फैल गया और पाप तथा अधर्म का बोलबाला हो गया। तब भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा के लिए मत्स्य रूप धारण करके हयग्रीव का वध किया और वेदों की रक्षा की।भगवान ने ब्रह्माजी को पुन: वेद दे दिए। इस प्रकार भगवान ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों का उद्धार तो किया ही, साथ ही संसार के प्राणियों का भी अमिट कल्याण किया।
वाल्मीकि रामायण में अयोध्या का वर्णन :-
अयोध्या नगर के वैभव का वर्णन वाल्मीकि रामायण में विस्तार से आता है। ऋषि वाल्मीकि रामायण के ‘बालकांड’ में अयोध्या का वर्णन करते हुए कहते हैं –
कोसलो नाम मुदितः स्फीतो जनपदो महान् ।
निविष्ट सरयूतीरे प्रभूतधनधान्यवान ।।
अयोध्या नाम नगरी तत्रासील्लोकविश्रुता ।
मनुना मानवेंद्रेण या पुरी निर्मिता स्वयंम् ।।
आयता दश च द्वे च योजनानि महापुरी ।
श्रीमती त्रीणि विस्तीर्णा सुविभक्तमहापथा ।।
(अर्थात — सरयू नदी के तट पर एक खुशहाल कोशल राज्य था । वह राज्य धन और धान्य से भरा पूरा था । वहां जगत प्रसिद्ध अयोध्या नगरी है । रामायण के अनुसार इसका निर्माण स्वयं मानवों में इंद्र मनु ने किया था । यह नगरी बारह योजनों में फैली हुई थी । अयोध्या भगवान बैकुण्ठ नाथ की थी | इसे महाराज मनु पृथ्वी के ऊपर अपनी सृष्टि का प्रधान कार्यालय बनाने के लिए भगवान बैकुण्ठनाथ से मांग लाये थे।)
बैकुण्ठ से लाकर मनु ने अयोध्या को पृथ्वी पर अवस्थित किया और फिर सृष्टि की रचना की | उस विमल भूमि की बहुत काल तक सेवा करने के बाद महाराज मनु ने उस अयोध्या को इक्ष्वाकु को दे दिया | वह अयोध्या जहाँ पर साक्षात भगवान ने स्वयं अवतार लिया | सभी तीर्थों में श्रेष्ठ एवं परम मुक्ति धाम है |मुनि लोग विष्णु भगवान के अंगों का वर्णन करते हुए अयोध्यापुरी को भगवान का मस्तक बतलाते हैं ।समस्त लोकों के द्वारा जो वन्दित है, ऐसी अयोध्यापुरी भगवान आनन्दकन्द के समान चिन्मय अनादि है | यह आठ नामों से पुकारी जाती है अर्थात इसके आठ नाम हैं हिरण्या, चिन्मया, जया, अयोध्या, नंदिनी, सत्या, राजिता और अपराजिता । भगवान की यह कल्याणमयी राजधानी साकेतपुरी आनन्दकन्द भगवान श्रीकृष्ण के गोलोक का हृदय है | इस देश में पैदा होने वाले प्राणी अग्र जन्मा कहलाते हैं | जिसके चरित्रों से समस्त पृथ्वी के मनुष्य शिक्षा ग्रहण करते हैं | मानव सृष्टि सर्वप्रथम यहीं पर हुई थी |
यह अयोध्यापुरी सभी बैकुण्ठों (ब्रह्मलोक, इन्द्रलोक, विष्णुलोक, गोलोक आदि सभी देवताओं का लोक बैकुण्ठ है) का मूल आधार है | तथा जो मूल प्रकृति है (जिसमें दुनिया पैदा हुई है) उससे भी श्रेष्ठ है | यह सदरूप है यह ब्रह्ममय है सत, रज, तम इन तीनों गुणों में से रजोगुण से रहित है | यह अयोध्यापुरी दिव्य रत्नरूपी खजाने से भरी हुई है और सर्वदा नित्यमेव श्रीसीतारामजी का बिहार स्थल है ।
अयोध्या का परिमाप :-
अयोध्या का परिमाप स्कंध पुराण के वैष्णव खंड अयोध्या महात्म्य १ /६४–६५ में कहा गया है कि सहस्रधारा (लक्ष्मण घाट) इसका मध्य भाग है। इससे एक योजन पूर्व,सरयू नदी से एक योजन दक्षिण, समंत से एक योजन पश्चिम तथा तमसा नदी से एक योजन उत्तर तक अयोध्या नगरी रही है।
अयोध्या का मत्स्याकार स्वरूप:-
विष्णोस्ससुदर्शने चक्रेस्थिता पुण्यांकुरा सदा।
यत्र साक्षात् स्वयं देवो विष्णुर्वसति सर्वदा।।
सहस्रधारामारभ्य योजनं पूर्वतो दिशि।
पश्चिमे च यथा देवि योजनं संमतोवधि।।
मत्स्याकृतरियं भद्रे पुरी विष्णो रुदिरिता।
पश्चिमेतस्य मूर्धा तू गोप्रताराश्रता प्रिये।।
पूर्वत: पुच्छभागो हि दक्षिणोत्तर मध्यमा।।
एतत् क्षेत्रस्य संस्थानम् हरेरंतगृहम स्मृतम।
(अर्थात अयोध्या में श्रीहरि विष्णु के सुदर्शन चक्र पर स्थित है। यहां सदैव पुण्य का वास रहता है। वह स्वयं सदैव यहां् विराजमान रहते हैं। अयोध्या का निर्धारण करते हुए पुराण में कहा गया है कि सहस्रधारा (लक्ष्मण घाट) इसका मध्य स्थल है। इससे एक योजन पूरब इसका पुच्छ भाग तो एक योजन पश्चिम इसका सिर भाग है। इसकी आकृति मत्स्याकार है। साथ ही इसका मध्य भाग उत्तर से दक्षिण है।)
भौगोलिक परिवर्तनों के बावजूद अयोध्या आज भी मनु से बसाई गई अयोध्या के स्वरूप में है। पश्चिम में गुप्तारघाट तो पूरब में बिल्वहरिघाट को यहां के लोग सिर व पुच्छ भाग मानते हैं। सहस्रधारा आज भी अयोध्या के मध्य भाग में स्थित है। प्राचीन अयोध्या को कोसल साकेत, इच्छवाकु भूमि और रामपुरी आदि के नाम से भी जाना जाता है। इक्ष्वाकु वैवस्वत मनु के सबसे बड़े पुत्र थे। धरती का दूसरा नाम पृथ्वी इस वंश के छठे राजा पृथु के नाम पर पड़ा। गंगा को पृथ्वी पर लाने वाले इसी वंश परंपरा के भगीरथ थे। बाद में अयोध्या का इतिहास रघुवंश के नाम से आगे बढ़ा।
वासुदेव घाट अयोध्या में मत्स्य अवतार का अवतरण:-
वासुदेव घाट भगवान विष्णु के अवतार की कथा से जुड़ा है। यह अयोध्या के सबसे पुराने घाटों में से एक रहा है। अब यह स्नान घाट नहीं रहा है क्योंकि सरयू नदी उत्तर की ओर खिसक गई है और वह स्थान सूख गया है। यहां अनेक प्राचीन मंदिर और घनी आबादी बस गई है। पर बासुदेव घाट की कथा अभी भी बनी है। तीर्थयात्री अभी भी इस पवित्र स्थल पर आते हैं और तीर्थयात्रा करते हैं। मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु मत्स्य का अवतार लिए थे।मत्स्य अवतार ने वैवस्वत मनु की अवधि के दौरान महान जलप्रलय की स्थापना की थी। जब जलप्रलय का पानी कम हुआ तो सब कुछ खत्म हो गया और मनु अयोध्या में यहां ही प्रकट हुए थे।
कोप भवन में विष्णु के 24 अवतारो का दर्शन होता है :-
अयोध्या में भगवान विष्णु के 24 अवतारो का भी दर्शन होता है. 24 अवतार मंदिर राम जन्म भूमि परिसर के दर्शन मार्ग पर स्थित कोप भवन में है. इसी भवन में रानी केकई ने भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास भी दिया था । अयोध्या में एकमात्र ऐसा जगह है. जहां भगवान विष्णु के 24 अवतार का अलग-अलग रूपों में दर्शन होता है. इस जगह पर भगवान कृष्ण से लेकर भगवान राम ,कल्कि राम,वराह अवतार , नर नारायण, कपिल मुनि समेत भगवान विष्णु के 24 अवतार के दुर्लभ दर्शन होते हैं।

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