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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से राजनीति

क्या भारत से कम्युनिस्ट आंदोलन विदा हो गया है ?

केरलम में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार का अंत होने के साथ ही कम्युनिस्टों का अंतिम किला ध्वस्त हो गया है। कई लोग इस पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कह रहे हैं कि इस किले के ध्वस्त होने से कम्युनिस्ट आंदोलन भारत से सदा के लिए विदा हो गया है। हमारा मानना है कि ऐसा कहना तो अभी जल्दबाजी होगी। हां, इतना अवश्य है कि हमें सावधान रहना होगा। किसी भी प्रकार का तूफान, उपद्रव, उत्पात और उग्रवाद दोबारा जन्म ना ले, इसके लिए राष्ट्रीय सहमति के साथ-साथ सामूहिक एकता की भी आवश्यकता है। इसका कारण केवल यह है कि कम्युनिस्ट आंदोलन पूर्णतया आतंकवाद पर टिका हुआ है । इसकी चित्ति में आतंकवाद है, उक्ति में आतंकवाद है, कृति में आतंकवाद है। अपने से विपरीत मत रखने वाले को मिटा दो- यह इसके चिंतन का मूल आधार है। इसलिए किसी भी कम्युनिस्ट से यह अपेक्षा करना कि वह लोकतंत्र के प्रति समर्पित होगा, चील के घोसले में मांस ढूंढने जैसा है। यह बात सदा ध्यान रखिए कि किसी भी कम्युनिस्ट को कभी भी लोकतंत्र नहीं चाहिए, क्योंकि वह लोकतंत्र में नहीं ठोकतंत्र में विश्वास रखता है।

यही कारण है कि प्रत्येक कम्युनिस्ट देश जब सर्वहारा क्रांति से अर्थात लाल क्रांति से गुजरा तो उसने खून की नदियां बहते हुए देखी हैं। जिन-जिन कम्युनिस्ट देशों में कम्युनिस्ट क्रांति हुई, वहां- वहां क्रान्ति से बचे हुए लोगों के चेहरों पर आज तक भी आतंक का साया है। बीती हुई शताब्दी कम्युनिस्ट आंदोलन के खूनी इतिहास की शताब्दी रही है। जिसने संभवत: बीते 100 वर्षों में कम्युनिस्ट सरकारों के द्वारा सबसे अधिक नरसंहार होता हुआ देखा है।

आर.जे. रुम्मेल के अनुसार ” सोवियत संघ सबसे बड़ा नरसंहार करने वाला देश प्रतीत होता है, जिसने कथित तौर पर लगभग 61,000,000 लोगों की हत्या की। इनमें से लगभग 43,000,000 लोगों की हत्या के लिए स्टालिन स्वयं जिम्मेदार है। इनमें से अधिकांश मौतें, संभवतः लगभग 39,000,000, गुलाग में घातक जबरन श्रम और वहां से ले जाने के दौरान हुईं। 1987 तक कम्युनिस्ट चीन, लेकिन मुख्य रूप से 1949 से सांस्कृतिक क्रांति तक, जिसने अकेले ही 1,000,000 से अधिक लोगों की हत्या की, दूसरा सबसे बड़ा नरसंहार करने वाला देश है। फिर उत्तर कोरिया और टीटो के युगोस्लाविया जैसे कम बड़े नरसंहार करने वाले देश भी हैं।

स्पष्ट है कि नरसंहार के लिए उपलब्ध आबादी की संख्या कुल नरसंहार में बहुत बड़ा अंतर पैदा करती है, और इसलिए नरसंहार की वार्षिक प्रतिशत दर बहुत कुछ दर्शाती है। अब तक, सभी साम्यवादी देशों में और वास्तव में इस सदी में सबसे घातक कंबोडिया खमेर रूज के शासनकाल में रहा है। पोल पॉट और उसके साथियों ने अप्रैल 1975 से दिसंबर 1978 के बीच लगभग 7,000,000 की आबादी में से लगभग 2,000,000 कंबोडियाई लोगों को मार डाला। यह प्रतिवर्ष आबादी के 8 प्रतिशत से अधिक की हत्या की दर है, या पोल पॉट के शासनकाल में एक औसत कंबोडियाई के जीवित रहने की संभावना 2 में से 1 से थोड़ी अधिक है।

संक्षेप में कहें तो, साम्यवादियों ने संभवतः लगभग 110,000,000 लोगों की हत्या की, जो 1900 से 1987 तक सभी सरकारों, अर्ध-सरकारी संस्थाओं और गुरिल्लाओं द्वारा मारे गए कुल लोगों का लगभग दो-तिहाई है। बेशक, विश्वव्यापी आंकड़ा अपने आप में चौंकाने वाला है। यह इस सदी के सभी अंतरराष्ट्रीय और घरेलू युद्धों में मारे गए 38,000,000 लोगों की संख्या से कई गुना अधिक है। फिर भी, अकेले सोवियत संघ (एक साम्यवादी देश) द्वारा की गई हत्याओं की संभावित संख्या युद्ध की इस कीमत से कहीं अधिक है। और साम्यवादी चीन द्वारा की गई हत्याएं लगभग इसके बराबर हैं।”

हमने यह उद्धरण यहां पर इसलिए प्रस्तुत किया है कि इन तत्वों के आलोक में कम्युनिस्ट आंदोलन की वास्तविकता को समझ सकें। कम्युनिस्ट 1977 में कांग्रेस से झटककर पश्चिम बंगाल पर कब्जा किया। इसके बाद उन्होंने पूरे प्रदेश को ही हिंदुओं के लिए एक जेलखाने में परिवर्तित कर दिया। ऐसा नहीं है कि कम्युनिस्ट मुस्लिम विचारधारा से सहमत हों, वह मुस्लिम विचारधारा से भी उतनी ही घृणा करते हैं जितनी आर्य/ हिंदू विचारधारा से करते हैं। यही कारण है कि चीन जैसे देश में मुसलमानों के लिए कुरान रखना तक वर्जित कर दिया गया है। परंतु भारत में ये लोग मुस्लिम समाज के प्रति सहानुभूति दिखाते हैं। इसका कारण केवल एक है कि हिंदुओं से निपटने के लिए वह एक ही साथ एक ही समय में दो शत्रु पालना उचित नहीं मानते। मुसलमानों से समझौता करके हिंदुओं को निपटाने में उनका सहयोग लेने के लिए उनके प्रति बनावटी उदारता दिखाते हैं। यही कारण है कि 1989 में पश्चिम बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार ने विधिवत यह शासनादेश जारी कर दिया था कि मुस्लिम शासकों के शासनकाल में हिंदुओं के प्रति दिखाई गई कट्टर सोच और उनके प्रति बरती गई हिंसा के सभी तथ्यों को इतिहास की पुस्तकों से निकाल दिया जाए। प्रत्येक कम्युनिस्ट की यह सोच है कि पहले हिंदू से निपटा जाए, उसके बाद इस्लाम की कट्टरता को समाप्त किया जाए।
कम्युनिस्ट लोगों की इस प्रकार की सोच को आर्य समाज, हिंदू महासभा और आरएसएस जैसे संगठन पहले दिन से समझते रहे हैं । यही कारण है कि इन संगठनों ने पहले दिन से कम्युनिस्ट विचारधारा के भारत विरोध की भावना को समझ कर उसे भारत का शत्रु स्वीकार किया है। इसी बिंदु पर जनजागरण करने का अभियान भी चलाया है। इन तीनों ही संगठनों की सोच कम्युनिस्टों को लेकर बड़ी स्पष्ट है। इनका मानना है कि यह कभी भी भारत भक्त नहीं हो सकते। परंतु कांग्रेस ने अपनी दोगली नीतियों का परिचय देते हुए कम्युनिस्टों को दूध पिलाने का काम किया। 1971 में जो कांग्रेस की नेता इंदिरा गांधी को सरकार चलाने के लिए कम्युनिस्टों के सहयोग की आवश्यकता पड़ी तो कम्युनिस्टों ने यह शर्त लगा दी कि समर्थन तो हम दे देंगे, परंतु हमें देश का शिक्षा मंत्रालय दीजिए। इंदिरा गांधी ने तुरंत कम्युनिस्टों की इस मांग को स्वीकार कर लिया। उससे पहले इंदिरा गांधी के पिता और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी इनके प्रति उदार दृष्टिकोण रखते आए थे। इंदिरा गांधी ने दो कदम और आगे जाकर कम्युनिस्टों को भारतीयता और हिंदू समाज की जड़ें खोदने का अवसर उपलब्ध करा दिया। परिणाम यह हुआ कि कम्युनिस्ट शिक्षा मंत्री नूरुल हसन ने देश के इतिहास और देश की वैदिक संस्कृति का विनाश करने में किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ी।

आज जब देश में भगवा सोच आगे बढ़ रही है, भारतीयता को प्रोत्साहित किया जा रहा है, वेद और वैदिक संस्कृति की बात करते हुए हिंदू समाज के उत्थान की बात हो रही है तो यह सोच और इस प्रकार का कार्य कम्युनिस्टों को किसी भी स्थिति में सहन नहीं है। इन्होंने पश्चिम बंगाल व केरल सहित देश के कई क्षेत्रों में भारत विरोधी तैयार किए हैं। जितने भर भी फ्रेंच कट दाढ़ीबाज कथित विद्वान आपको टी.वी. चैनलों पर बहस करते हुए दिखाई देंगे, उनके मुंह से आप एक शब्द भी भारत भक्ति का नहीं सुन सकते। कारण केवल एक है कि भारत का सनातन धर्म और सनातन धर्म की मान्यताएं कम्युनिस्टों को किंचित भी रास नहीं आतीं। इनकी सोच में नास्तिकता है जबकि भारत आस्तिक लोगों का देश है। लड़ाई के इस प्रमुख बिंदु को दृष्टि से ओझल करने का प्रयास किया जाता है और हमें ऊपरी एकता की बातों में भ्रमित करने का प्रयास किया जाता है। यह कुछ उसी प्रकार का है जैसे हविश के भूखे भेड़ियों के सामने किसी असहाय अबला को बहला फुसला कर भेज दिया जाए और फिर उसका शील भंग करा दिया जाए। हमको सच को समझना चाहिए।

इन लोगों ने मनसा वाचा कर्मणा भारत के सनातन स्वरूप को मिटाने का हर संभव प्रयास किया है। इसके लिए शिक्षा में मिलावट की गई है। भारत के गौरवशाली इतिहास को विलुप्त किया गया है। भारतीय परंपराओं का उपहास किया गया है और भारतीयता को तुच्छ सिद्ध करने का प्रयास किया गया है।

केरलम के लोगों का इस बात के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया जाना चाहिए कि उन्होंने कम्युनिस्ट शासन को उखाड़ फेंकने का निर्णय दिया है। परंतु इस निर्णय के साथ-साथ हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सामान्य रूप से यह देखा जाता है कि जिस प्रांत में एक दल को लोगों ने इस बार सत्ता सौंपी है, अगली बार उनसे सत्ता छीन कर वह फिर से पुरानी पार्टी को ही सत्ता सौंप देते हैं। केरलम में आज कांग्रेस की सरकार बनी है। कांग्रेस के बारे में भी हम सभी जानते हैं कि इसकी विचारधारा भी भारत भारतीयता और वैदिक संस्कृति के विरुद्ध रही है। इसने भी भारत के गौरवशाली इतिहास को मिटाने का काम करते हुए कम्युनिस्ट विचारधारा का सहयोग और समर्थन किया है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस के शासन के आज से आरंभ होने वाले 5 वर्ष के भीतर ही सभी देशभक्त शक्तियों को इस बात का प्रयास करना होगा कि कम्युनिस्ट अब जिस गड्ढे में फेके गए हैं, उससे बाहर निकलने का साहस नहीं कर पाएं। इसलिए हमको निरंतर सजग, सावधान और जागरूक रहना है। क्योंकि सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। हमको सामूहिक प्रयास करते हुए देश की शांति को भंग करने वाले प्रत्येक राजनीतिक और सामाजिक संगठन पर दृष्टि रखनी होगी। अतीत से शिक्षा लेकर वर्तमान को सुधारते हुए भविष्य सुरक्षित करना होगा। हमें उन देशों की परिस्थितियों से भी शिक्षा लेनी चाहिए, जहां-जहां पर कम्युनिस्ट क्रांति हो चुकी है और जिन्होंने इस क्रांति में अपने परिजनों या प्रियजनों को बड़ी संख्या में मरते हुए देखा है।

हमें ध्यान रखना होगा कि समस्या का निस्तारण तभी समझिए जब समस्या की जड़ों को ही खोज कर सुखा दिया जाए। केरम में जो कुछ वृक्ष की जड़ों को ना तो खुदा गया है और नहीं खोजा गया है।

– डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)

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