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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

देश का विभाजन और सावरकर, अध्याय -20 क असहनीय थी विभाजन की त्रासदी

1947 का अगस्त माह । मैं तब 4 वर्ष का था। पर उन दिनों की अनेक घटनाएं आज भी मेरे मन मस्तिष्क में ज्यों की त्यों जमी बैठी हैं। जिन बातों का अनुभव व्यक्ति को बहुत बड़ी अवस्था में जाकर होता है, वह मुझे बचपन के उन दिनों में हो गया था। चित्त पर उनकी यादें कुछ इस प्रकार बैठ गईं कि आज मिटाए से भी नहीं मिट पाती हैं।
आपत्ति के दिनों में लोगों को समूह, संप्रदाय या समाज की याद आती है। जब सुख के दिन होते हैं तो हर व्यक्ति अपने जीवन साथी और बच्चों के साथ खुश रहने का प्रयास करता है। 1947 अर्थात देश विभाजन के समय के वे दिन बड़े ही भयावह थे। उस समय लोगों को साथ रहना और समूह के रूप में एकत्र हो जाना अपने प्राण बचाने की सबसे बड़ी गारंटी दिखाई देती थी। सबका साथ पाकर ही उसमें सुरक्षा का आभास होता था। ‘अल्लाह हू अकबर’ के नारे उस समय प्राणलेवा दिखाई देते थे। उनकी याद आज तक कानों में गूंजती है। कई ऐसे चेहरे याद आते हैं जो बचपन की उस प्रभात में मुझे कुछ कुछ पहचानने में आने लगे थे, पर 1947 की उस त्रासदी में वे चेहरे कहीं अनंत में विलीन हो गए।

हर छत पर रखा था आत्मरक्षा का सामान

जब देश विभाजन की उस पीड़ा के दौर से गुजर रहा था तो एक दिन हमारे घर की छत पर मोहल्ले भर के लोग विराजमान थे। हमारे मोहल्ले में मात्र 20 या 25 घर थे। हर एक छत पर एक केरोसिन तेल का भरा कनस्तर रखा था। दो-दो फुट लंबे लकड़ी के डंडों पर रुई व कपड़े लपेटे गये थे। यह सारा सामान लड़ने के लिए नहीं था बल्कि किसी भी आकस्मिकता के क्षणों में आत्मरक्षा का एक उपाय मात्र था। उसमें हम कितना सफल हो पाएंगे ? – यह तो किसी को पता नहीं था। पर उन भयावह परिस्थितियों में आत्मरक्षा के लिए जितना किया जा सकता था, उतना करने का यह प्रयास मात्र था।
मुझे उस समय तो कुछ समझ नहीं आया कि इन डंडों का या मशालों का करना क्या है ? पर आज वह बता सकता हूं। उन सबको एकत्र करने का प्रयोजन क्या था और वह हमारे लिए उन भयावह परिस्थितियों में कितने कारगर हो सकते थे ? – इस बात की समझ बाद में आई। इसके उपरांत भी उस समय मुझे इतना अवश्य आभास था कि स्थिति परिस्थिति बहुत ही भयावह बन चुकी हैं। उन डंडों के सिरों पर तेल लगाकर उन्हें जलाया जाना था। समय आने पर गली में उन जलती मशालों को आने वाले आक्रांताओं पर फेंका जाना था। उस समय उन आक्रांताओं से बचने के लिए गांव के लोगों द्वारा छत पर भारी मात्रा में ईंट रोड़े रखे गए थे। कहने का अभिप्राय है कि हम सबकी रक्षा के लिए उस समय हमारे सबसे बड़े हथियार ईंट ,रोड़े और डंडों में लगाई गई मशालें थीं । वह समय ऐसा था कि कहीं दूर से जाकर हम ना तो हथियार ला सकते थे और ना ही उस समय हथियार बनाने की कोई सामग्री हमारे पास उपलब्ध थी।
मकानों की छतें ही हमारे लिए किला बन गई थीं। इन सब बातों से अनुमान लगाया जा सकता है कि एक वह संप्रदाय था जो चाकू छुरा चलाना बचपन से सीख जाता है, इसलिए समय आने पर चाकू और छुरों को ही अपनी प्राण रक्षा का आधार बना लेता है और एक हम हिंदू लोग थे जो पूर्णतया अहिंसावादी होते हैं और हथियार रखने को भी उचित नहीं मानते हैं। ऐसे में लड़ाई की तैयारी तो थी, पर यह लड़ाई केवल इतने तक सीमित थी कि यदि मरें तो मरने से पहले थोड़ा तो हाथ – पांव हिला ही लें। एक कौम विशेष से अपना संबंध बताने वाले लोग उस समय जल्लाद का रूप धारण कर चुके थे। उन्हें काफिरों का धनमाल लूटने और लूट के माल में काफिरों की बहन बेटियों को लेने का एक स्वर्णिम अवसर हाथ लगा था।

गांधी नेहरू की स्थिति

 गांधीजी और नेहरू जी उस काल में हमारे राष्ट्रीय नेता थे। गांधी जी ने एक बार कहा था कि पाकिस्तान मेरी लाश पर ही बनेगा। कांग्रेस के बड़े नेता होने के कारण हम लोग उनकी इस बात पर विश्वास कर रहे थे। हमें लगता था कि जो कुछ गांधी जी ने कहा है वही सत्य है और हमें अपने देश में ही अपना घर छोड़कर कहीं और के लिए पलायन करना नहीं पड़ेगा। आजादी के बाद कुछ बड़ा होने पर मैंने अपने घर के बड़े बुजुर्गों को चर्चा करते सुना कि गांधीजी यदि उस समय लोगों को यह विश्वास नहीं दिलाते कि पाकिस्तान उनकी लाश पर बनेगा और वह कदापि देश का बंटवारा स्वीकार नहीं करेंगे तो जितनी जानमाल की क्षति उस समय हम लोगों को उठानी पड़ी वह न उठानी पड़ती। अच्छा होता कि गांधीजी हिंदू समाज के लोगों को यह संकेत कर देते कि वह अपना सुरक्षित स्थान प्राप्त करने के लिए भारत की ओर आ जाएं। पर दुर्भाग्यवश उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया।
 देश विभाजन के पूर्व गांधीजी की उक्त बात को सुनकर उस समय हिंदू समाज के लोगों को थोड़ा भरोसा मिला था और उन्होंने सोचा था कि कांग्रेस के नेता देश का बंटवारा नहीं होने देंगे। उन्हें भरोसा था कि हमें अपने घर, स्थान , खेतीबाड़ी की भूमि को छोड़कर कहीं जाना नहीं पड़ेगा। अतः वे निश्चिंत होकर अपने काम धंधे में लगे हुए थे।  हम हिंदू लोगों ने यह सोचा ही नहीं था कि कांग्रेस के नेता और गांधी जी स्वयं समय आने पर हाथ खींच लेंगे और उस दस्तावेज पर स्वयं ही हस्ताक्षर कर देंगे जो देश के विभाजन के संबंध में था। जब कांग्रेस के नेता गांधी जी ने देश के विभाजन पर सहमति दे दी तो हमें अत्यंत पीड़ा हुई। आश्चर्य तो हमें उस समय हुआ जब जनसंख्या की अदला - बदली को भी कांग्रेस के नेताओं ने उचित नहीं माना और हम हिंदुओं को मुसलमानों के सामने उनका सबसे प्रिय शिकार बना कर डाल दिया। अपने मनपसंद शिकार को पाकर अर्थात काफिरों को असहाय देखकर मुसलमान उन पर गिद्ध की भांति टूट पड़े। कितने ही ऐसे मुसलमान थे जो हिंदुओं के साथ बड़े घनिष्ठता के संबंध रखते थे, पर समय आने पर उनकी नजरें टेढ़ी हो गईं और जो कल हिंदुओं के बच्चों को या बहू बेटियों को अपनी बहू बेटियां या बच्चों की भांति देखते थे,  वही अब उन पर गिद्ध दृष्टि रखे हुए थे।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( यह लेख मेरी नवीन पुस्तक “देश का विभाजन और सावरकर” से लिया गया है। मेरी यह पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स दिल्ली से प्रकाशित हुई है जिसका मूल्य ₹200 और पृष्ठ संख्या 152 है।)

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