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पर्यावरण

प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से विनाश की तरफ बढ़ता पहाड़

बिना बिष्ट
हल्द्वानी, उत्तराखंड

विश्व आर्थिक मंच की वैश्विक जोखिम रिपोर्ट 2020 के अनुसार अगले 10 दशकों में शीर्ष जोखिमों में जलवायु परिवर्तन शामिल हो सकते हैं. यह जोखिम मानवजनित, पर्यावरणीय आपदाएं, जैव विविधता हानि व मौसमी घटनाएं हो सकती हैं. दरअसल पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखने के लिए प्रकृति और मानव के बीच तालमेल होना अत्यंत ही आवश्यक है. यह सिक्के के दो पहलू की भांति है. किसी एक में होने वाली कमी दूसरे को प्रभावित करती है. पिछले कई दशकों से मानव गतिविधियां जलवायु परिवर्तन का प्रमुख चालक रही हैं. शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, वनोन्मूलन व रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों का प्रयोग जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारक के रूप में देखे जा सकते हैं और इन कारकों का जनक मानव है. आधुनिकता व बढ़ती जनसंख्या के साथ तेजी से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है जो भविष्य में किसी विनाश का सूचक हो सकता है. प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से न केवल मानव, बल्कि वन्य जीवों पर भी इसका बुरा प्रभाव देखने को मिल रहा है.

जाने माने फोटोग्राफर और पर्यावरणविद पद्मश्री अनूप साह बताते हैं कि जिस ज्योलीकोट और सातताल जैसे क्षेत्र जो कभी अपनी प्राकृतिक सुंदरता व वन्य प्राणियों की फोटोग्राफी के लिए देसी व विदेशी फोटोग्राफरों को सालों भर आकर्षित करते थे, वही आज विकास की भेट चढ़ कर गुमनामी में खो गये हैं. अन्तर्राष्ट्रीय फोटोग्राफर होने के नाते अपने अनुभवों को साझा करते हुए वह बताते हैं कि उनके द्वारा जिस मनोहारी जंगल व कई वन्य जीवों के दृश्यों को कैमरे में क़ैद किया गया था, आज जलवायु परिवर्तन व मानव हस्तक्षेप के चलते उनमें से कई प्रजातियां विलुप्त सी हो गई हैं. अनूप साह बताते हैं कि प्रकृति का दोहन सबसे अधिक वन्य जीवों के आवास के लिए भंयकर सिद्ध हो रहा है. सरकारी योजनाओं के तहत पर्यावरण संरक्षण के लिए ऐसी प्रजातियों को रोपित किया जा रहा है जो इकोलॉजी को बदल रही हैं. यह अत्यंत ही गंभीर विषय है. जिस पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो इसके और भी अधिक दुष्परिणाम हो सकते हैं.

मानव वन्य जीवों में संघर्ष बढ़ने लगे हैं. मानव द्वारा जंगलों को काटकर आबादी क्षेत्रों में तब्दील कर दिया जा रहा है. वन्य जीवों को उनके घरों से बेघर किया जा रहा है. जिसके चलते सीमित स्थान होने से जानवरों द्वारा मानव बस्तियों पर हमला कर मानव को नुकसान पहुंचाया जा रहा है. भारत में पायी जाने वाली 1300 पक्षियों की प्रजातियों में अकेले 700 से अधिक प्रजातियां केवल उत्तराखंड में ही पायी जाती हैं. परंतु, विगत कई वर्षो से प्रकृति दोहन के चलते इनके प्राकृतिक वास समाप्त हो गये हैं और अब इन प्रजातियों की आधी संख्या ही देखने को मिल रही है. कठफोड़वा ऐसा पक्षी जो आवाज और सुन्दरता के चलते सभी का ध्यान अपनी ओर आर्कषित करता था. यह भी अब कम ही दिखाई दे रहे हैं. वहीं गौरैया की प्रजातियां जो कभी पूरे राज्य में दिखाई देती थी वह भी अब न के बराबर रह गयी है. मानव का प्रकृति में हस्तक्षेप जल्द ही कई पशुओं व पक्षियों की प्रजातियों को धरती से विलुप्त कर देगा.

वनों के दोहन पर अपने विचार रखते हुए ओखलकांडा के पर्यावरणविद् चन्दन नयाल का कहना है पर्वतीय क्षेत्रों में विकसित हो रही अलग अलग प्रजातियां संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को बदल रही हैं. वही आरामदायक जीवन यापन के लिए आवश्यक सामग्री निर्माण हेतु न जाने कितने पेड़ों का कटान किया जाता है. शुद्ध हवा, स्वच्छ जल और शान्ति के चलते पहाड़ों पर घर बनाना सबका सपना बन रहा है. एक अनुमान के अनुसार 01 नाली (लगभग 900 वर्ग फुट के बराबर) में 40 पेड़ होते हैं तो सोचिये यदि कोई एक नाली में निर्माण कार्य करता है तो अनुमानित 40 पेड़ों का कटान किया जाता होगा. इस प्रकार से यदि निर्माण कार्य होते रहेंगे तो पहाड़ों का अस्तित्व ही खतरे में आ जायेगा. इसका एक नुकसान जहां वन्य जीवों का हो रहा है वहीं पर्वतीय क्षेत्र की ग्रामीण महिलाएं भी इससे प्रभावित हो रही हैं. जो प्रतिदिन जंगलों से लकड़ी के गठठे लाती हैं तब कहीं उनके घर का चूल्हा जलता है. यदि पेड़ों की कटाई का सिलसिला नहीं रुका तो महिलाओं को जंगल से लकड़ियां इकठ्ठी करने में प्रतिदिन दोगुनी मेहनत करनी होगी. जो न केवल उनके समय बल्कि उनकी सेहत के लिए भी बुरा होगा.

इतना ही नहीं, राज्य कई औषधीय पौधों की प्रजातियों के लिए भी जाना जाता है. परंतु दोहन के चलते न केवल इनका नुकसान हो रहा है बल्कि आजीविका के रूप में भी यह बहुत बड़ी क्षति है. बहरहाल, वनस्पतियों और वन्य जीवों के संरक्षण के उदेदश्य से मनाये जाने वाले वन्य जीव सप्ताह को महज प्रतीकात्मक रूप में नहीं बल्कि धरातलीय रूप में भी लागू करने की ज़रूरत है. समाज में पर्यावरण संरक्षण की समझ पैदा करने की आवश्यकता है. इसके लिए नई पीढ़ी को जागरूक करने की जरूरत है. ईको सिस्टम को जानने और इसके संरक्षण के लिए इसे पाठ्यक्रम में पढ़ाने के साथ साथ इसे आम नागरिकों के साथ भी जोड़ने की आवश्यकता है. जिससे लोगों में सही जानकारी और जागरूकता से प्रकृति को बचाने में सकारात्मक सहयोग मुमकिन हो सके. अगर पहाड़ को बचाना है तो सबसे पहले इसके अंधाधुंध दोहन पर रोक लगानी होगी, अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब धरती पर वन्य जीव और मानव नहीं, केवल कंक्रीट के घर रह जायेंगे. (चरखा फीचर)

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