ब्रिक्स के बाद ड्रैगन की फुंफकार

अभी अभी हम ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ्रीका) की आर्थिक मोर्चेबंदी की सुर्खियों को पढ़ पढक़र मगन हो रहे थे और भारत चीन के संबंधों की नई-नई संभावनाएं तलाश रहे थे। लेकिन ब्रिक्स की प्रगति पर चीन ने जल्दी ही ब्रेक्स लगा दिये हैं। चीन ने भारत की आर्थिक मोर्चे पर हो रही तरक्की को शुरू से ही नापसंद किया है। आर्थिक प्रगति पर बढते भारत को चीन ही नहीं विश्व का कोई भी देश अच्छी नजर से नहीं देख रहा है, लेकिन चीन के लिए यह प्रगति कुछ खास ही तकलीफ देह साबित हो रही है।इसलिए चीन ने भारत को धमकी पूर्ण चेतावनी दी है कि दक्षिणी चीन सागर के विवादास्पद क्षेत्र में तेल एवं गैस की खोज करना भारतीय कंपनियों को महंगा सौदा साबित हो सकता है। चीन नहीं चाहता है कि इस विवादास्पद क्षेत्र में वियतनाम और भारत की ओएनजीसी विदेश लि. कंपनी मिलकर तेल खोजने के अपने अभियान को आगे बढायें। चीन अपनी साम्राज्यवादी नीति के लिए प्रसिद्घ है। यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि चीन अपनी आजादी से पूर्व विश्व की विभिन्न साम्राज्य वादी शक्तियों की शिकारगाह रहा है। सदियों तक बड़ी ही शर्मनाक और अपमान जनक स्थितियों से दो चार होता रहा। इन शक्तियों में ब्रिटेन सबसे आगे रहा। यद्यपि अमेरिका रूस, जापान जैसे देशों ने भी बहती गंगा में हाथ धोने का प्रयास किया चीन की लूट में। इन सबका प्रयास था कि चीन की लूट में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की।द्वितीय विश्वयुद्घ के बाद नई विश्व व्यवस्था में चीन की भागीदारी उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरूद्घ होनी चाहिए थी। लेकिन चीन ने साम्राज्यवाद की गली सडी व्यवस्थाओं को ही अपनी राष्टï्रीय नीतियों का अंग बना लिया। इसलिए आज चीन से विश्वशांति को गंभीर खतरा है। चीन ने दक्षिण चीन सागर विवाद को सुलझाने के लिए काफी लाबिग की है। परंतु वियतनाम, मलेशिया और फिलीपींस अपने स्वामित्व वाले द्वीपों पर अधिकार छोडने को तैयार नहीं है। इसलिए चीन के प्रतिनिधि वू शियूचुन ने कहा कि भारतीय कंपनियों को वहां सोच समझकर ही जाना चाहिए। आसियान में चीनी प्रतिनिधि शियूचून का कहना है कि चीन अपने दावे को कमजोर नहंी करेगा। उसका आशय साफ है कि चीन भारत सहित किसी भी देश की ऐसी गतिविधियों को बर्दाश्त नहंी करेगा जिससे दक्षिण चीन सागर के विवादित क्षेत्र पर दावा कमजोर होता हो। ऐसे में भारत को चाहिए कि वह ब्रिक्स और चीन भारत संबंधों को बिल्कुल अलग अलग करके ही देखें। भारत ने इस क्षेत्र की संपदा को विश्व संपदा कहकर अपनी उचित टिप्पणी की है, जो स्वागत योग्य है।

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